By अभिनय आकाश | Jul 21, 2026
दिल्ली की सियासत में इन दिनों दो अलग-अलग मोर्चों पर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। एक तरफ जहां 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के बैनर तले युवाओं और छात्रों का प्रदर्शन सड़क पर उग्र रूप ले रहा है और सरकार के खिलाफ तीखी नारेबाजी हो रही है, वहीं दूसरी तरफ अंदरखाने एक अलग ही राजनीतिक रणनीति तैयार की जा रही है। प्रमुख मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं की अगुवाई में एक ऐसा एजेंडा आकार ले रहा है, जिसकी गूंज आने वाले दिनों में देश की सियासत को गरमा सकती है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक तरफ छात्रों के आंदोलन और दूसरी तरफ इस नई गोलबंदी के बीच लोकतंत्र की आड़ में सरकार पर दबाव बनाने या कोई नया मोर्चा खोलने की तैयारी है? क्या यह सब महज संयोग है या लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सरकार पर चौतरफा दबाव बनाने की कोई बड़ी पटकथा? आइए समझते हैं राजधानी दिल्ली में बन रहे इस नए सियासी समीकरण का पूरा गणित। दरअसल इंडियन मुस्लिम फॉर सिविल राइट्स यानी आईएमसीआर नामक संगठन ने आगामी 24 जुलाई को दिल्ली में एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण बैठक का ऐलान कर दिया है। इस बैठक में मुस्लिम समुदाय की कई बड़ी और जानीमानी हस्तियों के छूटने की खबर है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस मंच पर कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कई राजनीतिक दलों के मुस्लिम सांसद एक साथ नजर आएंगे। यानी मंच बड़े लेवल पर सजाया जाएगा। इतना ही नहीं जमात इस्लामी, जमात अहले हदीस और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल अवार्ड जैसे प्रभावशाली संगठनों के नुमाइंदे भी इस चर्चा का हिस्सा बनने जा रहे हैं।
विपक्षी दलों को और उनसे भी ज्यादा मुसलमानों को, मौलानाओं को जिनकी दुकान पर हथौड़ा चल रहा है। वही बार-बार चिल्लाते हैं, बैठक बुलाते हैं, माहौल गरमाते हैं। किसी ना किसी बहन मुसलमानों को इकट्ठा कर सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश में लग जाते हैं। अब देखिए ना यह जो बैठक बुलाई जा रही है, इसमें क्या मुद्दे उठाए जा रहे हैं। गौर से सुनिए। मदरसों पर चल रहे बुलडोजर एक्शन। बुलडोजर एक्शन मजहब देखकर नहीं बल्कि अवैध चीजें देखकर किया जा रहा है। फिर चाहे उसकी जद में मस्जिद आए या फिर मंदिर आए। दस्तावेज है तो बच जाएंगे। नहीं है अवैध है तो जाहिर सी बात है बुलडोजर की जद में जाएंगे। लेकिन इस चीज से ना तो हिंदुओं को दिक्कत है। इस चीज से ना तो अवैध कारनामे जो कर रहे हैं उन्हें दिक्कत हो रही है। लेकिन दिक्कत किसे हो रही है? देश भर में यूसीसी कानून का भी मुसलमान ही विरोध कर रहे हैं। जब एक देश है तो सभी धर्मों के लिए एक कानून क्यों नहीं हो सकता? जबकि इस कानून से बेटियों को उनका हक मिल रहा है। तलाक शादी के नियम बन रहे हैं। कुप्रथाएं बंद हो रही हैं। लेकिन फिर भी चंद मुसलमानों को दिक्कत है। सिर्फ इतना ही नहीं। अब उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड के खत्म करने पर ही आ जाते हैं। क्या कोई बच्चा धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ बाकी शिक्षा ग्रहण करेगा? डॉक्टर इंजीनियर बनेगा तो किसी को तकलीफ होगी? नहीं। जाहिर सी बात है नहीं होगी। फिर इस चीज से चंद मुसलमानों को तकलीफ क्यों हो रही है?
अगर सरकार निशाना बनाती या फिर अनदेखी करती हर चीज की सुविधा ना मिलती। बोलने की आजादी ना मिलती। हर चीज का तो हक मिल रहा है। अब देखिए ना इसी तकलीफ को लेकर मुसलमानों के ठेकेदार मंच सजा रहे हैं और मुसलमानों को ही भड़काने के लिए साजिश रचते नजर आ रहे हैं। जब कहीं मुसलमानों को भड़काकर देश के लोकतंत्र के खिलाफ किया गया कोई विरोध प्रदर्शन खड़ा किया जाता है तो उसका कितना नेगेटिव असर हुआ है चलिए इस पर भी आ जाते हैं। आयोजकों का सीधा-सीधा तर्क है। राजनीतिक दलों के जरिए मुसलमानों की लगातार की जा रही अनदेखी के विरोध में यह कदम उठाया जा सकता है। लेकिन यहां एक बड़ा और बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या इस तरह की अपीलों से देश का ही नुकसान नहीं होगा? जिस लोकतंत्र ने स्वतंत्र भारत को एक सूत्र में पिरोकर रखा क्या उसके बहिष्कार से किसी मुस्लिम समुदाय का भला हो सकता है? इतिहास गवाह है कि जब भी मजहब या पंथ के आधार पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से दूरी बनाने का प्रयास किया गया है। उसके परिणाम हमेशा नकारात्मक यानी नेगेटिव ही रहे हैं। तो ऐसे में अगर हम अतीत के पन्नों को पलटे तो ऐसी रूढ़िवादी और अलगाववादी सोच के परिणाम साफ दिखाई देते हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान की शह पर कश्मीर में हुरियत जैसे अलगाववादी गुटों ने कई बार चुनावों के बहिष्कार का नारा दिया था।
कश्मीर के आम नागरिक लंबे समय तक एक स्वस्थ और पारदर्शी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से मरहूम रहे और वहां तो विकास की रफ्तार भी थमी रही। आपने देखा होगा वैश्विक स्तर पर देखें तो साल 2005 में इराक के सुन्नी मुसलमानों ने अमेरिकी प्रभाव का आरोप लगाते हुए चुनाव का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया था। इस बहिष्कार का परिणाम क्या हुआ सबने देखा। संसद में सुन्नी समुदाय का प्रतिनिधित्व किसी गिनती में नहीं रहा। जिससे देश में शिया सुन्नी टकराव की एक नई और हिंसक लहर शुरू हो गई। और इसी तरह साल 2014 में बहरीन के शिया मुसलमानों ने भी वही रास्ता चुना जिसके कारण वहां सुन्नी मुस्लिम दलों ने एक तरफ़ा जीत हासिल की और वहां का विपक्ष आज तक राजनीतिक रूप से खुद को स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा है। इन तमाम वैश्विक और घरेलू उदाहरणों से यह साफ है कि लोकतंत्र से दूरी बनाना कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।