Prabhasakshi Exclusive: Pakistan-Afghanistan एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं, मगर भारत ने अफगानिस्तान का ही पक्ष क्यों लिया?

By नीरज कुमार दुबे | Jan 08, 2025

प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क के खास कार्यक्रम शौर्य पथ में इस सप्ताह हमने ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) से जानना चाहा कि अफगानिस्तान पर पाकिस्तान ने हवाई हमले किये, इस मुद्दे पर भारत ने अफगानिस्तान का पक्ष लेते हुए कहा कि अपनी आंतरिक विफलताओं के लिए पड़ोसियों को दोष देना पाकिस्तान की पुरानी आदत है। इसे कैसे देखते हैं आप? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि पिछले सप्ताह पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच शत्रुता में तीव्र वृद्धि के परिणामस्वरूप अफगानिस्तान में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की ओर से किये गये हमले में दर्जनों नागरिकों की मौत हो गई है। उन्होंने कहा कि सीमा पार लड़ाई का यह नवीनतम दौर है। इसके बारे में पाकिस्तान द्वारा जोर देकर कहा गया है कि यह सशस्त्र समूह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) द्वारा किये गये हमलों का जवाब है। उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद ने कहा है कि टीटीपी को अफगानिस्तान में शरण मिल गई है इसलिए यह हमला किया गया। उन्होंने कहा कि टीटीपी का हालिया हमला 21 दिसंबर को हुआ था जिसमें कम से कम 16 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे।

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ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि हालांकि अभी दोनों ओर से बंदूकें शांत हैं लेकिन सवाल खड़ा हुआ है कि दशकों पुराने, तनावपूर्ण और नाजुक रिश्ते में उलझे इन दोनों पड़ोसियों के लिए आगे का रास्ता क्या है? उन्होंने कहा कि देखा जाये तो दशकों तक पाकिस्तान को अफगान तालिबान का संरक्षक माना जाता था, जो पहली बार 1996 में सत्ता में आया था। उन्होंने कहा कि ऐसा माना जाता था कि पाकिस्तान तालिबान समूह पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है और उसे आश्रय, धन और राजनयिक समर्थन प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि 9/11 के हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान पर हमले के बाद कई अफगान तालिबान नेताओं ने पाकिस्तान में शरण मांगी थी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में अमेरिकी ड्रोन हमलों के बीच टीटीपी, जिसे अक्सर पाकिस्तान तालिबान कहा जाता है, वह उभरा। उन्होंने कहा कि अफगान तालिबान के साथ वैचारिक संबंध साझा करने के बावजूद टीटीपी ने पाकिस्तान के खिलाफ एक हिंसक अभियान चलाया। जवाब में पाकिस्तानी सेना ने टीटीपी को खत्म करने के लिए कई अभियान चलाए हैं और इसके कई नेताओं को अफगानिस्तान में धकेल दिया है। उन्होंने कहा कि जब 2021 में अफगान तालिबान ने काबुल पर फिर से नियंत्रण हासिल कर लिया तो पाकिस्तान को टीटीपी की गतिविधि पर अंकुश लगाने के लिए तालिबान से काफी उम्मीद थी। हालाँकि, तब से पाकिस्तान के भीतर हमलों में वृद्धि से पता चलता है कि उसके अरमानों पर पानी फिर गया।

ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि अफगान तालिबान को खुरासान प्रांत में आईएसआईएल (आईएसआईएस) से संबद्ध अन्य समूहों से महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि अफगान तालिबान को यह तय करना होगा कि टीटीपी का समर्थन करना है या पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को प्राथमिकता देनी है। उन्होंने कहा कि फिलहाल मुझे नहीं लगता कि कोई भी पक्ष स्थिति को खराब करना चाहता है। उन्होंने कहा कि वैसे यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में टीटीपी के ठिकानों को निशाना बनाया है। इसी तरह के हवाई हमले मार्च में भी हुए थे लेकिन तब अफगानिस्तान सरकार की ओर से कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। उन्होंने कहा कि इसके अलावा जनवरी में पाकिस्तान और ईरान ने एक-दूसरे के सीमा क्षेत्रों पर बमबारी की थी। लेकिन फिर बाद में सब शांत हो गया था क्योंकि संघर्ष को किसी भी बड़े स्तर पर ले जाने का जोखिम कोई नहीं उठा सकता।

ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि जहां तक भारत की प्रतिक्रया की बात है तो भारत ने हमेशा आम नागरिकों पर हमले के विरोध में आवाज उठाई है। अफगानिस्तान और भारत के ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। भारत ने वहां पर कई विकास परियोजनाएं पूरी की हैं और कई वर्तमान में चल भी रही हैं। भारत हमेशा से ही पाकिस्तान के दुष्प्रचार का पीड़ित भी रहा है इसलिए जब अफगानिस्तान के खिलाफ कार्रवाई हुई तो दिल्ली ने कहा कि पड़ोसियों को दोष देना पाकिस्तान की पुरानी आदत है।

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