तिल द्वादशी पर भगवान विष्णु की पूजा से होती है मनोकामनाएं पूर्ण

By प्रज्ञा पाण्डेय | Jan 29, 2022

आज तिल द्वादशी है, माघ महीने की कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को तिल द्वादशी कहा जाता है। हिन्दू धर्म में इस तिथि का विशेष महत्व है तो आइए हम आपको तिल द्वादशी का महत्व तथा व्रत की विधि के बारे में बताते हैं।

नारद और स्कंद पुराण के मुताबिक माघ महीने की द्वादशी तिथि  पर तिल दान करने का भी महत्व बताया गया है। इस बार द्वादशी और प्रदोष व्रत एक ही दिन होने से शनिवार को भगवान विष्णु और शिवजी की पूजा से मिलने वाला पुण्य और बढ़ जाएगा। पंडितों का मानना है कि इस द्वादशी तिथि पर सूर्योदय से पहले उठकर तिल मिला पानी पीना चाहिए। फिर तिल का उबटन लगाएं। इसके बाद पानी में गंगाजल के साथ तिल डालकर नहाना चाहिए। इस दिन तिल से हवन करें। फिर भगवान विष्णु को तिल का नैवेद्य लगाकर प्रसाद में तिल खाने चाहिए। इस तिथि पर तिल दान करने अश्वमेध यज्ञ और स्वर्णदान करने जितना पुण्य मिलता है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु जी की पूजा-उपासना की जाती है। भगवान श्रीहरि विष्णु को पूजा के दौरान तिल के लडडू प्रसाद में भेंट की जाती है। शास्त्रों में निहित है कि तिल द्वादशी के दिन विधि और श्रद्धा पूर्वक विष्णु जी की पूजा करने से व्यक्ति की सभी मनाकामनाएं पूर्ण होती हैं। तिल द्वादशी के दिन गंगा स्नान और तिल दान से व्यक्ति को पुण्य फल की प्राप्ति होती है। साथ ही मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

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तिल द्वादशी पर ऐसे करें पूजा

इस दिन प्रात: काल उठें और सर्वप्रथम भगवान श्रीहरि विष्णु जी को प्रणाम कर दिन प्रारम्भ करें। अब नित्य कर्मों से निवृत होकर गंगाजल युक्त पानी से स्नान करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर आमचन करें और अपने आप को शुद्ध करें। चूंकि, भगवान विष्णु जी को पीला रंग अति प्रिय है। अत: पीले रंग का नवीन वस्त्र धारण करें। फिर जल में लाल रंग मिलाकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। इसके पश्चात, षोड़शोपचार विधि से भगवान श्रीहरि विष्णु जी की पूजा करें। पूजा के दौरान ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र का जाप करें। अंत में आरती कर पूजा संपन्न करें।  तिल द्वादशी के दिन तांबे के बर्तन में चावल, तिल, जल तथा फूलों को मिलाकर सूर्य मंत्र बोलते हुए अर्घ्य देने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें। 

पूजा के दौरान भगवान विष्णु का तिल मिले जल से अभिषेक कर धूप व दीप जलाकर फल, फूल, चावल, रौली, मौली, से पूजन कर भगवान को तिल से बनी वस्तुओं या तिल तथा गुड़ से बने प्रसाद का भोग लगाएं। इस दौरान भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए भक्तों को 108 बार ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र का जाप करना चाहिए। पूजा करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुंह करके बैठें। पूजा करने के बाद शाम को कथा सुनने के बाद भगवान की आरती उतारें। व्रती को इस दिन गरीब लोगों को दान अवश्य देना चाहिए। इससे शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इस दिन व्रत और पूजा करने से सभी मनोकामना पूरी होती है।

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तिल द्वादशी का महत्व 

इस दिन मंदिर और मठों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। साथ ही कीर्तन-भजन कर प्रभु का गुणगान किया जाता है। संध्याकाल में सत्संग किया जाता है। इसमें भगवान के विभिन्न रूपों की कथा सुनाई जाती है। इस व्रत को करने से व्यक्ति को जन्मांतरों के बंधन से मुक्ति मिलती है। वहीं, मरणोपरांत व्यक्ति को वैकंठ धाम की प्राप्ति होती है। साथ ही व्यक्ति को पाप कर्मों से भी मुक्ति मिलती है। इस दिन दान करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का आगमन होता है।

तिल द्वादशी का उपाय

शिवजी मंदिर जाकर ऊँ नम: शिवाय मंत्र बोलते हुए शिवलिंग पर जल और दूध से अभिषेक करें। फिर बिल्व पत्र और फूल चढ़ाएं। इसके बाद काले तिल चढ़ाएं। इसके बाद शिव मूर्ति या शिवलिंग के नजदीक तिल के तेल का दीपक लगाएं। शिव पुराण का कहना है कि ऐसा करने से हर तरह की परेशानियां और बीमारियां खत्म होने लगती है।

इस दिन तिल दान करने के फायदे 

पंडितों का मानना है कि तिल द्वादशी के दिन तिल दान करने से जीवन में व्याप्त सभी परेशानियों का अंत होता है। तिल द्वादशी को तिल दान करने से दुःख, दर्द, दुर्भाग्य और कष्टों से मुक्ति मिलती है। तिल द्वादशी के दिन तिल युक्त पानी से स्नान करना चाहिए। इससे व्यक्ति के सभी पाप कट जाते हैं। करियर को नया आयाम देने के तिल द्वादशी को स्नान ध्यान कर तिलांजलि करें। धार्मिक मान्यता है कि पितृ के प्रसन्न रहने से व्यक्ति जीवन में सबकुछ प्राप्त कर सकता है। शास्त्रों के असार पितृ को प्रसन्न करने के लिए अमावस्या और पूर्णिमा तिथियों को तिल तर्पण करने की सलाह देते हैं। साथ ही तिल द्वादशी को तिल दान अवश्य करें।

- प्रज्ञा पाण्डेय

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