19 साल की लड़की को मिली 40 साल के पति को छोड़कर पार्टनर के साथ रहने की इजाज़त, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला

By रेनू तिवारी | Apr 06, 2026

न्याय के गलियारों में अक्सर कानून और भावनाओं की जंग देखने को मिलती है, लेकिन हाल ही में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि एक बालिग व्यक्ति की पसंद सर्वोपरि है। कोर्ट ने एक 19 साल की महिला को उसके 40 वर्षीय पति के बजाय उसके पार्टनर के साथ रहने का अधिकार दिया है। इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत महिला के पति द्वारा दायर एक 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) याचिका से हुई थी। पति का आरोप था कि उसकी पत्नी को अनुज कुमार नामक व्यक्ति ने अवैध रूप से बंधक बना रखा है। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए महिला का पता लगाया और उसे 'वन-स्टॉप सेंटर' में रखने के बाद कोर्ट में पेश किया।

यह मामला पति द्वारा दायर एक 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी को कोई दूसरा आदमी, अनुज कुमार, ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से अपने पास रखे हुए है। पुलिस ने महिला का पता लगाया और उसे कोर्ट में पेश करने से पहले एक 'वन-स्टॉप सेंटर' में रखा।

लेकिन जब जजों ने उससे पूछा कि वह क्या चाहती है, तो उसके जवाब में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। उसने अपनी शादी के बारे में बात की, 21 साल के उम्र के फ़र्क के बारे में बताया - वह 19 साल की थी, उसका पति 40 साल का - और एक ऐसे रिश्ते के बारे में बताया जिसमें कभी तालमेल नहीं बन पाया। उसने कहा कि शादी ठीक से नहीं चल रही थी और उसने अपने साथ दुर्व्यवहार होने का आरोप भी लगाया।

उसका फ़ैसला पक्का था; वह अपने पार्टनर के साथ रहना चाहती थी। कोर्ट ने काउंसलिंग का आदेश दिया, ताकि उसे अपने फ़ैसले पर दोबारा सोचने का एक मौक़ा मिल सके। लेकिन इससे कुछ भी नहीं बदला।

काउंसलिंग सेशन के बाद भी, महिला अपने फ़ैसले पर कायम रही। उसके बगल में खड़ा उसका पार्टनर, कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वह महिला का पूरा ख़्याल रखेगा और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की डिवीज़न बेंच ने फ़ैसला सुनाया कि सबसे ज़्यादा अहमियत महिला की अपनी आवाज़ की ही है। एक बार जब यह साफ़ हो गया कि महिला पर किसी भी तरह का कोई ग़ैर-क़ानूनी दबाव या रोक-टोक नहीं है, तो पति की याचिका का कोई आधार ही नहीं बचा।

कोर्ट ने महिला को उसके पार्टनर के साथ जाने की इजाज़त दे दी, और इस बात को फिर से दोहराया कि एक बालिग व्यक्ति को यह फ़ैसला करने का पूरा अधिकार है कि वह कहाँ और किसके साथ रहना चाहता है। मामले को बंद करने से पहले, कोर्ट ने महिला की सुरक्षा के लिए एक और कदम उठाया। अगले छह महीनों तक, कुछ तय अधिकारी - जिन्हें "शौर्य दीदी" कहा जाएगा - महिला के संपर्क में रहेंगे, और उसकी सुरक्षा व भलाई का पूरा ध्यान रखेंगे।

ज़रूरी औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद, महिला को 'वन-स्टॉप सेंटर' से रिहा कर दिया जाएगा। यह मामला भले ही एक क़ानूनी विवाद के तौर पर शुरू हुआ हो, लेकिन इसका अंत व्यक्तिगत आज़ादी पर एक मज़बूत संदेश के रूप में हुआ।

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महिला की बात को सही ठहराते हुए, कोर्ट ने एक बार फिर से एक साफ़ लकीर खींच दी है। जब किसी वयस्क के जीवन की बात आती है, तो अंतिम निर्णय उसी व्यक्ति का होता है। 


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