तेल कम, गैस कम...आने वाले दिनों में क्या बिजली भी होगी कम? बढ़ती गर्मी के बीच लोगों के मन में नई टेंशन!

By नीरज कुमार दुबे | Mar 30, 2026

भीषण गर्मी ने अभी से ही लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया है, जिससे यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले महीनों में तापमान किस स्तर तक पहुंच सकता है। देश के कई हिस्सों में मार्च के अंतिम सप्ताह से ही तापमान सामान्य से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। इस बीच पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में चल रहे तनाव ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। हालात ऐसे बन रहे हैं कि लोग अब खाना पकाने जैसे घरेलू कार्यों के लिए भी बिजली पर निर्भर होते जा रहे हैं। ऐसे में जब अप्रैल से जून के बीच भीषण गर्मी अपने चरम पर होगी, तब बिजली की मांग में भारी उछाल आना लगभग तय माना जा रहा है।

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हम आपको बता दें कि पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व क्षेत्र दुनिया के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता माने जाते हैं। यहां जारी तनाव का सीधा असर कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर पड़ रहा है। हालांकि भारत अपनी बिजली जरूरतों का बड़ा हिस्सा कोयले से पूरा करता है, लेकिन गैस आधारित बिजली संयंत्र और आयातित ईंधन भी ऊर्जा संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं। यदि वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होती है तो इसका असर भारत की ऊर्जा लागत पर भी पड़ सकता है।

इसके अलावा घरेलू स्तर पर भी बदलाव देखने को मिल रहा है। शहरों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और जीवनशैली में बदलाव के कारण लोग अब गैस की जगह बिजली आधारित उपकरणों का अधिक उपयोग करने लगे हैं। इंडक्शन चूल्हे, बिजली से चलने वाले हीटर और अन्य उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल ने कुल बिजली खपत को और बढ़ा दिया है।

हम आपको बता दें कि भारत की बिजली व्यवस्था अभी भी काफी हद तक कोयले पर निर्भर है। कुल बिजली उत्पादन का लगभग सत्तर प्रतिशत हिस्सा कोयला आधारित बिजली घरों से आता है। गर्मी के मौसम में जब मांग बढ़ती है, तब कोयले की खपत भी तेजी से बढ़ती है। कई बार यह स्थिति पैदा हो जाती है कि बिजली घरों के पास सीमित दिनों का ही कोयला भंडार बचता है।

कोयला खदानों से उत्पादन, रेलवे के जरिए परिवहन और बिजली घरों तक आपूर्ति की पूरी श्रृंखला पर दबाव बढ़ जाता है। यदि इस श्रृंखला में कहीं भी बाधा आती है तो इसका सीधा असर बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। यही कारण है कि हर साल गर्मी के मौसम में कोयले की उपलब्धता एक बड़ा मुद्दा बन जाती है।

देखा जाये तो बढ़ती मांग और ईंधन की लागत में संभावित वृद्धि के चलते बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। यदि बिजली उत्पादन की लागत बढ़ती है, तो वितरण कंपनियों पर भी दबाव बढ़ेगा, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। हालांकि सरकार आम जनता पर बोझ कम रखने के लिए सब्सिडी और अन्य उपायों का सहारा ले सकती है, लेकिन लंबे समय तक यह व्यवस्था टिकाऊ नहीं मानी जाती। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक ऊर्जा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और घरेलू मांग लगातार बढ़ती है, तो भविष्य में बिजली दरों में संशोधन करना पड़ सकता है।

साथ ही सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले महीनों में बिजली कटौती बढ़ेगी? यदि मांग और आपूर्ति के बीच अंतर अधिक बढ़ता है, तो कई राज्यों में बिजली कटौती की स्थिति बन सकती है। खासकर ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों में इसका प्रभाव अधिक देखने को मिल सकता है। इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में भी पीक समय के दौरान दबाव बढ़ सकता है। जब घरों, दफ्तरों और बाजारों में एक साथ बिजली की खपत बढ़ती है, तब ग्रिड पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। यदि पर्याप्त उत्पादन उपलब्ध नहीं होता, तो लोड प्रबंधन के तहत कटौती करनी पड़ सकती है।

उधर, केंद्र सरकार ने इस चुनौती को देखते हुए पहले से ही कई कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। कोयले के उत्पादन और आपूर्ति को बढ़ाने, बिजली घरों में न्यूनतम भंडार सुनिश्चित करने और राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों को तेजी से बढ़ाने की दिशा में भी काम हो रहा है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि मांग प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है। ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देना, स्मार्ट ग्रिड तकनीक का उपयोग और उपभोक्ताओं को जागरूक करना इस दिशा में अहम कदम हो सकते हैं।

बहरहाल, स्पष्ट है कि वर्ष 2026 में भारत के सामने बिजली आपूर्ति को लेकर एक कठिन परीक्षा हो सकती है। भीषण गर्मी, वैश्विक ऊर्जा संकट, बढ़ती घरेलू खपत और कोयले पर निर्भरता जैसे कई कारक मिलकर इस चुनौती को और जटिल बना रहे हैं। ऐसे में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े सभी पक्ष मिलकर किस तरह इस स्थिति से निपटते हैं और आम लोगों तक बिजली की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं।

-नीरज कुमार दुबे

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