By अभिनय आकाश | Aug 20, 2026
अबू अल-दुहुर एयरबेस लोकेशन तुर्की बॉर्डर से महज 80 किमी दूर। यह वो इलाका है जिसे तुर्की अपना बैकयार्ड यानी कि अपना प्रभाव क्षेत्र समझता था। लेकिन इजराइल ने यहां आठ भीषण हमले करके यह साबित कर दिखाया कि उसकी मिसाइलों के लिए कोई भी बॉर्डर पवित्र नहीं है। लेकिन इस खबर का सबसे खौफनाक पहलू क्या है? इजराइल के लड़ाकू विमानों ने तब बम गिराए जब वहां से तुर्की की हाई लेवल मिलिट्री डेलीगेशन निकले हुए मात्र 24 घंटे भी नहीं हुए थे। यानी इजराइल की आंखें तुर्की के एक-एक ऑफिसर पर जमी हुई थी। 17 अगस्त 2026 की शाम तुर्की की सेना का एक बड़ा दस्ता जिसमें सर्विलांस और टेक्निकल एक्सपर्ट शामिल थे। अबू अल-दुहुर एयरबेस पहुंचता है। मकसद था सीरिया की नई अल शरा सरकार की वायुसेना को फिर से खड़ा करना। सीरिया पिछले कुछ समय से गुपचुप तरीके से अपना एविएशन कैपेसिटी बढ़ा रहा है। अगस्त 2026 में इन्होंने मिग 21 के साथ एक्सरसाइज भी की। इजराइल के लिए यह एक बहुत बड़े खतरे की घंटी थी।
ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने सीरिया के नए राष्ट्रपति अहमद अल शरा पर बहुत बड़ी पॉलिटिकल कैपिटल खर्च की है। ट्रंप को लगता है कि अल शरा वो शख्स हैं जो सीरिया को ईरान के चंगुल से निकालकर वेस्टर्न एयरलाइंस में ला सकते हैं। अब आपको याद होगा कि ट्रंप ने अल शरा को अपना परफ्यूम तक गिफ्ट कर दिया और उनसे उनकी पत्नियों के बारे में मजाक भी किया था। अब अमेरिका यह चाहता है कि सीरिया एक नॉर्मल देश बने ताकि वहां पुनर्निर्माण के कॉन्ट्रैक्ट अमेरिकी कंपनियों को मिल सके। लेकिन इजराइल का नजरिया अलग है। इजराइल को लगता है कि अल शरा सिर्फ एक मुखौटा है और उसके पीछे एर्दोगान की वही पुरानी कट्टरपंथी विचारधारा काम कर रही है। इतना ही नहीं इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री ने तो यहां तक कह दिया था कि तुर्की ही नया ईरान है। अमेरिका और इजराइल के बीच की यह दरार सीरिया के आसमान में साफ अब देखी जा रहीहै। मक्का पैक की जिसका शोर पिछले 17 दिनों से पूरी दुनिया में था। जिसकी हवा इजराइल ने निकाल दी। तुर्की ने इस पैक्ट को इसलिए जॉइन किया था ताकि उसे इजराइल और ग्रीस जैसे दुश्मनों के खिलाफ एक इस्लामिक ढाल मिल सके।
लेकिन इजराइल ने पैक्ट बनने के तीसरे हफ्ते में ही तुर्की के प्रभाव वाले क्षेत्र पर हमला कर दिया। यह मक्का पैट के लिए मेक या ब्रोक मूवमेंट है। चलिए बात करते हैं मक्का पैक के लिटमस टेस्ट की। देखिए अगर सऊदी अरब और पाकिस्तान सिर्फ कड़े शब्दों में निंदा करके चुप हो जाते हैं तो दुनिया समझ जाएगी कि ये पैक सिर्फ कागजी शेर है। दूसरा पॉइंट है अगर अंकारा इस मामले को एस्केलेट करता है और रियाद से सैन्य मदद मांगता है तो क्या सऊदी इजराइल से दुश्मनी मोल लेगा? यह बहुत बड़ा सवाल है और जानकारों का मानना है कि इजराइल ने जानबूझकर यह समय चुना है ताकि वो मक्का पैक्ट की एकजुटता की पोल खोल सके। इजराइल जानता है कि सऊदी अरब कभी भी इजराइल के साथ सीधा युद्ध नहीं जाएगा और यही एर्दोगान की सबसे बड़ी कमजोरी भी है। इजराइल की इस रणनीति को समझिए। इसे कहते हैं ऑफेंसिव डिफेंस यानी खतरा पैदा होने से पहले ही उसे जड़ से मिटा दो। इजराइल ने सिर्फ सीरिया पर बम नहीं गिराए हैं बल्कि उसने तुर्की के चारों तरफ एक जाल बुन लिया है।