By सुरेश हिंदुस्तानी | Mar 18, 2024
भारत में नागरिकता संशोधन अधिनियम के लागू होने के बाद एक बार फिर से राजनीतिक गुणा भाग का खेल प्रारंभ हो गया है। तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल इस मामले में पूर्व नियोजित राजनीति ही कर रहे हैं। जबकि केंद्र सरकार की ओर से बार बार यह स्पष्ट किया जा रहा है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम नागरिकता देने वाला है, यह किसी की नागरिकता को समाप्त नहीं करेगा। इसके विपरीत केंद्र सरकार के प्रत्येक कदम का विरोध करने वाले राजनीतिक दल इसे भारतीय मुसलमानों के विरोध में उठाया गया कदम बताने का भ्रम पैदा करने वाला रवैया बता रहे हैं। यहां एक बात यह भी स्पष्ट करने वाली है कि इस अधिनियम में भारत के मुसलमान कहीं हैं ही नहीं, फिर क्यों इस अधिनियम में मनमाफिक निहितार्थ तलाश करने की राजनीति की जा रही है? क्या इस प्रकार की राजनीति देश को मजबूत बना सकती है, यकीनन नहीं। क्योंकि जिस देश में कुतर्क की राजनीति की जाती है, वहां भ्रम का वातावरण ही निर्मित होगा। देश के राजनीतिक दलों को चाहिए कि वह स्वच्छ और रचनात्मक राजनीति करके देश को शक्तिशाली बनाने का प्रयास करें। जहां तक भारतीय जनता पार्टी की बात है तो वह अपने एजेंडे से अलग कुछ भी नहीं कर रही है, नागरिकता का मुद्दा उसके लिए पहले से ही प्राथमिकता में रहा है। इतना ही नहीं अभी तक भाजपा नीत केंद्र सरकार ने जो निर्णय लिए हैं, उन सभी को लेकर ही वह जनता के पास गई और भाजपा को ऐसा करने के लिए ही समर्थन मिला।
वर्तमान में शरणार्थी और घुसपैठियों का अंतर समझने की बहुत आवश्यकता है। शरण वही मांगता है जो मजबूर हो गया हो और घुसपैठ करने वाला व्यक्ति एक उद्देश्य को लेकर चलता है। आज देश के लगभग आठ राज्य ऐसे हैं जहां घुसपैठ करने वाले नागरिक भारत में रह रहे हैं। इतना ही नहीं इनको भारत में राजनीतिक संरक्षण भी आसानी से मिल जाता है। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी खुलकर घुसपैठियों के समर्थन में खड़ी होती दिखाई देती हैं। यह केवल वोट की खातिर ही किया जा रहा है और यही तुष्टीकरण की पराकाष्ठा है। लेकिन सवाल यह आता है कि जब ये घुसपैठ करने वाले व्यक्ति अपने देश के प्रति वफादार नहीं हुए तो भारत के वफादार कैसे हो सकते हैं? इसलिए शरणार्थियों के लिए तो जगह हो सकती है, लेकिन घुसपैठियों को पनाह देना बहुत बड़े खतरे को आमंत्रण देने के समान ही कहा जाएगा।
वास्तविकता यह है ऐसे मामलों में राजनीति नहीं की जानी चाहिए। भाजपा सरकार की नीतियों का विरोध होना चाहिए, यह लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, लेकिन यह विरोध देश की कीमत पर नहीं होना चाहिए। आज यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो रहा है कि विपक्षी राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करने के लिए देश की जनता के सामने भ्रम की स्थिति पैदा करने का प्रयास करने लगे हैं। मोदी का विरोध करते करते जाने अनजाने में देश का विरोध करने लगते हैं। एक समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे आचार्य प्रमोद कृष्णम ने यह स्पष्ट तौर पर अभिव्यक्त किया कि कांग्रेस के नेता हिंदुओं से नफरत करते हैं, सनातन का विरोध करते हैं। कांग्रेस को आचार्य प्रमोद कृष्णम की बात पर मंथन करना चाहिए था, लेकिन मंथन करना तो दूर उनको पार्टी से बाहर कर दिया। इसी प्रकार विपक्ष के अन्य राजनीतिक दलों के नेता भी गाहे बगाहे सनातन के विरोध में अप्रिय बयान देते रहे हैं। यह भी एक प्रकार से तुष्टिकरण की राजनीति ही कही जाएगी। ऐसी राजनीति भारत को भारत से अलग करने वाली है। यहां यह भी समझना बहुत जरूरी है कि सनातन धर्म के बारे में गलत और विवादित बयान देने वालों के विरोध में कांग्रेस सहित अन्य दलों ने कोई बयान नहीं दिया। यह एक प्रकार से उनको समर्थन देना ही कहा जाएगा।
भारत की राजनीति के लिए यह कोई नई बात नहीं है कि सरकार के निर्णय का बिना किसी नीति या सिद्धांत के विरोध किया जाए। ऐसा पहले भी होता रहा है। हम जानते हैं कि राफेल मामले में भी ऐसा ही विरोध हुआ और इस मामले में अयोध्या के राम मंदिर निर्माण को भी लिया जा सकता है, लेकिन विपक्ष के राजनीतिज्ञ संभवतः यह भूल जाते हैं कि भारत की जनता चाहती क्या है? हम यह भी जानते हैं कि भारत की जनता राम से सीधा जुड़ाव रखती है। इसलिए यह कहा जा सकता है विपक्ष जनता के मनोभाव को समझने में अभी तक असफल ही रहा है। इसी प्रकार सीएए का मामला भी है। विपक्ष का यह कहना किसी भी प्रकार से न्याय संगत नहीं कहा जा सकता कि यह मुसलमानों के विरोध में है। इसके प्रावधान के तहत ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है कि किसी को नागरिकता नहीं दी जाएगी या किसी की नागरिकता छीनी जाएगी। जो बातें की जा रही हैं, वे केवल राजनीति के अलावा और कुछ नहीं। हां, इस कानून के तहत विदेशी मुसलमानों को नागरिकता नहीं दिए जाने की परिकल्पना निहित है, परंतु इसमें भारतीय मुसलमान का कहीं कोई परिलक्षण नहीं है। इसलिए विपक्ष केवल भ्रमित करने की ही राजनीति कर रहा है। ऐसी राजनीति से बचना चाहिए।
-सुरेश हिंदुस्तानी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)