Prabhasakshi NewsRoom: West Asia पर नजरें गड़ाये दुनिया को भीषण होती Afghanistan-Pakistan War पर भी ध्यान देना चाहिए

By नीरज कुमार दुबे | Mar 13, 2026

दुनिया की नजर इस समय पश्चिम एशिया के संघर्षों पर टिकी हुई है, लेकिन इसी बीच दक्षिण और मध्य एशिया की सीमा पर एक ऐसा युद्ध भड़क चुका है जिसे अंतरराष्ट्रीय चर्चा में लगभग नजरअंदाज किया जा रहा है। देखा जाये तो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच छिड़ा यह संघर्ष केवल दो पड़ोसी देशों की सीमा झड़प नहीं है, बल्कि यह आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र की सामरिक दिशा तय करने वाला टकराव बन सकता है।

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इसके अलावा, पूर्वी अफगानिस्तान के खोस्त और पकतिया क्षेत्रों में भी सीमा पार गोलाबारी से लगातार मौतें हुई हैं। तालिबान के अनुसार एक ही परिवार के चार लोग, जिनमें दो बच्चे भी शामिल थे, तोप और मोर्टार हमले में मारे गये। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक फरवरी के अंत से मार्च के पहले सप्ताह तक पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई में 56 नागरिकों की जान जा चुकी है, जिनमें 24 बच्चे शामिल हैं। इस संघर्ष के कारण लगभग एक लाख पंद्रह हजार लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं।

हम आपको बता दें कि इस युद्ध की जड़ में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच पुराना अविश्वास है, जो तालिबान की सत्ता वापसी के बाद और गहरा गया। इस्लामाबाद का आरोप है कि अफगानिस्तान की जमीन पर तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान नामक उग्रवादी संगठन को शरण दी जा रही है। यही संगठन पाकिस्तान के भीतर कई घातक हमलों के लिये जिम्मेदार रहा है, जिनमें पेशावर के विद्यालय पर हुआ भीषण नरसंहार भी शामिल है।

वहीं अफगान तालिबान इस संगठन को पूरी तरह पाकिस्तान के हवाले करने से हिचक रहा है, क्योंकि इससे उनके अपने गुटों के भीतर विद्रोह भड़क सकता है। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच आरोप प्रत्यारोप से शुरू हुआ विवाद अब खुली सैन्य टकराहट में बदल गया है। लेकिन इस संघर्ष का असली महत्व केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे दो एशियाई महाशक्तियां भारत और चीन भी अप्रत्यक्ष रूप से खड़ी दिखाई दे रही हैं। यही कारण है कि यह युद्ध धीरे धीरे दक्षिण एशिया के नए सामरिक संतुलन का परीक्षण बन रहा है।

पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अफगानिस्तान तेजी से भारत के प्रभाव क्षेत्र में आता जा रहा है। काबुल और नयी दिल्ली के संबंध हाल के समय में मजबूत हुए हैं। पाकिस्तान को डर है कि यदि भारत अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाता है तो उसकी उत्तरी सीमा पर दबाव कई गुना बढ़ सकता है।

दूसरी ओर भारत के लिये अफगानिस्तान के साथ मजबूत संबंध दोहरे लाभ का अवसर है। एक तरफ इससे पाकिस्तान के खिलाफ सामरिक दबाव बढ़ाया जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ अफगान भूमि से कश्मीर की ओर आने वाले उग्रवाद को रोका जा सकता है। हम आपको याद दिला दें कि 1980 के दशक के अफगान युद्ध के बाद यही उग्रवादी नेटवर्क भारत के उत्तरी क्षेत्रों में हिंसा का कारण बना था।

इस पूरे समीकरण में चीन की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। बीते दशक में पाकिस्तान की सेना और रक्षा व्यवस्था तेजी से चीनी तकनीक और हथियारों पर निर्भर हुई है। अब चीन पाकिस्तान का प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता और खुफिया सहयोगी बन चुका है। 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सीमित सैन्य कार्रवाई के दौरान यह नया समीकरण साफ दिखाई दिया था। उस टकराव में चीन की खुफिया मदद, वायु रक्षा ढांचा और आधुनिक युद्धक विमान पाकिस्तान के लिये निर्णायक साबित हुए थे। इससे यह संकेत मिला कि भविष्य के भारत पाकिस्तान संघर्षों में चीन की छाया और गहरी होगी।

यही कारण है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच मौजूदा युद्ध को केवल सीमा विवाद मानना भारी भूल होगी। दरअसल यह उस नये सुरक्षा परिदृश्य की पहली झलक है जिसमें अफगानिस्तान संभावित रूप से भारत के निकट सहयोगी की भूमिका में है, जबकि पाकिस्तान चीन की सामरिक शक्ति का अग्रिम मोर्चा बन चुका है। इस युद्ध का एक और गंभीर पहलू मानवीय संकट है। सीमा क्षेत्रों में लगातार गोलाबारी से गांव खाली हो रहे हैं और हजारों परिवार विस्थापित हो चुके हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो यह संकट पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैला सकता है।

दुनिया भले ही अभी इस युद्ध को नजरअंदाज कर रही हो, लेकिन हकीकत यह है कि अफगानिस्तान पाकिस्तान टकराव दक्षिण और मध्य एशिया की राजनीति को नया मोड़ दे सकता है। यदि इसमें भारत और चीन के हित और गहरे उलझ गये तो यह संघर्ष आने वाले समय में एक व्यापक भू राजनीतिक मुकाबले का रूप ले सकता है। इसलिये यह केवल एक सीमा युद्ध नहीं, बल्कि एशिया के भविष्य का संकेत है जिसे अनदेखा करना वैश्विक राजनीति की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है।

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