BRICS समिट में ये 5 काम कर गए जिनपिंग, भारत भी हैरान!

By अभिनय आकाश | Sep 17, 2026

भारत की कमान में ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन सुपरहिट रहा है। सबसे बड़ी चुनौती थी सब देशों को एक मंच पर लाना और भारत ने नई दिल्ली डिक्लेरेशन पर सभी सदस्य देशों से मोहर लगवाकर अपनी कूटनीति का लोहा मनवा दिया। अब अगली मेजबानी चीन के पास है। साल 2027 में ब्रिक्स समिट विजिंग में होने वाला है। लेकिन कमान हाथ में आते ही शी जिनपिंग ने ब्रिक्स के लिए अपना फाइव पॉइंट प्लान लॉन्च कर दिया है। जो कई नए सवाल खड़े कर रहा है।  ब्रिक्स समिट खत्म हुआ और भारत की सफल चेयरमैनशिप के बाद अब कमान चीन के हाथों में है। लेकिन बीजिंग पहुंचते ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक ऐसा फाइव पॉइंट एक्शन प्लान रख दिया जिसने पूरी दुनिया के डिप्लोमेट्स के कान खड़े कर दिए हैं। चीन के इस प्लान में बिजनेस है, एआई है, टेक्नोलॉजी है और डिजिटल इकॉनमी की बड़ी-बड़ी बातें हैं। लेकिन ग्लोबल सिक्योरिटी और टेररिज्म जैसे बड़े मुद्दों पर सन्नाटा क्यों है? क्या चीन ब्रिक्स को सिर्फ अपनी कंपनियों का मार्केट बनाना चाहता है?

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आखिर क्या है जिंपिंग का यह प्लान? 
पॉइंट नंबर 1- ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट यानी देशों के बीच व्यापार और निवेश को बेहतर आसान बनाना और स्पेशल इकोनमिक ज़ोन में पार्टनरशिप बढ़ावा देना। 
पॉइंट 2- टेक एंड एआई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और लार्ज लैंग्वेज मॉड्यूल पर एक दूसरे का साथ देना। 
पॉइंट 3- डिजिटल इकॉनमी। पूरी तरह से ऑनलाइन और डिजिटल ट्रेड को बढ़ावा देना। 
पॉइंट नंबर 4 मैन्युफैक्चरिंग यानी सामान बनाने की क्षमता। प्रोडक्शन कैपेसिटी को कई गुना बढ़ावा देना। 
पॉइंट नंबर 5- यूथ एंड इनोवेशन। युवाओं को नई टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप से जोड़ना।

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कुल मिलाकर देखा जाए तो चीन का पूरा फोकस सिर्फ और सिर्फ पैसे बिजनेस और टेक्नोलॉजी पर टिका हुआ है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब है। उसका सस्ता सामान पहले से ही पूरी दुनिया भर में भरा पड़ा है। भारत के साथ चीन का ट्रेड गैप बहुत बड़ा है। हम चीन से खरीदते बहुत ज्यादा हैं और बेचते कम है। ऐसे में अगर ब्रिक्स के नाम पर व्यापार और आसान होता है तो चीन के सस्ते सामानों की भारत में बाढ़ आ सकती है। भले ही ब्रिक्स कोई यूरोपियन यूनियन जैसा ग्रुप नहीं है लेकिन अगर मार्केट खुला तो भारत को अपने लोकल बिजनेस और मैन्युफैक्चरिंग को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा चीन का सबसे बड़ा दांव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर है। चीन एआई और टेक के मामले में तेजी से आगे भाग रहा है। लेकिन यहां सबसे बड़ा खतरा है डाटा सिक्योरिटी का। अगर ब्रिक्स देशों चीन के एi मॉडल और डिजिटल नेटवर्क पर निर्भर होते हैं तो उनका डाटा कितना सुरक्षित रहेगा। टेक्नोलॉजी का फायदा तो ठीक है लेकिन प्राइवेसी और नेशनल सिक्योरिटी के जोखिमों को भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता है। शी जिमपिंग ने साफ कहा है चीन अपने इकॉनमी को मजबूत करते हुए पूरी दुनिया से कनेक्टेड रहेगा। उनका मकसद ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों से अपना दबदबा बनाना है। चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआई और ग्लोबल डेवलपमेंट इनिशिएटिव को ब्रिक्स के रास्ते और आगे बढ़ाना चाहता है। यानी ब्रिक्स के मंच पर इस्तेमाल चीन अपने ग्लोबल बिजनेस को मार्केट में फैलाने के लिए कर रहा है। 
चीन का मैसेज एकदम क्लियर है। बिजनेस बढ़ाओ, एआई लाओ, सामान बनाओ और मार्केट पर कब्जा करो। लेकिन सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स सिर्फ एक कमर्शियल बाजार बनकर रह जाएगा? क्या आतंकवाद, बॉर्डर सिक्योरिटी और वर्ल्ड पीस जैसे गंभीर मुद्दों पर ठंडे बस्ते में चले जाएंगे। अब देखना होगा कि 2027 में जब बीजिंग में ब्रिक्स देश जुटेंगे तो क्या भारत और बाकी देश चीन से इस बिजनेस फर्स्ट एजेंडा पर अपनी शर्तें रख पाएंगे या नहीं। 
 

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