सवालों का सामना करेगी आम आदमी पार्टी?

By उमेश चतुर्वेदी | Apr 27, 2026

राजनीति सपने दिखाते हुए लोगों से उन्हें पूरा करने के वायदे करती है, लेकिन लोगों को उन्हीं राजनीतिक दलों के दिखाए सपनों पर भरोसा होता है, जिनकी साख होती है। लोकतंत्र में साख हासिल करने का सबसे बड़ा और जांचा-परखा हथियार आंदोलन ही है। कई बार जनाकांक्षाओं के उफान में आंदोलन से उभरी राजनीति को सफलताएं मिल भी जाती हैं, लेकिन वे लंबे समय तक टिक नहीं पातीं। उनमें बिखराव शुरू हो जाता है। आम आदमी पार्टी के साथ भी क्या ऐसा ही हो रहा है? राघव चड्ढा की अगुआई में आप के दस में से सात सांसदों के बगावती होने और बीजेपी में शामिल होने के बाद कुछ ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं।

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इंदिरा सरकार की जन विरोधी नीतियों और कांग्रेसी सरकारों में भ्रष्टाचार के खिलाफ 1970 के दशक में जेपी आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन में शामिल हो रहे लोगों को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने जयप्रकाशन नारायण को एक पत्र लिखा था। जेपी आंदोलन का एक लक्ष्य व्यवस्था को बदलना भी था। चंद्रशेखर ने अपने पत्र में आशंका जताई थी कि आंदोलन में शामिल होने वाले नेता व्यवस्था में बदलाव के लिए नहीं, सत्ता के लिए आ रहे हैं। उन्होंने आगे लिखा था कि सत्ता में आने के बाद ये ही नेता व्यवस्था का हिस्सा बन जाएंगे और भविष्य में अपनी-अपनी जातियों के नेता बन जाएंगे। उन नेताओं की ओर देखते हैं तो पाते हैं कि चंद्रशेखर की आशंका सच हुई। उस आंदोलन से निकलने नेताओं में से ज्यादातर पारिवारिक पार्टियों के नेता हैं और ज्यादातर पर भ्रष्टाचार को लेकर मुकदमे चल रहे हैं। जेपी आंदोलन में उभरे नेताओं का जातीय आधार पर टिकी राजनीति के चलते अस्तित्व बचा हुआ है, लेकिन असम से घुसपैठियों को बाहर निकालने वाले आंदोलन से उभरी पार्टी असम गणपरिषद के नेताओं के बारे में आज देश कितना जानता है? जबकि केजरीवाल की तरह उसके नेताओं ने छात्रावास से निकल कर सीधे सत्ता के गलियारों पर कब्जा कर लिया था। 

यह पहला मौका नहीं है कि अन्ना आंदोलन से उभरी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से बड़े नाम निकले हैं। आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में शामिल रहे योगेंद्र यादव और मशहूर वकील प्रशांत भूषण को पार्टी ने शुरू में ही या तो निकाल दिया था या वे निकल गए थे। प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण ने आम आदमी पार्टी की स्थापना के लिए भारी रकम दी थी। अन्ना आंदोलन में अरविंद केजरीवाल के साथ कंधा से कंधा भिड़ाकर खड़ी रहीं पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी को भी जल्द ही पार्टी से अलग राह चुननी पड़ी थी। पार्टी का शुरू के दिनों से ही बड़ा चेहरा रहीं शाजिया इल्मी भी वहां की बजाय अब भारतीय जनता पार्टी में हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे आनंद कुमार हों या फिर कैलाश गहलोत, सबको केजरीवाल की अगुआई वाली पार्टी से अलग राह चुननी पड़ी है। 

जब भी किसी दल से कोई नेता बगावत करके नई राह चुनता है, तब वह दल विशेष उसे गद्दार कहता है। राघव चड्ढा की अगुआई में केजरीवाल के खिलाफ बगावत करके नई राह चुनने वाले सांसदों को भी गद्दार कहा जाना कोई नई बात नहीं है। वैसे अपने निजी अहम् या अनदेखी के चलते दलों को छोड़ना या फायदे के लिए दल बदलना भारतीय राजनीति में जाना-पहचाना है। इस लिहाज से देखें तो आम आदमी पार्टी से बगावत होना भी नया नहीं कहा जाएगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस पार्टी की डेढ़ दशक की उम्र भी नहीं हुई, उसके महत्वपूर्ण नेता आखिर क्यों उसे छोड़कर निकल रहे हैं? यह सवाल और भी महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है, क्योंकि इस बार पार्टी छोड़ने वाले नेताओं में से राघव चड्ढा और संदीप पाठक तो पार्टी के शुरूआती दिनों से रणनीतिकार और संगठक रहे हैं। दोनों केजरीवाल के नजदीक भी माने जाते रहे। दिल्ली से राज्यसभा सांसद बनने से पहले स्वाति मालीवाल भी केजरीवाल की करीबी मानी जाती रहीं। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने आम आदमी पार्टी के एजेंडे को ही आगे बढ़ाया। उनका कार्यक्षेत्र दिल्ली ही था, लेकिन मणिपुर और दूसरे बीजेपी शासित राज्यों के कथित महिला अत्याचारों की जांच करने वह इसीलिए पहुंचती रहीं, ताकि बीजेपी को अपने दलीय एजेंडे के तहत कठघरे में खड़ा किया जाए। मुख्यमंत्री निवास में उनसे हुई कथित मारपीट के बाद से वे बगावती हैं। राघव चड्ढा के साथ जाकर उन्होंने अपनी बगावत को सियासी वैधता देने की कोशिश की है।

आप में इस बड़ी बगावत का सीधा फायदा निश्चित तौर पर बीजेपी को ही होगा। अगले साल गुजरात और पंजाब में चुनाव हैं। गुजरात में आप बार-बार तीसरा कोण बनाने की कोशिश करती है। बगावत से उसके जमीनी कार्यकर्ताओं पर असर पड़ेगा और तीसरा कोण बनाने में वह शायद ही सफल हो पाए। उत्तर भारत में भारतीय जनता पार्टी के लिए पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब पर निगाह है। वहां वह अब तक कायदे से उपस्थिति भी दर्ज नहीं करा पाई है। याद करना चाहिए कि राघव लंबे समय तक पंजाब के प्रभारी रहे हैं। आप ने पिछला विधानसभा चुनाव भी उनके ही प्रभार में जीता था। बीजेपी इन नेताओं के जरिए पंजाब में आप के किले में सेंध लगाने की कोशिश करेगी। वैसे भी चड्ढा के साथ गए नेताओं में सबसे ज्यादा पंजाब से ही चुनकर आए हैं। वैसे इस बगावत से पंजाब की राजनीति में कांग्रेस की राह भी आसान हो सकती है। उसके छिटके हुए कार्यकर्ता भी उसकी ओर लौटना शुरू कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया ब्लॉक का हिस्सा होने के चलते स्थानीय स्तर पर कांग्रेसी नेताओं के लिए आप सरकार का कड़ा विरोध कर पाना आसान नहीं था। संसदीय दल में बगावत के चलते उनका भी मनोबल बढ़ सकता है।

वैसे इन नेताओं की संसद सदस्यता खत्म कराने को लेकर भी राजनीतिक दांवपेच शुरू हो गए हैं। कपिल सिब्बल ने तो तर्क ही दे दिया है कि किसी पार्टी में शामिल होने के लिए टूटे हुए गुट को पहले दल बनाना होता है। राघव की अगुआई वाले नेताओं ने यह कदम ना उठाते हुए सीधे अलग होकर बीजेपी में शामिल होने का ऐलान कर दिया है। इस तर्क के जरिए राज्यसभा सभापति को आम आदमी पार्टी चिट्ठी भी देने जा रही है। सिब्बल के दिए तर्क को लेकर बीजेपी ने सोचा नहीं होगा, ऐसा मानना बेवकूफी होगी। जाहिर है कि बीजेपी ने भी सोचकर पत्ते खेले हैं। पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले अगर वहां के आप विधायकों में भी बड़ी टूट-फूट हो तो हैरत नहीं होनी चाहिए। क्योंकि बागी नेताओं की अगुआई में ऐसी कोशिशें होना स्वाभाविक है। 

आम आदमी पार्टी में अब तक छोटी बगावतें होती रही हैं। लेकिन यह पहला मौका है, जब संसदीय दल का बड़ा हिस्सा अलग हो चुका है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व को अपने गिरेबान में झांकना होगा। उसे विचार करना होगा कि आखिर उसके किले में कहां सुराख है और वह किस वजह से बड़ी हो रही है। राजनीति में कहा जाता है कि सत्ता ऐसी गोंद होती है, जिससे दलीय कार्यकर्ता चिपके रहते हैं। आप के पास पंजाब की सत्ता है, फिर भी अगर बड़ी बगावत होती है, तो निश्चित तौर पर उसके पीछे गहरी नाराजगी और उसके कारण होंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या आप का नेतृत्व इस दिशा में सोचना शुरू करेगा। 

- उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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