By कमलेश पांडे | Aug 10, 2026
एशिया में ईरान और रूस के दांवपेंच से निपटने के लिए या फिर अमेरिका और चीन की शह पर पहले पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच और अब तुर्किये के साथ भी मक्का में जो रक्षा समझौते हुए हैं, उसके दृष्टिगत भारतवासियों के दिलोदिमाग में बस एक ही सवाल कौंध रहा है कि क्या कथित 'इस्लामिक नाटो' से भारत की कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ेंगी? क्या इससे निपटने में रूस-ईरान से रक्षा सम्बन्धों को और मजबूती दी जानी चाहिए? या फिर अमेरिका या चीन या फिर दोनों के इशारे पर हुए इस गठबंधन के पीछे कोई परोक्ष चाल तो नहीं है?
पहली, पाकिस्तान को नया रणनीतिक ऑक्सीजन मिल सकता है: पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता, तुर्किये के पास मजबूत रक्षा उद्योग/सैन्य क्षमता और सऊदी अरब के पास वित्तीय व ऊर्जा शक्ति है। इन तीनों का संयोजन पाकिस्तान को भारत के मुकाबले कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाने के नए साधन दे सकता है।
दूसरा, तुर्किये का शामिल होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है: भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तुर्किये ने कई बार इस्लामाबाद के पक्ष में राजनीतिक रुख अपनाया है। अब यदि वह किसी औपचारिक सामूहिक रक्षा व्यवस्था का हिस्सा है, तो भविष्य के भारत-पाकिस्तान संकट में उसका वजन और बढ़ सकता है।
तीसरा, सऊदी अरब को पाकिस्तान का “स्थायी सैन्य सहयोगी” मान लेना भी गलत होगा: रियाद के भारत के साथ बड़े आर्थिक, ऊर्जा और रणनीतिक हित हैं। इसलिए सऊदी नेतृत्व के लिए पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग और भारत के साथ रणनीतिक संबंध—दोनों को साथ लेकर चलना संभवतः अधिक उपयोगी है।
जवाब: संभावना को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन अभी इसका प्रमाण नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि जनवरी 2026 में ही रणनीतिक विश्लेषण में यह कहा जा रहा था कि तुर्किये इस तरह के गठबंधन का इस्तेमाल NATO के भीतर अपनी bargaining power बढ़ाने और “hedging” के लिए कर सकता है। चूंकि अमेरिका के लिए ऐसा ढांचा कुछ परिस्थितियों में उपयोगी भी हो सकता है, क्योंकि ईरान के विरुद्ध क्षेत्रीय deterrence बढ़ाना, पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य बोझ कम करना,
सऊदी सुरक्षा को वैकल्पिक रूप से मजबूत करना, तुर्किये को पश्चिमी सुरक्षा ढांचे से पूरी तरह दूर जाने से रोकना और पाकिस्तान को चीन के पूर्ण प्रभाव में जाने से रोकना उसका असली मकसद है। इसलिए इसे “अमेरिका के खिलाफ गठबंधन” मानना उतना ही गलत होगा जितना इसे निश्चित रूप से “अमेरिकी परियोजना” मान लेना।
जवाब: चीन के पाकिस्तान के साथ अत्यंत गहरे रक्षा संबंध हैं और सऊदी अरब के साथ उसके आर्थिक संबंध लगातार बढ़े हैं। यदि यह त्रिकोण आगे चलकर विस्तृत होता है, तो बीजिंग को पश्चिम एशिया–पाकिस्तान–हिंद महासागर के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
लेकिन चीन के लिए भी समस्या है: सऊदी अरब अमेरिका से पूरी तरह अलग नहीं होना चाहता और तुर्किये NATO का सदस्य है। इसलिए इसे अभी चीन-नेतृत्व वाला गठबंधन कहना वास्तविकता से आगे निकलना होगा।
मेरे आकलन में “इस्लामिक NATO” शब्द से ज्यादा महत्वपूर्ण इसके संभावित नेटवर्क प्रभाव हैं। यदि भविष्य में इसमें कतर, अजरबैजान, मिस्र या अन्य मुस्लिम-बहुल देश किसी रूप में जुड़ते हैं, तो तस्वीर बदल सकती है। मई में पाकिस्तान की ओर से तुर्किये और कतर के संभावित जुड़ाव की बात भी सामने आई थी। तब भारत को तीन मोर्चों पर चुनौती मिल सकती है: पश्चिम एशिया → पाकिस्तान → तुर्किये, यानी पाकिस्तान को पहली बार भारत के विरुद्ध केवल द्विपक्षीय नहीं बल्कि बहु-देशीय कूटनीतिक समर्थन तंत्र बनाने का अवसर मिल सकता है।
लेकिन भारत की स्थिति भी कमजोर नहीं है, क्योंकि भारत को प्रतिक्रिया में किसी “anti-Islamic bloc” में जाने की जरूरत नहीं है। उलटे भारत की ताकत उसकी multi-alignment diplomacy है। चूंकि भारत को एक साथ सऊदी अरब और UAE से रणनीतिक संबंध है, इजरायल से रक्षा एवं तकनीकी सहयोग है, मिस्र और ग्रीस से समुद्री सहयोग है, ईरान से चाबहार संपर्क है, अमेरिका से Indo-Pacific साझेदारी है, रूस से रक्षा संबंध है और खाड़ी देशों में विशाल भारतीय प्रवासी समुदाय है, जिसका लाभ भारत को उठाना चाहिए।
यही भारत का सबसे बड़ा जवाब होगा—किसी एक धुरी में शामिल होना नहीं, बल्कि इतनी मजबूत बहुध्रुवीय स्थिति बनाना कि कोई धुरी भारत को घेर न सके।
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि अभी इसे “भारत को घेरने की साजिश” कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन पाकिस्तान–तुर्किये–सऊदी रक्षा समझौता भारत के लिए एक वास्तविक strategic signal जरूर है। और सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि “इसके पीछे अमेरिका है या चीन?”, बल्कि यह है कि क्या दोनों महाशक्तियाँ अपने-अपने हित के लिए इस नए क्षेत्रीय समीकरण का इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगी? इसकी संभावना काफी अधिक है। और एक महत्वपूर्ण बात: इस गठबंधन को “इस्लामिक NATO” कहना स्वयं इन देशों की आधिकारिक भाषा नहीं है; विश्लेषकों ने भी इस लेबल को भ्रामक बताया है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक