Dangal Girl Zaira Wasim के लिए देश से बड़ा है धर्म ! Independence Day Celebration में बच्चियों को नृत्य करते देख भड़कीं पूर्व अभिनेत्री

By नीरज कुमार दुबे | Aug 18, 2026

कश्मीर में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान बच्चियों के नृत्य का एक वीडियो सामने आने के बाद पूर्व अभिनेत्री जायरा वसीम ने जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। जायरा वसीम ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पूछा कि धार्मिक और सामुदायिक उद्देश्यों के लिए गठित संस्था के बैनर तले आयोजित कार्यक्रम में छोटी बच्चियों से मंच पर नृत्य क्यों कराया गया? उनका तर्क है कि बच्चों को केवल नृत्य या मनोरंजन तक सीमित करने की बजाय उन्हें सोचने, सीखने, सृजन करने, चर्चा करने और समाज में योगदान देने के अवसर मिलने चाहिए।

इसे भी पढ़ें: Omar Abdullah ने Vande Mataram विवाद पर कहा, सरकारी कार्यक्रमों में नया बदलाव समझने में लगेगा समय

यहां एक विडंबना भी दिखाई देती है। जायरा वसीम स्वयं कभी उसी फिल्मी दुनिया का हिस्सा थीं, जिसे उन्होंने बाद में अपने धार्मिक विश्वासों के साथ टकराव का कारण बताते हुए छोड़ दिया। ‘दंगल’ से पहचान बनाने के बाद उन्होंने ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ और ‘द स्काई इज़ पिंक’ में काम किया। 2019 में उन्होंने अभिनय से अलग होने की घोषणा करते हुए कहा था कि फिल्म उद्योग उनके ईमान और धार्मिक आस्था के साथ टकरा रहा था।

यहीं उनसे दूसरा बड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए कि अगर कभी फिल्मों में काम करना आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और चुनाव था, तो आज किसी दूसरी बच्ची के सांस्कृतिक प्रदर्शन को उसकी स्वतंत्रता और चुनाव की बजाय धार्मिक कसौटी से क्यों देखा जा रहा है? बच्चों को सोचने की आजादी देने की बात बिल्कुल सही है, लेकिन क्या उस आजादी में नृत्य, संगीत, कला और राष्ट्रीय पर्व मनाने की स्वतंत्रता भी शामिल नहीं होनी चाहिए?

साथ ही जायरा वसीम की टिप्पणी का सबसे असहज पहलू उनकी प्राथमिकताओं को लेकर उठने वाला सवाल है। क्या देश के राष्ट्रीय पर्व की खुशी और धार्मिक आस्था को हमेशा एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना जरूरी है? स्वतंत्रता दिवस भारत के हर नागरिक का साझा राष्ट्रीय उत्सव है। इसमें मुस्लिम, हिंदू, सिख, ईसाई और हर समुदाय के बच्चे समान रूप से भाग लेते हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या धार्मिक पहचान को इतनी प्रमुखता दी जानी चाहिए कि राष्ट्रीय उत्सव की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां ही संदेह के घेरे में आ जाएं? उनकी सार्वजनिक टिप्पणियां यह सवाल जरूर पैदा करती हैं कि क्या धार्मिक मूल्यों की रक्षा और भारतीय राष्ट्रीय जीवन की खुली, बहुलतावादी अभिव्यक्ति के बीच कोई संतुलन संभव नहीं है? जायरा को समझना चाहिए कि बच्चियों को पढ़ने, सोचने और सवाल करने के साथ-साथ मंच पर अपनी कला दिखाने का अधिकार भी मिलना ही चाहिए।

बहरहाल, आखिर सवाल सिर्फ एक नृत्य का नहीं है। सवाल यह है कि हम बच्चों के लिए कैसी दुनिया बनाना चाहते हैं? जहां संस्थाएं तय करें कि उन्हें क्या करना चाहिए, या ऐसी दुनिया जहां वे ज्ञान, कला, संस्कृति, देशभक्ति और अपनी व्यक्तिगत पसंद, सबको साथ लेकर आगे बढ़ सकें? जायरा से पूछा जाना चाहिए कि यदि स्वतंत्रता दिवस भी बच्चों की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त स्वतंत्र मंच नहीं है, तो फिर स्वतंत्रता का अर्थ आखिर क्या बचता है?

प्रमुख खबरें

Jan Gan Man: दिमागी नक्सल टिप्प्णी कटाक्ष नहीं चेतावनी है, क्या खुद को गर्व से Dimagi Naxal कहने वाले नेता नक्सली हिंसा के पीड़ितों का दर्द सुनना चाहेंगे?

Global हिट बनी Maruti Fronx! 90 देशों में डिमांड, 2 लाख Export का Record

काबुल के Hazara इलाके में School के पास Grenade Attack, 50 बच्चे घायल, दहला Afghanistan

Saurabh Das का Delhi Govt पर बड़ा आरोप: छात्रों पर FIRs रद्द करने में देरी क्यों?