अचानक 114 राफेल विमान खरीदने की जरूरत क्यों पड़ गयी? इस सौदे में भारत ने क्या शर्तें रखी हैं?

By नीरज कुमार दुबे | Jan 17, 2026

भारत की सेनाओं को आधुनिक हथियारों और अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने, सीमाओं की सुरक्षा को अभेद्य बनाने और हर मोर्चे पर दुश्मन को करारा जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी पीछे नहीं रहते। राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर उनकी नीति साफ है कि ताकत ही शांति की सबसे मजबूत गारंटी होती है। इसी सोच के तहत भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाला एक और निर्णायक कदम अब आकार ले रहा है। राफेल लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की दिशा में सरकार की ताजा पहल न केवल वायुसेना की कमजोर पड़ती स्क्वाड्रन ताकत को संबल देगी, बल्कि बदलते सामरिक परिदृश्य में भारत को निर्णायक बढ़त भी दिलाएगी।


हम आपको बता दें कि रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की अध्यक्षता वाले रक्षा खरीद बोर्ड ने फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह मंजूरी औपचारिक प्रक्रिया का पहला ठोस चरण है, जिसके बाद प्रस्ताव रक्षा अधिग्रहण परिषद के सामने जाएगा और अंतत: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट समिति से अंतिम स्वीकृति मिलेगी। अनुमान है कि यह सौदा करीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये का होगा, जो भारत का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा बन सकता है।

इसे भी पढ़ें: 114 नए विमान, कांप उठेंगे चीन-पाकिस्तान, क्यों इसे कहा जा रहा अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा

यह मंजूरी ऐसे समय आई है जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे की तैयारी चल रही है। यदि मूल्य वार्ता और अन्य स्वीकृतियां समय पर पूरी होती हैं तो दोनों देशों के बीच अंतर सरकारी समझौते के तहत सौदे पर हस्ताक्षर संभव हैं। इस मॉडल में बिचौलियों की कोई भूमिका नहीं होगी और सीधे आपूर्ति सुनिश्चित होगी।


हम आपको बता दें कि भारतीय वायुसेना पहले ही 36 राफेल विमानों का संचालन कर रही है और नौसेना ने भी इसी श्रेणी के 26 समुद्री संस्करण मंगाए हैं। नए सौदे के तहत 18 विमान सीधे उड़ान योग्य स्थिति में मिलेंगे, जबकि शेष का निर्माण भारत में होगा। नागपुर स्थित डसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस में अंतिम संयोजन लाइन स्थापित होने की तैयारी है, जहां टाटा, महिंद्रा और डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज जैसी भारतीय कंपनियां साझेदार बनेंगी। स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी 55 से 60 प्रतिशत तक रहने की उम्मीद है।


हम आपको यह भी बता दें कि इस सौदे में भारत ने कुछ बड़ी शर्तें रखी हैं, जिनमें सभी विमानों पर भारतीय हथियारों और मिसाइलों का एकीकरण, सुरक्षित डेटा लिंक और एयरफ्रेम, इंजन तथा एवियोनिक्स में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण शामिल है। राफेल के उन्नत F-4 और भविष्य के F-5 संस्करणों की मांग भी रखी गई है, जिनमें नई पीढ़ी का एईएसए रडार, बेहतर आत्म सुरक्षा प्रणाली, लंबी दूरी की मारक क्षमता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सहायता शामिल होगी।


यह सब ऐसे समय हो रहा है जब वायुसेना की स्क्वाड्रन संख्या घटकर 29 रह गई है, जबकि स्वीकृत संख्या 42 है। मिग-21 जैसे पुराने विमानों की विदाई और तेजस परियोजना में देरी ने यह अंतर और गहरा कर दिया है। चीन और पाकिस्तान के साथ दो मोर्चों की चुनौती और बांग्लादेश की ओर से उभरती सुरक्षा चिंता ने इस खरीद को अनिवार्य बना दिया है।


देखा जाये तो राफेल की बहु भूमिका क्षमता, गहरी मार, नेटवर्क केंद्रित युद्ध क्षमता और घातक सटीकता भारतीय वायुसेना को वह धार देती है जिसकी आज सख्त जरूरत है। यह विमान हवा में प्रभुत्व स्थापित करने के साथ साथ जमीनी ठिकानों पर सर्जिकल वार और समुद्री क्षेत्र में भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है।


इस सौदे का सबसे बड़ा लाभ यह है कि भारत केवल उपभोक्ता नहीं रहेगा, बल्कि निर्माता बनेगा। एयरफ्रेम, इंजन और एवियोनिक्स में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से भारतीय उद्योग को जबरदस्त बल मिलेगा। यह आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को ठोस जमीन देता है और भविष्य की परियोजनाओं के लिए कौशल तथा आधारभूत ढांचा तैयार करता है। साथ ही बड़ी संख्या में एक ही प्लेटफार्म होने से रखरखाव लागत घटेगी और उपलब्धता बढ़ेगी।


सामरिक परिदृश्य में इसका प्रभाव दूरगामी होगा। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स और पाकिस्तान की वायुसेना दोनों को अब ऐसे प्रतिद्वंद्वी का सामना करना होगा, जो सेंसर, हथियार और नेटवर्क के स्तर पर उनसे आगे है। राफेल की तैनाती से भारत की निवारक क्षमता मजबूत होगी और किसी भी दुस्साहस की कीमत दुश्मन के लिए असहनीय बनेगी। बहरहाल, राफेल सौदा भारत के संप्रभु निर्णय का प्रतीक है। यह बताता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होगा। भारत अब निर्णायक प्रतिकार की पूरी तैयारी कर चुका है यही संदेश राफेल के पंखों पर सवार होकर आसमान में गूंजेगा।


-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

खोजी पत्रकारिता, जो पत्रकारिता का आधार स्तंभ रही है, आज कमजोर पड़ती दिख रही है: प्रो. केजी सुरेश

Al-Falah University का आतंकी कनेक्शन! ED का खुलासा- Red Fort ब्लास्ट के आरोपी को दी नौकरी

ब्रिक्स देशों के नौसैनिक अभ्यास पर भारत का पहला बयान, अमेरिका नहीं बल्कि ये थी वजह!

सरकार और विपक्ष (व्यंग्य)