बिहार में करारी हार के बाद राजनीति छोड़ देंगे प्रशांत किशोर? अब आगे क्या हैं विकल्प

By अभिनय आकाश | Nov 15, 2025

बिहार की राजनीति में खुद को गेम चेंजर बताने वाले प्रशांत किशोर बिहार की सियासत को अर्श तक ले जाने वाले खुद फर्श पर हैं। रैली में भीड़ थी। नीतीश कुमार पर तीखे वार थे। नए बिहार के नए-नए दावे थे, वायदे थे। बावजूद इन सबके जन स्वराज पार्टी एक सीट भी जीतने में कामयाब नहीं हुई। प्रचार के जो हीरो थे वो नतीजों में जीरो कैसे बन गए? इस रिपोर्ट में आपको उत्तर प्रशांत किशोर यानी पीके ने बिहार चुनाव में अपनी नई पार्टी बनाकर जबरदस्त सियासी आगाज किया। पीके बिहार की सियासत में पोस्टर बॉय के तौर पर उभरे और जन स्वराज पार्टी से जुड़ने की होड़ सी लग गई। लगा जैसा दिल्ली में हुआ था ठीक वैसा ही बिहार में होने वाला है। बदलाव आने वाला है। बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा नीति को लेकर पीके ने बढ़-चढ़कर बातें की और बिहारियों को एक नए बिहार का ख्वाब दिखाया। बिहार की सियासत में खुद को अर्श पर देखने वाले प्रशांत किशोर ने तो यहां तक भविष्यवाणी कर दी कि इस बार नीतीश कुमार का आखिरी चुनाव है और इस बार बिहार में नीतीश सरकार आई तो वो राजनीति छोड़ देंगे। यह अंतिम सत्र है और नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक कैरियर का यह अंतिम सत्र है।

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खुद एक भी सीट नहीं हुआ हासिल

बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी जनसुराज सबसे अधिक चर्चा में थे, लेकिन परिणाम ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पार्टी को केवल एक प्रतिशत तक वोट मिले और कोई सीट नहीं मिली। प्रशांत किशोर के करीबियों का कहना है कि परिणाम उनकी उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहे। वे बड़ी जीत की उम्मीद नहीं कर रहे थे, लेकिन कुछ वोट प्रतिशत कुछ और सीटें उम्मीद की थीं। अब उन्हें शून्य से शुरुआत करनी होगी। विपक्ष कमजोर होने के कारण वे भविष्य में राज्य में सक्रिय रह सकते हैं, लेकिन अगली रणनीति पर अभी जल्दबाजी में कुछ कहना मुश्किल है। चुनाव से पहले उन्होंने नीतीश कुमार की सीटें सीमित करने के बड़े दावे भी किए थे।

आखिर ऐसा क्यों हुआ

प्रशांत किशोर ने प्रचार के दौरान दावा किया था कि जदयू को 25 से अधिक सीटें जीती तो वे राजनीति छोड़ देंगे। यह दांव उल्टा पड़ गया।

चुनाव से पहले दावा करते थे कि समाज के अच्छे लोगों को टिकट देंगे। लेकिन पार्टी के 231 प्रत्याशियों में से 108 पर क्रिमिनल केस है।

जातीय समीकरण पर खरे नहीं उतरे।

सोशल मीडिया और इंफ्लूएंसर्स के सहारे प्रचार अभियान चलाया, लेकिन खुद चुनाव नहीं लड़े।

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