LAC पर पहली चाल में सैनिकों की वापसी.. अब China से दोस्ती पर भारत का चौंकाने वाला बयान

By अभिनय आकाश | Oct 28, 2024

चीन के साथ लद्दाख में देपसांग और डेमचोक पर सालों से चल आ रही तनातनी लगभग खत्म हो चुकी है। लंबी बातचीत के बाद दोनों देशों ने इस मुद्दे का हल निकाल लिया है। दोनों जगहों से भारत और चीन के सैनिक पीछे हटेंगे। लेकिन अगर आपको भी ये लगता है कि लद्दाख में विवाद सुलझने के बाद भारत और चीन के बीच दोस्ती हो गई है तो ऐसी गलतफहमी पालना बेइमानी होगी। इस बात का संकेत डॉ. एस जयशंकर ने अपने बयान में दिया है। उन्होंने बताया है कि कैसे चीन के साथ भारत का विवाद अभी भी सुलझा नहीं है। भारत ये जानता है कि चीन कितना चालाक है और उसकी चालाकी में भारत नहीं फंसेगा। ये भी वो अच्छी तरह से समझता है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने फिर एक बार चीन को लेकर ऐसा बयान दिया जिसके जरिए पूरी दुनिया तक साफ संकेत पहुंच गया है। ये बयान दुनिया को बताने के लिए काफी है कि भारत चीन के साथ दोस्ती वाली चाल में नहीं फंसा है।

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एलएसी पर पैट्रोलिंग को लेकर भले ही भारत और चीन के बीच बात बन गई है। लेकिन दोनों देशों के बीच मुद्दे अभी भी सुलझे नहीं हैं। चीन के साथ सफल समझौते को लेकर विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर ने अपने बयान में कहा कि बहुत ही अकल्पनीय था। ये चतुर कूटनीति का ही परिणाम था। जयशंकर ने पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि पीछे हटने का यानी नए कदमों को उठाने का ये समझौता था। दोनों ने तय किया कि देपसांग और डेमचोक पर गश्त होगी। इससे हमें अगले कदम पर विचार करने का मौका मिलेगा। ऐसा नहीं है कि सबकुछ हल हो गया है। लेकिन पीछे हटना जो पहला चरण है, हम उस स्तर तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं।

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यानी ये  संकेत साफ बता रहा है कि भारत और चीन के बीच भले ही एलएसी पर पैट्रोलिंग को लेकर विवाद सुलझ गया हो। लेकिन दोनों देशों के बीच जो लंबे समय से आ रहे विवाद हैं वो भी बरकरार हैं। चीन की चालाकी में भारत को अब फंसना नहीं है। रूस के कजान में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हाल ही में पीएम मोदी ने मुलाकात की थी। ये तय हुआ कि दोनों देशों के विदेश मंत्री और सुरक्षा सलाहकार मिलेंगे और देखेंगे कि आगे कैसे बढ़ना है। जयशंकर ने कहा कि आज हम जि  मुकाम पर पहुंचे हैं जहां खड़ा हैं। इसका एक कारण हमारी ओर से अपनी बात पर अड़े रहना और अपनी बात रखने के लिए दृढ़ प्रयास हैं। सेना देश की रक्षा के लिए बहुत ही अकल्पनीय परिस्थिति में मौजूद थी। सेना ने अपना काम किया और कूटनीति ने अपना काम किया। 

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