सपा और कांग्रेस के वंशवाद को चुनौती देगा बसपा का परिवारवाद

By अजय कुमार | Jun 26, 2019

बहुजन समाज पार्टी में जिस तरह से परिवारवाद हावी हुआ है, उससे वो लोग काफी आश्चर्यचकित हैं जो सुश्री मायावती के पूर्व के उन बयानों पर विश्वास करते थे जिसमें वह कहा करती थीं कि मेरा कोई परिवार नहीं है। मेरा परिवार तो बहुजन समाज है। मायावती की बातों पर उनका वोटर इसलिए आंख मूंदकर विश्वास कर लेता था, क्योंकि मायावती अविवाहित हैं। वह कहती थीं मेरा जीवन दलित मूवमेंट के लिए है। मान्यवर कांशीराम उनके सियासी गुरु थे, जिन्होंने कभी गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करा था।

इसे भी पढ़ें: मायावती का बहुजन हिताय से परिजन हिताय तक का सफर

बताते हैं बहुजन समाज को जगाने बाले मान्यवर कांशीराम पहले पहल डीआरडीओ में वैज्ञानिक पद पर नियुक्त थे। 1971 में वह श्री दीनाभाना एवं श्री डी.के. खापर्डे के सम्पर्क में आये, जिन्होंने उनका जीवन बदल दिया। खापर्डे ने कांशीराम साहब को बाबासाहब द्वारा लिखित पुस्तक दी। इस पुस्तक ने कांशीराम का जीवन बदल दिया। पुस्तक को पढ़ने के बाद कांशीराम ने सरकारी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। उसी समय उन्होंने अपनी माताजी को पत्र लिखा कि वो आजीवन विवाह बंधन में नहीं बधेंगे। अपना घर परिवार नहीं बसायेंगे। उनका सारा जीवन समाज की सेवा करने में ही लगेगा। कांशीराम ने उसी समय यह प्रतिज्ञा की थी कि उनका उनके परिवार से कोई सम्बंध नहीं रहेगा। वह कोई सम्पत्ति अपने नाम नहीं बनायेंगे। उनका सारा जीवन समाज को ही समर्पित रहेगा और कांशीराम ने किया भी ऐसा ही। वह आजीवन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग डटे रहे। अंतिम समय तक उनके पास कोई सम्पत्ति नहीं थी। यहां तक कि उनके परिनिर्वाण के बाद भी उनका शरीर उनके परिवार को नहीं सौंपा गया था।

 

ऐसे कांशीराम की शिष्य थीं सुश्री मायावती। इसीलिए तो जब मायावती किसी जनसभा या अन्य किसी मौके पर कहतीं कि उनका परिवार तो बहुजन समाज है तो उनके वोटर खुशी से झूमने लगते थे, लेकिन बीएसपी में अक्सर चह चर्चा भी छिड़ी रहती थी कि कांशीराम के बाद मायावती तो मायावती के बाद कौन ? मगर 5 नवंबर, 2014 की एक घटना ने मानो इस का उत्तर दे दिया था। इस दिन मायावती ने राज्यसभा के लिए अपने दो प्रत्याशियों का नाम घोषित किया था। राजाराम और वीर सिंह। उस समय आजमगढ़ के रहने वाले राजाराम को मायावती के राजनीतिक वारिस के तौर पर देखा गया था। माना गया कि वही आगे चलकर माया की गद्दी संभालेंगे। पोस्ट ग्रेजुएट राजाराम 2008 के बाद दूसरी बार राज्यसभा सांसद बनने से पहले पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे थे। उन्हें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और राजस्थान का पार्टी प्रभारी भी बनाया जा चुका था, लेकिन धीरे−धीरे उनका दावा धुंधलाता गया। अब हमारे सामने एक नया नाम है मायावती के भाई आनंद कुमार का। आनंद के साथ ही मायावती के भतीजे आकाश का नाम पार्टी ने आगे बढ़ा दिया है।

 

भले ही 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव और अब 2019 में लोकसभा चुनाव में भी बसपा को करारी हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन राजनीति के जानकार कहते हैं कि मायावती ने आम चुनाव से पूर्व 18 सितंबर को मेरठ में एक रैली की थी। इस रैली में सबकी निगाहें दो ही शख्स पर टिकी हुई थीं, एक थे मायावती के भाई आनंद कुमार और दूसरे थे मायावती के भतीजे आकाश। 18 सितंबर का दिन पहला ऐसा मौका था, जब दोनों को सार्वजनिक तौर पर मंच पर सामने लाया गया और लोगों से उनका परिचय करवाया गया था। बताया जाता है कि इससे पहले भी आनंद और आकाश को लखनऊ और दिल्ली में पार्टी बैठक में देखा गया था।

इसे भी पढ़ें: रिश्ते को नहीं सत्ता को महत्व देती हैं मायावती, अखिलेश यही बात समझ नहीं पाये

मायावती के सियासी सफर पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि 1977 में मायावती बीएस−3 के संस्थापक कांशीराम के कहने पर राजनीति में आई थीं। 1995 में वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और 15 दिसंबर, 2001 को कांशीराम ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। वहीं अंबेडकर जयंती के मौके पर बाबा साहब को श्रद्धांजलि देते हुए मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को बीएसपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने का ऐलान किया। यह इशारा था कि शायद मायावती ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुन लिया है। जब इस संबंध में मायावती से पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'मैंने अपने भाई आनंद कुमार को इस शर्त पर बीएसपी में लेने का फैसला किया है कि वह कभी एमएलसी, विधायक, मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बनेगा। इसी वजह से मैं आनंद को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना रही हूं।'

 

खैर, ऐसा लगता है कि बीएसपी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। वोट प्रतिशत के मामले में भले वह सूबे की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी रही हो, लेकिन बीजेपी को मिले प्रचंड बहुमत के बाद मायावती के सामने पार्टी को फिर से जिताने की चुनौती है। ऐसे में बहन की पार्टी से हमेशा दूर−दूर रहे आनंद की नई भूमिका चौंकाने वाली है। आनंद अपनी बहन मायावती से छोटे हैं। एक समय वह नोएडा में क्लर्क हुआ करते थे। मायावती जब उत्तर प्रदेश की सियासत में चमकीं, तो आनंद की किस्मत भी खुल गई। वह लगातार हाथ−पैर मारते रहे और खूब पैसे बनाए। मायावती के दाहिने हाथ कहे जाने वाले पंडित नेता जी के बेटे ने भी दिल खोलकर आनंद का साथ दिया। आनंद के बड़े बेटे आकाश भी उनके साथ मंच पर दिखने लगे।

 

खैर, बहुजन समाज पार्टी और मायावती अकेली ऐसी नेत्री नहीं हैं, जिन्होंने अपने सियासी उत्तराधिकारी के रूप में परिवारवाद को बढ़ावा दिया है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, बिहार में लालू यादव, पंजाब में बादल परिवार, हरियाणा में देवी लाल, कर्नाटक में देवेगौड़ा, मध्य प्रदेश में सिंधिया घराना, कमलनाथ, राजस्थान में दिवंगत राजेश पायलट के बेटे, केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राजस्थान के राज्यपाल और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह किस−किस का नाम लिया जाए। देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी रह चुकी कांग्रेस में तो पांच पीढ़ियों से वंशवाद फलफूल रहा है। अपवाद छोड़कर सभी दल और नेता अपने परिवार के सदस्यों को उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाते हैं। बस फर्क इतना है कि वंशवाद की बेल कहीं कम, कहीं ज्यादा फैली हुई है। मजे की बात यह है कि हाल फिलहाल तक मतदाता भी परिवारवाद को मंजूरी देते रहे हैं। इसीलिए तो एक ही परिवार से कई−कई सांसद और विधायक देखने को मिल जाते हैं। यद्यपि बीते कुछ चुनावों में मतदाताओं द्वारा जातिवाद, संप्रदायवाद और परिवारवाद को किसी हद तक खारिज कर दिया गया है, इसके बावजूद बसपा प्रमुख मायावती द्वारा अपने भाई और भतीजे को पार्टी में शीर्ष पदों पर पदस्थ करना उनका अपना और पार्टी का मामला ही कहा जाएगा।

इसे भी पढ़ें: गठबंधन तोड़ना तो समझ आता है पर मायावती ने अखिलेश पर आरोप क्यों लगाया ?

बात उत्तर प्रदेश की करें तो यहां की राजनीति में परिवारवाद की दृष्टि से मुलायम सिंह का परिवार अव्वल माना जाता था। इस परिवार के एक साथ कई−कई सांसद और विधायक चुन लिए जाते थे, यह कर्म हाल में सम्पन्न लोकसभा चुनाव में थोड़ा कमजोर पड़ा। पिछले दिनों संपन्न लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह और अखिलेश यादव को छोड़कर उनके परिवार के सभी सदस्यों को हार का सामना करना पड़ा। सिर्फ मुलायम−अखिलेश यादव ही जीत पाए। जबकि अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव, भाई शिवपाल यादव और भतीजे धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव को हार का सामना करना पड़ा। जाहिर है, आज का मतदाता नेताओं में व्याप्त परिवारवाद को पसंद नहीं कर रहा है, लेकिन यह बात नेताओं को समझने में अभी समय लगेगा।

 

विडंबना देखिए जो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी डॉ. राम मनोहर लोहिया और बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महापुरुषों के नाम पर राजनीति करती है, जिन्होंने अपने प्रभाव को अपने परिवार की प्रगति का कभी जरिया नहीं बनाया, उन्हीं के स्वयंभू घोषित उत्तराधिकारी परिवारवाद की विष बेल को खूब खाद−पानी दे रहे हैं। जबकि मौजूदा राजनीति में लोहिया और आंबेडकर के वंशज कहीं नहीं नजर आते हैं। मायावती के राजनीतिक गुरु कांशीराम ने भी अपने परिवार की बजाय मायावती को राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया। यह सच है कि राजनेताओं के परिवार वालों को राजनीति में आने से नहीं रोका जा सकता है, पर उन्हें निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके सीधे पार्टी के सर्वोच्च पदों पर प्रतिष्ठित कर देना अलोकतांत्रिक और अमर्यादित है। अगर डॉक्टर का बेटा डॉक्टर और आईएएस का बेटा आईएएस, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर बनना चाहता है तो उसे इसके लिए अपने आप को तैयार करना पड़ता है। प्रतियोगी परीक्षाओं से गुजर कर ही वह कोई भी मुकाम हासिल कर पाता है, लेकिन राजनीति में योग्यता को तिलांजलि दे दी जाती है। अच्छा होता बसपा−सपा या अन्य क्षेत्रीय दल कांग्रेस के परिवारवाद के चलते हुए पतन से सबक लेते, जो परिवारवाद के ही कारण सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। परिवारवाद के चलते ही तमाम दलों के योग्य और जनाधार वाले नेता हाशिये पर पड़े रहते हैं। इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जिन्हें कांग्रेस ने कभी वह सम्मान या पद नहीं दिया जिसके वह हकदार थे। जब−जब गैर गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की मजबूरी आई तब−तब गांधी परिवार ने उनसे कम योग्य समझे जाने वाले नेताओं को आगे बढ़ा दिया। बसपा और मायावती के लिए तो इतना ही कहा जा सकता है कि कभी बसपा में नारा गूंजा करता था, 'कांशीराम तेरा मिशन अधूरा, मायावती करेंगी पूरा।' लेकिन अब यह नारा कुछ इस तरह से गूंजेगा, 'माया तेरा मिशन अधूरा, भाई−भतीजा करेंगे पूरा।'

 

-अजय कुमार

 

All the updates here:

प्रमुख खबरें

Atal Tunnel North Portal पर आया बर्फीला तूफान, Avalanche से Lahaul Valley का संपर्क कटा

AIMJ प्रमुख Maulana Razvi की बड़ी मांग, गाय को National Animal घोषित करने से सद्भाव बढ़ेगा

Jammu-Kashmir के उधमपुर में बड़ा Encounter, सुरक्षा बलों ने Jaish के 2 आतंकियों को घेरा

Mira Bhayandar में BJP का शक्ति प्रदर्शन, Dimpal Mehta बनीं मेयर, Congress-Shiv Sena का दांव फेल