By नीरज कुमार दुबे | Apr 22, 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सवाल सीधा है कि क्या सत्ताविरोधी माहौल को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने पक्ष में मोड़ पाएगी? या फिर ममता बनर्जी का जादू एक बार फिर कायम रहेगा? वैसे राज्य में चुनावी हवा भले ही बदलाव की सुगबुगाहट दिखा रही हो, लेकिन जमीन पर हालात इतने सरल नहीं हैं। देखा जाये तो इस बार के चुनावों में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार रैलियां, केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता और संगठन की आक्रामक रणनीति यह संकेत देती है कि पार्टी किसी भी कीमत पर बंगाल में सत्ता का स्वाद चखना चाहती है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी अपनी पकड़ ढीली पड़ने देने के मूड में नहीं है। ममता बनर्जी, जो लंबे समय से राज्य की राजनीति का केंद्र रही हैं, अब भी अपने जनाधार और कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे मैदान में डटी हुई हैं।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही मजबूत है। ममता बनर्जी ने बीते वर्षों में महिला मतदाताओं, ग्रामीण गरीबों और अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की है। ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच भरोसा पैदा किया है, जबकि अन्य सामाजिक योजनाओं ने गरीब तबकों को सीधे लाभ पहुंचाया है। यही कारण है कि भाजपा के आक्रामक अभियान के बावजूद टीएमसी का आधार पूरी तरह हिलता नजर नहीं आता।
इसके अलावा, भाजपा की रणनीति में एक अहम किरदार हैं शुभेन्दु अधिकारी, जो कभी ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी थे और अब उनके सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं। शुभेन्दु अधिकारी ने नंदीग्राम में ममता बनर्जी को मात दी थी और इस बार ममता बनर्जी को उनके गढ़ भवानीपुर में चुनौती दे रहे हैं। शुभेन्दु अधिकारी राज्य में भाजपा का चेहरा बनने का प्रयास कर रहे हैं हालांकि, उनका प्रभाव सीमित इलाकों तक ही केंद्रित माना जाता है, और पूरे बंगाल में एक व्यापक लहर खड़ी करना उनके लिए आसान नहीं है।
हम आपको याद दिला दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल में टर्निंग प्वाइंट साबित हुए थे। पार्टी ने उस चुनाव में अप्रत्याशित सफलता हासिल करते हुए खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया था। उसी प्रदर्शन के आधार पर भाजपा को उम्मीद थी कि वह विधानसभा चुनाव में सत्ता तक पहुंच सकती है। लेकिन बाद के चुनावी अनुभवों ने यह भी दिखाया कि लोकसभा और विधानसभा की राजनीति में मतदाताओं का व्यवहार अलग हो सकता है।
एक और चुनौती भाजपा के सामने सांस्कृतिक और भाषाई असंतुलन की है। बंगाल की अपनी विशिष्ट पहचान है, और यहां बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा अक्सर उभरता रहता है। भाजपा के कई नेताओं के बयान और रणनीतियां कभी-कभी स्थानीय संवेदनशीलताओं से मेल नहीं खातीं, जिससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है। टीएमसी इस मुद्दे को भुनाने में माहिर रही है और खुद को ‘बंगाल की असली आवाज’ के रूप में पेश करती है।
इसके अलावा, मतदाताओं के एक हिस्से में यह धारणा भी है कि भाजपा की राजनीति अत्यधिक ध्रुवीकरण पर आधारित है। धार्मिक और पहचान की राजनीति का असर भले कुछ क्षेत्रों में दिखता हो, लेकिन पूरे राज्य में यह रणनीति कितनी कारगर होगी, इस पर सवाल बना हुआ है। बंगाल का सामाजिक ताना-बाना जटिल है, और यहां की राजनीति सिर्फ एक मुद्दे पर नहीं टिकती।
दूसरी ओर, टीएमसी के खिलाफ असंतोष को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। ग्रामीण इलाकों में विकास की असमानता, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और रोजगार के अवसरों की कमी जैसे मुद्दे लोगों के बीच चर्चा में हैं। भाजपा इन्हीं सवालों को उठाकर खुद को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहती है।
वैसे बंगाल की चुनावी लड़ाई सिर्फ आंकड़ों और नारों की नहीं है, बल्कि भावनाओं, पहचान और भरोसे की भी है। भाजपा के पास आक्रामक अभियान और राष्ट्रीय नेतृत्व का समर्थन है, लेकिन टीएमसी के पास जमीनी नेटवर्क और ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता है। इसलिए, यह कहना जल्दबाजी होगी कि सत्ताविरोधी लहर किसके पक्ष में जाएगी। भाजपा के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी क्योंकि उसे नाराज़गी को वोट में बदलना होगा। वहीं ममता बनर्जी के लिए यह अपनी विश्वसनीयता और जनसंपर्क की सबसे बड़ी परीक्षा है।
बहरहाल, इस चुनाव का नतीजा सिर्फ सत्ता परिवर्तन या सत्ता में पुनरावृत्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि बंगाल की राजनीति आने वाले वर्षों में किस दिशा में आगे बढ़ेगी। फिलहाल, मैदान सजा है, दांव बड़े हैं और फैसला पूरी तरह जनता के हाथ में है, जो इस बार सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि राजनीतिक कथा का अगला अध्याय लिखने जा रही है।
-नीरज कुमार दुबे