अबकी बार 400 पार के साथ सत्ता में आकर क्या BJP बदल देगी संविधान? नियमों की कसौटी पर कितना खरा उतरता है विपक्ष का दावा और अनंत हेगड़े का बयान

By अभिनय आकाश | Mar 11, 2024

हम सब भारत के संविधान की कसमें तो खूब खाते हैं या लोगों को खाते हुए सुनते हैं। पर क्या आपने संविधान देखा है? अगर कोई फोटो वगैरह में देखा भी हो तो एक चीज तो आपको पता ही होगी की अपना संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है। सोने पर सुहागा ये कि पूरा संविधान हिंदी और अंग्रेजी में लिखा गया। हाथों से कैरीग्राफ किया गया, न कोई प्रिटिंग हुई और न कोई टाइपिंग। इस संविधान के पहले पन्ने पर संविधान की आत्मा है। यानी संविधान की प्रस्तावना। वहीं प्रस्तावना जो 'हम भारत के लोग' से शुरू होती है। लेकिन इन दिनों बीजेपी के एक सांसद के बयान के बाद संविधान में बदलाव को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कर्नाटक से बीजेपी सांसद अनंत कुमार हेगड़े ने जनसभा में कहा कि संविधान में संशोधन के लिए और कांग्रेस की ओर से इसमें जोड़ी गई अनावश्यक चीजें हटाने के लिए बीजेपी को संसद के दोनों सदनों में दो- तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। आगामी लोकसभा चुनाव में एनडीए को 400 पार सीटें मिलने पर राज्यसभा में बहुमत हासिल करने में मदद मिलेगी। हेगड़े के बयान पर राजनीति तेज हो गई है। हेगड़े के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि संविधान को 'फिर से लिखना और नष्ट करना बीजेपी और आरएसएस का अजेंडा है। राहुल गांधी ने कहा कि बीजेपी सांसद का बयान कि उन्हें 400 सीट संविधान बदलने के लिए चाहिए, नरेंद्र मोदी और उनके संघ परिवार के छिपे मंसूबों का सार्वजनिक एलान है। कर्नाटक के सांसद की टिप्पणी को लेकर विपक्ष की ओर से सत्तारूढ़ दल पर निशाना साधने के बीच पार्टी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने रिएक्ट किया। उन्होंने कहा कि बीजेपी ने हमेशा संवैधानिक लोकाचार और राष्ट्रीय हित के अनुरूप काम किया है। हालांकि, आपको बता दें कि ऐसा नहीं है कि संविधान में इससे पहले संशोधन या बदलाव नहीं किए गए हैं। जून 1951 में संविधान में पहला संशोधन हुआ। उसके बाद ये सिलसिला लगातार चलता रहा है। कुल संशोधनों का औसत निकाला जाए तो हर साल करीब दो संशोधन होते हैं। एक वक्त में तो इंदिरा गांधी ने एक ही संशोधन के जरिए 40

अनुच्छेद तक बदल दिए थे। जबकि पीएम मोदी ने पिछले 10 साल में 8 बड़े संविधान संशोधन किए हैं। 

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जब इंदिरा गांधी ने किया था संविधान में व्यापक बदलाव

वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर श्रीमती गांधी पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग, मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए धनबल का प्रयोग आदि कई आरोप लगाए थे। हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राजनारायण मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली का दोषी करार दिया और 6 वर्ष तक कोई भी पद संभालने पर प्रतिबंध लगा दिया। श्रीमती गांधी ने हाईकोर्ट के निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। 24 जून, 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा। मगर श्रीमती गांधी को पद पर बने रहने का फैसला दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय के बाद से श्रीमती गांधी से प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देने की मांग उठने लगी थी। लेकिन श्रीमती गांधी किसी भी कीमत पर त्यागपत्र देने को राजी नहीं हुईं। परिणामस्वरूप, 25 जून, 1975 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के त्यागपत्र न देने तक देशभर में धरना-प्रदर्शन करने की घोषणा कर दी। अपने विरुद्ध आक्रोश को देखते हुए कुर्सी के मोह में अंधी हो चुकीं इंदिरा गांधी ने ऐसा कदम उठाया, जिसकी शायद ही किसी ने कल्पना की हो। 25-26 जून, 1975 की दरम्यानी रात को इंदिरा गांधी ने देश को आपातकाल के मुंह में धकेल दिया। प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी के इशारों पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली ने संविधान की धारा-352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। आपातकाल में सबसे पहले भारतीय संविधान का 38वां संशोधन 22 जुलाई 1975 को पास हुआ। इस संशोधन के अनुसार न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा का अधिकार छीन लिया गया। करीब दो महीने बाद इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाए रखने के लिए संविधान का 39वां संशोधन लाया गया। इलाहबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा का चुनाव रद्द कर दिया। लेकिन इस संशोधन ने कोर्ट से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच के अधिकार को ही छीन लिया।  40वें और 41वें संशोधन के जरिए संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संशोधन पास किया गया।

प्रस्तावना में किन परिस्थितियों में संशोधन किया गया?

इंदिरा गांधी ने "गरीबी हटाओ" जैसे नारों के साथ एक समाजवादी और गरीब-समर्थक छवि के आधार पर जनता के बीच अपनी स्वीकृति को मजबूत करने का प्रयास किया था। लेकिन गौर करने वाली बात है कि संविधान में 42वां संशोधन, 1976 में पारित हुआ जब आपातकाल लागू था। इस दौरान "संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य" शब्दों को "संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य" से बदल दिया गया। इस दौरान "राष्ट्र की एकता" शब्द को "राष्ट्र की एकता और अखंडता" में भी बदल दिया। 42वें संशोधन में कई अन्य प्रावधान थे, जिसके द्वारा इंदिरा सरकार ने सत्ता को और केंद्रीकृत करने की कोशिश की थी। हालांकि इनमें से कुछ को आपातकाल के बाद सत्ता में आई जनता सरकार ने 44वें संविधान संशोधन के जरिए रद्द कर दिया। संविधान की प्रस्तावना में हुए बदलाव से छेड़छाड़ नहीं की गई। 

क्या संविधान में बदलाव संभव हैं? 

अनुच्छेद 368(2) के तहत संसद “प्रत्येक सदन में उस सदन की कुल सदस्यता के बहुमत से और उस सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से एक विधेयक पारित करके संविधान में संशोधन कर सकती है। उसके बाद, विधेयक राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाएगा जो अपनी सहमति देंगे और उसके बाद संविधान में संशोधन किया जाएगा। संविधान सशोधन विधेयकों के लिए संयुक्त अधिवेशन की प्रक्रिया लागू नहीं होती है। अगस्त 2023 तक देश के संविधान में 127 संशोधन हो चुके हैं। 

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मोदी सरकार के 10 सालों में संविधान में किए गए बड़े बदलाव

99वां संशोधन: 13 अप्रैल 2015- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन

100वां संशोधन: 31 जुलाई 2015 को भारत और बांग्लादेश के बीच भूमि सीमा समझौते संधि

101वां संशोधन: 1 जुलाई 2017 वस्तु एवं सेवा कर लागू किया गया।

102वां संशोधन: 11 अगस्त 2018 को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया। 

103वां संशोधन: 12 जनवरी 2019 को  अनुच्छेद 15 के खंड (4) और (5) में उल्लिखित वर्गों के अलावा अन्य वर्गों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के नागरिकों के लिए अधिकतम 10% आरक्षण।

104वां संशोधन: 25 जनवरी 2020 को लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों के आरक्षण को अगले 10 वर्षों यानी 2030 तक बढ़ाया गया। 

105वां संशोधन: 10 अगस्त 2021 को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) की पहचान करने के लिए राज्य सरकारों की शक्ति को बहाल किया गया।

106वां संशोधन: 28 सितंबर 2023 को महिलाओं को विधानसभा और संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान। 

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