सूरज को मना लेंगे (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | May 02, 2025

विदेशियों का तो पता नहीं लेकिन विश्वगुरुओं के देश में, पता नहीं कैसी कैसी चौरासी करोड़ योनियां भुगतने के बाद, सिर्फ एक बार ही मानव जीवन मिलता है। इस महा विरली योनी यानी मानव जन्म में जितनी हो सकती है, हम जी भर कर मनमानी कर रहे हैं। दूसरों के दुखों में सुखी होकर संतुष्टि पा रहे हैं। अपनी आने वाली कई पीढ़ियों के लिए धन इक्कठा कर रहे हैं। 

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फिलहाल हमें बुध और शुक्र से कुछ लेना देना नहीं है। हमारे पास अपना ही बहुत कुछ है जिसे हम संभाल नहीं पा रहे। लेकिन सूरज महाराज को चाहिए कि पृथ्वी पूरी न निगलें। कम से कम हमारा देश रहने दें। सूर्यजी पता ही होगा कि हजारों साल से हम उनको भगवान का दर्जा देते हैं उनकी पूजा करते हैं। सुबह सुबह सूर्यदेव को जल चढ़ाने की समृद्ध परम्परा है। वह बात अलग है कि हम दिन रात मेहनत कर, भागदौड़ कर, जुगाड़ कर सफल होने के लिए अनैतिक रास्ते इख्तियार करते हैं। कई तरह के पाप कर धार्मिक अनुष्ठान करवाते हैं। मेहनत से की गई हेराफेरी की कमाई का हिस्सा भगवान् को भी उपहार देते हैं। 

चांद पर बसने का ख़्वाब, अरबों खरबों खर्चने के बाद भी अभी तो पूरा नहीं हुआ। हमारे पास वहां के चित्र, मिटटी और छोटी मोटी चट्टानें हैं। वह बात दीगर है कि कुछ लोगों ने वहां प्लाट भी खरीद लिए हैं। शायद नक़्शे भी बनवा लिए होंगे। अब कह रहे हैं कि पृथ्वी पर बढ़ रहे तापमान, जलवायु के खतरे से मौसम चक्र बिगड़ने के कारण कुदरती आपदाएं बढ़ रही हैं। महा मुसीबत के समय में अगर धरती छोड़कर जाना ही पड़ा तो मंगल ग्रह ही सबसे उपयुक्त रहेगा। संभवत तभी वहां जीने के ख़्वाब उगाए जा रहे हैं। 

वर्तमान बारे सोचना खतरों से खाली नहीं है। शक्तिशाली देश, लड़ते हुए दुनिया बर्बाद करने में सहयोग दे रहे हैं। ज़बरदस्त मारक हथियार उपलब्ध हैं। कृत्रिम बुद्धि ने नैसर्गिक बुद्धि पर कब्ज़ा कर लिया है। नेता विकास के पीछे बिना हाथ धोए पड़े हैं। वैसे ज्यादा घबराने की ज़रूरत नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार धरती पर जीवन एक अरब, दो हज़ार इक्कीस साल बाद खत्म होगा। पृथ्वी को निगलने में अभी पांच अरब साल लगेंगे। तब तक हम सूरज को मना ही लेंगे। 

- संतोष उत्सुक

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