वैश्विक औसत से बहुत दूर है सत्ता में महिलाओं की भागीदारी

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Apr 22, 2026

संसद में महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण का बिल गिरने के साथ ही देश में सत्ता में महिलाओं की भागीदारी को लेकर नई बहस छिड़ गई है। जहां एक और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश के माध्यम से महिलाओं से माफी मांगी है तो दूसरी और विपक्ष ने इसे अपनी बड़ी जीत और सरकार की हार बताई है। हांलाकि विपक्ष यह भी कह रहा है कि उनका विरोध सीटों के परिसीमन से अधिक है। खैर यह अलग बहस का विषय हो सकता है। पर एक बात साफ हो जानी चाहिए कि सत्ता में महिलाओं की हिस्सेदारी के मामलें में हम दुनिया के देशों से अभी काफी पीछे चल रहे हैं। दुनिया के 190 देशों के आंकड़ों का विष्लेषण करे तो हमारे देश का स्थान 147 वां आता है। दुनिया के देशों में सत्ता में महिलाओं की भागीदारी की बात करें तो वैश्विक स्तर औसत 27.5 फीसदी है। 30 महिला राष्ट्राध्यक्ष महिलाएं है तो दुनिया के केवल 8 देश ही ऐसे हैं जहां महिलाओं की भागीदारी 50 फीसदी से अधिक है। रवांडा, क्यूबा, निकारागुआ, कोस्टारिका, बोलिविया, मैक्सिको, एंडोरा और संयुक्त अरब अमीरात में 50 प्रतिशत से अधिक भागीदारी है। न्यूजीलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड 45 से 50 प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व है। आज हम महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी की बात कर रहे हैं वहीं इस समय दुनिया के 56 देश ऐसे हैं जहां सत्ता में महिलाओं का 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है। 

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जहां तक राजनीतिक दलों की बात है तो भले ही महिला आरक्षण बिल का अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण कांग्रेस व अन्य विपक्षियों के साथ तृणमूल कांग्रेस ने भी विपक्ष में मतदान किया पर लोकसभा और राज्य सभा में टीएमसी दल की महिलाओं की हिस्सेदारी अधिक है। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो कांग्रेस की भागीदारी 14.3 प्रतिशत और बीजेपी की भागीदारी 12.9 प्रतिशत है। अन्य दलों की भी कमोबेश यही स्थिति है। जहां तक राज्यों का प्रश्न है तो इस समय देश में सर्वाधिक महिला सदस्य छत्तीसगढ़ विधानसभा में है। छत्तीसगढ़ में कुल सदस्यों में 21.1 प्रतिशत महिला सदस्य है। त्रिपुरा में 15 प्रतिशत महिला सदस्य है। बाकी देश के अन्य राज्यों में 15 प्रतिशत महिलाएं भी विधानसभा की सदस्य नहीं है। नागालैंड देश का ऐसा प्रदेश है जहां सबसे कम महिला सदस्य है। कर्नाटक जैसे राज्य में भी पांच प्रतिशत से कम महिला विधानसभा सदस्य है। 

खैर इससे यह तस्वीर साफ हो जानी चाहिए कि जब तक संवैधानिक बाध्यता नहीं होगी तब तक महिलाओं की भागीदारी लाख प्रयासों के बावजूद नहीं बढ़ने वाली है। इसके लिए एक सीमा तक सीटों का आरक्षण करना ही होगा। इसका जीता जागता उदाहरण पंचायतीराज व स्थानीय स्वशासन संस्थाएं है। जहां महिलाओं की सीटे आरक्षित होने से आज तस्वीर ही बदल गई है। आज सरपंच पति या प्रधान पति वाली बात भी नहीं रही है। पिछले चुनाव परिणाम भी यह साफ कर चुके हैं कि आज महिलाएं अपने निर्णय स्वयं लेती है। यही कारण है कि सरकार बनने और बनाने में महिलाओं मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। आने वाले समय में इसमें और अधिक सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। ऐसे में एक बात साफ हो जानी चाहिए कि बिना आरक्षित सीटों के विधानसभाओं या संसद में महिला सदस्यों की हिस्सेदारी बढ़ने की कल्पना करना बेमानी होगी। यह तो संवैधानिक बाध्यता से ही संभव हो पाएगा। यह सभी राजनीतिक दलों को समझना होगा। यदि महिलाओं की सत्ता में सहभागिता बढ़ानी है तो महिला सीटों का आरक्षण करना ही होगा। यह अवश्य है कि आरक्षण की सीमा आपसी समन्वय व विचार विमर्श से सर्वसम्मति से तय होता है तो यह बेहतर लोकतांत्रिक परंपरा होगी। राजनीतिक दलों को आपसी आग्रह दुराग्रहों से हटकर इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। गैरसरकारी संगठनों को भी इस दिशा में देश में माहौल बनाना चाहिए। यह साफ है कि अब समय आ गया है जब महिलाओं की हिस्सेदारी तय होनी ही चाहिए। 

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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