By नीरज कुमार दुबे | May 26, 2026
दिल्ली के दिल में बसी वह आलीशान इमारत इन दिनों देशव्यापी बहस का केंद्र बनी हुई है, जिसे कभी अंग्रेजी हुकूमत ने अपने अफसरों और सैन्य अधिकारियों की ऐशगाह के रूप में खड़ा किया था। आज वही दिल्ली जिमखाना क्लब केंद्र सरकार के फैसले के बाद विवादों में है। मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि राजधानी के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण इलाके में स्थित इस 27 एकड़ जमीन की अब देशहित में जरूरत है। सरकार ने क्लब को पांच जून तक परिसर खाली करने का नोटिस दिया है। मोदी सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा ढांचे, शासन व्यवस्था और सार्वजनिक हित से जुड़ी परियोजनाओं के लिए इस भूमि का उपयोग किया जायेगा।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आगे कहा कि लीज की शर्तों के तहत सरकार को सार्वजनिक हित में लीज समाप्त करने का अधिकार है। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार मुआवजा देने या वैकल्पिक जगह उपलब्ध कराने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकती है। जब कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार का यह बयान रिकॉर्ड पर लिया जा सकता है कि 5 जून को जबरन कब्जा नहीं लिया जाएगा, तो तुषार मेहता ने कहा, ‘'हां, इसे रिकॉर्ड पर लिया जा सकता है। कब्जा कानून में तय प्रक्रिया के तहत ही लिया जाएगा।’'
जहां तक इस पूरे प्रकरण की बात है तो आपको बता दें कि यह विवाद केवल एक क्लब का नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का है जो आजादी के इतने दशक बाद भी औपनिवेशिक विशेषाधिकारों को पकड़े बैठी है। दिल्ली जिमखाना क्लब की कहानी अंग्रेजी शासन से शुरू होती है। वर्ष 1913 में इसे इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से बसाया गया था। उस समय इसका उद्देश्य भारतीय जनता की सेवा नहीं, बल्कि अंग्रेज अफसरों और फौजी अधिकारियों को एक अलग, विशिष्ट और शाही माहौल देना था। भारतीयों की वहां एंट्री तक नहीं होती थी। नौकर भारतीय हो सकते थे, सदस्य नहीं। अंग्रेजों ने इन क्लबों को अपनी सत्ता और श्रेष्ठता का प्रतीक बनाया था।
आजादी के बाद भले ही इसके नाम से इंपीरियल शब्द हट गया, लेकिन तौर तरीके काफी हद तक वही बने रहे। वर्षों तक यह क्लब देश के सबसे ताकतवर अफसरों, रिटायर्ड नौकरशाहों, सेना के उच्च अधिकारियों, जजों, बड़े वकीलों और रसूखदार लोगों का गढ़ बना रहा। आम आदमी के लिए इसकी सदस्यता किसी सपने से कम नहीं रही। कहा जाता है कि सदस्यता के लिए तीस से चालीस साल तक इंतजार करना पड़ता था। आवेदन शुल्क लाखों में और उसके बाद भी सदस्यता की कोई गारंटी नहीं।
केंद्र सरकार ने जब इसकी कार्यप्रणाली की जांच शुरू की तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। वर्ष 2017 में सात सदस्यों की शिकायत के बाद कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने इसकी जांच करवाई। आरोप लगे कि सरकारी अधिकारियों और गैर सरकारी लोगों से अलग अलग भारी भरकम शुल्क वसूले जाते थे। राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण ने भी वर्ष 2020 में क्लब की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यह संस्था आज भी औपनिवेशिक सोच का अवशेष बनी हुई है और यहां समान अवसर तथा सामाजिक न्याय की संवैधानिक भावना कमजोर पड़ती दिखाई देती है।
यही कारण है कि जब मोदी सरकार ने इस जमीन को वापस लेने का फैसला किया तो देश के एक बड़े वर्ग ने इसे सही कदम माना। सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर राजधानी के सबसे महंगे और संवेदनशील इलाके में हजारों करोड़ की जमीन पर कुछ सौ विशिष्ट लोगों का कब्जा क्यों बना रहे? जिस जमीन का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित के लिए हो सकता है, वहां एक विशेष वर्ग की ऐशगाह चलती रहे, यह तर्क अब जनता को स्वीकार नहीं है।
मोदी सरकार ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि यह जमीन रक्षा संबंधी ढांचे को मजबूत करने, शासन से जुड़ी संस्थागत जरूरतों और सार्वजनिक सुरक्षा परियोजनाओं के लिए आवश्यक है। यह इलाका प्रधानमंत्री आवास और अन्य अति संवेदनशील परिसरों के निकट स्थित है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की जरूरतों को प्राथमिकता देना किसी भी जिम्मेदार सरकार का कर्तव्य है। खास बात यह भी है कि केंद्र सरकार ने अदालत में साफ कहा कि किसी प्रकार की जबरन कार्रवाई नहीं होगी और पूरी प्रक्रिया कानून के तहत पूरी की जाएगी। सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि क्लब को वैकल्पिक जमीन देने पर विचार किया जा सकता है।
इसके बावजूद क्लब प्रबंधन और कुछ सदस्य इसे अपनी परंपरा और अधिकारों पर हमला बता रहे हैं। उनका दावा है कि सरकार ने अस्पष्ट कारण दिए हैं और मुआवजे का उल्लेख नहीं किया। लेकिन यहां असली सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक जमीन पर पीढ़ियों तक विशेषाधिकार चल सकते हैं? क्या लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्थाओं को हमेशा के लिए संरक्षित रखा जा सकता है, जिनकी जड़ें औपनिवेशिक भेदभाव में हों?
देखा जाये तो दिल्ली जिमखाना पर विवाद ने देश के सामने उन तमाम क्लबों की वास्तविकता भी उजागर कर दी है, जो वर्षों से विशिष्ट वर्गों की बंद दुनिया बने हुए हैं। इन क्लबों में पहनावे से लेकर व्यवहार तक ऐसे नियम लागू किए जाते रहे, जिनमें भारतीय संस्कृति और आम नागरिकों की सहजता के लिए बहुत कम जगह दिखाई देती है। कभी किसी महिला को पारंपरिक पोशाक में प्रवेश से रोका गया, कभी किसी कलाकार को नंगे पैर होने पर रोक दिया गया। यह सब उस मानसिकता का हिस्सा है, जो खुद को समाज से ऊपर मानती रही है।
जिमखाना शब्द की कहानी भी इसी औपनिवेशिक इतिहास से जुड़ी है। अंग्रेजों ने फारसी के खाना और जिमनेजियम के जिम को जोड़कर यह शब्द बनाया था। धीरे धीरे देशभर में ऐसे क्लब बनते चले गए। इनका उद्देश्य केवल खेलकूद नहीं था, बल्कि अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय समाज से अलग एक विशिष्ट जीवनशैली देना था। आजादी के बाद सत्ता बदल गई, लेकिन कई जगह व्यवस्था का चरित्र बहुत अधिक नहीं बदला।
मोदी सरकार का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह केवल जमीन का मामला नहीं, बल्कि व्यवस्था में बराबरी की भावना स्थापित करने का प्रयास भी है। सरकार का संदेश साफ दिखाई देता है कि सार्वजनिक संसाधनों पर पहला अधिकार जनता और राष्ट्रहित का है, न कि किसी विशिष्ट समूह का। जिस दौर में देश आधुनिक रक्षा ढांचा, सुरक्षित प्रशासनिक व्यवस्था और मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की ओर बढ़ रहा है, उस समय राजधानी के केंद्र में स्थित बहुमूल्य भूमि का उपयोग राष्ट्रीय जरूरतों के लिए किया जाना स्वाभाविक है।
बहरहाल, दिल्ली जिमखाना विवाद ने एक पुरानी बहस को फिर जीवित कर दिया है कि क्या भारत अब भी औपनिवेशिक दौर की मानसिक और संस्थागत विरासत को ढोता रहेगा, या फिर लोकतांत्रिक और जनोन्मुख व्यवस्था की दिशा में निर्णायक कदम उठाएगा? फिलहाल मोदी सरकार ने यह संकेत दे दिया है कि विशेषाधिकारों के पुराने किले अब अछूते नहीं रहेंगे।