Prajatantra: जयंत चौधरी पर डोरे क्यों डाल रही BJP? पश्चिमी यूपी में किसको किसकी जरूरत

By अंकित सिंह | Feb 07, 2024

लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल अपनी तैयारी में जुटे हुए हैं। अब से लगभग 1 महीने के भीतर ही चुनावी तारीखों का ऐलान भी हो जाएगा। इसी के साथ जोड़-तोड़ की भी राजनीति देखने को मिल रही है। बिहार और झारखंड में सियासी हलचल के बाद अब उत्तर प्रदेश की बारी बनती दिख रही है। इसका बड़ा कारण राष्ट्रीय लोक दल के प्रमुख जयंत चौधरी हैं। जयंत चौधरी फिलहाल इंडिया गठबंधन के हिस्सा हैं। बावजूद इसके उनके भाजपा के साथ गठबंधन को लेकर अटकलें काफी जोरों पर है। यहां तक दावा किया जा रहा है कि जयंत चौधरी इंडिया गठबंधन को झटका देते हुए एनडीए का हिस्सा बन सकते हैं। खबर यह भी है कि भाजपा की ओर से जयंत चौधरी के समक्ष चार सीटों की पेशकश की गई है। 

जयंत भाजपा की जरूरत क्यों?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति देखें तो यहां जाट और मुस्लिम वोट का बोलबाला रहा है। क्षेत्र की कुल 27 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 2019 में 19 सीटों पर जीत हासिल की थी। आठ पर बसपा-सपा गठबंधन को जीत मिली थी। हालांकि, भाजपा को अपने उम्मीदवारों को जीत दिलाने के लिए जाट वोटरों के समर्थन की जरूरत रहती है। इसका बड़ा कारण यह भी है कि इधर मुस्लिम वोटो का बड़ा आधार है जो भाजपा के पक्ष में नहीं आता। जिन आठ सीटों पर पार्टी को 2019 में हार मिली थी वहां हर हाल में इस बार जीत हासिल करने की कवायद चल रही है ताकि 400 पार का आंकड़ा पूरा किया जा सके। 2014 में एनडीए ने जहां उत्तर प्रदेश में 80 में से 73 सीटों पर जीत हासिल की थी तो वही 2019 में आंकड़ा मात्र 64 का रह गया था। यही कारण है कि भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खुद को मजबूत करने के लिए जयंत चौधरी पर डोरे डाल रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जाट लैंड भी कहा जाता है जहां उनकी आबादी 18% है। अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट भाजपा गठबंधन के पक्ष में खड़े होते दिखाई देंगे तभी हरियाणा और राजस्थान में भी पार्टी को इसका फायदा मिलेगा। जयंत को अपने पाले में करने के साथ ही भाजपा इंडिया गठबंधन पर मनोवैज्ञानिक दवाब बनाने में कामयाब रहेगी। 

 

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जयंत को भाजपा की सबसे ज्यादा जरूरत

पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह और अजीत सिंह की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ते हुए जयंत चौधरी को अब तक कुछ खास सफलता नहीं मिली है। राष्ट्रीय लोक दल 2014 और 2019 के चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शून्य सीटों पर सिमट गई थी। 2014 में तो उसे सिर्फ 0.9% वोट मिला था। हालांकि 2019 में इसमें वृद्धि देखी गई। बावजूद इसके दोनों ही चुनाव में राष्ट्रीय लोक दल को एक भी सीट नहीं मिल सकी। 2014 के चुनाव में आरएलडी ने 8 सीटों पर चुनाव लड़ा था। जयंत चौधरी मथुरा से, बागपत से अजीत सिंह, अमरोहा से राकेश टिकैत जैसे दिग्गज नेताओं को हार मिली थी। यही कारण है कि 2024 में राजनीतिक भविष्य को देखते हुए जयंत को सोचना पड़ रहा है। जयंत को पता है कि राम मंदिर की लहर है और जाट समाज में यह बड़ा मुद्दा बन सकता है। जयंत को यह भी पता है कि जब सपा-बसपा और कांग्रेस के साथ गठबंधन में उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई तो इस बार तो सिर्फ सपा के साथ गठबंधन में इसकी उम्मीद करना कितना ठीक रहेगा? इसके अलावा जयंत को जिन सीटों की पेशकश की गई है, उनमें कैरना, बागपत, मथुरा और अमरोहा है। कैराना, बागपत और मथुरा में बीजेपी का लगातार दो बार से कब्जा है। ऐसे में जयंत को भी पता है कि इन चार सीटों में से कम से कम तीन पर तो उनकी पार्टी को जीत मिल सकती है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है। जयंत के करीबियों को विधान परिषद के रास्ते सेट किया जा सकता है। आरएलडी नेताओं को योगी सरकार में मंत्री भी बनाया जा सकता है।  

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