छोटे चौधरी का बड़ा खेला, इंडी गठबंधन की डूबती नाव से कूदने के लिए लगा है रेला

By नीरज कुमार दुबे | Feb 07, 2024

विपक्ष के इंडी गठबंधन की नाव डूबती देख इस पर सवार राजनीतिक दलों में कूद कर अपनी जान बचाने की होड़ देखने को मिल रही है। इंडी गठबंधन की नाव को जिन नीतीश कुमार ने तैयार किया था वही सबसे पहले यहां से दूसरी तरफ कूद गये जिससे नाव का संतुलन गड़बड़ा गया। मौका देख ममता बनर्जी ने भी इस नाव से दूरी बना ली और अब राष्ट्रीय लोक दल भी इससे कूदने के लिए पूरी तरह तैयार है। आम आदमी पार्टी भी इंडी गठबंधन की नाव से कूदने के लिए अपना सामान समेट रही है। इस गठबंधन में अब जो दल बचे हैं वह या तो आपस में ही लड़ रहे हैं या उन दलों के भीतर ही भितरघात देखने को मिल रही है जिसके चलते किसी का चुनाव चिह्न खतरे में पड़ गया है तो किसी की पार्टी का मालिकाना हक किसी और के पास चला गया है। विपक्ष की यह स्थिति देख अब प्रधानमंत्री मोदी के संसद में दिये गये संबोधन की वह बात किसी को अतिश्योक्ति नहीं लग रही कि भाजपा आगामी लोकसभा चुनावों में अकेले दम पर 370 सीटें जीतेगी और एनडीए 400 के पार जायेगा।

इसे भी पढ़ें: RLD-BJP गठबंधन की अटकलों के बीच बोले शिवपाल यादव, गुमराह किया जा रहा, जयंत चौधरी हमारे साथ

लेकिन अब छोटे चौधरी के नाम से मशहूर जयंत चौधरी के पाला बदलने की अटकलों से विपक्षी खेमा बेचैन दिख रहा है। क्योंकि बात यह नहीं है कि छोटा दल गठबंधन से बाहर जा रहा है या बड़ा दल, बात यह है कि लंबे समय से गठबंधन में साथ रहा दल अब दूसरे के साथ जा रहा है। हम आपको याद दिला दें कि हाल ही में अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी के साथ एक फोटो ट्वीट करते हुए ऐलान किया था कि रालोद के लिए गठबंधन में सात लोकसभा सीटें दी गयी हैं। लेकिन यह सात सीटें कौन-सी होंगी इसका ऐलान नहीं किया गया था। इस बात से जयंत चौधरी नाराज बताये जा रहे थे। जयंत चौधरी ने राजस्थान विधानसभा चुनावों के दौरान भी कांग्रेस से कुछ सीटें अपने लिये मांगी थीं लेकिन कांग्रेस की ओर से स्पष्ट इंकार कर दिये जाने के चलते उन्हें निराशा हाथ लगी थी। इसलिए जब भाजपा की ओर से इस बार गठबंधन का प्रस्ताव आया तो उसे जयंत चौधरी मना नहीं कर सके। बताया जा रहा है कि भाजपा के साथ जाने पर जयंत चौधरी को मथुरा, कैराना, अमरोहा और बागपत सीटें मिल सकती हैं। अभी इनमें से अमरोहा को छोड़कर बाकी तीनों सीटें भाजपा के पास हैं। बताया जा रहा है कि जयंत चौधरी भाजपा के प्रस्ताव को स्वीकार करने का मन बना चुके हैं क्योंकि उन्हें अपनी पार्टी के क्षेत्रीय दल के दर्जे को बचाना है। यदि उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार इन लोकसभा चुनावों में मत हासिल नहीं किये तो संभव है कि उनका चुनाव चिह्न नल भी छिन जाये। जयंत चौधरी यह बात समझ रहे हैं कि भले समाजवादी पार्टी उन्हें लड़ने के लिए ज्यादा सीटें दे दे लेकिन सीटें जीतने की ज्यादा संभावना भाजपा के साथ मिलकर लड़ने में ही है।

दूसरी ओर भाजपा भी यह समझ रही है कि किसान आंदोलन के दौरान से नाराज पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं को पूरी तरह तभी साधा जा सकता है जब राष्ट्रीय लोकदल साथ आ जाये। हम आपको याद दिला दें कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा चुनावी नुकसान पश्चिमी क्षेत्र में ही हुआ था। 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान भी भाजपा का प्रदर्शन इस क्षेत्र में अपेक्षा के अनुरूप नहीं था इसलिए भाजपा 2024 में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती। भाजपा का प्रयास है कि इस बार उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर जीत हासिल की जाये और इसके लिए तमाम प्रयास किये भी जा रहे हैं। ऐसी भी चर्चा सामने आई कि जयंत चौधरी ने पांच से सात लोकसभा सीटों की मांग रखी थी लेकिन भाजपा की ओर से चार सीटों का ही वादा किया गया है। भाजपा को पता है कि यदि जयंत को ज्यादा सीटें दी गयीं तो उत्तर प्रदेश की अन्य सहयोगी पार्टियां अपना दल, सुभासपा और निषाद पार्टी भी ज्यादा सीटें मांगेंगी। बताया जा रहा है कि गठबंधन के बाद राष्ट्रीय लोकदल को उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में जगह दी जा सकती है और लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र में भी एक पद मिल सकता है।

इस तरह की भी चर्चा है कि जयंत चौधरी की पार्टी 12 फरवरी से पहले भाजपा के साथ आ सकती है और जब 12 फरवरी को भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा मुजफ्फरनगर पहुँचेंगे तो जयंत चौधरी भी साथ होंगे। हम आपको बता दें कि नड्डा लोकसभा चुनाव से पहले मुजफ्फरनगर से पार्टी के एक महीने के ग्रामीण संपर्क कार्यक्रम की शुरुआत करेंगे। ग्रामीण संपर्क कार्यक्रम के दौरान भाजपा नेता मोदी सरकार के जन-कल्याणकारी कदमों को रेखांकित करने के अलावा चुनाव घोषणापत्र के लिए किसानों और मजदूरों सहित ग्रामीण आबादी से सुझाव मांगेंगे। पार्टी के सदस्य लोगों से संवाद के दौरान गांवों में गायों और कृषि उपकरणों की पूजा भी करेंगे। देखा जाये तो नड्डा ने इस कार्यक्रम की शुरुआत के लिए मुजफ्फरनगर का चयन कर बड़ा राजनीतिक संदेश भी दिया है क्योंकि यह क्षेत्र मोदी सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के विरोध का केंद्र था। हालांकि बाद में केंद्र ने उन कानूनों को वापस ले लिया था लेकिन आंदोलन में भाग लेने वाले किसानों की नाराजगी अब तक दूर नहीं हुई है।

बहरहाल, जहां तक इंडी गठबंधन की बात है तो बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में इसके कुछ और घटक या उन घटकों के बड़े नेता सत्तारुढ़ एनडीए का दामन थाम सकते हैं क्योंकि देश के राजनीतिक मिजाज से सभी वाकिफ हैं। सभी इस बात को समझ रहे हैं कि देश की ताजा राजनीतिक स्थिति यही है कि दस साल के शासन के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कम होने की बजाय देश-विदेश में और बढ़ी ही है।

-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

12 करोड़ की बड़ी कुर्बानी, Rishabh Pant की Delhi Capitals में वापसी, BCCI की मुहर का इंतजार!

मुझे Delhi Police गिरफ्तार करने वाली है..., Abhijeet Dipke का Jail Bharo Andolan का आह्वान, Jantar Mantar पर बढ़ा तनाव

भारत से पहली बार कांपा चीन, पुतिन के गुरु बोले हिंदू आ रहे हैं!

Bihar को मिलेगी नई पहचान, Patna का JP Ganga Path बनेगा World-Class Tourism Hub