बिहार चुनाव में महिला वोटर होंगी असली 'गेमचेंजर', नीतीश के दांव से बदलेगी तस्वीर?

By अंकित सिंह | Sep 03, 2025

भारत में चुनाव सिर्फ़ राजनीतिक रैलियों, घोषणापत्रों और सोशल मीडिया पर चर्चाओं में ही नहीं जीते या हारे जाते। घरों, रसोई और दफ़्तरों में, एक खामोश मतदाता वर्ग मतदान के दिन से पहले अपनी पसंद और प्राथमिकताओं पर चर्चा करता है। यह वर्ग कोई और नहीं, बल्कि महिला वर्ग है। इस साल बिहार में चुनाव होने है। ऐसे में महिला मतदाता वहां हमेशा की तरह इस बार भी अहम भूमिका निभाने वाली हैं। चुनाव दर चुनाव, महिला मतदाता राजनीतिक दिग्गजों की जीत और हार में एक अहम कारक बनकर उभरी हैं। और यह बात बिहार में सबसे ज़्यादा सच है, जहाँ मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शराबबंदी के कदम ने उन्हें महिला मतदाताओं का समर्थन दिलाया और सत्ता में उनकी लंबी दौड़ सुनिश्चित की।

सीएम नीतीश ने की 7 बड़ी घोषणाएं 

बीते दो महीनों के दौरान सीएम नतीश कुमार ने ऐसी 7 बड़ी घोषणाएं की हैं, जो महिलाओं को सीधे लाभ पहुंचाने वाली हैं। इन योजनाओं के जरिए नीतीश कुमार ने रोजगार, आर्थिक सशक्तिकरण, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सहित महिलाओं के हर पहलू को छूने की कोशिश की है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यह रणनीति बेहद सोच-समझकर बनाई गई है। जिसमें सीधे तौर पर महिला वोट बैंक को साधने की कोशिश माना जा रहा है।

जीविका दीदियों को राहत और प्रोत्साहन

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनावी साल में ग्रामीण महिलाओं को साधने के लिए बड़ा कदम उठाया है। इस कदम के तहत 1.40 लाख जीविका कर्मियों का मानदेय दोगुना कर दिया है। इसके अलावा बैंक ऋण पर ब्याज दर 10 फीसद से घटाकर 7 फीसद कर दिया है। जो महिलाओं के बड़े समूह को लाभांवित करने वाला है। इस फैसले को ग्रामीण महिलाओं के लिए सीएम नीतीश कुमार का चुनावी मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री कन्या विवाह मंडप योजना

राज्य सरकार की ओर से 8,053 ग्राम पंचायतों में विवाह मंडप के निर्माण के लिए 50 लाख रुपये की स्वीकृति दी गई। इन मंडपों के संचालन और देखरेख की जिम्मेदारी ग्रामीण महिलाओं को ही सौंपी जाएगी। जिससे उन्‍हें आर्थिक लाभ तो होगा ही महिलाओं में नेतृत्व क्षमता बढ़ेगी और सामाजिक जरूरतों में उनकी भागीदारी भी मजबूत होगी। रणनीतिकारों की माने तो ये महिला सशक्तिकरण का अहम कदम माना जा रहा है। साथ ही चुनाव के लिहाज से भी अहम है।

आशा और ममता कार्यकर्ताओं को लाभ

बताते चलें कि आशा कार्यकर्ताओं का मानदेय 1,000 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये किया गया। ममता कार्यकर्ताओं का मानदेय 300 रुपये से बढ़ाकर 600 रुपये कर दिया गया। आशा फैसिलिटेटर के मानदेय में भी बढ़ोतरी की गई है। इस बढ़ोतरी के जरिए सीधे तौर पर 1 लाख 20 महिलाओं को लाभांवित किया गया। बताते चलें वर्तमान में बिहार में 91,094 आशा कार्यकर्ता, 4,364 आशा फैसिलिटेटर और 4,600 ममता कार्यकर्ता कार्यरत हैं। इसके अलावा, 29,000 नई आशा कार्यकर्ताओं की बहाली प्रक्रिया में है। इन सभी को मिलाकर राज्य का यह नेटवर्क करीब 1.20 लाख महिलाओं का होता है।

आंगनबाड़ी सेविकाओं को डिजिटल सहयोग

सरकार की ओर से आंगनबाड़ी सेविकाओं को मोबाइल खरीदने के लिए 11,000 रुपये की सहायता दी जा रही है। यह कदम डिजिटल कनेक्टिविटी को बढ़ाने और महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। जानकारों की मानें तो महिला संवाद के दौरान सीएम नीतीश कुमार ने इस जरूरत को महसूस की। जो अब अहम दांव साबित हो रहा है।

मुख्यमंत्री महिला स्‍वरोजगार योजना

सीएम नीतीश कुमार के फोकस सीधे तौर पर महिलाएं हैं। मुख्‍यमंत्री महिला स्‍वरोजगार योजना के तहत भी बिहार के सभी परिवार की एक महिला को साधने का प्रयास किया गया। इस योजना के तहत 20,000 करोड़ रुपये का फंड बना दिया गया है। ताकि हर परिवार से एक महिला को 10,000 का अनुदान दिया जा सके। जिसे लौटाना भी नहीं होगा। यदि महिलाएं सफलतापूर्वक अपना व्‍यवसाय करने में सफल हुईं तो 6 महीने बाद 2 लाख रुपये का ऋण भी प्राप्त कर सकेंगी। ऐसे में ये योजना राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी काफी अहम मानी जा रही है। अब देखने वाली बात होगी, ये योजना महिलाओं को वोट बैंक के रूप में कितना प्रभावित कर पातीं हैं।

रसोइयों का मानदेय किया दोगुना

इधर, महिलाओं को ही फोकस कर विद्यालयों में कार्यरत रसोइयों का मानदेय 1,600 से बढ़ाकर 3,300 रुपये कर दिया गया है। चूंकि इस काम में ज्यादातर महिलाएं ही जुड़ी हैं, इसलिए यह फैसला भी महिला वोटरों को सीधे प्रभावित करेगा। ऐसे में ये माना जा रहा है। सीएम नीतीश कुमार की ओर से हाल में लिए गए फैसले आगामी चुनाव पर बड़ा असर डालेंगे।

महिला आरक्षण और महिला डोमिसाइल नीति

नीतीश कुमार पहले से ही महिला आरक्षण 50 फीसद आरक्षण की बात कर रहे हैं। लिहाजा पंचायतों और नगर निकायों में 50 फीसद का आरक्षण पहले से था। सरकारी नौकरियों में 35 फीसद का आरक्षण भी तय है। लेकिन अब सीएम नीतीश कुमार ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 फीसद का आरक्षण का प्रावधान भी कर दिया। इसके अलावा शिक्षक बहाली में डोमिसाइल नीति को भी लागू कर दिया। जो महिलाओं को सीधे तौर पर महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता की गारंटी देता है।

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क्यों महिलाएं हैं नीतीश की रणनीति के केंद्र में?

आंकड़ों की बात की जाए तो 2020 के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 3.39 करोड़ से अधिक महिला मतदाता है। गौर करने वाली बात ये है कि जहां महिला वोटरों की संख्‍या में बढ़ोतरी होई है, वहीं बिहार में महिलाओं का दबदबा भी बढ़ा है। सरकार की ओर से चलाई जा रही जीविका योजनाओं से महिला परिवार में निर्णायक भूमिका में हैं। वहीं, 2020 चुनाव के दौरान महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से 6 फीसद ज्यादा रही। याद दिला दें कि आंकड़ों के अनुसार 54 फीसद पुरुष और 60 फीसद महिला मतदाताओं ने वोट किया था। ऐसे में ये माना जा रहा है कि इस बार महिलाएं सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएंगी।

मोदी की अपील

इस पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार की महिलाओं से एक भावुक अपील की, जिसने एनडीए को महिला वोटों की दौड़ में आगे कर दिया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि विपक्षी दल के एक चुनावी मंच पर उनकी माँ के साथ बदसलूकी की गई और इस कृत्य ने हर माँ और बहन का अपमान किया है। उन्होंने आगे बताया कि कैसे एक माँ अपने बच्चों के लिए मुश्किलों का सामना करती है और कहा कि अगर वह अपनी दिवंगत माँ के अपमान को माफ़ भी कर दें, तो बिहार नहीं करेगा। बिहार में जैसे-जैसे राजनीतिक तापमान बढ़ता जा रहा है, मुख्य दावेदार इस बात पर उँगलियाँ तरेर रहे होंगे कि महिला मतदाता क्या सोचती हैं और मतदान केंद्र पर वे अपनी किस्मत कैसे तय करेंगी।

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