नई भाजपा के रोल मॉडल हैं योगी, हेमंत और शुभेंदु!

By प्रो. संजय द्विवेदी | Jun 27, 2026

उत्तर प्रदेश एक ऐसे मुख्यमंत्री से रूबरू है, जिसे राजनीति के मैदान में बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उनके बारे में यह ख्यात था कि वे एक खास वर्ग की राजनीति करते हैं और भारतीय जनता पार्टी भी उनकी राजनीतिक शैली से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह अपनी पकड़ बनाई है और देश में एक अलग माडल खड़ा दिया है, वह सर्वत्र चर्चा का विषय है। इससे यह भी साबित हो रहा है कि ‘अपनी राजनीति’ के प्रति भाजपा का आत्मदैन्य कम हो रहा है। वहीं असम में हेमंत विश्वशर्मा उम्मीदों का चेहरा बनकर उभरे हैं, असम में तीसरी बार सरकार बनाकर भाजपा ने पूर्वोत्तर में इतिहास रच दिया है। इसी तरह गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति से पश्चिम बंगाल की विजय ऐतिहासिक कही जा रही है और वहां बने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के ताबड़तोड़ फैसलों ने जनविश्वास की हिलोरें पैदा की हैं। जड़ता को तोड़कर एक नई उम्मीद बनी है। केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के आगमन ने भारतीय राजनीति के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है। 

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यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं की एक समय में दीनदयाल जी उदार थे, तो अटलजी और बलराज मधोक अपनी वक्रता के चलते उग्र नेता माने जाते थे। अटलजी का दौर आया तो लालकृष्ण आडवाणी उग्र कहे जाने लगे, फिर एक समय ऐसा भी आया जब आडवानी उदार हो गए और नरेंद्र मोदी उग्र मान जाने लगे। आज की व्याख्याएं सुनें- नरेंद्र मोदी उदार हो गए हैं और योगी आदित्यनाथ और गृहमंत्री अमित शाह उग्र  माने जाने लगे हैं। अब तो असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्वशर्मा और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी आदित्यनाथ की परंपरा के मुख्यमंत्री कहे जाने लगे हैं।

सेकुलर संक्रमण से मुक्ति से मिली नई पहचान-

यह मीडिया, बौद्धिकों की अपनी रोज बनाई जाती व्याख्याएं हैं। लेकिन सच यह है कि अटल, मधोक, आडवानी, मोदी, अमित शाह या आदित्यनाथ, हेमंत विश्वशर्मा और शुभेंदु अधिकारी कोई अलग-अलग लोग नहीं है। एक विचार के प्रति समर्पित राष्ट्रनायकों की सूची है यह। इसमें कोई कम जा ज्यादा उदार या कठोर नहीं है। किंतु भारतीय राजनीति का विमर्श  ऐसा है जिसमें वास्तविकता से अधिक ड्रामे पर भरोसा है। भारतीय राजनेता की मजबूरी है कि वह टोपी पहने, रोजा भले न रखे किंतु इफ्तार की दावतें दे। आप ध्यान दें सरकारी स्तर पर यह प्रहसन लंबे समय से जारी रहा है। भाजपा भी इसी राजनीतिक क्षेत्र में काम करती है। उसमें भी इस तरह के रोग हैं। वह भी राष्ट्रनीति के साथ थोड़े तुष्टिकरण को गलत नहीं मानती। जबकि उसका अपना नारा रहा है सबको न्याय, तुष्टिकरण किसी का नहीं। उसका एक नारा यह भी रहा है-“राम, रोटी और इंसाफ। ”

लंबे समय के बाद भाजपा में अपनी वैचारिक लाइन को लेकर गर्व का बोध दिख रहा है। असरे बाद वे भारतीय राजनीति के सेकुलर संक्रमण से मुक्त होकर अपनी वैचारिक भूमि पर गरिमा के साथ खड़े दिख रहे हैं। समझौतों और आत्मसमर्पण की मुद्राओं के बजाए उनमें अपनी वैचारिक भूमि के प्रति हीनताग्रंथि के भाव कम हुए हैं। अब वे अन्य दलों की नकल के बजाए एक वैचारिक लाइन लेते हुए दिख रहे हैं। दिखावटी सेकुलरिज्म के बजाए वास्तविक राष्ट्रीयता के उनमें दर्शन हो रहे हैं। मोदी जब एक सौ चालीस करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते हैं तो बात अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक से ऊपर चली जाती है। यहां देश सम्मानित होता है, एक नई राजनीति का प्रारंभ दिखता है। एक भगवाधारी संन्यासी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है तो वह एक नया संदेश देता है। वह संदेश त्याग का है, परिवारवाद के विरोध का है, तुष्टिकरण के विरोध का है, सबको न्याय का है।

भारतीयता का विमर्श अब केंद्रीय विमर्श-

आजादी के बाद के सत्तर सालों में देश की राजनीति का विमर्श भारतीयता और उसकी जड़ों की तरफ लौटने के बजाए घोर पश्चिमी और वामपंथी रह गया था। जबकि बेहतर होता कि आजादी के बाद हम अपनी ज्ञान परंपरा की और लौटते और अपनी जड़ों को मजबूत बनाते। किंतु सत्ता, शिक्षा, समाज और राजनीति में हमने पश्चिमी तो, कहीं वामपंथी विचारों के आधार पर चीजें खड़ी कीं। इसके कारण हमारा अपने समाज से ही रिश्ता कटता चला गया। सत्ता और जनता की दूरी और बढ़ गयी। सत्ता दाता बन बैठी और जनता याचक।  सेवक मालिक बन गए। ऐसे में लोकतंत्र एक छद्म लोकतंत्र बन गया। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हम सत्तर साल के बाद सड़कें बना रहे हैं। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हमारे अपने नौजवानों ने भारतीय राज्य के खिलाफ बंदूकें उठा रखी थीं। गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़संकल्प की बदौलत आज माओवादी आतंक का अंत भी हमने देखा। पिछले सत्तर सालों में लोकतंत्र की विफलता की ये कहानियां सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं। राजनीतिक तंत्र के प्रति उठा भरोसा भी साधारण नहीं था। आज ऐसा लगता है कि राजनीति से कुछ हो सकता है। मोदी,शाह, आदित्यनाथ भरोसे के प्रतीक बन गए। इसका मतलब यह भी है कि ये कुछ कह रहे हैं तो करेंगें भी।

नरेंद्र मोदी, अमित शाह, आदित्यनाथ देश की इन्हीं उम्मीदों के चेहरे हैं। तीनों अंग्रेजी नहीं बोलते। तीनों जन-मन-गण के प्रतिनिधि हैं। यह भारतीय राजनीति का बदलता हुआ चेहरा है। क्या सच में भारत खुद को पहचान रहा है ? वह जातियों, पंथों, क्षेत्रों की पहचान से अलग एक बड़ी पहचान से जुड़ रहा है- वह पहचान है भारतीय होना, राष्ट्रीय होना। एक समय में राजनीति हमें नाउम्मीद करती हुयी नजर आती थी। बदले समय में वह उम्मीद जगा रही है। कुछ चेहरे ऐसे हैं जो भरोसा जगाते हैं। एक आकांक्षावान भारत बनता हुआ दिखता है। यह आकांक्षाएं राजनीति दलों के एजेंडे से जुड़ पाएं तो देश जल्दी और बेहतर बनेगा। राजनीतिक विमर्श और जनविमर्श को साथ लाने की कवायद हमें करनी ही होगी। जल्दी बहुत जल्दी। यह जितना और जितना जल्दी होगा भारत अपने भाग्य पर इठलाता दिखेगा।

- प्रो. संजय द्विवेदी

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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