Crude Oil संकट से बढ़ेगी महंगाई? Petrol-Diesel की मांग घटी, देश की Economy पर मंडराया बड़ा खतरा।

By Ankit Jaiswal | Jun 03, 2026

वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी उथल-पुथल का असर अब भारत पर भी साफ दिखाई देने लगा है। बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों, आपूर्ति संबंधी चिंताओं और महंगाई के दबाव के बीच कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने भारत में पेट्रोल और डीजल की मांग वृद्धि के अनुमान को काफी कम कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा परिस्थितियां लंबे समय तक बनी रहीं तो इस वर्ष ईंधन खपत में वृद्धि कोविड महामारी के बाद सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच सकती है।

मौजूद जानकारी के अनुसार ऊर्जा बाजार का अध्ययन करने वाली संस्था क्लेपर ने हाल ही में भारत में परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों की मांग वृद्धि के अपने अनुमान में लगभग 39 प्रतिशत की कटौती की है। पहले जहां इस वर्ष मांग में प्रतिदिन लगभग 1.28 लाख बैरल की वृद्धि का अनुमान था, वहीं अब इसे घटाकर करीब 78 हजार बैरल प्रतिदिन कर दिया गया है।

गौरतलब है कि पेट्रोल की मांग वृद्धि का अनुमान भी लगभग 40 प्रतिशत घटाया गया है। पहले जहां 63 हजार बैरल प्रतिदिन की वृद्धि की संभावना जताई गई थी, वहीं अब यह अनुमान करीब 38 हजार बैरल प्रतिदिन रह गया है। इसी तरह डीजल की मांग वृद्धि का अनुमान भी लगभग 30 प्रतिशत घटाकर 42 हजार बैरल प्रतिदिन कर दिया गया है।

विशेषज्ञ एलिफ बिनिची के अनुसार कच्चे तेल के आयात पर बढ़ती लागत, रुपये की कमजोरी और सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर बढ़ते वित्तीय दबाव के कारण सरकार ईंधन बचत से जुड़े संदेशों और खर्च में संयम को बढ़ावा दे रही है। इसका असर परिवहन क्षेत्र में ईंधन खपत की वृद्धि पर पड़ सकता है।

वहीं ऊर्जा अनुसंधान संस्था रिस्टैड एनर्जी ने भी भारत में डीजल की मांग वृद्धि के अनुमान में भारी कटौती की है। संस्था का मानना है कि डीजल खपत में वृद्धि अब केवल 4 से 5 हजार बैरल प्रतिदिन रह सकती है, जबकि पहले यह अनुमान 50 से 60 हजार बैरल प्रतिदिन के बीच था।

बता दें कि डीजल भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण ईंधन माना जाता है। माल परिवहन, कृषि कार्य, निर्माण गतिविधियों और औद्योगिक संचालन का बड़ा हिस्सा डीजल पर निर्भर करता है। ऐसे में इसकी मांग में कमी आर्थिक गतिविधियों की गति को भी प्रभावित कर सकती है।

मौजूद जानकारी के अनुसार बढ़ती ईंधन कीमतों का असर महंगाई पर भी पड़ सकता है। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होने की आशंका है। इसके अलावा सरकार के राजकोषीय संतुलन और चालू खाते पर भी दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की स्थिति चीन जैसी नहीं है। चीन में सड़क परिवहन ईंधन की मांग में दीर्घकालिक गिरावट के संकेत पहले से दिखाई दे रहे थे, जबकि भारत में मौजूदा कमजोरी को अस्थायी माना जा रहा है। उनका मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और तेल आपूर्ति सामान्य होती है तो भारत में ईंधन की मांग फिर से मजबूत गति पकड़ सकती है। फिलहाल ऊर्जा बाजार और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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