अब जेल से नहीं चलेगी सरकार, मोदी का नया कानून तमाम मंत्री-मुख्यमंत्रियों को क्यों डरा रहा है?

By अभिनय आकाश | Aug 20, 2025

भारत के संविधान निर्माताओं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इस देश के संसदीय लोकतंत्र के जीवन में कोई ऐसा क्षण भी आएगा कभी कि विभत्स और जघन्य अपराध में जेल जाने वाले मंत्री और मुख्यमंत्री जेल से शासन चलाने की दंभपूर्ण जिद करेंगे और अपने पद से त्यागपत्र देने से इनकार कर देंगे और कहेंगे कि हम जेल से शासन चलाएंगे। जेल में ही फाइलें साइन करेंगे। जेल में ही कैबिनेट की बैठक बुलाएंगे। संविधान निर्माताओं को हमेशा इस बात का भान रहा होगा कि ये भारत है और यहां सामाजिक जीवन में लोक-लाज का बड़ा महत्व है। भारत में लोकतंत्र लोक-लाज से भी संचालित होता है। इसलिए उन्हें लगा होगा कि कभी ऐसी स्थिति आएगी ही नहीं कि सत्ता के लिए राजनेता इस स्तर पर आ जाएंगे कि जेल से शासन चलाने की जिद करेंगे। अब आपराधिक मामलों में पीएम, सीएम या मंत्री कोई भी गिरफ्तार होता है तो उसको हटाने के लिए मोदी सरकार एक बिल लेकर आई है, जिस पर कांग्रेस इस पर भड़की हुई है। गंभीर अपराधों में गिरफ्तार किए जाने वाले प्रधानमंत्री हो, मुख्यमंत्री हो या फिर केंद्रीय मंत्री उन्हें हटाने के लिए लोकसभा में विधेयक पेश किया गया। 

विधेयक लाने की वजह

वर्तमान में गिरफ़्तारी के बाद भी मंत्रियों के अपने पद पर बने रहने पर कोई रोक नहीं है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में विधायकों और सांसदों को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान है, अगर उन्हें दो साल या उससे ज़्यादा की सज़ा वाले किसी अपराध में दोषी ठहराया जाता है। पिछले साल, तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और तमिलनाडु के मंत्री वी. सेंथिल बालाजी की गिरफ़्तारी के बाद, नेताओं के सत्ता में बने रहने का मुद्दा केंद्र और विपक्ष के बीच विवाद का विषय बन गया था। धन शोधन के एक मामले में गिरफ़्तार हुए बालाजी के मामले में, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने उन्हें बिना किसी विभाग के मंत्रिमंडल में बनाए रखा था। इस वजह से राज्यपाल के साथ उनकी तीखी बहस हुई थी। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भूमि घोटाला मामले में ईडी द्वारा गिरफ्तार किए जाने से ठीक एक दिन पहले जनवरी 2024 में इस्तीफा दे दिया था। 

संवैधानिक विश्वास को बढ़ाएगा

वर्तमान में निर्वाचित प्रतिनिधियों की अयोग्यता से संबंधित कानून मौजूद हैं। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, राज्य विधानसभाओं और संसद के सदस्यों को दो वर्ष या उससे अधिक की सजा मिलने पर अयोग्य घोषित किया जा सकता है। भ्रष्टाचार और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि के मामले में सजा की अवधि की परवाह किए बिना अयोग्यता की जा सकती है। केंद्र अब ऐसे कानून लाने जा रहा है जिनके तहत प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों सहित किसी भी मंत्री को 30 दिन या उससे अधिक समय तक गिरफ्तार रहने पर पद से हटाया जा सकेगा। प्रस्तावित विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के विवरण के अनुसार, गंभीर आपराधिक अपराधों के आरोपों का सामना कर रहा कोई मंत्री, गिरफ्तार और हिरासत में लिया गया, संवैधानिक नैतिकता और सुशासन के सिद्धांतों को विफल या बाधित कर सकता है और अंततः लोगों द्वारा उस पर रखे गए संवैधानिक विश्वास को कम कर सकता है।

केजरीवाल का मैटर बना टर्निंग प्वाइंट

राजनीतिक विश्वेषक कहते हैं कि ये मामला सरकार के लिए ट्रिगर प्वाइंट था। जिस बिल को सरकार अभी पेश करने जा रही है अगर ये कानून तब वजूद में होता तो ऐसी स्थिति में गिरफ्तार सीएम कुर्सी उनकी गिरफ्तारी के 31 दिन स्वत: ही चली जाती। अरविंद केजरीवाल के अलावा सत्येंद्र जैन भी कई महीनों तक जेल जाने के बावजूद अपने पद पर बने हुए थे। इसके अलावा तमिलनाडु के मंत्री सेंथिल बाला जी का मामला भी ऐसा ही था। जब उनपर आरोप लगे तो वहां के राज्यपाल ने उन्हें बर्खास्त करने की सिफारिश की थी। लेकिन कानूनी विचार विमर्श के बाद ये तय किया गया कि उन्हें पद से नहीं हटाया जाएगा।

प्रधानमंत्री को भी हटाया जा सकता है

प्रधानमंत्री को हटाने से जुड़े प्रावधान पर एक बिल में प्रावधान है कि यदि कोई प्रधानमंत्री, जो अपने पद पर बने रहने के दौरान लगातार 30 दिनों की अवधि के दौरान, किसी कानून के तहत अपराध करने के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और हिरासत में रखा जाता है, जिसमें पांच साल या उससे अधिक की जेल की सजा है तो उसे ऐसी गिरफ्तारी और हिरासत के बाद इकतीसवें दिन तक अपना त्यागपत्र दे देना होगा और यदि वह त्यागपत्र नहीं देता है, तो वह उसके बाद पड़ने वाले दिन से वह प्रधानमंत्री नहीं रहेगा। 

सुप्रीम कोर्ट के निशाने पर रहा था ईडी

विपक्ष ने आरोप लगाया है कि नए विधेयक, यदि पारित हो जाते हैं, तो केंद्रीय एजेंसियों को गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को गिरफ्तार करने या हिरासत में लेने के बेलगाम अधिकार मिल जाएँगे। हाल के महीनों में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय एजेंसियों, विशेष रूप से ईडी के आचरण पर गहरी चिंता व्यक्त की है और कहा है कि यह सभी हदें पार कर रहा है। इस महीने की शुरुआत में शीर्ष अदालत ने ईडी से कहा था, आप एक बदमाश की तरह काम नहीं कर सकते।" साथ ही, अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एजेंसी को कानूनी सीमाओं के भीतर ही काम करना चाहिए। 

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