जनता को मुफ्तखोरी की आदत डाल रहे हैं राजनीतिक दल, सावधान रहने की जरूरत

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Nov 30, 2018

मद्रास हाईकोर्ट द्वारा मुफ्तखोरी को लेकर की गई टिप्पणी निश्चित रूप से चेताने वाली होने के साथ ही समाज में फैल रही विसंगति की ओर भी इशारा कर रही है। कर्म ही पूजा मानने वाले देश में वोटों की राजनीति के चलते चुनावी वादों के रूप में मुफ्त में खाद्य सामग्री से लेकर दूसरी वस्तुएं बांटने का जो दौर चला है उसकी ओर अदालत ने सीधा सीधा और साफ साफ इशारा कर दिया है। सही भी है मुफ्तखोरी की आदत के चलते ही वास्तव में लोग आलसी होने लगे हैं। आज फसल काटने के समय मजदूर नहीं मिलता। खेती या अन्य कार्य के लिए मजदूर नहीं मिलने का एक प्रमुख कारण विशेषज्ञ साफतौर से मनरेगा के चलते गांवों में आए बदलाव को मानने लगे हैं।

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चुनावी वैतरणी पार करने के लिए लोकलुभावन चुनावी घोषणाएं करना आम होता जा रहा है। कभी लैपटॉप बांटने तो कभी मुफ्त बिजली, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त स्कूटी या पानी या अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की घोषणाएं आम हैं। चावल या अनाज बांटने की घोषणाएं तो आम रही हैं। ठीक है कि राजनीतिक दलों की सत्ता सिंहासन तक पहुंचना एक मजबूरी है। यह भी सही है कि राजनीति में कोई भी आता है तो वह केवल और केवल भजन या समाज सेवा के लिए तो आता नहीं है। यह भी सही है कि चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन घोषणाएं आम होती जा रही हैं। एक समय था जब चुनाव से ठीक पहले आने वाला केन्द्र या राज्य का बजट लोकलुभावन होता था। उस बजट में लोकलुभावन घोषणाएं होती थीं, रियायतें होती थी, कर छूट होती थी पर ऐसा बहुत कम देखने को मिलता था। खासतौर से दक्षिण के राज्यों को छोड़कर अन्य राज्यों व केन्द्र में मुफ्तखोरी की घोषणाएं तो कम से कम नहीं होती थीं। यहां हमें रियायतों और मुफ्तखोरी में अंतर करना होगा। मुफ्तखोरी और मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं में अंतर करना होगा। यदि सबको चिकित्सा सुविधा निशुल्क उपलब्ध कराई जाती है या मुफ्त शिक्षा की बात की जाती है तो इसे मुफ्तखोरी नहीं कहा जा सकता बल्कि यह तो संवेदनशील लोकहितकारी सरकारों का दायित्व हो जाता है। पर सभी या वर्ग विशेष को मुफ्त भोजन, मुफ्त खाद्यान्न, बिना काम के भत्तों आदि का वितरण सत्ता की सीढ़ी तो बन सकता है पर देखना यह होगा कि आखिर इसका समाज और सामाजिक व्यवस्था पर असर क्या पड़ रहा है। ठीक है जरूरतमंद लोगों या अन्य को आप एक सीमा तक सहायता दे सकते हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने सही ही कहा है कि मुफ्तखोरी से लोग आलसी होते जा रहे हैं।

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आखिर राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने के लिए किए जाने वाले मुफ्तखोरी के वादे किसके बल बल पर किए जाते हैं। साफ है कि कड़ी मेहनत कर सरकारी खजाने में करों के माध्यम से पैसा देने वाले मेहनतकश आम आदमी का पैसा है। इस आम आदमी के करों से प्राप्त राशि के उपयोग को मुफ्तखोरी में व्यय किया जाता है तो देश की उत्पादकता में भागीदार बनने वाले हाथों को आलसी बनाना नहीं है तो और क्या है ? सरकार लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा करने और सेवाओं का विस्तार कर भी बहुत कुछ अर्जित कर सकती है। सबको समान रूप से शिक्षा का अवसर, उच्च व तकनीकी शिक्षा की पहुंच साधनहीन पर योग्य युवाओं तक पहुंचाने की व्यवस्था, सबको चिकित्सा सुविधा, पानी बिजली की सुविधा, सस्ता और बेहतर आवागमन, गरीबों को सस्ता अनाज आदि ऐसी सुविधाओं को पहुंचाया जाता है तो सभी लोग समान रूप से विकास में भागीदार बनेंगे। नहीं तो देश की जनशक्ति मुफ्तखोरी के लालच में विकास में भागीदार कैसे बन पाएगी। ऐसी लोकलुभावन मुफ्तखोरी की योजनाएं सत्ता तक पहुंचने का माध्यम तो बन सकती हैं पर इसके जो परिणाम सामने आ रहे हैं वह समाज में गंभीर विसंगति पैदा करने वाले हैं। राजनीतिक दलों के साथ ही प्रतिक्रियावादियों और गैर सरकारी संगठनों को भी इस दिशा में प्रखरता के साथ आगे आना होगा।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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