अखंड सौभाग्य के लिए महिलाएं करती हैं गणगौर पूजा

By प्रज्ञा पाण्डेय | Mar 27, 2020

गणगौर पूजा स्त्रियां सौभाग्य की कामना के लिए करती हैं। इसे गौरी तृतीया भी कहा जाता है, तो आइए हम आपको गणगौर पूजा के बारे में कुछ खास जानकारी देते हैं।

चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को गणगौर पूजा होती है। गणगौर गण तथा गौर दो शब्दों से मिलकर बना है जिसमें गण का अर्थ शिव तथा गौर का मतलब गौरी होता है। यह त्यौहार मुख्य रूप से मध्यप्रदेश तथा राजस्थान में मनाया जाता है। इस बार गणगौर पूजा 27 मार्च, शुक्रवार को मनायी जाएगी। विवाहित स्त्रियां जहां गणगौर व्रत पति की मंगल कामना के लिए करती हैं वहीं अविवाहित लड़कियां सुयोग्य वर पाने की कामना से शिव और गौरी को पूजती हैं।

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ऐसे होती है पूजा गणगौर की 

बसंत ऋतु में आने वाले गणगौर की पूजा बहुत खास होती है। गणगौर की पूजा कुंवारी लड़कियां और विवाहित स्त्रियां दोनों करती हैं। पूजा करने के लिए सबसे पहले महिलाएं और लड़कियां लोटे में जल भरती हैं। उसके बाद उसमें हरी-हरी दूब और फूल सजाकर सिर पर रखकर गणगौर के गीत गाती हुई घर आती हैं। फिर मिट्टी के शिव और पार्वती बनाकर चौकी पर स्थापित कर देती हैं।

चौकी पर स्थापित करने के बाद शिव-गौरी को सुंदर वस्त्र पहनाकर सजाया जाता है और उनकी चन्दन,अक्षत, धूप, दीप, दूब व पुष्प से पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही सुहाग की वस्तुएं भी अर्पित की जाती हैं। सौभाग्य की कामना से दीवार पर सोलह-सोलह बिंदियां रोली,मेहंदी व काजल की लगाई जाती हैं। उसके बाद एक थाली में चांदी का छल्ला और सुपारी रखकर उसमें कुमकुम, हल्दी,जल और दूध-दही घोलकर सुहागजल तैयार किया जाता है। दोनों हाथों में दूब लेकर इस जल से पहले गणगौर को छींटे लगाकर अपने ऊपर लगाती हैं। इसके अलावा मीठे गुने या चूरमे का भोग लगाकर गणगौर माता की कहानी सुनायी जाती है।

गणगौर पूजा से जुड़ी पौराणिक कथाएं

गणगौर पूजा से जुड़ी एक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक बार शिवजी, पार्वती माता और नारद जी घूमने निकले तथा चैत्र नवरात्र की तृतीया को एक गांव के पास पहुंचे। उस समय गांव की उच्च कुल की महिलाएं भगवान के अच्छे पकवान बनाने चली गयीं। इतने में सामान्य कुल की नारियां ने तीनों का स्वागत किया। इससे प्रसन्न होकर पार्वती जी ने सौभाग्य रस उन पर छिड़क दिया। तब तक उच्च कुल की स्त्रियां भी सोने, चांदी की थाली पकवान लेकर आ गयीं उनको पार्वती जी ने अपनी अंगुली चीरकर उस रक्त से सौभाग्य प्रदान किया। उसके बाद नदी तट पर पार्वती जी ने स्नान कर शिव जी को बाल के दो कण का भोग लगाया। उसके बाद महादेव के पास गयीं तो महादेव ने देर से आने का कारण पूछा। तब पार्वती जी झूठ बोल दिया कि उनके मायके के लोग आए थे उनसे बात करने में देर हो गयी।

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इस पर महादेव जी पार्वती माता का मन जान गए और उन्होंने कहा कि चलो नदी किनारे मैं भी तुम्हारे भाई-भाभी से मिलने जाता हूं। नदी की ओर जाते समय शिव जी ने पार्वती मां की लाज रखने के लिए एक महल बना दिया और उसमें उनके मायके वालों को रख दिया। इस तरह नदी किनारे पहुंचने कर दो दिन महल में रहकर लौटने लगी। लेकिन तभी शिव जी माला छूट गयी तो उन्होंने नारद जी माला लाने को कहा। नारद जी जब माला लेने गए तो वहां कुछ भी नहीं था लेकिन तभी बिजली चमकी और उन्हें माला दिखाई दी। नारद जी माला लेकर शिव जी के पास और सब बातें बतायीं। तब शिवजी ने कहा यह पार्वती माता की माया है। इस पर नारद जी ने कहा कि हे माता आप आदिशक्ति है तथा संसार की सभी महिलाएं अपने सौभाग्य के लिए आपकी आराधना करती रहेंगी। 

प्रसाद बांटने का है खास नियम 

गणगौर पूजा में चढ़ने वाले प्रसाद को बांटने का भी खास नियम है। इस व्रत को केवल महिलाएं करती हैं इसलिए इसका प्रसाद केवल स्त्रियों में ही बांटा जाता है। पुरुषों को यह प्रसाद नहीं दिया जाता है। गणगौर पूजा के दौरान पार्वती माता को जो प्रसाद चढ़ाया जाता है नारियां उसे अपने मांग में सजाती हैं। उसके बाद शाम को शुभ मुहूर्त में गणगौर को पानी पिलाकर किसी पवित्र तालाब में इसका विसर्जन कर दिया जाता है।

प्रज्ञा पाण्डेय

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