अब्दुल्ला-मायावती-सिब्बल...एक-एक कर मोदी के समर्थन में अचानक क्यों उतरने लगे विरोधी,'चक्रव्यूह' में फंसे राहुल?

Rahul
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अभिनय आकाश । Sep 17 2026 12:22PM

भारत में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणापत्र पर सर्वसम्मति और सीमा पार आतंकवाद की निंदा को भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। इस ऐतिहासिक सफलता पर उमर अब्दुल्ला, यशवंत सिन्हा और कपिल सिब्बल जैसे प्रमुख विपक्षी नेताओं ने भी मोदी सरकार की विदेश नीति की जमकर सराहना की है।

ब्रिक्स में मोदी ने दुनिया को दिखाई भारत की ताकत। मायावती अब्दुल्ला जैसे विरोधी भी हुए मोदी के फैन। नेता विपक्ष कैसा होना चाहिए राहुल गांधी को बता दिया। कहते हैं जब विरोधी भी तारीफ करने लगे तो समझ लेना चाहिए सरकार सही रास्ते पर जा रही है। लेकिन यह बात शायद कांग्रेस नेता राहुल गांधी को समझ में नहीं आती। इसीलिए जिस ब्रिक्स सम्मेलन का भारत में सफल आयोजन हुआ। जिस ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर कई बड़ी उपलब्धियां भी हासिल की। उस ब्रिक्स सम्मेलन में राहुल गांधी को बस यही नजर आया कि विदेशी मेहमानों को सिर्फ वेजिटेरियन खाना क्यों खिलाया गया। नॉनवेज क्यों नहीं परोसा गया?
वहीं दूसरी तरफ इसी देश में कुछ ऐसे विरोधी नेता भी हैं जो सरकार का विरोध भी करते हैं और जहां सरकार अच्छा करती है उसकी तारीफ भी करते हैं। कुछ ऐसा ही एक बार फिर हुआ जब उमर अब्दुल्ला, कपिल सिब्बल, मायावती जैसे विरोधियों ने भी सरकार की जमकर तारीफ की। पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद भारत ने जिस तरह से ब्रिक्स समिट के सभी सदस्यों को मंच पर लाकर नई दिल्ली घोषणापत्र पर सर्वस्मति बनाई और फिर 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले के साथ ही क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म और टेरर फंडिंग पर भी कड़ी निंदा की गई जिसका समर्थन सभी देशों ने किया। यही वजह है कि जम्मू कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला ने भी विरोधी होने के बावजूद मोदी सरकार की तारीफ करते हुए कहा भारत सरकार और विशेषकर विदेश मंत्रालय का विषय है कि वह इस पर बात करें। लेकिन इस बात को समझिए कि पहलगाम हमले की खुद निंदा होना ही अपने आप में एक बड़ी बात है। 
जरा देखिए कि उस कमरे में पाकिस्तान के कितने सहयोगी और मित्र देश मौजूद थे। ऐसे माहौल में घोषणापत्र में पहलगाम का नाम लेकर जिक्र किया जाना ही हमारी विदेश नीति की एक बड़ी सफलता है। बात उमर अब्दुल्ला तक ही सीमित नहीं है। कभी खुद देश के विदेश मंत्री रहे यशवंत सिन्हा भी ब्रिक्स की सफलता देखकर गदगद हैं। उन्हें तो इस बात की सबसे ज्यादा खुशी है कि ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने जिन देशों को बुलाया था उन सभी देशों के राष्ट्र अध्यक्ष आए तो वहीं घोषणापत्र पर सभी सदस्य देशों की सहमति से भी वो गदगद नजर आए। इसमें नोट करने वाली बात जो है वो यह है कि सारे इसमें जो शासनाध्यक्ष या राष्ट्रध्यक्ष आपके प्रेसिडेंट प्राइम मिनिस्टर इन देशों के जिनको बुलावा गया वो सब लोग आए। प्रमुख रूप से चाइना के राष्ट्रपति आए और रशिया के राष्ट्रपति आए। तो यह एक अच्छी बात रही कि सारे लोग जिनको निमंत्रण गया वह आ गए। दूसरी बात जो है वह यह रही कि जब इसके पहले इसकी तैयारी करने के लिए विदेश मंत्रियों की मीटिंग हुई थी मई के महीने में दिल्ली में तो उसमें एक साझा बयान नहीं बन पाया था क्योंकि बहुत सारे मतभेद थे।

कपिल सिब्बल जैसे पूर्व कांग्रेसी नेता भी सरकार की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए कहा असल में हमारे पास देशों का एक ऐसा मिलाजुला समूह है जिससे कोई क्रांतिकारी या पक्का साझा प्रस्ताव आसानी से नहीं निकल सकता। ठीक इसीलिए मैंने शुरुआत में कहा था कि यह हमारी सरकार के लिए एक उल्लेखनीय उपलब्धि है कि बिना किसी विवाद के एक संयुक्त बयान पारित किया गया। यह अपने आप में एक बड़ी कामयाबी है। ब्रिक्स समिट में भारत की सफलता के लिए मोदी सरकार की तारीफ कर रहे हैं क्योंकि राजनीति में मतभेद हो सकते हैं। सरकार पर सवाल भी उठा सकते हैं। लेकिन बात जब देश की आती है, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के प्रभुत्व की आती है, तो देश के विपक्षी नेता भी सरकार के साथ खड़े हो जाते हैं।

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