आत्मविश्वास, संतुलन और संवाद से मोदी ने ब्रिक्स को बनाया विकासशील देशों की आशा का मंच

By नीरज कुमार दुबे | Jul 07, 2025

2025 की ब्रिक्स शिखर बैठक ने एक बार फिर यह साबित किया है कि यह समूह न केवल वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में संतुलन लाने के लिए प्रतिबद्ध है, बल्कि बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन और भारत की नीतिगत प्राथमिकताओं ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की स्थायी भूमिका को रेखांकित किया है। इस बैठक में जहां एक ओर भारत ने ग्लोबल साउथ की आवाज़ को मजबूती दी, वहीं दूसरी ओर चीन, रूस और ब्राजील जैसे अहम सहयोगियों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने की पहल भी की।

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1. ग्लोबल साउथ का नेतृत्व– विकासशील देशों की समस्याओं और आकांक्षाओं को केंद्र में रखते हुए भारत ने ‘Global South Voice’ बनने की भूमिका निभाई।

2. संवाद के माध्यम से मतभेदों का समाधान– बिना टकराव के, संवाद और संतुलन की नीति अपनाते हुए भारत ने चीन और रूस दोनों के साथ अपने हितों को स्पष्ट रूप से रखा।

3. सतत विकास और समावेशी वैश्वीकरण – डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, हरित ऊर्जा, और खाद्य सुरक्षा जैसे विषयों पर भारत ने दीर्घकालिक दृष्टिकोण साझा किया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने ब्रिक्स को केवल एक आर्थिक मंच नहीं, बल्कि एक रणनीतिक, वैचारिक और नैतिक मंच बना दिया है जो पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प के रूप में उभर रहा है। यह स्पष्ट हो रहा है कि भारत अब केवल भागीदार नहीं, बल्कि नीति-निर्माता और संतुलनकर्ता की भूमिका निभा रहा है– वह भी आत्मविश्वास, गरिमा और स्थिरता के साथ। साथ ही प्रधानमंत्री ने भारत के डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मॉडल की सराहना करते हुए ब्रिक्स देशों को इस अनुभव से सीख लेने की सलाह दी और आत्मनिर्भर भारत की नीति को वैश्विक आत्मनिर्भरता की अवधारणा से जोड़ा और कहा कि एक-दूसरे पर निर्भर होकर भी आत्मनिर्भर राष्ट्र बन सकते हैं।

देखा जाये तो ब्रिक्स शिखर बैठक 2025 ने यह सिद्ध किया कि यह मंच अब केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक और व्यावहारिक महत्व का बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्पष्ट, दूरदर्शी और समावेशी विचारों ने भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को उजागर किया। आने वाले वर्षों में ब्रिक्स भारत को एक सशक्त, आत्मनिर्भर और अंतरराष्ट्रीय नीति निर्माता के रूप में स्थापित करने का माध्यम बनता रहेगा।

इसके अलावा, ब्रिक्स समूह की ओर से पहलगाम आतंकवादी हमले की कड़े शब्दों में निंदा करना और आतंकवाद को "कतई बर्दाश्त न करने" का दृष्टिकोण अपनाना तथा इससे मुकाबला करने में दोहरे मापदंड त्यागने के भारत के रुख को दोहराना, भारतीय विदेश नीति की एक बड़ी जीत है। हम आपको यह भी बता दें कि पिछले सप्ताह अमेरिका में हुई क्वॉड की बैठक में भी पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की गयी थी। क्वॉड सदस्य देशों ने पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले का जबरदस्त विरोध करते हुए जो संयुक्त बयान जारी किया था उसका एक एक शब्द दर्शा रहा था कि भारत की बुलंद आवाज का विश्व भर में कितना असर हुआ है।

उधर, ब्रिक्स बैठक 2025 के प्रमुख निष्कर्षों पर गौर करें तो आपको बता दें कि इस वर्ष की बैठक में जो बड़े निर्णय हुए उसके तहत सदस्यों देशों ने अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए वैकल्पिक करेंसी सिस्टम विकसित करने पर चर्चा की। साथ ही कई नए विकासशील देशों को "ब्रिक्स+" के तौर पर जोड़ने की दिशा में सहमति बनी, जिससे समूह का वैश्विक प्रभाव और व्यापक होगा। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और IMF जैसे संस्थानों में विकासशील देशों की हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया। साथ ही सतत विकास, हरित ऊर्जा और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में सहयोग को बढ़ाने का निर्णय हुआ। इसके अलावा, ग्लोबल साउथ में आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और संघर्ष समाधान पर संयुक्त दृष्टिकोण अपनाने का संकल्प लिया गया।

भारत की दृष्टि से ब्रिक्स के महत्व की बात करें तो आपको बता दें कि ब्रिक्स भारत को पश्चिमी दबावों से स्वतंत्र होकर अपनी विदेश नीति निर्धारित करने की स्वतंत्रता देता है। रूस और चीन जैसे पड़ोसी राष्ट्रों के साथ मंच साझा कर भारत अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करता है।

इसके अलावा, भारत ब्रिक्स के माध्यम से वैश्विक दक्षिण (Global South) का नेतृत्व करता है, जिससे उसे अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके अलावा, ब्रिक्स न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के माध्यम से भारत को बुनियादी ढांचे के विकास के लिए वैकल्पिक वित्तीय सहायता प्राप्त होती है, जो IMF/World Bank जैसे पश्चिमी संस्थानों पर निर्भरता को कम करती है। इसके अलावा, भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को ब्रिक्स देशों का सहयोग मिलने से वैश्विक स्तर पर स्वीकृति और समर्थन मिलता है।

ब्रिक्स सदस्यों के साथ भारत के संबंधों की बात करें तो आपको बता दें कि इस मंच पर भारत और चीन का आमना-सामना उस समय हुआ जब सीमा विवादों को लेकर दोनों देशों के संबंधों में तनाव बना हुआ है। देखा जाये तो भारत-चीन संबंधों में ब्रिक्स एक रणनीतिक "dialogue buffer" की भूमिका निभा रहा है– जहां सहयोग की संभावना है, लेकिन सतर्कता भी आवश्यक है।

इसके अलावा, ब्रिक्स के मंच पर भारत और रूस के संबंधों में गर्मजोशी साफ दिखी। यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत ने रूस के साथ ऐतिहासिक रणनीतिक साझेदारी को बनाए रखा है। भारत ने रूस से तेल आयात, रक्षा आपूर्ति और परमाणु ऊर्जा सहयोग को लेकर प्रतिबद्धता दोहराई है। साथ ही भारत ने ब्रिक्स मंच से कोई पक्ष नहीं लिया, बल्कि रूस के साथ संबंधों को रणनीतिक संतुलन के रूप में प्रस्तुत किया। देखा जाये तो भारत-रूस संबंध ब्रिक्स के भीतर भारत की "नॉन-वेस्टर्न मैत्री नीति" का आधार स्तंभ बने हुए हैं।

जहां तक ब्राजील के साथ संबंधों की बात है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत और ब्राजील, दोनों ग्लोबल साउथ के अगुवा हैं। ब्रिक्स बैठक में इन दोनों देशों की सहभागिता विशेष रूप से कृषि, जलवायु और डिजिटल समावेशन के क्षेत्र में मजबूत हुई। इसके अलावा, ब्राजील के पास जैव ईंधन की प्रचुरता है और भारत हरित ऊर्जा में अग्रणी बनना चाहता है– यह साझा लक्ष्य स्पष्ट रूप से उभर कर आया। साथ ही भारत ने ब्राजील के साथ खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करने पर बल दिया। इसके अलावा, दोनों देशों ने वैश्विक संस्थानों में सुधार और ग्लोबल साउथ की भूमिका बढ़ाने पर सहमति जताई। देखा जाये तो भारत-ब्राजील साझेदारी ब्रिक्स को "Global South Strategic Engine" का स्वरूप प्रदान कर सकती है।

हम आपको बता दें कि ब्रिक्स एक प्रभावशाली समूह के रूप में उभरा है क्योंकि यह विश्व की 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एकसाथ लाता है, जो वैश्विक जनसंख्या का लगभग 49.5 प्रतिशत, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का लगभग 26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका की सदस्यता वाला ब्रिक्स एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय मंच है जो विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज़ को वैश्विक मंच पर बुलंद करता है। 

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन और ब्रिक्स बैठक से इतर उनकी द्विपक्षीय मुलाकातों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक निर्णायक वैश्विक भागीदार बन चुका है। भारत अब पश्चिम और ग्लोबल साउथ के बीच एक 'ब्रिज' की भूमिका निभा रहा है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की यात्रा ने भारत की "वसुधैव कुटुम्बकम्" की परिकल्पना को वैश्विक मंचों पर पुनः सशक्त किया है। ब्राजील जैसे देशों के साथ संबंधों को नया आयाम देकर भारत ने यह साबित किया है कि वह न केवल आर्थिक शक्ति है, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टिकोण से भी विश्व नेतृत्व का सक्षम दावेदार है।

-नीरज कुमार दुबे

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