विश्व पर्यटन दिवस पर जानिये जिंदगी में खुशियों के लिए कितना जरूरी है घूमना

By ललित गर्ग | Sep 27, 2019

विश्व पर्यटन दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यटन और उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व आर्थिक मूल्यों के प्रति विश्व समुदाय को जागरूक करना है। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन द्वारा 1980 में शुरू किया गया जो प्रत्येक वर्ष 27 सितम्बर को मनाया जाता है। यह विशेष दिन इसलिये चुना गया क्योंकि इस दिन 1970 में यू.एन.डब्ल्यू.टी.ओ. के कानून प्रभाव में आये थे जिसे विश्व पर्यटन के क्षेत्र में बहुत बड़ा मील का पत्थर माना जाता है, इसका लक्ष्य विश्व पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों के लोगों को जागरूक करना है। पर्यटकों के लिए विभिन्न आकर्षक और नए स्थलों की वजह से पर्यटन दुनियाभर में लगातार बढ़ने वाला और विकासशील आर्थिक क्षेत्र बन गया है। भारत पर्यटन की दृष्टि से समृद्ध एवं व्यापक संभावनाओं वाला देश है।

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भारत विश्व के पाँच शीर्ष पर्यटक स्थलों में से एक है। विश्व पर्यटन संगठन और वर्ल्ड टूरिज्म एण्ड ट्रैवल काउन्सिल तथा पर्यटन के क्षेत्र में अग्रणीय संगठनों ने भारतीय पर्यटन को सबसे ज्यादा तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र के रूप में बताया है। भारत के प्रति विश्व के पर्यटकों को आकर्षित करने में यात्रा साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अब तक यात्रा साहित्य की दृष्टि से राहुल सांकृत्यायन का ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, डॉ. भगवतीशरण उपाध्याय का ‘सागर की लहरों पर’, कपूरचंद कुलिश का ‘मैं देखता चला गया’, धर्मवीर भारती का ‘ढेले पर हिमालय’ तथा नेहरू का ‘आंखों देखा रूस’, रामेश्वर टांटिया का ‘विश्व यात्रा के संस्मरण’, आचार्य तुलसी का यात्रा साहित्य की ही भांति पुखराज सेठिया की पुस्तक ‘आओ घूमें अपना देश’ आदि मार्मिक और रोचक यात्रा-वृतांत है। यह यात्रा साहित्य इतनी सरल शैली में यात्रा का इतिहास प्रस्तुत करता है कि पाठक को ऐसा लगता है मानो वह इन लेखकों के साथ ही यात्रायित हो रहा है।

जिस तरह हम भारत को एक गुलदस्ते की भांति अनुभव करते हैं, लगभग वैसा ही विविधरूपी, बहुरंगी और बहुआयामी गुलदस्ता है- भारत का पर्यटन संसार। एक ऐसा गुलदस्ता है जिसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के पुष्प सुसज्जित हैं। किसी फूल में कश्मीर की लालिमा है तो किसी में कामरूप का जादू। कोई फूल पंजाब की कली संजोए हैं, तो किसी में तमिलनाडु की किसी श्यामा का तरन्नुम। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और अन्य प्रदेशों के पर्यटन स्थलों को देखना एक सुखद एवं अद्भुत अनुभूति का अहसास है। यह भारत पल-पल परिवर्तित, नितनूतन, बहुआयामी और इन्द्रजाल की हद तक चमत्कारी यथार्थ से परिपूर्ण है। भारत सरकार एवं विभिन्न राज्यों की सरकारें पर्यटन को प्रोत्साहन देने के लिये समय-समय पर अनेक योजनाएं प्रस्तुत करती हैं।

‘पैलेस ऑन व्हील्स’ ऐसा ही एक उपक्रम है, जिसे देश की शाही सैलानी रेलगाड़ी का तीसरा हॉस्पिटेलिटी इंडिया इंटरनेशनल अवार्ड दिया गया है। राजस्थान पर्यटन विकास निगम का यह पहियों पर राजमहल दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर भारत का नाम रोशन करने वाला माना गया है। अब एक और पैलेस ऑन व्हील्स शुरू किए जाने की योजना है। इसमें पर्यटकों के लिए पहले से भी ज्यादा सुख-सुविधाएं होंगी।

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भारत में केवल गोवा, केरल, राजस्थान, उड़ीसा और मध्य प्रदेश में ही पर्यटन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है, बल्कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पर्यटन को भी अच्छा लाभ पहुँचा है। हिमाचल प्रदेश में पिछले वर्ष 6.5 मिलियन पर्यटक गए थे। यह आंकड़ा राज्य की कुल आबादी के लगभग बराबर बैठता है। इन पर्यटकों में से 2.04 लाख पर्यटक विदेशी थे। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो प्रदेश ने अपेक्षा से कहीं अधिक सफल प्रदर्शन किया। विश्व पर्यटन संगठन ने भारतीय पर्यटन को सर्वाधिक तेजी से यानि 8.8 फीसदी वार्षिक की दर से विकसित हो रहे उद्योग के रूप में घोषित किया है। पर्यटन देश का तीसरा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाला उद्योग है। 2004 में पर्यटन से 21 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक की आय हुई। देश की कुल श्रम शक्ति में से 6 प्रतिशत को पर्यटन में रोजगार मिला हुआ है। पर्यटन उद्योग की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं।

भारत के विशाल तथा खूबसूरत तटीय क्षेत्र, अछूते वन, शान्त द्वीप समूह, वास्तुकला की प्राचीन, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक परम्परा, रंगमंच तथा कलाकेन्द्र पश्चिम के पर्यटकों के लिए खूबसूरत आकर्षण के केन्द्र बनते रहे हैं। विदेशी पर्यटकों के प्रति आत्मीयता दर्शाने के लिए सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम अतिथि देवो भवः शुरू किया गया है। विदेशी पर्यटक दूसरे देशों में भी घूमते हैं लेकिन भारत में पर्यटकों को अपनेपन की अनुभूति होती है, इसीलिए वे जहां भी जाते हैं न केवल उन जगह के प्रमुख दर्शनीय स्थलों को देखते हैं बल्कि वहां के लोगों के साथ, वहां के खान-पान के साथ, वहां के सांस्कृतिक मूल्यों के साथ, वहां के ऐतिहासिक तथ्यों के साथ, वहां की लोकसंस्कृति, कला एवं संगीत के साथ एकाकार होकर उन्हें जो अनुभूति होती है, वही भारतीय पर्यटन के आकर्षण का बड़ा कारण है। उनके लिये महत्वपूर्ण है उनका भारत भर में भ्रमण और अपनी अक्षत जिज्ञासा और अखंड पिपासा के साथ भारत को यहां से वहां तक घूमकर देख लेना। इन विदेशी एवं देश के सैलानियों ने उस मानक दृष्टि को प्राप्त किया है, जो भारत की सिर्फ छापों को न ग्रहण करने, बल्कि उसकी समग्र विविधताओं, नित नवीनताओं और अंतर्विरोधों के बीच से उस बिन्दु को ढूंढ़ निकालने की दृष्टि, जिससे इस बहुरूपी भारत को उसके बहुआयामी और निहंग वास्तविक रूप में देखा जा सके और ऊबड़-खाबड़ अनगढ़ता की परतों में छिपी सुंदरता को उद्घाटित किया जा सके। संभवतः इसी कारण भारत का पर्यटन दुनिया से भिन्न, अलौकिक एवं अद्भुत है।

-ललित गर्ग

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