उमर खालिद के समर्थन में उतर कर जोहरान मामदानी ने बड़ा खतरनाक खेल खेला है

By नीरज कुमार दुबे | Jan 02, 2026

न्यूयार्क के मेयर जोहरान मामदानी की ओर से भारत में तिहाड़ जेल में बंद उमर खालिद को भेजे गए एक पत्र ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया विवाद खड़ा कर दिया है। हम आपको बता दें कि यह पत्र उमर खालिद के माता पिता से मुलाकात के दौरान दिया गया और इसमें मामदानी ने खालिद के विचारों की तारीफ करते हुए लिखा कि वे उनके बारे में सोच रहे हैं। उल्लेखनीय है कि उमर खालिद पर वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े गंभीर आरोपों की सुनवाई चल रही है।

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हम आपको बता दें कि मामदानी के पत्र को सिर्फ एक व्यक्तिगत संदेश नहीं माना जा रहा है बल्कि इसे एक राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। भारत और अमेरिका के संबंधों के संदर्भ में भी इस कदम को असहज माना गया है। भारत में यह तर्क उभरा है कि यदि हर देश का स्थानीय नेता दूसरे देश के न्यायिक मामलों पर टिप्पणी करने लगे तो संप्रभुता और संस्थागत सम्मान पर आंच आएगी।

देखा जाये तो जोहरान मामदानी का यह कदम साफ तौर पर भारत के आंतरिक मामलों में दखल है। सवाल सीधा है। सवाल उठता है कि न्यूयार्क के मेयर को यह अधिकार किसने दिया कि वह भारत के दंगों से जुड़े एक आरोपी की तारीफ करे और उसे नैतिक समर्थन दे। मामदानी को समझना होगा कि भारत की न्याय व्यवस्था सक्षम है, संवैधानिक है और अपने फैसले खुद लेने में समर्थ है।

उमर खालिद कोई साधारण सामाजिक कार्यकर्ता नहीं है, बल्कि उस पर दिल्ली दंगों की साजिश में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं। ऐसे व्यक्ति को वैश्विक मंच से नैतिक समर्थन देना न केवल भारत के लिए गलत है, बल्कि यह एक खतरनाक परंपरा को जन्म देता है। इससे यह संदेश जाता है कि दंगों और हिंसा से जुड़े आरोपों को वैचारिक खोल पहनाकर महिमामंडित किया जा सकता है। यह संदेश उन तत्वों के लिए संजीवनी का काम करता है जो अराजकता और टकराव की राजनीति में विश्वास रखते हैं।

मामदानी को यह समझना चाहिए था कि भारत का आंतरिक कानून और व्यवस्था किसी विदेशी राजनेता की राय का मोहताज नहीं। यदि उन्हें मानवाधिकार की इतनी ही चिंता है, तो उन्हें अपने देश में चल रही हिंसा, नस्लीय तनाव और अपराध की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। भारत में न्याय की प्रक्रिया अदालतों के माध्यम से चलती है, न कि सोशल संदेशों और पत्रों के जरिये।

इस तरह का समर्थन सिर्फ भारत में ही नहीं, अमेरिका में भी गलत असर डाल सकता है। जब वहां के नेता दंगों के आरोपी की तारीफ करते हैं, तो यह वहां मौजूद कट्टर और हिंसक विचारधारा के लोगों का हौसला बढ़ाता है। वे इसे यह कहकर पेश कर सकते हैं कि उनके विचारों को वैश्विक मान्यता मिल रही है। यह लोकतंत्र के लिए घातक संकेत है। लोकतंत्र का अर्थ कानून का शासन है, न कि आरोपियों का महिमामंडन।

यह भी याद रखना जरूरी है कि भारत और अमेरिका दोनों ही लोकतांत्रिक देश हैं। लोकतंत्र की बुनियाद एक दूसरे की संस्थाओं के सम्मान पर टिकी होती है। जब कोई विदेशी नेता भारत की न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है या एक पक्ष को नैतिक ऊंचाई पर बैठाने की कोशिश करता है, तो यह आपसी विश्वास को चोट पहुंचाता है। यह न तो कूटनीतिक मर्यादा के अनुरूप है और न ही जिम्मेदार राजनीति का उदाहरण।

मामदानी का पत्र उन तमाम भारतीय नागरिकों की भावनाओं का भी अपमान है जिन्होंने दिल्ली दंगों में अपने परिजन खोए, जिनकी दुकाने जलीं और जिनका जीवन तबाह हुआ। उनके लिए दंगे कोई वैचारिक बहस नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। ऐसे में दंगों के मास्टरमाइंड की तारीफ करना घावों पर नमक छिड़कने जैसा है।

भारत को किसी से प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं कि वह लोकतांत्रिक है या न्यायप्रिय। यहां की अदालतें स्वतंत्र हैं और फैसले सबूतों के आधार पर होते हैं। यदि उमर खालिद निर्दोष है, तो वह अदालत से बरी होगा। यदि दोषी है, तो सजा पाएगा। इसमें किसी विदेशी मेयर के भावनात्मक पत्र की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। 

बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि जोहरान मामदानी का यह कदम गैर जिम्मेदार, दखल देने वाला और भड़काऊ है। भारत के आंतरिक मामलों में इस तरह की बयानबाजी बंद होनी चाहिए। लोकतंत्र का सम्मान तभी संभव है, जब हर देश अपनी सीमाएं पहचाने और दूसरों की न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप से बचे। यही संतुलन वैश्विक शांति और आपसी सम्मान की असली कसौटी है।

-नीरज कुमार दुबे

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