चुनौतियों पर सदा विजय पाने वाले नड्डा क्या दिल्ली में भी जीत दिला पाएंगे ?

By डॉ. नीलम महेंद्र | Jan 31, 2020

जगत प्रकाश नड्डा, बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष, एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने लाइम लाइट से दूर, लो प्रोफाइल रहते हुए विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के सर्वोच्च पद तक पहुंचने में सफलता हासिल करने की मिसाल कायम की। वैसे बिहार की छात्र राजनीति से हिमाचल प्रदेश सरकार में एक मंत्री और विपक्ष में रहते हुए नेता प्रतिपक्ष का पद संभालने से लेकर केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री बनने और अब पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने तक नड्डा का राजनैतिक सफर विविधताओं से भरा रहा है।

क्योंकि जिस पार्टी की बागडोर अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी से लेकर अमित शाह जैसी हस्तियों ने संभाली हो उस पार्टी की कमान संभालने का जिम्मा मिलना जितना गर्व का विषय होता है उतना ही जिम्मेदारी का अहसास भी लाता है।

दरअसल जुलाई 2014 से जनवरी 2020 तक के साढ़े पांच साल तक के अपने कार्यकाल में अमित शाह ने पार्टी अध्यक्ष के नाते वो लकीर खींच दी है जिसे बरकरार रखना ही शायद पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होने वाली है। लेकिन नए बीजेपी अध्यक्ष के लिए चुनौतियाँ और भी हैं। खास तौर पर तब जब उन्होंने पार्टी की कमान ऐसे समय में संभाली हो जब दिल्ली के चुनाव सामने खड़े हों, जहाँ के लोगों ने 1998 से भाजपा से दूरी बनाकर रखी हो और जहाँ भाजपा के राष्ट्रवाद का मुकाबला "दिल्ली का बेटा" और उसकी मुफ्त योजनाओं की घोषणाओं से हो।

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लेकिन जैसा कि नड्डा की अब तक की राजनैतिक यात्रा बताती है चुनौतियाँ उनके लिए आगे बढ़ने की सीढ़ी होती हैं। बहुत कम लोग जानते होंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना को क्रियान्वित करने का जिम्मा नड्डा का ही था। इससे पहले 2014 के चुनावों में पर्दे के पीछे काम करने वाले मुख्य चेहरों में एक चेहरा नड्डा का भी था। ये वो चुनाव थे जिन्होंने देश की राजनीति की दिशा ही बदल दी। और जब 2019 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश का जिम्मा नड्डा को दिया गया तो भाजपा ने राज्य में 49.6% वोट शेयर के साथ 80 में से 62 सीटें जीतकर महागठबंधन के गणित को ध्वस्त कर राजनैतिक पंडितों को चौंका दिया था। दरअसल संगठन में सबको साथ में लेकर चलने का हुनर ही नड्डा को संगठन के शीर्ष पर लेकर गया। शायद यही वो बुनियादी हुनर है जो नड्डा को भाजपा के अध्यक्ष पद तक लेकर गया। क्योंकि इस पद पर बैठे व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वो संघ और भाजपा के बीच एक सेतु का काम करे, जो दोनों संगठनों में समन्वय बैठा कर चले। लेकिन इसके साथ ही मोदी और शाह की जोड़ी को किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो उनका विश्वासपात्र हो और आगे जाकर पार्टी में उनका प्रतिद्वंद्वी ना बने। क्योंकि अगर खबरों की मानें तो 2019 चुनावों में भाजपा को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में संघ एनडीए के घटक दलों में मोदी विरोध को देखते हुए एक नए चेहरे की अगुवाई में सरकार बनाने की रूपरेखा पर कार्य करना आरंभ कर चुका था। दरअसल राजनीति में आकर्षण कितना ही हो, उसका असली चेहरा तो कुरूप ही होता है। शायद इसलिए अपने मुस्कुराते चेहरे के साथ नड्डा संघ और भाजपा दोनों के लिए स्वीकार्य बने। कारण जो भी हो लेकिन संगठन के साधारण कार्यकर्ता के स्तर से उसके अध्यक्ष तक की नड्डा की यह यात्रा निःसंदेह हर किसी के लिए प्रेरणादायी है।

-डॉ. नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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