कोरोना काल में देश के सबसे सफल मुख्यमंत्री के रूप में उभरे हैं योगी

By डॉ. नीलम महेंद्र | Jun 05, 2020

एक प्रदेश जो लचर कानून व्यवस्था अराजकता और भ्रष्टाचार के लिए जाना जाता था। ऐसा राज्य जहाँ बिजली कब आएगी इसी इंतजार में लोगों का दिन निकल जाता था। जहाँ बिना नकल के कोई परीक्षा ही नहीं होती थी। जहाँ दिनदहाड़े गुंडागर्दी और साम्प्रदायिक दंगे आम बात थी। जहाँ के लोग इन हालातों को अपना भाग्य मानकर उनसे समझौता करके जीना सीख चुके थे आज वो प्रदेश देश के मानचित्र पर तेज़ी से अपनी पहचान और भाग्यरेखा दोनों बदल रहा है। जब 2017 में योगी आदित्यनाथ ने उपर्युक्त परिस्थितियों में मुख्यमंत्री के रूप में उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली थी तो उनके चयन के फैसले पर आम लोग ही नहीं पार्टी में भी कुछ लोगों को संशय था। लेकिन योगी सरकार के इन तीन सालों ने ना सिर्फ उनके विरोधियों का मुंह बंद कर दिया बल्कि पार्टी आलाकमान के फैसले पर वो मोहर अंकित कर दी जिसकी मिसाल वर्तमान में शायद ही देखने को मिले। इन तीन सालों ने एक संन्यासी को लेकर परंपरागत धारणाओं के विपरीत एक योगी की ऐसी छवि उकेरी जिसके एक हाथ में पूजा की थाली तो दूसरे में आईपैड है। 

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दरअसल मुख्यमंत्री का पद संभालते ही उन्होंने सबसे पहले राज्य के प्रशासनिक तंत्र में लगी भ्रष्टाचार और परिवारवाद से उपजी अकर्मण्यता और मक्कारी के दीमक को साफ करके अपने इरादे जता कर आमजन में उम्मीद के अनेक दीपक जला दिए थे। लेकिन कोरोना काल में जिस प्रकार योगी सरकार ने अपने प्रदेश के एक-एक व्यक्ति के जीवन को महत्व दिया, उसकी पीड़ा को समझा, उसकी परवाह की और कोरोना महामारी जैसी आपदा से निपटने में जिस कार्यकुशलता का परिचय देकर अपना उत्तर प्रदेश मॉडल देश के सामने रखा वो अन्य राज्यों के लिए नज़ीर बन गया। चाहे वो राज्य में विशेष समुदाय द्वारा कोरोना वारियर्स के प्रति हिंसक और अभद्र घटनाएं हों चाहे प्रवासी मजदूर हों या दूसरे प्रदेश में पढ़ने गए छात्र। राजनेताओं और सरकारों द्वारा गरीबों और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील होने के दावे करना और उनके प्रति संवेदनशील होने में क्या फर्क होता है यह योगी सरकार ने दिखाया और समूचे देश ने देखा। देश ने देखा जब लॉकडाउन के दौरान दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे राज्यों से लाखों मजदूरों की भीड़ यकायक यूपी बॉर्डर पर एकत्र हो गई या कर दी गई, तो योगी सरकार ने कैसे रातों रात ना सिर्फ इनके लिए भोजन और ठहरने का इंतजाम कराया बल्कि बसों की व्यवस्था करके इनको इनके गंतव्य तक भी पहुंचाया। पर योगी ने इतना करके इसे ही अपनी जिम्मेदारी का अंत नहीं माना। यह बात एक राजनेता को सामान्य लग सकती है कि जो मजदूर कल तक दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान जैसे राज्यों के चलते उद्योगों की जरूरत थे, लॉकडाउन के चलते वो चंद दिनों में ही उन पर बोझ बन जाएं और इस प्रकार के हालात उत्पन्न कर दिए जाएं और वे पलायन के लिए मजबूर हो जाएं। लेकिन एक संवेदनशील योगी को यह घटना अमानवीय लगी और वो कर्मयोगी बन कर यहीं नहीं रुके बल्कि आगे बढ़े। उन्होंने अन्य राज्यों की सरकारों से कहा कि वे भविष्य में उत्तर प्रदेश के श्रमिकों को उत्तर प्रदेश सरकार की अनुमति के बाद ही काम पर रख सकेंगे। इतना ही नहीं योगी सरकार ने प्रवासी मजदूरों को राज्य में ही काम देने का वादा किया और उनकी आर्थिक सुरक्षा हेतु प्रवासन आयोग का गठन करने का निर्णय लिया जो उनकी नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ उनका बीमा करके उनका जीवन भी सुरक्षित करेगा। प्रवासी मजदूरों के विषय में वे क्या सोचते हैं उनके इस बयान से समझा जा सकता है कि "एक भूखा बच्चा ही अपनी माँ को ढूंढ़ता है।"

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देश ने वो मंजर भी देखा जब लॉकडाउन के कारण कोटा में फंसे यूपी के दस हज़ार छात्रों की आवाज को सुनने वाले वो देश के पहले मुख्यमंत्री बने। देश साक्षी हुआ उन हज़ारों माता-पिता और बच्चों के कृतज्ञ चेहरों का जिन्हें योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद देने के लिए शब्द नहीं मिल रहे लेकिन आंखों के आँसू उनके जज्बात भली भांति बयाँ कर रहे थे।

कोरोना काल से पहले भी जब दिल्ली समेत देश भर में सीएए के विरोध प्रदर्शन ने दंगों का रूप लिया और अराजकता फैलाने की कोशिशें हुईं तो योगी सरकार ही देश के इतिहास की वो पहली सरकार बनी जिसने दंगों के दौरान हुए नुकसान की भरपाई दंगाइयों से ही की। इतना ही नहीं योगी सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया कि उत्तर प्रदेश में कोई शाहीन बाग़ ना खड़ा हो पाए। 

एक मुख्यमंत्री के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन करने वाले योगी आदित्यनाथ ने संन्यासी रूप को केवल बाहरी व्यक्तित्व और जीवन ही नहीं अपनी आत्मा में आत्मसात किया है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखा देश ने जब कोरोना काल में उन्हें अपने पिता के निधन की सूचना मिली लेकिन उन्होंने उत्तर प्रदेश की 23 करोड़ जनता के प्रति अपने कर्तव्य को पहले रखा और पत्र लिखकर अपनी माँ से क्षमा याचना की। एक मुख्यमंत्री को अपने पिता के अंतिम संस्कार में जाने से कौन रोक सकता था? लेकिन उन्होंने अपनी माँ को लिखा, "अंतिम संस्कार के कार्यक्रम में लॉकडाउन की सफलता और महामारी कोरोना को परास्त करने की रणनीति के कारण भाग नहीं ले पा रहा हूँ।'' एक सामान्य मानव और एक संन्यासी में यही अंतर होता है। ऐसे कठोर निर्णय लेने वाला ऐसा हृदय जो मानवीय संवेदनाओं से भरा हो एक योगी का ही हो सकता है। और आज वो योगी कर्मयोग से अपने प्रदेश का भविष्य बदलने के लिए चल पड़ा है।

-डॉ. नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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