Apache Helicopter Deal को लेकर Donald Trump के 'झूठे' दावों पर कब चुप्पी तोड़ेगा भारत?

By नीरज कुमार दुबे | Jan 08, 2026

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर ऐसा दावा किया है जो तथ्यों से कोसों दूर है। हम आपको बता दें कि एक राजनीतिक कार्यक्रम में ट्रंप ने कहा कि भारत ने अमेरिका से 68 अपाचे हमला हेलीकॉप्टर खरीदे हैं और इनकी डिलीवरी में देरी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद उनसे मिलने आए थे और बोले थे कि “सर क्या मैं आपसे मिल सकता हूं”। ट्रंप यहीं नहीं रुके। उन्होंने यह भी जोड़ा कि रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर टैरिफ लगाए गए और इससे मोदी खुश नहीं थे।

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ट्रंप का यह बयान न केवल गलत है बल्कि जानबूझकर बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया प्रतीत होता है। दिलचस्प बात यह है कि इस बयान पर नई दिल्ली ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। सरकार की ओर से न तो खंडन आया और न ही स्पष्टीकरण। कूटनीतिक हलकों में इसे लेकर असहजता जरूर महसूस की गई लेकिन सार्वजनिक तौर पर चुप्पी बनाए रखी गई।

देखा जाये तो यह कोई पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर झूठे या अतिरंजित दावे किए हों। साथ ही यह समझना जरूरी है कि अपाचे हेलीकॉप्टर कोई साधारण रक्षा सौदा नहीं हैं। यह भारत की सामरिक क्षमता का एक अहम हिस्सा हैं। अपाचे हेलीकॉप्टर आधुनिक युद्ध में जमीन पर सेना को सीधी और घातक हवाई सहायता देने के लिए जाने जाते हैं। पहाड़ी इलाकों में, सीमावर्ती क्षेत्रों में और तेज रफ्तार सैन्य अभियानों में इनकी भूमिका निर्णायक होती है। चीन और पाकिस्तान जैसी चुनौतियों के बीच भारत के लिए यह प्लेटफॉर्म सामरिक संतुलन बनाए रखने का एक मजबूत औजार है।

ऐसे में इन हेलीकॉप्टरों की संख्या को गलत तरीके से पेश करना केवल आंकड़ों की गलती नहीं है। यह भारत की सैन्य तैयारी और रणनीतिक सोच को गलत रोशनी में दिखाने का प्रयास है। जब कोई अमेरिकी नेता यह कहता है कि भारत ने 68 हेलीकॉप्टर खरीदे, तो यह संदेश जाता है कि भारत पूरी तरह अमेरिकी हथियारों पर निर्भर है और अमेरिका के दबाव में फैसले करता है। यह धारणा भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के बिल्कुल खिलाफ है।

देखा जाये तो ट्रंप की राजनीति का यह तरीका पुराना है। वह हर अंतरराष्ट्रीय सौदे को अपने व्यक्तिगत पराक्रम की तरह पेश करते हैं। उनके लिए भारत कोई साझेदार नहीं बल्कि एक मंच है, जिस पर खड़े होकर वह अपने घरेलू समर्थकों को यह दिखा सकें कि उन्होंने अमेरिका के लिए कितने अरब डॉलर के सौदे कराए। अब सवाल उठता है कि नई दिल्ली चुप क्यों है। क्या यह कूटनीतिक समझदारी है या राजनीतिक मजबूरी? हालांकि कूटनीतिज्ञों का कहना है कि हर बयान पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं और ट्रंप जैसे नेता को नजरअंदाज करना ही बेहतर है। देखा जाये तो भारत और अमेरिका के रिश्ते सिर्फ किसी एक नेता पर निर्भर नहीं हैं। रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, हिंद प्रशांत रणनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे मुद्दे इन रिश्तों की बुनियाद हैं। लेकिन रिश्तों की मजबूती का मतलब यह नहीं कि झूठ को बिना चुनौती के स्वीकार कर लिया जाए। खासकर तब, जब वह झूठ भारत की गरिमा और संप्रभु निर्णय क्षमता पर सवाल खड़ा करता हो।

मोदी सरकार ने अब तक खुद को मजबूत और आत्मविश्वासी नेतृत्व के रूप में पेश किया है। ऐसे में यह उम्मीद की जाती है कि जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को गलत तरीके से पेश किया जाए, तो एक स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब आए। यह जवाब आक्रामक होना जरूरी नहीं, लेकिन सटीक जरूर होना चाहिए। ट्रंप का बयान एक चेतावनी भी है। यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में सच से ज्यादा कहानी बिकती है। अगर भारत अपनी कहानी खुद नहीं बताएगा, तो दूसरे लोग उसे अपने हिसाब से गढ़ते रहेंगे। बहरहाल, चुप्पी कभी कभी रणनीति हो सकती है, लेकिन बार बार की चुप्पी अंततः सवाल बन जाती है।

-नीरज कुमार दुबे

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