By संतोष उत्सुक | Jun 15, 2026
कई साल तक यह कहते रहो कि हम विश्वगुरु हैं और बाकी सब हमारे चेले हैं। हमारे जैसा दूसरा कोई नहीं। विश्व में सब कुछ, हर कुछ सबसे पहले हमने ही किया। सबसे ज़्यादा अविष्कार हमने ही किए। दुनियावालों ने हमसे सीखा यानी संसार को हमने सिखाया। फिर किसी दिन कह दो कि विश्वगुरु होने में अभी वक़्त लगेगा तो बात कुछ हजम नहीं होती। कभी यशस्वी गुरुजन कहते रहे कि विश्वगुरु होने के लिए, महागुरु अमेरिका को पीछे छोड़ना पड़ेगा। अब अमेरिका की ट्रम्प चालों ने दुनिया भर में तनाव, अस्थिरता, लड़ाई और झगडा फैला दिया है तो हम कह रहे हैं कि विश्व गुरु होने में समय लगेगा। ऐसे असमंजस में तैरते हालातों में विश्वगुरु होने से तो अच्छा है विश्वगुरु न होना।
वरिष्ठ नेता, महाजन, प्रसिद्धजन, धनवान और मनवान तो सदियों से खुद को महागुरु समझते रहे और दूसरों को बुद्धू चेलों का हुजूम। यह चेले समाज की कई तरह की ऊंची दीवारों और बंद दरवाजों में जीते रहे और खुद को आनंद विभोर समझते रहे और समझ रहे हैं। अब ख़ास लोगों ने समझाया है कि हम फिलहाल विश्वगुरु नहीं हैं तो हमारे विश्वगुरु न होने की घोषणा का फायदा दुनिया को होने वाला है। इस बहाने दुनिया वाले अपने बारे खुद सोचना शुरू कर सकेंगे। अपने समाज के वैचारिक निर्णय खुद लेंगे। हर क्षेत्र में बार बार प्रेरणा के लिए हमारी तरफ नहीं देखेंगे। कुल मिलाकर हमें भी लाभ होगा वह यह कि हमें इस गर्वीले विचार से आज़ादी मिलेगी कि दुनिया हमारे पीछे चल रही है, हमें बार बार लगातार देख रही है, हमारे बिना संसार का काम नहीं चल रहा ।
समझदार उच्च कोटि विचार गुरुओं का क्या है, जिस दिन चाहेंगे अच्छा सा मुहर्त निकलवा कर, अपने विश्व गुरु होने की घोषणा फिर से कर देंगे। दुनिया तो बुद्धू है ही, फिर से हमारा लोहा ही नहीं बहुत कुछ मानना शुरू कर देगी।
- संतोष उत्सुक