Chhath Puja 2023: पर्व का नाम 'छठ' ही क्यों पड़ा? छठ पूजा व्रत की विधि क्या है और इस दौरान किन नियमों का पालन करना होता है

By शुभा दुबे | Nov 16, 2023

भगवान सूर्य की उपासना का पर्व है छठ पूजा। पूर्वी भारत में बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाए जाने वाले इस पर्व का नाम छठ इसलिए पड़ा क्योंकि चार दिवसीय इस व्रत की सबसे महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को होती है। कार्तिक मास में दीपावली के छह दिन बाद पड़ने वाला यह पर्व मुख्य रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ ही नेपाल के कुछ इलाकों में धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन अब इस पर्व का विस्तार देश के अन्य हिस्सों में भी तेजी से हो रहा है और बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से जुड़े लोग देश के जिस भी कोने में मौजूद हैं, वहां इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। दिल्ली में यमुना नदी और इंडिया गेट तथा मुंबई में चौपाटी पर उमड़ने वाली छठ व्रतियों की भीड़ इस बात को साबित करती है कि बड़े महानगरों में भी अब इस पर्व को लेकर जागरूकता बढ़ी है।

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चार दिवसीय उत्सव छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। सूर्य देव को समर्पित इस पर्व के दौरान बिहार के औरंगाबाद में सूर्य भगवान की महिमा का बखान करते भव्य मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां स्थित कुंड में भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं।

छठ पूजा के चार दिनों में पहला दिन 'नहाय खाय' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन घर की सफाई के पश्चात छठ व्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन को ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन कर लेने के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं। 

पूजा के दूसरे दिन यानि कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे 'खरना' कहते हैं। खरना का प्रसाद लेने के लिए आसपास के सभी लोगों को निमंत्रण दिया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है।

छठ पूजा के तीसरे दिन यानि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ के अलावा चावल के लड्डू बनाये जाते हैं। इसके अलावा सांचा और फल को भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल किया जाता है। शाम के समय बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती व्यक्ति के साथ परिवार के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के लिए घाट जाते हैं। इसके बाद सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा प्रसाद से भरे सूप से छठ मैया की पूजा की जाती है।

पूजा के चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही अपने बिस्तर का भी त्याग किया जाता है और व्रती फर्श पर कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताता है।

-शुभा दुबे

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