Yes, Milord! जबरन धर्मांतरण देश के लिए खतरा, हादसों के केस में भविष्य में मुआवजा, इस हफ्ते के कोर्ट के कुछ खास जजमेंट/ऑर्डर

By अभिनय आकाश | Nov 19, 2022

जब भी आप किसी ने मिलते हैं तो उसे कैसे एड्रेस करते हैं? जैसे सर, मैम, मैडम, मिस्टर, मिस, मिसेज। इसे सैल्यूटेशन्स या अभिवादन की क्रिया कह सकते हैं। अब बताइए कि कोर्ट में जजों को कैसे एड्रेस किया जाता होगा। आपने जितनी भी फिल्में देखी होंगी उसके हिसाब से इसका उत्तर होना चाहिए योर हॉनर, माई लार्ड या मीलार्ड। तो आज से आपके सामने हम आपके सामने हर हफ्ते आपके सामने शनिवार के दिन एक नए खास शो यस मीलार्ड के साथ आएंगे। सुप्रीम कोर्ट से लेकर लोअर कोर्ट तक इस सप्ताह यानी 14 नवंबर से 18 नवंबर 2022 तक क्या कुछ हुआ। कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट और टिप्पणियों का विकली राउंड अप आपके सामने लेकर आए हैं। कुल मिलाकर कहें तो आपको इस सप्ताह होने वाले भारत के विभिन्न न्यायालयों की मुख्य खबरों के बारे में बताएंगे। 

सुप्रीम कोर्ट ने जबरन धर्मांतरण को बेहद गंभीर मुद्दा करार देते सरकार से कहा है कि वह इसे रोकने के लिए कदम उठा और इस दिशा में गंभीर प्रयास करे। शीर्ष अदालत ने चेताया कि जबरन धर्मांतरण न सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है बल्कि देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने चेताया कि जबरन धर्मांतरण को नहीं रोका गया तो बहुत मुश्किल परिस्थितियां खड़ी हो जाएंगी। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि कई राज्य सरकारों ने जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बनाए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां चावल और गेहूं देकर धर्म परिवर्तन कराए जा रहे हैं। इस पर बेंच ने कहा, यह सब रोकने के लिए आप क्या कदम उठा रहे हैं। अदालत ने जबरन धर्मांतरण के खिलाफ कानून की मांग पर केंद्र सरकार से 22 नवंबर तक जवाब दाखिल करने को कहा है। अगली सुनवाई 28 नवंबर को होगी।

पूजा स्थल कानून

सुप्रीम कोर्ट ने पूजा स्थल कानून के खिलाफ दाखिल अर्जी पर केंद्र सरकार से 12 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने को कहा। कोर्ट ने सुनवाई जनवरी के पहले हफ्ते के लिए टाल दी। इससे पहले केंद्र को 31 अक्टूबर तक जवाब देना था। 14 नवंबर को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस मामले में उच्च स्तर पर विचार विमर्श होना है। ऐसे में वक्त दिया जाना चाहिए। चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने केंद्र की इस मांग को स्वीकार कर लिया। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की ओर से अर्जी दाखिल कर प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 की धारा 2, 3, 4 को चुनौती दी गई है।

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शिवलिंग की पूजा

वाराणसी की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने ज्ञानवापी परिसर में मुस्लिमों के प्रवेश पर बैन और कथित 'शिवलिंग' की पूजा की इजाजत देने वाली याचिका को सुनवाई योग्य माना है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला 1991 के पूजा स्थल कानून, वक्फ एक्ट और 1936 के दीन मोहम्मद केस के तहत नहीं है। इस मामले में सुनवाई 2 दिसंबर से शुरू होगी। गौरतलब है कि हिंदू पक्ष ने 'शिवलिंग' की पूजा की मांग की थी। इस पर मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई थी। उन्होंने तर्क दिया था कि पूजा स्थल कानून और वक्फ एक्ट के तह यह मामला सुनवाई योग्य नहीं है। लेकिन इसके उलट कोर्ट ने इसे अस्वीकार करते हुए अर्जी खारिज कर दी।

जजों की नियुक्ति के लिए नई प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति के लिए मौजूदा कलीजियम सिस्टम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है। कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए नई तय प्रक्रिया बनाए जाने की जरूरत बताई गई है। सुप्रीम कोर्ट 2015 के चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच के सामने याचिकाकर्ता नियुक्ति की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट एम. जे. (NJAC नेदुमपारा ने यह मामला उठाया। उन्होंने कहा कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट को लागू ने जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को प्रमोश खारिज करते हुए कलीजियम सिस्टम को लागू किया गया था। सीजेआई की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि वह मामले को लिस्ट करने के लिए कहेंगे। बता दें, कलीजियम सुप्रीम कोर्ट और हाई कार्ट में जजों की नियुक्ति और तबादले पर निर्णय लेता है। कलीजियम के सदस्य 'जज ही नामों की सिफारिश करके सरकार को भेजते हैं।

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हादसों के केस में भविष्य में मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर एक्सिडेंट की वजह से कोई स्थायी तौर पर शारीरिक अक्षमता का शिकार हो जाए, तो उसके भविष्य की आमदनी की हानि का भी मुआवजा देते समय आकलन होगा। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया है। कि अगर इंजरी ऐसी हो, जिससे स्थायी तौर पर शारीरिक अक्षमता आ जाए, तो पीड़ित भविष्य में होने वाली आमदनी की हानि का मुआवजा मांगा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ट्रिब्यूनल और मामले में ट्रिब्यूनल हाई कोर्ट और हाई कोर्ट के मत से विपरीत फैसला दिया। 

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