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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[उपचुनावों का जनादेश: क्या बदल रहा है मतदाता का मिजाज?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-mandate-of-the-by-elections-is-the-voter-mood-shifting]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लोकतांत्रिक राजनीति में कई बार छोटे चुनाव भी बड़े संदेश दे जाते हैं। विधानसभा उपचुनावों को लंबे समय तक केवल रिक्त सीटों को भरने की औपचारिक प्रक्रिया माना जाता रहा है। सामान्य धारणा यही रही कि जिस राज्य में जिस दल की सरकार होती है, प्रशासनिक बढ़त, संगठनात्मक शक्ति और सत्ता के प्रभाव के कारण वही दल उपचुनाव आसानी से जीत जाता है। इसी कारण उपचुनावों के परिणामों को व्यापक राजनीतिक संकेतक के रूप में कम ही देखा जाता था किंतु पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा तेजी से बदली है। अब उपचुनाव केवल एक सीट का फैसला नहीं करते बल्कि जनता के तत्कालीन मनोभाव, सरकार के प्रति संतोष-असंतोष, संगठन की मजबूती, नेतृत्व की स्वीकार्यता और भविष्य की राजनीतिक दिशा के संकेत भी देते हैं। बिहार के बांकीपुर, मध्य प्रदेश के दतिया और गुजरात के मांझलपुर विधानसभा उपचुनावों ने भी यही संदेश दिया है। तीन सीटों में से दो पर भाजपा की हार और केवल एक पर जीत ने राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या ये केवल स्थानीय परिस्थितियों का परिणाम हैं अथवा भाजपा के सामने उभर रही नई राजनीतिक चुनौतियों का प्रारंभिक संकेत? उपचुनाव सत्ता परिवर्तन का जनादेश नहीं होते किंतु वे जनता के बदलते मानस की पहली आहट अवश्य होते हैं और यही कारण है कि इन परिणामों को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।</div><div><br></div><div>सबसे अधिक चर्चा बिहार की बांकीपुर सीट की रही। यह सीट केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं थी बल्कि भाजपा की राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थी। लगभग तीन दशक से यह भाजपा का अभेद्य दुर्ग रहा। पहले भाजपाध्यक्ष नितिन नवीन के पिता और बाद में स्वयं नितिन नवीन लगातार यहां विजय प्राप्त करते रहे। नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट रिक्त हुई और भाजपा को अटूट विश्वास था कि उसका यह गढ़ सुरक्षित रहेगा किंतु जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने न केवल भाजपा का यह किला ध्वस्त कर दिया बल्कि बिहार की राजनीति में नए विकल्प की संभावनाओं को भी मजबूत कर दिया। यह परिणाम केवल भाजपा की हार नहीं बल्कि उसकी रणनीतिक चूक का भी परिणाम माना जा रहा है। उम्मीदवार चयन में अंतिम समय तक बना भ्रम, स्थानीय कार्यकर्ताओं की असंतुष्टि और अत्यधिक आत्मविश्वास ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। लंबे समय तक किसी सीट पर लगातार जीत कभी-कभी संगठन में आत्मसंतोष पैदा कर देती है। यही स्थिति बांकीपुर में दिखाई दी। भाजपा ने शायद मान लिया था कि उसका पारंपरिक वोट बैंक और संगठनात्मक नेटवर्क किसी भी परिस्थिति में जीत सुनिश्चित कर देगा जबकि मतदाता पहले की तुलना में अधिक सजग और स्वतंत्र निर्णय लेने वाला बन चुका है। बांकीपुर का परिणाम प्रशांत किशोर के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। चुनावी रणनीतिकार के रूप में अनेक दलों को सफलता दिलाने वाले प्रशांत किशोर पहली बार स्वयं चुनावी परीक्षा में उतरे और सफल हुए। हालांकि विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी पूरी तरह विफल रही थी किंतु इस विजय ने सिद्ध कर दिया कि यदि कोई दल लगातार जनता के बीच बना रहे और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाए तो वह स्थापित राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दे सकता है। यह जीत बिहार में तीसरे राजनीतिक विकल्प की संभावनाओं को भी बल देती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/after-all-why-how-and-because-of-whom-did-the-bjp-lose-the-bankipur-by-election-bihar-asks" target="_blank">आखिर बांकीपुर उपचुनाव भाजपा क्यों, कैसे और किसके चलते हारी? पूछता है बिहार!</a></h3><div>दूसरी ओर मध्य प्रदेश की दतिया सीट भाजपा के लिए और अधिक चिंता का विषय है। भाजपा की यह हार केवल विपक्ष की सफलता नहीं बल्कि भाजपा संगठन के भीतर असंतोष की अभिव्यक्ति भी मानी जा रही है। पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने के बाद उनके समर्थकों की नाराजगी चुनाव अभियान के दौरान लगातार चर्चा में रही। चुनावी राजनीति में उम्मीदवार केवल पार्टी का प्रतिनिधि नहीं होता बल्कि स्थानीय संगठन की भावनाओं का केंद्र भी होता है। जब कार्यकर्ता स्वयं उत्साहहीन हो जाएं या भीतरघात की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो मजबूत संगठन भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाता। दतिया का परिणाम इसी सत्य की पुष्टि करता है। मध्य प्रदेश भाजपा लंबे समय तक शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में अत्यंत मजबूत संगठनात्मक ढांचे के लिए जानी जाती रही। संगठन, सरकार और जनता के बीच संवाद की जो परंपरा विकसित हुई थी, नेतृत्व परिवर्तन के बाद उसे उसी प्रभावशीलता से बनाए रखना नई सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है। उपचुनावों ने संकेत दिया है कि केवल सत्ता में होना पर्याप्त नहीं, संगठन की एकजुटता और स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता भी उतनी ही आवश्यक है।</div><div>&nbsp;</div><div>गुजरात के मांझलपुर में भाजपा ने जीत दर्ज कर अपनी संगठनात्मक क्षमता का प्रदर्शन अवश्य किया किंतु मतों के अंतर में आया परिवर्तन संकेत देता है कि वहां भी विपक्ष धीरे-धीरे अपनी जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। यद्यपि गुजरात में भाजपा की स्थिति अभी भी सुदृढ़ है, फिर भी चुनावी आंकड़े बताते हैं कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मसंतोष उचित नहीं हो सकता। इन उपचुनावों की चर्चा का एक महत्वपूर्ण पक्ष ‘जेन-जी आंदोलन’ भी रहा। चुनाव 30 जुलाई को ऐसे समय हुए, जब प्रतियोगी परीक्षा, पेपर लीक, रोजगार, अवसरों की कमी, प्रशासनिक जवाबदेही इत्यादि युवाओं से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में थे। निश्चित रूप से यह कहना कठिन होगा कि केवल इसी आंदोलन ने चुनाव परिणामों को प्रभावित किया क्योंकि प्रत्येक उपचुनाव में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की लोकप्रियता और संगठनात्मक स्थिति कहीं अधिक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि युवाओं के बीच बढ़ती असंतुष्टि का व्यापक राजनीतिक वातावरण पर प्रभाव पड़ता है। यदि युवा मतदाता किसी सरकार के प्रति निराशा महसूस करता है तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव चुनावी व्यवहार पर भी दिखाई दे सकता है। आज का मतदाता (विशेषकर युवा वर्ग) केवल जातीय या पारंपरिक राजनीतिक पहचान के आधार पर मतदान नहीं कर रहा, रोजगार, शिक्षा, भ्रष्टाचार, पारदर्शिता, सुशासन, अवसरों की समानता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व जैसे मुद्दे उसकी प्राथमिकता बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल संचार ने भी मतदाता को पहले से अधिक जागरूक बनाया है। अब सरकारों के लिए केवल विकास के दावे पर्याप्त नहीं, उनके ठोस परिणाम भी दिखाई देने चाहिए।</div><div><br></div><div>भाजपा के लिए इन परिणामों से सबसे बड़ा सबक उम्मीदवार चयन को लेकर है। पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में देखा गया है कि टिकट वितरण को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष उत्पन्न हुआ है। संगठन की राय, कार्यकर्ताओं की भावनाओं और स्थानीय लोकप्रियता की उपेक्षा कभी-कभी चुनावी नुकसान का कारण बन जाती है। यदि पार्टी समय रहते इस पहलू पर गंभीरता से विचार नहीं करती तो भविष्य के बड़े चुनावों में भी ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। भाजपा को यह भी समझना होगा कि कोई भी राजनीतिक गढ़ स्थायी नहीं होता। लोकतंत्र में जनता समय-समय पर अपने निर्णय बदलती है और वही दल लंबे समय तक सफल रहता है, जो निरंतर आत्म-मूल्यांकन करता रहे। उपचुनावों ने भाजपा को यही संदेश दिया है कि संगठन की मजबूती, नेतृत्व की विश्वसनीयता और जनता के साथ सतत संवाद बनाए रखना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। हालांकि इन परिणामों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि राष्ट्रीय राजनीति का समीकरण पूरी तरह बदल रहा है। तीन विधानसभा सीटों के परिणाम किसी सरकार की लोकप्रियता का अंतिम पैमाना नहीं हो सकते, फिर भी लोकतंत्र में छोटे संकेतों की उपेक्षा करना भी राजनीतिक दृष्टि से उचित नहीं माना जाता क्योंकि यही छोटे संकेत आगे चलकर बड़े राजनीतिक परिवर्तनों की भूमिका तैयार करते हैं।</div><div><br></div><div>विपक्ष के लिए ये परिणाम आशा का संदेश हैं किंतु यह आशा तभी सार्थक होगी, जब वह केवल सत्ता विरोधी वातावरण पर निर्भर रहने के बजाय विश्वसनीय नेतृत्व, स्पष्ट वैकल्पिक नीति और मजबूत संगठन प्रस्तुत कर सके। वहीं जन सुराज जैसे नए राजनीतिक दलों के लिए यह अवसर भी है और परीक्षा भी। एक सीट की सफलता को व्यापक जनविश्वास में बदलना कहीं अधिक कठिन कार्य होगा। इन उपचुनावों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि मतदाता पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक, अधिक अपेक्षाकारी और अधिक स्वतंत्र निर्णय लेने वाला हो चुका है। अब चुनाव केवल संगठनात्मक शक्ति या पुराने राजनीतिक समीकरणों से नहीं जीते जा सकते। जनता नेतृत्व की विश्वसनीयता, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय मुद्दों के समाधान और भविष्य की स्पष्ट दृष्टि को भी उतना ही महत्व देती है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति अंततः जनता ही होती है और जनता समय-समय पर छोटे चुनावों के माध्यम से भी बड़े संदेश देना कभी नहीं भूलती।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 17:57:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-mandate-of-the-by-elections-is-the-voter-mood-shifting</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA['अगर ऐसा है तो मैं खुद को सांप्रदायिक कहने से नहीं हिचकूंगी', संसद में ऐसा कह कर सुषमाजी ने सबको हैरान कर दिया था]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sushma-swaraj-death-anniversary-political-journey-legacy-article-370-last-tweet]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज जब पूरा देश पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है, तब हर भारतीय के मन में उनकी मुस्कुराती छवि, ओजस्वी आवाज़ और मानवीय संवेदनाओं से भरा व्यक्तित्व एक बार फिर जीवंत हो उठता है। देखा जाये तो भारतीय राजनीति में ऐसे नेता विरले ही हुए हैं, जिनकी लोकप्रियता केवल अपनी पार्टी तक सीमित न रहकर राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर गई हो। सुषमा स्वराज उन्हीं असाधारण नेताओं में थीं। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, संसद हो या अंतरराष्ट्रीय मंच, उनके शब्दों में दृढ़ता थी, विचारों में स्पष्टता थी और व्यवहार में ऐसी आत्मीयता थी, जिसने उन्हें हर दल के नेताओं और करोड़ों भारतीयों का सम्मान दिलाया। छह अगस्त 2019 को 67 वर्ष की आयु में उनके निधन ने भारतीय राजनीति को एक ऐसी आवाज़ से वंचित कर दिया, जिसकी कमी आज भी महसूस की जाती है।</div><div><br></div><div>सुषमा स्वराज का अंतिम सार्वजनिक संदेश भी उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी वैचारिक प्रतिबद्धताओं में से एक का प्रतीक बन गया। छह अगस्त 2019 की शाम 7:23 बजे उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए ट्वीट लिखा था, "धन्यवाद प्रधानमंत्री जी। मैं अपने जीवनकाल में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।" यह संदेश जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के ऐतिहासिक निर्णय पर उनकी प्रतिक्रिया थी। भारतीय जनता पार्टी वर्षों से जिस संकल्प को लेकर आगे बढ़ रही थी, उसे पूरा होते देखना उनके जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक इच्छाओं में शामिल था। विडंबना देखिए कि इस ऐतिहासिक क्षण पर खुशी व्यक्त करने के कुछ ही घंटों बाद उन्हें हृदयाघात हुआ और उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। यह संयोग उनके जीवन को एक भावनात्मक पूर्णविराम देता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/after-all-why-how-and-because-of-whom-did-the-bjp-lose-the-bankipur-by-election-bihar-asks" target="_blank">आखिर बांकीपुर उपचुनाव भाजपा क्यों, कैसे और किसके चलते हारी? पूछता है बिहार!</a></h3><div>हरियाणा के एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी सुषमा स्वराज ने ऐसे दौर में राजनीति में अपनी पहचान बनाई, जब यह क्षेत्र लगभग पूरी तरह पुरुषों के वर्चस्व वाला माना जाता था। हरियाणा में मात्र 25 वर्ष की आयु में वह भारत की सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बनीं और 27 वर्ष की उम्र में राज्य में जनता पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व संभाला। बाद के वर्षों में वह लोकसभा सांसद, राज्यसभा सांसद और दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, लोकसभा में विपक्ष की दूसरी महिला नेता रहीं और भारत की पहली पूर्णकालिक महिला विदेश मंत्री बनने का गौरव भी हासिल किया। उनका राजनीतिक सफर केवल पदों की सूची नहीं था, बल्कि उन तमाम सामाजिक और राजनीतिक बाधाओं को तोड़ने की कहानी था, जिन्हें लंबे समय तक महिलाओं के सामने अजेय माना जाता रहा।</div><div><br></div><div>सुषमा स्वराज की सबसे बड़ी पहचान उनकी अद्भुत वक्तृत्व कला थी। संसद में उनके भाषण केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं होते थे, बल्कि उनमें इतिहास, संस्कृति, तर्क और संवेदना का अनूठा संगम दिखाई देता था। वर्ष 1996 में लोकसभा में दिया गया उनका "धर्मनिरपेक्षता" पर भाषण आज भी भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे चर्चित भाषणों में गिना जाता है। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से कहा था कि यदि वंदे मातरम् का सम्मान करना, राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा की रक्षा करना, अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की मांग करना और समान नागरिक संहिता की वकालत करना सांप्रदायिकता है, तो वे स्वयं को सांप्रदायिक कहने से नहीं हिचकेंगी। लेकिन इसी भाषण में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता की अपनी परिभाषा भी दी कि एक अच्छा हिंदू, अच्छा मुसलमान, अच्छा सिख और अच्छा ईसाई वही है, जो अपने धर्म का पालन करते हुए दूसरे धर्मों का भी समान सम्मान करे। उनके इस दृष्टिकोण ने वैचारिक बहस को नई दिशा दी और विरोधी दलों के कई नेताओं ने भी उनकी तार्किक क्षमता की सराहना की।</div><div><br></div><div>भारतीय संस्कृति की उनकी व्याख्या भी उतनी ही प्रभावशाली थी। जब संसद में भारतीयता की अवधारणा पर प्रश्न उठे, तब उन्होंने भांगड़ा से भरतनाट्यम तक, राजमा-चावल से इडली-दोसा तक और अमरनाथ से रामेश्वरम तक की सांस्कृतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि विविधताओं के बीच यही एकता भारत की असली पहचान है। उन्होंने कहा कि यही वह संस्कृति है, जिसमें कश्मीर का श्रद्धालु अमरनाथ का जल लेकर रामेश्वरम में भगवान शिव का अभिषेक करता है। उनके इन शब्दों ने भारतीय सांस्कृतिक एकता की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की, जिसे आज भी याद किया जाता है।</div><div><br></div><div>हालांकि सुषमा स्वराज की सबसे अलग पहचान विदेश मंत्री के रूप में बनी। वर्ष 2014 में जब उन्होंने विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली, तब कई लोगों को लगा कि विदेश नीति का पूरा केंद्र प्रधानमंत्री कार्यालय ही रहेगा। लेकिन उन्होंने अपने काम और संवेदनशीलता से यह धारणा बदल दी। उन्होंने विदेश मंत्रालय को आम भारतीय के जीवन से जोड़ दिया। सोशल मीडिया मंच ट्विटर को उन्होंने केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संकट में फंसे भारतीयों के लिए जीवनरेखा बना दिया। दुनिया के किसी भी कोने में कोई भारतीय मुश्किल में होता, तो लोग सीधे उन्हें टैग करते और कुछ ही समय में उनकी ओर से प्रतिक्रिया आ जाती। चाहे जर्मनी के शरणार्थी शिविर में फंसी गुरप्रीत कौर हों, पाकिस्तान में जबरन विवाह का शिकार बनी उज्मा हों, मूक-बधिर गीता की स्वदेश वापसी हो या पाकिस्तान में फंसे हमीद अंसारी का मामला, हर जगह सुषमा स्वराज ने मानवीय संवेदनाओं के साथ हस्तक्षेप किया।</div><div><br></div><div>उनकी कार्यशैली इतनी सक्रिय थी कि उन्होंने स्वयं कहा था, "मैं न सोती हूँ और न ही भारतीय दूतावासों के अधिकारियों को सोने देती हूँ।" उनके एक संदेश पर दुनिया के किसी भी देश में भारतीय दूतावास तत्काल सक्रिय हो जाता था। यही कारण था कि भारतीय राजनयिक अपने मोबाइल फोन हर समय चालू रखते थे। विदेश मंत्रालय को उन्होंने पहली बार ऐसा मानवीय चेहरा दिया, जहां फाइलों से पहले इंसान की पीड़ा को महत्व मिला। उनकी हाजिरजवाबी भी लोगों को बेहद पसंद थी। एक बार किसी व्यक्ति ने ट्विटर पर खराब रेफ्रिजरेटर की शिकायत कर दी, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "भाई, मैं रेफ्रिजरेटर के मामले में आपकी मदद नहीं कर सकती। मैं इस समय संकट में फंसे इंसानों की मदद में बहुत व्यस्त हूँ।"</div><div><br></div><div>विदेश नीति के स्तर पर भी उनके कार्यकाल में भारत ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं। कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भारत की कानूनी सफलता, डोकलाम विवाद के दौरान संतुलित कूटनीति, मालदीव संकट और नेपाल से जुड़े चुनौतीपूर्ण हालात का प्रबंधन, इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) की बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व तथा पाकिस्तान के विरोध के बावजूद वहां भारत की प्रभावशाली उपस्थिति, ये सभी उपलब्धियां उनके नेतृत्व की गवाही देती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख विदेश यात्राओं की पृष्ठभूमि तैयार करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन से लेकर चीन और किर्गिस्तान तक, उन्होंने परदे के पीछे रहकर भारतीय कूटनीति को मजबूती प्रदान की।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो सुषमा स्वराज को केवल एक सफल राजनेता या कुशल प्रशासक के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। वह ऐसी जननेता थीं, जिन्होंने राजनीति को मानवीय संवेदना से जोड़ा। उनकी वाणी में ओज था, विचारों में स्पष्टता थी, निर्णयों में राष्ट्रहित सर्वोपरि था और व्यवहार में ऐसी आत्मीयता थी कि राजनीतिक विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। शायद यही कारण था कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी उन्हें भारत की सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार किया। आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें केवल एक पूर्व विदेश मंत्री के रूप में नहीं, बल्कि उस जननेता के रूप में याद कर रहा है, जिसने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया और करोड़ों भारतीयों के दिलों में हमेशा के लिए अपनी जगह बना ली।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 13:43:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sushma-swaraj-death-anniversary-political-journey-legacy-article-370-last-tweet</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[आखिर बांकीपुर उपचुनाव भाजपा क्यों, कैसे और किसके चलते हारी? पूछता है बिहार!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/after-all-why-how-and-because-of-whom-did-the-bjp-lose-the-bankipur-by-election-bihar-asks]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बांकीपुर उपचुनाव 2026 में भाजपा की हार अब हर किसी को नहीं पच रही है। इसलिए लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि भाजपा क्यों हारी? कैसे पराजित हुई? और किसके चलते यह राजनीतिक दुर्दिन देखना पड़ा? बिहार वासी जानना चाहते हैं! क्योंकि 9 माह पहले ही तो उन्होंने जदयू नीत एनडीए गठबंधन को अभूतपूर्व बहुमत दिया था! अटकलें हैं कि क्या जदयू नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ हुई 'सियासी बदतमीजी' के बाद भाजपा अआखिर ब अकेले नहीं चल पाएगी, क्योंकि टीम नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी के हवा-हवाई रणनीतिकारों को असली राजनीतिक जमीन पर तगड़ी पटकनी दिला डाली है!&nbsp;</div><div><br></div><div>जानकारों की मानें तो चाहे चिराग पासवान हों, जीतनराम मांझी हों या उपेंद्र कुशवाहा हों, या मुंह फुलाए सवर्ण भाजपाई, सबकी खामोशी या राजनीतिक बकवास दोनों भाजपा पर भारी पड़ गई। वह हो गया, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी! इसलिए ज्वलंत प्रश्न उठता है कि क्या "भाजपा केवल अपने सहयोगियों और सहयोगी दलों दोनों के भितरघात की वजह से हारी" है? क्योंकि ऐसे मतदान केंद्र जहां सहयोगी दल परंपरागत रूप से मजबूत रहे हैं, फिर भी वहां भाजपा को असामान्य रूप से कम वोट मिले हैं। खुद पार्टी और गठबंधन के नेताओं द्वारा दबी जुबान में ये बातें कहीं जा रही हैं, ताकि उनका महत्व बढ़े।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-implications-of-prashant-kishor-victory-in-the-bankipur-by-election-are-startling" target="_blank">बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर की जीत के सियासी मायने चौंकाने वाले</a></h3><div>लिहाजा, सुलगते सवाल उठने लगे कि आखिर बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री (CM) बनने के बाद हुए पहले ही बांकीपुर उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार को जिस प्रकार की तगड़ी शिकस्त का सामना करना पड़ा, वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंतरिक युगलबंदी के खिलाफ किसी अंदरूनी राजनीतिक साजिश का द्योतक तो नहीं है!&nbsp;</div><div><br></div><div>चर्चा तो यहां तक हो रही है कि आनन-फानन में जिस तरह से पार्टी उम्मीदवार बदला गया, उस साजिश के पीछे केंद्रीय मंत्री अमित शाह की टीम में उपजे अंतर्विरोधों और आरएसएस से जुड़े दिग्गजों की परोक्ष भूमिका तो कहीं नहीं है, जो कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अव्यवहारिक पैराशूट नियुक्ति के बाद से ही अंदर ही अंदर खफा चल रहे थे और मौका मिलते ही उन्हें, उनकी ही जमीन पर असली जातीय और पार्टीगत दोनों राजनीतिक औकात दिखा दी!&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसा इसलिए कि जो पार्टी दुर्लभ से दुर्लभतम चुनाव जीत जाती है, वह आखिर अपने ही राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा छोड़ी हुई इकलौती सीट, जिस पर गत 30 वर्षों से 'पिता-पुत्र' का कब्जा रहा हो, वह अचानक हार जाए। खुद पटना के पीढ़ी दर पीढ़ी वाले भाजपा समर्थक संभ्रांत लोग भी अचंभित रह गए हैं कि ये क्या हो गया? क्या 'लालू की नीति' दबे पांव वेश बदलकर उनके पुत्र तेज प्रताप यादव के शह पर पटना में आ गई? क्या सहयोगी दलों के कार्यकर्ताओं को अपेक्षित स्तर पर सक्रिय नहीं किया गया? क्या स्थानीय स्तर पर असंतोष या गुटबाजी को शांत नहीं किया गया? क्या उम्मीदवार चयन को लेकर नाराज़गी नहीं भांपी जा सकी? क्या विपक्ष के प्रभावी ध्रुवीकरण का अंदाजा भाजपा रणनीतिकार नहीं लगा पाए? क्या स्थानीय मुद्दे और सत्ता-विरोधी भावना प्रबल रही और मतदान प्रबंधन यानी बूथ मैनेजमेंट में कमी बरती गई?</div><div><br></div><div>उनका सीधा सवाल यह भी है कि आखिर पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद, जदयू सांसद और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ सी पी ठाकुर (सांसद विवेक ठाकुर के पिता), राज्य सरकार के मंत्री रामकृपाल यादव और अशोक चौधरी के मोहल्लों से जुड़े मतदान केंद्रों पर भी भाजपा प्रत्याशी कैसे पिछड़े और प्रशांत किशोर वहां भी बढ़त बनाए रहे। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के बूथ की भी यही स्थिति रही। आखिर यह सब सियासी प्रपंच कैसे और क्यों संभव हुआ? क्या मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बदलने के लिए इतना बड़ा आत्मघाती षड्यंत्र सवर्णों के नेताओं ने अपने ही खिलाफ रच दिया? क्या किसी ने इस हेतु नई दिल्ली और नागपुर से इशारा भी किया था? बात पचने वाली तो बिल्कुल भी नहीं है।</div><div><br></div><div>सवाल है कि क्या आरएसएस और भाजपा के जमीनी तालमेल की कमी ही भाजपा के खराब प्रदर्शन का मुख्य कारण है। क्या भाजपा और उसके वैचारिक-संगठनात्मक नेटवर्क के बीच स्थानीय स्तर पर समन्वय में कमी रही? क्या उम्मीदवार चयन या स्थानीय असंतोष का प्रभाव पड़ा?</div><div>क्या विपक्ष ने नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाए? क्या कम मतदान का असर भाजपा के पारंपरिक मतदाता आधार पर पड़ा?</div><div><br></div><div>सवाल यह भी है कि क्या जदयू के पूर्वमुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने द्वारा ही बनवाए हुए भाजपाई मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से सियासी बदला ले लिया गया है? या फिर पूर्वमुख्यमंत्री व कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा, और पूर्व कानून मंत्री व सांसद रविशंकर प्रसाद के अलावा ऋतुराज सिन्हा और संजय मयूख जैसे दिग्गज कायस्थ नेताओं ने निजी कारणों से भितरघात किया/कराया है? क्या लोजपा रामविलास के नेता व केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का भी भाजपा को दिली सहयोग नहीं मिला? क्या उपेंद्र कुशवाहा की चुप्पी और जीतनराम मांझी और नागमणि जैसों के विषैले बोलों की कीमत भाजपा ने चुकाई है।</div><div><br></div><div>वहीं, राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यूजीसी बिल विवाद, ओबीसी/दलितों को ज्यादा कानूनी तरजीह दिए जाने, हिंदुत्व को गफलत में रखने और राम मंदिर चंदा चोरी प्रकरण के अलावा भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण आदि ने सवर्णों के बीच भाजपा की राजनीतिक साख को गहरी चोट पहुंचाई है। आलम यह बताया गया है कि ओबीसी/दलित वोट बैंक भाजपा के साथ पूरी तरह से नहीं जुटा पाया है,जबकि सवर्णों का सजग तबका अपने बच्चों के भविष्य के खातिर भाजपा से दूर चला जा रहा है, या विकल्प ढूंढ रहा है। क्या जन सुराज पार्टी में वह विकल्प दिखाई दे चुकी है? क्या सवर्णों ने बीजेपी को धोखा दिया या ओबीसी और दलितों ने या फिर तीनों वर्गों के समृद्ध तबके ने?</div><div><br></div><div>देखा जाए तो बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने शोषित, दलित, पिछड़ों, अल्पसंख्यक समाज की राजनीति को धार देने की कोशिश तो की थी, पर कामयाबी नहीं मिली। लिहाजा, इस चुनाव में उन्होंने न केवल मुद्दे बदलते, बल्कि मोदी-शाह-सम्राट पर सीधे निशाना साधकर ही सफलता के इस मुकाम तक पहुंचे हैं। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक, बिहार में भाजपा के लिए जन सुराज पार्टी अब एक वास्तविक चुनावी चुनौती बन चुकी है, जिसको राष्ट्रीय विस्तार पाते देर नहीं लगेगी। क्योंकि राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थिति यही चुगली कर रही है।</div><div><br></div><div>बांकीपुर उपचुनाव को प्रशांत किशोर ने व्यक्तिगत अभियान में बदल दिया था। उनकी पार्टी जन सुराज ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया और प्रशांत किशोर ने स्वयं मैदान में उतरकर इसे हाई-प्रोफाइल मुकाबला बना दिया। इससे&nbsp;</div><div>विपक्षी वोटों का ध्रुवीकरण हुआ और भाजपा विरोधी मत नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के राजद प्रत्याशी की ओर न जाकर अपेक्षाकृत अधिक एक दिशा में गए जिससे जनसुराज को विजयश्री मिली और भाजपा को नुकसान&nbsp; हुआ।&nbsp;</div><div><br></div><div>जहां तक एंटी-इनकंबेंसी की बात है तो बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का गढ़ था, जहां लगातार एक ही दल के प्रतिनिधित्व से कुछ मतदाताओं में बदलाव की इच्छा पैदा हो गई प्रतीत होती है। इस चुनाव में स्थानीय मुद्दे भी हावी रहे। विपक्ष ने पूर्व घोषित उम्मीदवार के अकस्मात बदलाव, बूथ प्रबंधन, स्थानीय संगठन और मतदान प्रतिशत जैसे कारक को भी उछाला, जो निर्णायक भूमिका निभाए। जबकि शहरी मतदाता का बदलता रुझान भाजपा पर भारी पड़ गया। शिक्षित और युवा मतदाताओं ने परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया, क्योंकि यूजीसी बिल का सर्वाधिक प्रभाव उन्हीं पर पड़ता। इसलिए इन बातों का प्रभाव परिणाम पर पड़ा है।</div><div><br></div><div>पहले सीजेपी द्वारा केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे स्वीकार करवाना और अब जेएसपी के प्रशांत किशोर द्वारा भाजपा का मजबूत गढ़ तोड़ दिया जाना बहुत कुछ संकेत दे रहा है, जो यह साबित करता है कि उनकी पार्टी केवल वैचारिक मंच नहीं, बल्कि चुनाव जीतने की क्षमता भी रखती है। वहीं, अब बिहार और देश की राजनीति में त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना बढ़ चुकी है, क्योंकि जन सुराज पार्टी अब एक स्थायी ताकत बन चुकी है। भविष्य के चुनावों में मुकाबला केवल एनडीए बनाम महागठबंधन तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि तीसरा गुट भी बनेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>यही नहीं, भाजपा को अब अपने पारंपरिक शहरी और सवर्ण वोट बैंक की समीक्षा भी करनी पड़ेगी, क्योंकि उसके शहरी गढ़ में ही सेंध लगी है। लिहाजा पार्टी यह जानने का प्रयास अवश्य करेगी कि क्या पराजय का कारण&nbsp; उम्मीदवार बदलने से उपजा अंदरूनी रोष, संगठन की अंदरूनी खींचातानी, स्थानीय मुद्दे या मतदाताओं की प्राथमिकताओं में बदलाव तो नहीं था। क्या बिहार में संगठन बनाम चेहरे की बहस तेज होगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>यहां पर यह चर्चा भी होगी कि क्या मजबूत संगठन हमेशा निर्णायक है, या प्रभावशाली स्थानीय नेतृत्व और अभियान भी स्थापित दलों को चुनौती दे सकते हैं? क्या भाजपा 2030 के विधानसभा चुनाव की रणनीतियाँ बदल सकती है? क्या सभी प्रमुख दल उम्मीदवार चयन, सामाजिक समीकरण, शहरी मतदाताओं और युवा वोटरों को लेकर अपनी अपनी रणनीति की समीक्षा करेंगे? इसलिए, बांकीपुर का परिणाम केवल एक सीट का परिणाम नहीं माना जाएगा; बल्कि इसे बिहार की बदलती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संकेत के रूप में भी देखा जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>भाजपा की हार के पीछे निम्नलिखित संभावित कारण हो सकते हैं, जैसे: एक, परंपरागत भाजपा मतदाताओं के एक हिस्से का जन सुराज की ओर जाना। दो, शहरी, युवा और बदलाव चाहने वाले मतदाताओं का रुझान बदलना। तीन, कम मतदान प्रतिशत का भाजपा के संगठनात्मक लाभ को कम कर देना। और चार, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और चुनावी रणनीति का प्रभाव। चूंकि एग्जिट पोल और कुछ चुनाव-पूर्व विश्लेषणों में यह दावा किया गया था कि सवर्ण मतों का एक हिस्सा प्रशांत किशोर की ओर जाने के संकेत हैं, वह बात अब सच प्रतीत होती है।</div><div><br></div><div>बताया जाता है राष्ट्रीय अध्यक्ष की सोच व समझ पर भी इस चुनाव का असर पड़ेगा, क्योंकि बांकीपुर जैसी लंबे समय से भाजपा की सीट के उनके हाथ से निकलते ही संगठन की चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और स्थानीय नेतृत्व पर सवाल उठ चुके हैं। लेकिन केवल एक उपचुनाव की हार से राष्ट्रीय अध्यक्ष की स्थिति पर बड़ा असर पड़ना तय नहीं माना जाता। पार्टी आमतौर पर कई चुनावों के समग्र प्रदर्शन के आधार पर ही संगठनात्मक निर्णय लेती है।</div><div><br></div><div>जहाँ तक मुख्यमंत्री पर असर की बात है तो, चूँकि यह चुनाव राज्य सरकार के कार्यकाल के दौरान हुआ है, इसलिए विपक्ष इसे सरकार के कामकाज पर जनमत के रूप में पेश कर सकता है। चूंकि हार का अंतर बड़ा है और भाजपा के पारंपरिक क्षेत्रों में भी गिरावट दिखी है, इसलिए सरकार की रणनीति, संगठन और सामाजिक समीकरणों की समीक्षा हो सकती है।</div><div><br></div><div>वहीं आगामी बिहार विधानसभा चुनाव पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि यह परिणाम व्यापक जनरुझान का संकेत प्रतीत होता है, जो भाजपा और एनडीए को उम्मीदवार चयन, सामाजिक गठबंधन, स्थानीय मुद्दों और चुनावी संदेश में बदलाव करने की जरूरत की चुगली कर रहा हैं। वहीं, यदि इसे केवल स्थानीय परिस्थितियों वाला परिणाम माना जाता है, तो इसका प्रभाव सीमित भी रह सकता है।</div><div><br></div><div>इसलिए बांकीपुर के परिणाम ने राजनीतिक संदेश अवश्य दिया है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष या मुख्यमंत्री की स्थिति पर उसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी नेतृत्व इस हार के कारणों का क्या आकलन करता है और आने वाले चुनावों में उसका प्रदर्शन कैसा रहता है। इतना तय है कि भाजपा की चुनावी हार आमतौर पर कई सामाजिक, राजनीतिक और संगठनात्मक कारणों के संयुक्त प्रभाव के चलते हुई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चूंकि भाजपा का पारंपरिक वोट अपेक्षा से कम निकला है, इसलिए संगठनात्मक समन्वय, बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर सवाल उठते हैं। भाजपा ने बूथ स्तर पर व्यापक संगठनात्मक तैयारी की थी और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को लगाया था। फिर भी इस चुनाव में कम मतदान, त्रिकोणीय मुकाबला, युवा मतदाताओं का रुझान, स्थानीय मुद्दे और विपक्ष की रणनीति जैसे कई अन्य कारकों के चलते उसे पराजय का सामना करना पड़ा।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 18:10:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/after-all-why-how-and-because-of-whom-did-the-bjp-lose-the-bankipur-by-election-bihar-asks</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ब्राह्मण वोट बैंक के लिए योगी और अखिलेश आमने-सामने, अखिलेश के 'PD मतलब पंडित' वाले बयान ने बिछाई नई सियासी बिसात]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/up-politics-yogi-vs-akhilesh-brahmin-politics-pda-formula]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले योगी बनाम अखिलेश की सियासत अब सीधे जातीय समीकरणों के अखाड़े में उतर चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां समाजवादी पार्टी के PDA की नई-नई राजनीतिक व्याख्याएं गढ़ते हुए कभी इसे "परिवार डेवलपमेंट अथॉरिटी" तो कभी "प्रोडक्शन हाउस ऑफ दंगाई एंड अपराधी" बताते हैं, वहीं अब अखिलेश यादव ने उसी PDA का नया अर्थ निकालकर भाजपा को उसी के अंदाज में जवाब दिया है। अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा कि "PDA में PD का मतलब पंडित है।" यानी जिस नारे को भाजपा लगातार निशाने पर ले रही थी, उसे सपा प्रमुख ने ब्राह्मण राजनीति के नए दरवाजे में बदलने की कोशिश कर दी।</div><div><br></div><div>दरअसल, समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र की जयंती पर लखनऊ में आयोजित प्रबुद्ध समाज सम्मेलन श्रद्धांजलि से ज्यादा राजनीतिक संदेश का मंच बन गया। अखिलेश यादव ने जनेश्वर मिश्र को समाजवादी आंदोलन का बड़ा चेहरा बताते हुए ब्राह्मण समाज को सम्मान देने का संदेश दिया और साफ संकेत दिया कि 2027 की लड़ाई में सपा सिर्फ पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ब्राह्मण मतदाताओं को भी अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/yogi-lashes-out-over--uproar-in-legislative-assembly-sp-has-no-faith-in-constitution" target="_blank">विधानसभा में बवाल पर भड़के योगी, बोले- सपा को संविधान पर भरोसा नहीं, राम मंदिर विवाद पर कही बड़ी बात</a></h3><div>अखिलेश ने योगी सरकार पर कई मोर्चों से हमला बोला। उन्होंने बिना नाम लिए विकास दुबे एनकाउंटर का जिक्र करते हुए कहा कि "जिस दिन गाड़ी पलटी थी, उस दिन गाड़ी नहीं, सरकार पलटने से बच गई थी।" इतना ही नहीं, उन्होंने दावा किया कि समय आने पर "सैटेलाइट इमेज" सामने आएगी, जिससे पूरी कहानी साफ हो जाएगी। राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गड़बड़ी के मुद्दे को उठाते हुए भी उन्होंने सरकार पर निशाना साधा और कहा कि हिंदू धर्म में दान की रसीद नहीं मांगी जाती, लेकिन अब रसीदों की राजनीति हो रही है। स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक कार्यशैली और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों को भी उन्होंने भाजपा सरकार के खिलाफ हथियार बनाया।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि ब्राह्मणों को लेकर अखिलेश का यह नया दांव इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह वर्ग लंबे समय तक सत्ता की धुरी रहा है। आजादी के बाद शुरुआती दशकों में ब्राह्मण मतदाता मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ रहे। मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में उनका बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया और राम मंदिर आंदोलन ने इस रिश्ते को और मजबूत किया। हालांकि 2007 में मायावती ने "ब्राह्मण-दलित सोशल इंजीनियरिंग" के सहारे पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर यह साबित कर दिया था कि ब्राह्मण वोट पूरी तरह किसी एक दल की स्थायी जागीर नहीं हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के उभार के बाद से ही यह वर्ग भाजपा के साथ रहा लेकिन तमाम कारणों के चलते ब्राह्मण भाजपा से नाराज बताये जा रहे हैं जिसके चलते अब एक बार फिर यही वर्ग सभी राजनीतिक दलों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।</div><div><br></div><div>यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी भी इस मुकाबले में पीछे नहीं है। मायावती पहले ही ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देने और उन्हें सम्मानजनक भागीदारी देने की रणनीति का ऐलान कर चुकी हैं। उनका दावा है कि ब्राह्मणों सहित सवर्ण समाज के हित सबसे सुरक्षित बसपा में हैं और 2007 जैसा समीकरण दोबारा बन सकता है। ऐसे में साफ है कि 2027 के चुनाव में ब्राह्मण वोटों के लिए भाजपा, सपा और बसपा के बीच त्रिकोणीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी।</div><div><br></div><div>उधर, उत्तर प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र भी इसी राजनीतिक तल्खी की भेंट चढ़ गया। विपक्ष के लगातार हंगामे के बीच सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। सत्र समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर लोकतंत्र और विकास विरोधी राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने अनुपूरक बजट, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के मानदेय बढ़ाने जैसे जनहित के मुद्दों पर चर्चा तक नहीं होने दी। योगी ने दावा किया कि उनकी सरकार ने शिक्षामित्रों और अनुदेशकों का मानदेय बढ़ाने के साथ पांच लाख रुपये तक की कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा भी उपलब्ध कराई है, लेकिन विपक्ष का मकसद केवल व्यवधान पैदा करना था।</div><div><br></div><div>बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब नारे भी हथियार हैं और उनकी परिभाषाएं भी। योगी हर मौके पर PDA की नई व्याख्या गढ़कर सपा पर हमला बोल रहे हैं, तो अखिलेश उसी PDA में "पंडित" जोड़कर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। मायावती भी ब्राह्मण कार्ड खेल चुकी हैं। ऐसे में यह साफ है कि अगले साल का विधानसभा चुनाव सिर्फ विकास और कानून-व्यवस्था पर नहीं, बल्कि नारों, जातीय समीकरणों और राजनीतिक प्रतीकों की जंग पर भी लड़ा जाएगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 17:29:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/up-politics-yogi-vs-akhilesh-brahmin-politics-pda-formula</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर की जीत के सियासी मायने चौंकाने वाले]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-implications-of-prashant-kishor-victory-in-the-bankipur-by-election-are-startling]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जन सुराज पार्टी के संस्थापक व मशहूर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार को लगभग 19 हजार वोटों से तगड़ी शिकस्त देकर न केवल चुनाव जीता, बल्कि राजनीतिक पंडितों को भी चौंका दिया। प्रशांत किशोर की यह जीत केवल एक सीट की जीत नहीं मानी जा रही, बल्कि बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखी जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसा इसलिए कि प्रशांत किशोर ने भाजपा के तीन दशक से अधिक पुराने गढ़ में अकल्पनीय जीत दर्ज की है और अपनी जन सुराज पार्टी को पहली बड़ी चुनावी सफलता दिलाई है। हालांकि, एक उपचुनाव के परिणाम के आधार पर पूरे राज्य के चुनाव के जनादेश का संकेत मान लेना एक बड़ी सियासी गलतफहमी होगी। फिर भी, उनकी यह जीत कई कारणों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार को 18,953 वोटों के भारी अंतर से हराया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/bihar-bypoll-message-for-bjp-core-vote-bank-prashant-kishor-bankipur-analysis" target="_blank">Core Vote Bank पाला बदलने पर यूँ ही मजबूर नहीं होता, ये बात BJP को समझ आ गयी होगी</a></h3><div>लिहाजा, बांकीपुर उपचुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह है कि, बिहार की राजनीति अब केवल एनडीए बनाम महागठबंधन की दोध्रुवीय प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि जन सुराज ने स्वयं को एक संभावित तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा बड़ा संदेश यह कि, जनसुराज पार्टी की नई जीत जहाँ भाजपा नीत एनडीए के लिए इस अकल्पनीय पराजय के बाद संगठन और रणनीति की समीक्षा का गहरा अवसर पैदा करता है। वाकई प्रशांत किशोर की जीत भाजपा के लिए स्पष्ट चेतावनी भी है, क्योंकि बांकीपुर जैसी भाजपा की पारंपरिक सीट का उसके हाथ से एक झटके में निकल जाने से यह साफ संकेत मिलता है कि चुनाव जीतने के लिए केवल संगठनात्मक मजबूती ही पर्याप्त नहीं है; बल्कि स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, सामाजिक समीकरण और मतदाता की अपेक्षाएं भी निर्णायक हो सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा बड़ा संदेश यह कि, इस अकल्पनीय जीत से जन सुराज पार्टी को राजनीतिक वैधता मिली है। अब जन सुराज को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि चुनाव जीतने में सक्षम राजनीतिक दल के रूप में देखा जाएगा। वाकई जिस चुनौती भरे सियासी परिदृश्य में प्रशांत किशोर ने अपनी जीत का परचम लहराया है और भाजपा के लंबे समय से सुरक्षित माने जाने वाले बांकीपुर के गढ़ में 30 साल बाद ही सही, पर सेंध लगा डाली है; वह नवोदित पार्टी के लिए एक अहम उपलब्धि है। इससे भाजपा का मनोबल टूटने के पुष्ट संकेत मिले हैं।</div><div><br></div><div>चौथा बड़ा संदेश यह कि, जन सुराज पार्टी की पहली चुनावी जीत का सेहरा खुद पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के सिर पर ही बंधा है और वो अपना पहला चुनाव लड़कर ही विधायक बनकर विधान सभा पहुंच चुके हैं, जिससे बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा करने के उनके मिशन को काफी बल मिला है। यही वजह है कि प्रशांत किशोर की नई भूमिका की चर्चा अब शुरू हो चुकी है, क्योंकि चुनावी रणनीतिकार से विधायक बनने के बाद उन्हें विधानसभा के भीतर अपनी राजनीति और वैकल्पिक नीतियों को सीधे प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां बड़ा संदेश यह कि, जहाँ तक 2026 में हुए बांकीपुर बिहार विधानसभा उप चुनाव के मनोवैज्ञानिक प्रभाव की बात है तो यह परिणाम जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाएगा और आगामी चुनावों में उम्मीदवारों व समर्थकों को आकर्षित कर सकता है। चूंकि वर्ष 2025 के विधानसभा चुनावों में शुरुआती धमाल मचाने के बाद प्रशांत किशोर की रणछोड़ रणनीतिकार और बुजदिल राजनेता वाली जो छवि बनी थी, अब उससे उन्हें मुक्ति मिली है और वह एक जुझारू राजनेता के रूप में उभरे हैं।</div><div><br></div><div>छठा बड़ा संदेश यह कि, जन सुराज पार्टी और प्रशांत किशोर के इस सियासी उभार से एक नई युवा और शहरी राजनीति के संकेत मिले हैं, क्योंकि चुनाव प्रचार में रोजगार, शिक्षा और सुशासन जैसे मुद्दों पर विशेष जोर दिया गया। इस प्रकार यदि यह रुझान अन्य क्षेत्रों में भी दिखता है, तो इससे बिहार की चुनावी राजनीति में मुद्दा-आधारित प्रतिस्पर्धा और मजबूत हो सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सातवां बड़ा संदेश यह कि, विपक्षी राजनीति भी अब एक नई करवट लेगी। उसे एक नया सकारात्मक विकल्प मिलेगा। बांकीपुर उपचुनाव में जिस तरह से राजद नीत महागठबंधन का वोट बैंक जनसुराज की ओर यकायक शिफ्ट हुआ, यह उसके समक्ष भी अपने जनाधार को मजबूत बनाए रखने की एक तगड़ी चुनौती समुपस्थित करता है। इससे राजद और महागठबंधन के सामने भी अब एक नई चुनौती खड़ी होगी, क्योंकि यदि जन सुराज पार्टी आगे भी विपक्षी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करती है, तो इससे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लिए विपक्ष का निर्विवाद केंद्र बने रहना कठिन हो सकता है। ऐसा इसलिए भी कि बांकीपुर में राजद तीसरे स्थान पर रही।</div><div><br></div><div>आठवां बड़ा संदेश यह कि, बिहार जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्रांत में भाजपा की यह पराजय उसके नेताओं की आपसी रस्साकशी का निराशाजनक परिणाम तो है ही, लेकिन उलजुलूल समीकरणों को साधने की उसकी राजनीतिक फितरत, और इसके चक्कर में बिगड़ैल बोलों पर बरती गई रणनीतिक खामोशी का यह साइड इफ़ेक्ट्स भी समझा जा सकता है। यह घटनाक्रम पुनः भाजपा को खुली नसीहत देता है कि यदि बनावटी 'ओबीसी राजनीति' के चक्कर में वह अपनी मूल राजनीतिक सवर्ण सियासी पूंजी भी न गंवा बैठे, जो कि कांग्रेस की ऐसी ही क्षुद्र सियासत से आजिज आकर भाजपा की ओर 1990 के दशक में शिफ्ट हुआ था, और अब विकल्प मिलते ही भाजपा की क्षुद्र सियासी चाल को भी नया राजनीतिक पाठ पढ़ाने पर आमादा दिखता है।</div><div><br></div><div>नवां बड़ा संदेश यह कि, बिहार में सत्ता मिलते ही नवभाजपाइयों यानी राजद से भाजपा में आए नागमणि जैसे सामाजिक विषधर नेताओं ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को धत्ता बताकर बैकवर्ड-फॉरवर्ड की जो लोहियावादी सियासत परवान चढ़ानी चाही, उसका साइड इफेक्ट्स भी&nbsp;</div><div>बांकीपुर उपचुनाव में दिखा है। क्योंकि भरत तिवारी एनकाउंटर को जातिवादी नजरिए से देखना और वैसी ही गोलबंदी को परोक्ष शह देकर बैकफुट पर लौटने से सवर्णों के बीच गलत संदेश गया है। इसलिए भाजपा के ओबीसी-दलित नेताओं को धुर सवर्ण विरोधी मानसिकता से बचना होगा, अन्यथा प्रतिक्रिया वश सवर्ण यदि ओबीसी की राजद और दलितों की लोजपा रामविलास को सियासी शह दे देंगे तो भाजपा के ओबीसी-दलित नेता न घर के रहेंगे, न घाट के।</div><div><br></div><div>दसवां बड़ा राजनीतिक संदेश और स्वाभाविक सवाल यह है कि भाजपा के 'पैराशूट' राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन द्वारा खाली की गई इस प्रतिष्ठित सीट पर बीजेपी चुनाव कैसे और क्यों हारी? क्या इसके पीछे भी उसकी कोई बड़ी रणनीति है या फिर अपने बड़े नेताओं के खिलाफ हुई भितरघात की वजह से भाजपा को यह शर्मनाक पराजय झेलनी पड़ी। चूंकि ऐसा माना जाता है कि कोई भी सत्ताधारी पार्टी प्रायः उपचुनाव नहीं हारती है, इसलिए यदि भाजपा हारी है तो इससे भी कई बड़े सवाल उपजते हैं।</div><div><br></div><div>सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या बांकीपुर में हुई चुनावी हार भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार की हार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, पूर्वमुख्यमंत्री नीतीश कुमार, और बड़बोले केंद्रीय मंत्री गण चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की संयुक्त हार है, क्योंकि सबने एक दूसरे के साथ सियासी घात-प्रतिघात किया है, ताकि सूबाई राजनीति में गठबंधन साथियों की प्रासंगिकता बनी रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस नजरिए से यह एनडीए के उन सूबाई सहयोगियों की भी हार है जो भाजपा के आधार वोट बैंक से अपने चुनाव दर चुनाव तो जीतते हैं, और फिर जीत के बाद मंत्री बनकर भी भाजपा के ही कोर सवर्ण वोटर्स को चिढ़ाने वाली (राजद/कॉंग्रेस वाली) भड़काऊ टिप्पणी शुरू कर देते हैं, जिस पर भाजपा की खामोशी उसकी ओबीसी-दलित परस्त राजनीति के समक्ष घुटने टेकते प्रतीत होती है। इससे उसका प्रतिबद्ध सवर्ण कैडर इधर उधर भागने के विकल्प ढूंढता है और वह मिलते ही भाजपा को उसकी असली सियासी औकात समझा देता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि महज एक उपचुनाव के परिणाम से आप पूरे बिहार विधानसभा चुनाव 2030 का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते; बल्कि इसके व्यापक निष्कर्ष के लिए आगे के संसदीय आम चुनाव 2029 के चुनावी रुझानों को भी देखना समझना दिलचस्प होगा।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 18:20:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-implications-of-prashant-kishor-victory-in-the-bankipur-by-election-are-startling</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बृजभूषण शरण सिंह के बाइज्जत बरी होने से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कई सारे समीकरण बदलने वाले हैं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/brij-bhushan-sharan-singh-acquitted-delhi-court-wfi-case]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>करीब तीन वर्षों तक देश की राजनीति, खेल जगत और मीडिया के केंद्र में रहे पूर्व भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) अध्यक्ष एवं पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह को आखिरकार दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत से बड़ी राहत मिल गई। महिला पहलवानों द्वारा दर्ज यौन उत्पीड़न मामले में अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। वैसे बृजभूषण शरण सिंह पर लगे आरोपों के समर्थन में जिस तरह तमाम विपक्षी नेता खड़े हो गये थे उसके चलते यह सब कुछ शुरू से ही राजनीतिक षड्यंत्र नजर आ रहा था। उल्लेखनीय है कि जंतर मंतर पर पहलवानों का धरना प्रदर्शन कराया गया था और धरने के मंच पर तमाम बड़े विपक्षी नेता पहुँचे थे और मंच से दिये गये भाषणों के जरिये भाजपा को महिला विरोधी बताया जा रहा था। साथ ही बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ देशभर में माहौल बनवाने और मीडिया ट्रायल के जरिये उनकी छवि बिगाड़ने के तमाम प्रयास किये गये थे। आरोप लगाने वाले पहलवानों ने अपने मेडल गंगा में बहाने तक की नौटंकी भी की थी ताकि जनता की सहानुभूति अर्जित की जा सके और हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को जिताया जा सके। लेकिन साच का आंच नहीं वाली कहावत सही सिद्ध हुई और बृजभूषण सभी आरोपों से बाइज्जत बरी हो गये।</div><div><br></div>
<div>हम आपको बता दें कि दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने महिला पहलवानों द्वारा दर्ज यौन उत्पीड़न मामले में बृजभूषण शरण सिंह और तत्कालीन डब्ल्यूएफआई सहायक सचिव विनोद तोमर को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। इस फैसले ने न केवल तीन वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त किया है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है।</div>
<h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/first-opposition-to-the-ram-mandir-now-questions-over-donations-yogi-slams-sp-double-standards" target="_blank">पहले Ram Mandir विरोध, अब चंदे पर सवाल! Yogi ने SP के दोहरे रवैये पर बोला हमला</a></h3><div>उधर, फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि उन्हें शुरू से अपने ऊपर लगे आरोपों पर भरोसा नहीं था। उन्होंने कहा कि उनकी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि यदि आरोप सही साबित हुए तो वह स्वयं फांसी पर चढ़ जाएंगे, लेकिन आज का दिन उनके लिए प्रसन्नता का विषय है। वहीं, सरकारी पक्ष ने कहा है कि विस्तृत निर्णय मिलने के बाद उसका अध्ययन किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर उच्च अदालत में आगे की कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि यह मामला अप्रैल 2023 में तब शुरू हुआ था, जब दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में छह महिला पहलवानों की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई थी। इसी दौरान एक नाबालिग की शिकायत पर पॉक्सो कानून के तहत भी अलग मामला दर्ज हुआ था। जून 2023 में दिल्ली पुलिस ने करीब 1500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी, जिसमें चार राज्यों के 22 गवाहों के बयान शामिल थे। बाद में नाबालिग शिकायतकर्ता और उसके पिता ने अपने आरोप वापस ले लिए थे। पुलिस ने अदालत से पॉक्सो मामला समाप्त करने का अनुरोध किया था जिसे मई 2025 में अदालत ने स्वीकार कर लिया था।</div><div><br></div><div>मई 2024 में अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत आरोप तय किए थे। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 32 गवाह पेश किए। बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि शिकायतकर्ताओं के बयानों में समय, स्थान और घटनाओं को लेकर कई बदलाव हुए तथा कुछ घटनाओं के समय आरोपी घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थे। बचाव पक्ष ने शिकायत दर्ज कराने में सात-आठ वर्ष की देरी का मुद्दा भी उठाया।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष का कहना था कि पीड़िताओं के बयान मुकदमे के दौरान लगातार एक जैसे रहे और अन्य गवाहों ने भी उनका समर्थन किया। शिकायतकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने अदालत में तर्क दिया कि शक्ति के असंतुलन और खेल संघ के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति के प्रभाव के कारण शिकायत दर्ज कराने में देरी स्वाभाविक थी। हालांकि, अंततः अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी कर दिया।</div><div><br></div><div>यूपी चुनाव पर क्या हो सकता है असर?</div><div><br></div><div>उधर, इस फैसले का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं माना जा रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला पहलवानों के आंदोलन और बृजभूषण शरण सिंह पर लगे आरोपों ने भाजपा को असहज स्थिति में ला दिया था। पार्टी को विपक्ष के लगातार हमलों का सामना करना पड़ा और अंततः कैसरगंज से बृजभूषण की जगह उनके पुत्र करण भूषण सिंह को चुनाव मैदान में उतारा गया था। अब अदालत से बरी होने के बाद भाजपा के लिए यह फैसला राजनीतिक दृष्टि से राहत देने वाला माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब अगले वर्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।</div><div></div><div>हम आपको बता दें कि बृजभूषण शरण सिंह का प्रभाव देवीपाटन मंडल और अवध क्षेत्र के कई जिलों में लंबे समय से माना जाता है। गोण्डा, बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती तथा आसपास के क्षेत्रों में उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़, सामाजिक नेटवर्क और शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से व्यापक जनसंपर्क रहा है। ऐसे में उनके बरी होने के बाद इन क्षेत्रों में भाजपा की चुनावी संभावनाएं और मजबूत होने की चर्चा राजनीतिक हलकों में शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि उनके समर्थकों में नया उत्साह आएगा और इसका लाभ भाजपा उम्मीदवारों को मिल सकता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, इस फैसले के बाद भाजपा नेतृत्व के सामने एक नई चुनौती भी उभर सकती है। माना जा रहा है कि अदालत के फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह का राजनीतिक प्रभाव देवीपाटन मंडल और अवध क्षेत्र में और बढ़ेगा इसके चलते विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन में उनकी राय और पसंद को भी महत्व देना पड़ सकता है। स्थानीय राजनीति में उनका प्रभाव देखते हुए पार्टी के लिए संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों की नजर एक और पहलू पर भी है। हाल ही में उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान बृजभूषण शरण सिंह ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी क्योंकि उनके विधायक पुत्र प्रतीक भूषण सिंह को मंत्री नहीं बनाया गया था। अब अदालत से राहत मिलने के बाद यह अटकलें भी तेज हो सकती हैं कि भविष्य में संगठन या सरकार में उनके परिवार की राजनीतिक भूमिका और मजबूत हो। हालांकि, इस संबंध में भाजपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, दिल्ली की अदालत का यह फैसला केवल एक चर्चित आपराधिक मुकदमे का निष्कर्ष नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक तस्वीर का भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन गया है। जहां कानूनी मोर्चे पर बृजभूषण शरण सिंह को बड़ी राहत मिली है, वहीं इसके राजनीतिक प्रभावों पर अब सभी दलों की नजरें टिकी रहेंगी।</div><div></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

]]></description>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 14:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/brij-bhushan-sharan-singh-acquitted-delhi-court-wfi-case</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जानिए, भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हो रहे सरकारी दमन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप और जवाबदेही तय करने का आह्वान क्यों किया?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/key-diplomatic-implications-of-the-steps-taken-regarding-the-ongoing-movement-in-pok]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत द्वारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK/PoJK) में कथित सरकारी दमन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप और जवाबदेही की अपील केवल एक मानवीय बयान नहीं, बल्कि एक बहु-स्तरीय कूटनीतिक रणनीति भी मानी जा रही है। हाल के दिनों में भारत ने पाकिस्तान से क्षेत्र में नागरिकों के साथ हुए कथित दमन पर जवाबदेही तय करने की मांग की है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दरअसल किसी भी तानाशाह देश में जब चुनाव भरोसे का संकट बन जाए, तो जनता का उद्वेलित होना स्वाभाविक है। पाक अधिकृत कश्मीर/जम्मू-कश्मीर में आजकल यही हो रहा है।वहां पर इन दिनों एक ही नारा गूंज रहा है, वह यह कि&nbsp; "Justice for PoJK, End Our Exile!" अर्थात "POJK के लिए न्याय, हमारा निर्वासन समाप्त करो!" यही वजह है कि भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर (PoK/PoJK) में सरकारी दमन रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से&nbsp; अपील की है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/zubair-baloch-shot-in-karachi-lyari-gang-war" target="_blank">Dhurandhar Style में Lyari की सड़कों पर बहा खून, Gangster Uzair Baloch के भाई Zubair को गोलियों से भून डाला</a></h3><div>भारत की यह अपील वहां के हालात के मद्देनजर बिल्कुल सही वक्त पर उठाया हुआ उचित कदम है। इससे वहां के आंदोलनकारियों को कूटनीतिक ऑक्सीजन मिली है। यदि बलूच विद्रोहियों का उन्हें साथ मिल जाये तो सोने पर सुहागा समझिए। भारत की सहानुभूति दोनों पक्षों से है। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक मर्यादा के चलते भारत खुलकर इनका साथ नहीं दे सकता है, जबकि मानवता और लोकतंत्र के नाम पर वह पाकिस्तानी हुक्मरानों को घेर सकता है। इसलिए भारत ने वही किया है, जो सबके लिए उचित है।</div><div><br></div><div>वैश्विक दुनियादारी के नकाबपोशों के नकाब उतारने के लिए भारत ने अंतर्राष्ट्रीय विरादरी से साफ कहा है कि पाकिस्तानी सरकार की कार्रवाई में PoK में 40 नागरिकों की मौत हुई है, जबकि वहां लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि यह मामला वहां हो रहे चुनावों से जुड़ा है। पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में 45 सीटों के लिए असेंबली इलेक्शन हो रहे हैं। ये चुनाव तीन चरणों में कराए जा रहे हैं, जो 10 अगस्त को पूरे होंगे। यहां विधानसभा की 53 सीटें हैं। इनमें से 45 पर सीधा चुनाव होता है, जबकि 8 सीटें महिलाओं, टेक्नोक्रैट्स और धर्मगुरुओं के लिए आरक्षित हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी चुनाव में हुई जबरदस्त धांधली के बाद पीओके की जनता भड़क गई है। गत 27 जुलाई को पहले चरण का चुनाव हुआ, जिसमें पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) ने 13 में से 9 सीटें जीतीं, बाकी 4 सीटें पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को मिलीं। इस चरण में जबरदस्त धांधली हुई। यह बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र की हमेशा से ही उपेक्षा की है। लिहाजा वहां प्रदर्शन हो रहे हैं। दरअसल, ये प्रदर्शन उन 12 सीटों को लेकर हो रहे हैं, जो प्रवासियों के लिए आरक्षित हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसकी अगुआई जॉइंट अवामी एक्शन कमिटी (JAAC) नाम का सिविल सोसाइटी ग्रुप कर रहा है। जॉइंट अवामी एक्शन कमिटी (JAAC) का कहना है कि इस्लामाबाद सरकार इन सीटों पर धांधली कर अपने लोग बिठाती है ताकि पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) असेंबली पर उसका कंट्रोल बना रहे। इस आरोप में दम है क्योंकि जो पार्टी पाकिस्तान पर हुकूमत करती है, वही अक्सर पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) चुनाव जीतती है। ,चूंकि पिछले दो महीने से पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में जबरदस्त आर्थिक परेशानी बढ़ी। इसलिए पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में लोगों के गुस्से बढ़े हुए हैं।</div><div><br></div><div>वास्तव में, इसकी वजहें सिर्फ चुनावी धांधली ही नहीं हैं, बल्कि आर्थिक दुश्वारियों की वजह से भी उनका गुस्सा परवान चढ़ा हुआ है। चूंकि स्थानीय लोगों के अधिकार और भी सीमित किए जा रहे हैं, इसलिए भी लोग बौखलाए हुए हैं। खबरें तो ये भी हैं कि सरकारी बंदिशों की वजह से ही इलाके में लोगों को सब्सिडाइज्ड गेहूं और जरूरी दवाइयां नहीं मिल पा रही हैं। वहीं, बिजली कटौती को लेकर भी लोगों में गुस्सा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पाक अधिकृत कश्मीर की नदियों पर बने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से जो बिजली बनती है, वह यहां के लिए जरूरी 400 मेगावॉट से कहीं अधिक है। इसके बावजूद इलाके में 15-20 घंटों तक बिजली काटी जाती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तुरंत दखल देकर पाकिस्तान सरकार के दमन पर रोक लगानी चाहिए।</div><div><br></div><h2># भारत के इस कदम के प्रमुख कूटनीतिक मायने इस प्रकार हैं:-</h2><div><br></div><div>पहला, नैरेटिव का पलटवार: पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है। भारत अब PoK में मानवाधिकार और शासन के प्रश्नों को प्रमुखता देकर यह संदेश दे रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्र की स्थिति पर भी जाना चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, मानवाधिकार आधारित कूटनीति: भारत अपनी बात को केवल क्षेत्रीय दावे तक सीमित न रखकर मानवाधिकार, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे से जोड़ रहा है। इससे उसकी अपील व्यापक अंतरराष्ट्रीय विमर्श में अधिक स्वीकार्य बनाने का प्रयास दिखता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव: यदि प्रमुख देश, संयुक्त राष्ट्र या मानवाधिकार संस्थाएं इस मुद्दे पर अधिक सक्रिय होती हैं, तो पाकिस्तान पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय कदम की संभावना कई देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगी।</div><div><br></div><div>चौथा, PoK के लोगों के प्रति संदेश: भारत यह संकेत भी देता है कि वह PoK के निवासियों के अधिकारों और उनकी स्थिति पर सार्वजनिक रूप से आवाज उठा रहा है। इससे वहां के घटनाक्रम को लेकर भारत की आधिकारिक रुचि प्रदर्शित होती है।</div><div><br></div><div>पांचवां, द्विपक्षीय से वैश्विक विमर्श की ओर: यह रुख दर्शाता है कि भारत केवल भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय संदर्भ में नहीं, बल्कि वैश्विक मानवाधिकार और जवाबदेही के मानकों के आधार पर भी इस विषय को प्रस्तुत करना चाहता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, इस रणनीति की सीमाएं भी हैं। कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर अधिकांश देश संतुलित रुख अपनाते हैं और दोनों पक्षों से संयम की अपेक्षा करते हैं। इसलिए भारत की अपील से तत्काल कोई अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई होना निश्चित नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव और वैश्विक चर्चा अवश्य बढ़ सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सुलगता सवाल है कि आखिर इस मसले पर दुनिया दखल क्यों दे, क्योंकि यह तो पहले ब्रिटिश और अब अमेरिकी शासकों द्वारा रचा गया और प्रोत्साहित किया गया खेल है, ताकि एशियाई देश परस्पर संघर्षरत रहें और अमेरिकी-यूरोपीय दाल यहां गलती रहे। पहले सोवियत संघ और अब रूस-चीन से अमेरिकी-यूरोपीय देशों को जो संयुक्त चुनौती मिल रही है, उसके दृष्टिगत भारत जैसे तटस्थ देश की नहीं, बल्कि पाकिस्तान जैसे दोगले देश की जरूरत अमेरिका को है, जो चीन के साथ मिलकर रूस/भारत के खिलाफ भी उसे भड़काता रहता है, क्योंकि यही अमेरिकी-यूरोपीय एजेंडा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>खासबात यह है कि भारत भले ही खुद को गुटनिरपेक्ष बताए, लेकिन अमेरिका-यूरोपीय देश उसे रूस का वफादार मित्र तथा चीन का चिर शत्रु समझते हैं। शायद इसी चीनी शत्रुता को भड़काकर वो अपना मकसद भी साधना चाहते हैं। लेकिन यहां भी भारत सधी चाल चलकर सबको हैरत में डाल देता है। इसलिए अब भारत को पीओके के बहाने घेरने की दुनियावी चाल चली गई है, जिसका अमेरिका-चीनी कुचक्र से गहरा नाता है। इस समस्या का समाधान अनुनय विनय से नहीं बल्कि शौर्य प्रदर्शन से किया जाना ही श्रेयस्कर होगा, ताकि पाकिस्तान-बंगलादेश से विदेशी खूंटों को उखाड़ फेंका जा सके।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 14:23:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/key-diplomatic-implications-of-the-steps-taken-regarding-the-ongoing-movement-in-pok</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आंदोलन की संस्कृतिः अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी आवश्यक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/culture-of-movement-not-just-rights-responsibility-is-also-necessary]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं है, बल्कि संवाद, असहमति और संवैधानिक मर्यादाओं का जीवंत तंत्र है। इस व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को अपनी मांगों और विचारों को शांतिपूर्ण ढंग से रखने का अधिकार प्राप्त है। संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार दिया है, लेकिन यह अधिकार कभी भी हिंसा, अराजकता, सार्वजनिक संपत्ति के विनाश या सुरक्षा बलों पर हमले का लाइसेंस नहीं बन सकता। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह विरोध को भी सम्मान देता है, किंतु विरोध की भी अपनी सीमाएं और जिम्मेदारियां होती हैं। हाल के वर्षों में कुछ आंदोलनों ने यह गंभीर प्रश्न खड़ा किया है कि क्या लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में कानून और व्यवस्था को चुनौती देना स्वीकार्य हो सकता है? यदि कोई प्रदर्शन बैरिकेड तोड़ने, पुलिस पर हमला करने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने अथवा संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान की ओर जबरन बढ़ने का प्रयास करे, तो सरकार और सुरक्षा एजेंसियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे केवल मूकदर्शक बनी रहें। राज्य का पहला दायित्व नागरिकों की सुरक्षा और संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करना है।</div><div><br></div><div>सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पैलेट गन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए यह कहना कि असाधारण परिस्थितियों में इसका प्रयोग किया जा सकता है, इसी संतुलित दृष्टिकोण का परिचायक है। न्यायालय ने किसी भी प्रकार के असीमित बल प्रयोग को उचित नहीं ठहराया, बल्कि यह स्पष्ट संकेत दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य के पास आवश्यक साधन भी होने चाहिए। यदि सुरक्षा बलों से हर प्रभावी उपाय छीन लिया जाएगा, तो हिंसक भीड़ पर नियंत्रण कैसे स्थापित होगा? यह प्रश्न केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों को असीमित अधिकार मिल जाने चाहिए। लोकतंत्र में प्रत्येक कार्रवाई न्यायिक समीक्षा और जवाबदेही के दायरे में रहती है। यदि कहीं बल प्रयोग आवश्यकता से अधिक हुआ हो, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन जांच का आधार तथ्य होने चाहिए, पूर्वाग्रह नहीं। जिस प्रकार प्रदर्शनकारियों की पीड़ा सुनी जानी चाहिए, उसी प्रकार घायल हुए पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों का पक्ष भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-political-significance-of-the-nda-mps-mangal-milan-session" target="_blank">एनडीए सांसदों के सत्रीय 'मंगल मिलन' के सियासी मायने</a></h3><div>आज आवश्यकता इस बात की है कि आंदोलन की संस्कृति पर पुनर्विचार किया जाए। स्वतंत्रता आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की ऐसी परंपरा विकसित की थी, जिसमें नैतिक बल सबसे बड़ा हथियार था। सत्याग्रह में विरोध था, परंतु वैमनस्य नहीं। संघर्ष था, परंतु हिंसा नहीं। दृढ़ता थी, परंतु अराजकता नहीं। दुर्भाग्य से आज कुछ आंदोलनों में संवाद की जगह टकराव, संयम की जगह उग्रता और तर्क की जगह भीड़ की शक्ति को महत्व दिया जाने लगा है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में परिवर्तन सड़क पर पत्थर फेंकने से नहीं, बल्कि विचार, संगठन, जनजागरण और संवैधानिक प्रक्रियाओं से आता है। यदि हर असहमति हिंसक रूप ले लेगी, तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं युवाओं का होगा, जिनके भविष्य के नाम पर आंदोलन किए जाते हैं। लोकतंत्र की रक्षा भावनाओं से नहीं, बल्कि अनुशासन और उत्तरदायित्व से होती है।</div><div><br></div><div>यदि यह मान लिया जाए कि किसी राजनीतिक दल या उसके समर्थकों द्वारा आयोजित आंदोलन में कुछ असामाजिक और हिंसक तत्वों ने प्रवेश कर उसे अराजक दिशा देने का प्रयास किया, तो ऐसी स्थिति में सरकार का प्राथमिक दायित्व कानून-व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। समय रहते प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई, भले ही उससे कुछ अप्रिय घटनाएं हुई हों, व्यापक अराजकता और राष्ट्रीय संस्थानों को संभावित क्षति से बचाने के उद्देश्य से देखी जा सकती है। साथ ही, लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह भी अपेक्षित है कि विपक्ष जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंसा और तोड़फोड़ से स्पष्ट दूरी बनाए तथा वैध मांगों के समर्थन और अवैध कृत्यों के विरोध के बीच स्पष्ट रेखा खींचे। लोकतंत्र तभी सुदृढ़ होता है जब सरकार कानून के शासन का पालन करे, विपक्ष जिम्मेदार आचरण करे और आंदोलन संविधान की मर्यादाओं एवं शांतिपूर्ण तरीकों के भीतर संचालित हों।</div><div><br></div><div>राजनीतिक दलों की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी भी दल का यह दायित्व है कि वह जनभावनाओं को सकारात्मक दिशा दे। यदि कोई राजनीतिक संगठन या उसके समर्थक आंदोलन के दौरान हिंसा, तोड़फोड़ या कानून हाथ में लेने को प्रोत्साहित करते हैं, तो उसकी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है, लेकिन उसका धर्म केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करना भी है। यदि किसी भी पक्ष द्वारा जनआंदोलनों का उपयोग केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है, तो अंततः लोकतंत्र ही कमजोर होता है। सरकारों को भी यह आत्ममंथन करना चाहिए कि जनआक्रोश की स्थितियां क्यों बनती हैं। संवाद के द्वार हमेशा खुले रहने चाहिए। पारदर्शी निर्णय, समय पर संवाद और शिकायतों के समाधान की प्रभावी व्यवस्था अनेक आंदोलनों को उग्र होने से पहले ही शांत कर सकती है। लोकतंत्र में शासन का अर्थ केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि विश्वास अर्जित करना भी है।</div><div><br></div><div>भविष्य के लिए कुछ स्पष्ट सिद्धांत निर्धारित किए जाने चाहिए। प्रत्येक बड़े आंदोलन के लिए पूर्व अनुमति, निर्धारित मार्ग, आयोजकों की स्पष्ट जवाबदेही, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा, हिंसा की स्थिति में त्वरित पहचान और दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित हो। साथ ही पुलिस को भी भीड़ नियंत्रण के आधुनिक, वैज्ञानिक और न्यूनतम आवश्यक बल के सिद्धांतों पर निरंतर प्रशिक्षित किया जाए। इससे नागरिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच बेहतर संतुलन स्थापित होगा। लोकतंत्र का सौंदर्य इस बात में नहीं कि कितनी जोर से नारे लगाए गए, बल्कि इस बात में है कि कितनी गंभीरता से संवाद हुआ। संसद जनता की आकांक्षाओं का मंदिर है। यदि कोई समूह अपनी बात संसद तक पहुंचाना चाहता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन संसद पर दबाव बनाने या उसे घेरने की संस्कृति लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करती है। लोकतंत्र में जनमत सर्वोपरि है, भीड़तंत्र नहीं।</div><div><br></div><div>आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ विश्वगुरु बनने की दिशा में भी अग्रसर है। ऐसे समय में हमें विरोध की भी ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जो विश्व के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करे। हमारे आंदोलन व्यवस्था को तोड़ने के नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने के माध्यम बनें। हमारे प्रदर्शन राष्ट्र को विभाजित करने के नहीं, लोकतांत्रिक चेतना को समृद्ध करने के साधन बनें। अंततः यह स्मरण रखना होगा कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब कर्तव्यों का भी समान रूप से पालन किया जाए। यदि आंदोलन संविधान की मर्यादाओं में रहकर होंगे, तो सरकार भी अधिक उत्तरदायी बनेगी और लोकतंत्र भी अधिक सशक्त होगा। भारत को ऐसे आंदोलनों की आवश्यकता है जो व्यवस्था को चुनौती देने के बजाय उसे सुधारने की प्रेरणा दें। जो युवाओं को उग्रता नहीं, उत्तरदायित्व सिखाएं और जो राष्ट्रहित को दलगत हितों से ऊपर रखकर लोकतंत्र को और अधिक परिपक्व, अनुशासित तथा जनोन्मुख बनाने का मार्ग प्रशस्त करें।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 18:10:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/culture-of-movement-not-just-rights-responsibility-is-also-necessary</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Abhijeet Dipke, Saurav Das, Richa Chadha अनजाने में मर्यादा की सीमा लांघ रहे हैं या फिर जानबूझकर बदतमीजी कर रहे हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/abhijeet-dipke-saurav-das-richa-chadha-controversial-statements-pm-modi-editorial]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है और सत्ता की आलोचना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत मानी जाती है। लेकिन जब विरोध की भाषा शालीनता की सीमा लांघकर व्यक्तिगत अपमान में बदल जाए, जब तर्क और तथ्यों की जगह गाली-गलौज और कटाक्ष ले लें, और जब वरिष्ठों के सम्मान जैसी बुनियादी सामाजिक मर्यादाओं का भी मजाक उड़ाया जाने लगे, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह लोकतांत्रिक विरोध है या फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में सभ्य संवाद की संस्कृति को कमजोर करने की कोशिश है?</div><div><br></div><div>हाल के दिनों में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके, उसके प्रवक्ता सौरव दास और अभिनेत्री रिचा चड्ढा के बयानों ने इसी बहस को जन्म दिया है। तीनों के बयान अलग-अलग संदर्भों में आए, लेकिन उनकी भाषा और दृष्टिकोण में जो समानता दिखाई देती है वह है व्यक्तिगत कटाक्ष, वरिष्ठों के प्रति असम्मान और मर्यादा की सीमाओं को लांघने की प्रवृत्ति।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/dialogue-alone-will-resolve-youth-discontent" target="_blank">संवाद से ही सुलझेगा युवा असंतोष</a></h3><div>अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छात्रों के लिए जारी वीडियो संदेश पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि "आपकी त्वचा देश के भविष्य से ज्यादा चमकदार है।" यह टिप्पणी ऐसे समय आई जब प्रधानमंत्री ने परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय बनाने और पेपर लीक पर अंकुश लगाने के लिए पारित कानून को विद्यार्थियों के हित में एक महत्वपूर्ण कदम बताया था। देखा जाये तो कोई भी व्यक्ति सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकता है, कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठा सकता है या सरकार से जवाब मांग सकता है। लेकिन किसी के व्यक्तित्व या शारीरिक स्वरूप पर टिप्पणी करना क्या स्वस्थ लोकतांत्रिक आलोचना कहलाएगी? क्या इससे छात्रों की समस्या का कोई समाधान निकलता है?</div><div><br></div><div>यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पूरी होने के बाद क्या दिपके और उनके सहयोगी इतने आत्ममुग्ध हो गए हैं कि अब देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए भी घटिया और व्यक्तिगत भाषा का इस्तेमाल सामान्य मानने लगे हैं? जिस नेता को दुनिया में सबसे अधिक वोट प्राप्त कर लोकतांत्रिक जनादेश मिला हो, उसके साथ असहमति पूरी तरह स्वीकार्य हो सकती है, लेकिन क्या उसका अपमान लोकतांत्रिक अधिकार की श्रेणी में रखा जा सकता है?</div><div><br></div><div>सौरव दास का बयान इस बहस को और गंभीर बना देता है। जब उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत माता के खिलाफ इस्तेमाल हुई अपमानजनक भाषा पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता और लोकतंत्र में "जोक" को स्वीकार करना चाहिए। देखा जाये तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन किसी दिवंगत व्यक्ति या किसी के परिवार के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों का समर्थन करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद के स्तर को गिराना माना जायेगा। लोकतंत्र में तीखी आलोचना की पूरी गुंजाइश है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान और विशेषकर दिवंगत परिजनों को निशाना बनाना स्वस्थ राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा नहीं माना जाता।</div><div><br></div><div>भारत के मतदाताओं ने बार-बार यह संकेत दिया है कि वे नीतियों पर बहस चाहते हैं, लेकिन व्यक्तिगत अभद्रता को पसंद नहीं करते। राजनीतिक इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जहां तीखी व्यक्तिगत टिप्पणियों की तुलना में मुद्दों पर आधारित राजनीति को अधिक स्वीकार्यता मिली। ऐसे में यह मान लेना कि अपमानजनक भाषा ही जनभावना का प्रतिनिधित्व करती है, वास्तविकता से दूर आकलन है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, अभिनेत्री रिचा चड्ढा का हालिया सोशल मीडिया पोस्ट भी इसी मानसिकता की झलक देता है। उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा कि केवल उम्र के आधार पर सम्मान नहीं मिलना चाहिए और अपनी बात को स्थापित करने के लिए उन्होंने ऐसे शब्दों और उपमाओं का प्रयोग किया जोकि अपमानजनक और असंवेदनशील थीं। किसी व्यक्ति का सम्मान केवल उम्र से नहीं, उसके आचरण से भी जुड़ा हो सकता है, यह तर्क अपनी जगह है। लेकिन क्या इस विचार को व्यक्त करने के लिए पूरे वरिष्ठ वर्ग का उपहास उड़ाना, उनकी शारीरिक स्थिति पर कटाक्ष करना और उन्हें अपमानित करने वाली भाषा का प्रयोग करना उचित माना जा सकता है? रिचा चड्ढा को यह पता होना चाहिए कि भारतीय समाज में बुजुर्गों का सम्मान केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का महत्वपूर्ण आधार रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि रिचा चड्ढा इससे पहले भी कई विवादित बयानों को लेकर सुर्खियों में रह चुकी हैं। ऐसे में यह धारणा भी मजबूत होती है कि फिल्म और मनोरंजन जगत के कुछ कलाकार अपनी नई फिल्म या वेब सीरीज के रिलीज़ से पहले चर्चा में बने रहने और लाइमलाइट हासिल करने के लिए जानबूझकर विवादित बयान देते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>देखा जाये तो सरकारों से सवाल पूछना आवश्यक है, आंदोलनों का होना भी लोकतंत्र का हिस्सा है और सार्वजनिक हस्तियों की आलोचना भी पूरी तरह वैध है। लेकिन यदि आलोचना की भाषा ही अपमान में बदल जाए, यदि असहमति की जगह व्यक्ति और उसके परिवार को निशाना बनाया जाए और यदि वरिष्ठों के प्रति सम्मान को ही पिछड़ापन बताने की कोशिश होने लगे, तो यह केवल राजनीतिक या वैचारिक बहस नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक संस्कारों के क्षरण का संकेत बन जाती है।</div><div><br></div><div>आखिरकार लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं चलता, बल्कि जिम्मेदारियों से भी चलता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण संवाद की मर्यादा भी है। असहमति का अधिकार लोकतंत्र को मजबूत करता है, लेकिन अभद्रता और व्यक्तिगत अपमान किसी भी लोकतांत्रिक समाज को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर ही करते हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:52:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/abhijeet-dipke-saurav-das-richa-chadha-controversial-statements-pm-modi-editorial</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[प्रियंका द्वारा गौमूत्र का उपहास कांग्रेस की हिन्दू विरोधी मानसिकता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/priyanka-mockery-of-cow-urine-reflects-the-congress-party-anti-hindu-mindset]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कांग्रेस पार्टी की सांसद प्रियंका गांधी की योग्यता का जिक्र करते हुए अकसर राजनीतिक विश्लेषक एक बात का अवश्य जिक्र करते हैं कि उनकी छवि, विशेषकर नाक अपनी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी से मिलती है। लेकिन अब दोनों दादी-पोतियों का एक और समान गुण सामने आया है, इंदिरा गांधी ने 7 नवम्बर, 1966 को संसद भवन के सामने हजारों गोभक्तों पर गोलियां चलवाईं थी और लगभग उसी मानसिकता का परिचय देते हुए अब प्रियंका वाड्रा गांधी ने संसद के भीतर गोमूत्र का उपहास उड़ाया है। शर्मनाक बात है कि जब प्रियंका इस तरह का दुष्कर्म कर रही थी तो विपक्षी बैंचों पर बैठे कांग्रेसी सांसद भी खिलखिला रहे थे। हिन्दू विरोध से उपजी कांग्रेसियों की यह हंसी कौरवसभा में द्रौपदी चीरहरण के समय कपटी दुर्योधन द्वारा लगाए गए अट्टाहस की तरह हर हिन्दू के मनों को बींध गई।</div><div><br></div><div>संसद में मंगलवार को उस समय काफी हंगामा मचा जब प्रियंका वाड्रा ने पेपर लीक मामले पर सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी में शामिल एक सदस्य की योग्यता उनके गोमूत्र विशेषज्ञ होने को बताई। लोकसभा में शिक्षा संबंधी मुद्दों पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार द्वारा पेपर लीक को लेकर गठित उच्च स्तरीय कार्यबल पर तंज कसते हुए कहा कि इसमें एक गौमूत्र विशेषज्ञ भी शामिल हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/priyanka-gandhi-and-kalyan-banerjee-discuss-makar-dwar-mention-rajiv-gandhi-and-mamata-banerjee" target="_blank">प्रियंका गांधी-कल्याण बनर्जी की मकर द्वार पर चर्चा, राजीव गांधी-ममता का हुआ जिक्र, जानें पूरा मामला</a></h3><div>हालांकि चर्चा के दौरान प्रियंका गांधी ने किसी का नाम नहीं लिया। लेकिन उनका इशारा आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामाकोटि की ओर माना जा रहा है, जो इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता वाली इस टास्क फोर्स का हिस्सा हैं। 2025 में प्रो. कामाकोटि ने दावा किया था कि गोमूत्र में एंटीबैक्टीरियल और पाचन संबंधी गुण होते हैं। प्रो. वी. कामकोटि देश के जाने-माने वैज्ञानिक हैं। जनवरी, 2025 को चेन्नई की एक गौशाला में माटू पोंगल कार्यक्रम में बोलते हुए, कामकोटी ने देशी गाय और जैविक खेती के बारे में कहा। इस दौरान उन्होंने बताया कि गाय के मूत्र में जीवाणुरोधी, कवकरोधी और पाचन सम्बन्धी गुण होते हैं। उन्होंने एक तपस्वी से जुड़ी कहानी भी साझा की, जिन्होंने गौमूत्र पीकर अपना बुखार ठीक कर लिया था। इस ब्यान के कारण उस समय भी प्रो. कामकोटि वामपंथी व जिहादी ताकतों के निशाने पर आ गए थे और प्रियंका ने भी अब उन जख्मों को पुन: कुरेद दिया है।</div><div><br></div><div>गोमूत्र का उपहास उड़ाने वालों को जानना चाहिए कि हिन्दू धर्म में कोई भी विश्वास अवैज्ञानिक नहीं हैं, गोमूत्र के औषधीय गुण विज्ञान द्वारा प्रमाणित हैं। भारत के वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद और नागपुर के गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र के सहयोग से किए गए शोध पर आधारित गोमूत्र के गुणों को अमेरिकी पेटेंट मिल चुका है। गोमूत्र के अर्क पर पहला महत्वपूर्ण अमेरिकी पेटेंट (नंबर 6410059) एंटीबायोटिक और एंटीफंगल दवाओं के असर को बढ़ाने के लिए 2002 में मिला था। इसके बाद कैंसर रोधी दवाओं के प्रभाव को तेज करने और डीएनए सुरक्षा से जुड़े अन्य पेटेंट (पेटेंट नंबर 6896907 और 7718360) भी संयुक्त रूप से भारत के शोधकर्ताओं द्वारा अमेरिका में दर्ज कराए गए। गोमूत्र व अन्य प्राकृतिक चीजों से बने कीटनाशकों को भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता और पेटेंट प्राप्त हुआ है।</div><div><br></div><div>आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री श्रीपाद येसो नाइक ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया था कि वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अनुसार, इसकी घटक प्रयोगशाला, केंद्रीय औषधीय एवं सुगंधित पादप संस्थान (सीआईएमएपी), लखनऊ ने नागपुर के गो-विज्ञान अनुसंधान केंद्र के सहयोग से किए गए एक अध्ययन में गाय के मूत्र के आसवन (कामधेनु अर्क) का एक नया उपयोग खोजा है। यह आसवन संक्रमणरोधी और कैंसररोधी एजेंटों सहित जैवसक्रिय अणुओं की सक्रियता बढ़ाने और उपलब्धता को सुगम बनाने में सहायक है। गाय के मूत्र के आसवन में कैंसररोधी प्राकृतिक एजेंट टैक्सोल (पैक्लिटैक्सेल) की जैव-संवर्धन क्षमता पाई गई है, जो यू वृक्ष (टैक्सस एसपीपी.) द्वारा सूक्ष्म मात्रा में उत्पादित होता है। गाय के मूत्र का आसवन, जीवाणुओं पर विभिन्न एंटीबायोटिक दवाओं की निष्फलता क्षमता बढ़ाने के अलावा, स्तन कैंसर कोशिका लाइन एमसीएफ-7 के विरुद्ध पैक्लिटैक्सेल की कोशिका विभाजन अवरोधक गतिविधि को भी बढ़ा सकता है। इसके अलावा, गाय के मूत्र के आसवन से तैयार किए गए एक सफेद क्रिस्टलीय अवक्षेप ने भी गाय के मूत्र के आसवन के समान सक्रियता दिखाई। इस शोध निष्कर्ष पर अमेरिका का पेटेंट भी प्राप्त कर लिया गया है।</div><div><br></div><div>लेकिन अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की पराकाष्ठा की सीमा भी लांघ चुकी कांग्रेस पार्टी ने लगता है कि अपनी पुरानी बीमारी के चलते हिन्दू आस्था के साथ-साथ विज्ञान का भी उपहास उड़ाना शुरू कर दिया है।</div><div><br></div><div>वैसे प्रियंका के गोमूत्र के उपहास उड़ाने के प्रयास को देख कर किसी को आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि इनकी दादी पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी गोअष्टमी के दिन 7 नवम्बर, 1966 को संसद भवन के सामने निहत्थे गोभक्तों, संतों व गोमाता पर गोलियां चलवा कर दिल्ली की सडक़ों को रक्तरंजित करने का पराक्रम दिखा चुकी हैं। केरल में यूथ कांग्रेस के प्रदर्शनकारी सार्वजनिक रूप से एक बछड़े की हत्या कर उसके मांस की दावत उड़ा चुके हैं। अच्छा होगा कि प्रियंका गांधी अपने किए अपराध के लिए समूचे देश से माफी मांगें अन्यथा यह न भूलें कि हिन्दू समाज गोरक्षा व गोसम्मान के लिए 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रान्ति कर चुका है। गोरक्षा व गोसम्मान हिन्दू आस्था से ही नहीं हिन्दू अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है।</div><div><br></div><div>- राकेश सैन</div><div>32 खण्डाला फार्म कालोनी,</div><div>ग्राम एवं डाकखाना रंधावा मसंदां</div><div>जालंधर।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 18:21:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/priyanka-mockery-of-cow-urine-reflects-the-congress-party-anti-hindu-mindset</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[साथियों को भूखे मरता छोड़ खुद जीत का जश्न बनाती कॉकरोच जनता पार्टी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/cjp-celebrating-its-own-victory-while-leaving-its-comrades-to-starve-to-death]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गिद्धों का भी एक धर्म होता है, वो जिंदा जानवरों का मांस नहीं खातीं। वह प्रतीक्षा करती हैं उसके मरने की और प्राण छोडऩे के बाद ही लोथड़ों को नोचती हैं। लेकिन आज का इंसान गिद्ध से भी ज्यादा विभत्स हो गया लगता है। नीट पेपर लीक को लेकर देश भर में प्राण गंवाने वाले 21 युवाओं के पोस्टर लगा कर दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना देने वाली कॉकरोच जनता पार्टी के नेता इन युवाओं का शोक मनाना तो दूर बल्कि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के तुरंत बाद फाइव स्टार होटलों में कुल्हे मटकाते और बोतलों के ढक्कन खोलते दिखे। पेपर लीक मामले में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र हो गया और लगभग एक महीने से दिल्ली के जंतर मंतर पर लोकतंत्र की नई-नई रखवाली कॉकरोच जनता पार्टी का धरना भी खत्म हो गया पर दो दिनों के भीतर ही इन नए नवेले लोकतंत्र के रखवालों का असली चेहरा सामने आने लगा है। नीट पेपर लीक होने के आक्रोश में मारे गए जिन युवाओं के पोस्टर लगा कर कोहराम मचाने वाली कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं ने इतना तमाशा किया वो अपने साथियों को भूखे मरता छोड़ खुद फाइव स्टार होटलों में ठुमके लगाते और बीयर पार्टी करते हुए दिखाई दिए। लाशों के मंच पर लग रहे ठुमके और उड़ रही शराब की दुर्गंध इस बात की साक्षी है कि इस तरह की हरकत करने वालों के मनों में कितनी सड़ांध भरी होगी।</div><div><br></div><div>केवल आम जनता ही नहीं बल्कि खुद सीजेपी के आंदोलन से जुड़े लोगों ने इसे शर्मनाक बताया है। सीजेपी के मंच पर भूख हड़ताल पर बैठे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने वायरल वीडियो को लेकर कहा है कि जीत के साथ विनम्रता भी होनी चाहिए। सोनम ने कहा कि सफलता पाने के साथ-साथ सम्मान और विनम्रता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। सीजेपी समर्थकों ने भी पार्टी के वीडियो की आलोचना की है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के संस्थापक सदस्य और कमेंटेटर-यूट्यूबर मेघनाद ने सीजेपी नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जब विरोध प्रदर्शन खत्म होने के बाद दर्जनों प्रदर्शनकारी सडक़ों पर बेघर और भूखे रह गए थे तब ये नेता पार्टी कर रहे थे। इंस्टाग्राम पोस्ट में मेघनाद ने कहा कि उन्होंने और कुछ अन्य लोगों ने उन दर्जनों प्रदर्शनकारियों के लिए यात्रा और भोजन का इंतजाम किया जो सीजेपी नेताओं के साथ एक महीने से ज्यादा समय से जंतर-मंतर पर डेरा डाले हुए थे। मेघनाद ने सीजेपी पार्टी के वीडियो के बारे में लिखा, ‘मैं यह सुबह 4 बजे देख रहा हूं। मैंने और कुछ लोगों ने पिछले दो दिनों में अपने पैसे से सीजेपी के उन वॉलंटियर्स और प्रदर्शनकारियों को घर भेजा है जिन्हें बेसहारा और भूखा छोड़ दिया गया था। मैं कुछ नहीं कहने वाला था लेकिन मैंने यह वीडियो देखा और मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है।’ उन्होंने सीजेपी के लिए कड़े शब्दों के साथ अपनी पोस्ट खत्म की, ‘जब आप पार्टी कर रहे थे तब दिल्ली में 70 से ज्यादा प्रदर्शनकारी और छात्र भूखे रह गए क्योंकि आपने परवाह न करने का फैसला किया था। बधाई हो सीजेपी आखिरकार आप भी एक और राजनीतिक पार्टी बन ही गए।’</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-will-be-strengthened-by-dialogue-not-by-violence" target="_blank">संवाद से सशक्त होगा लोकतंत्र, हिंसा से नहीं</a></h3><div>ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि किसी आंदोलन के खत्म होने के दो दिनों बाद ही उसमें फूट पड़ती दिख रही हो। आखिर पड़े भी क्यों ना, कुछ लोगों ने देश के युवाओं के आक्रोश का लाभ उठाया और देखते ही देखते वे दुनिया में अभियानवादियों के स्टार बन गए। उनकी कही बातें अब इंटरनेशनल मीडिया में गूंज रही हैं और उनकी भाव भंगिमा ऐसी है मानो उन्होंने बहुत बड़ा मार्का मार लिया हो। लेकिन क्या फाइव स्टार होटलों में गुलछर्रे उड़ाने वाले जेन-जी नेता बताएंगे कि आंदोलन के दौरान कितनी बार पेपर लीक के मृतकों को याद किया गया। केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे के बाद काक्रोचों ने अहंकारमयी मुद्रा में आकर कहा कि ‘झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए।’ सीजेपी के नेता जीत के जश्न में उन लोगों को क्यों भूल गए जिन्होंने अपनी जानें दीं। उन परिवारों को क्यों नहीं बुलाया गया जिन्होंने अपने बच्चों को खोया। असल में कुछ अभियानवादियों ने इन 21 युवाओं की लाशों का मंच की तरह उपयोग किया और अपना कद बड़ा कर चलते बने। कहने को ये जेन-जी वाले शिक्षा नीति में सुधार का नारा लेकर आए थे परंतु इनका असली नारा यही दिखता है कि ‘अपना काम है बनता-भाड़ में जाए जनता।’ ऐसे मुर्दाखोर आंदोलनकारियों पर तो शायद गिद्धों को भी शर्म आ जाए।</div><div><br></div><div>- राकेश सैन</div><div>32 खण्डाला फार्म कालोनी,</div><div>ग्राम एवं डाकखाना रंधावा मसंदां,</div><div>जालन्धर।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:53:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/cjp-celebrating-its-own-victory-while-leaving-its-comrades-to-starve-to-death</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, जेन-जी की ताकत और राजनीति के लिए बड़ा संदेश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/dharmendra-pradhan-resignation-the-power-of-gen-z-and-a-major-message-for-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय लोकतंत्र ने एक बार फिर यह साबित किया है कि जनता की आवाज यदि संगठित, शांतिपूर्ण और निरंतर हो तो वह सबसे शक्तिशाली सत्ता को भी आत्ममंथन के लिए विवश कर सकती है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं है बल्कि यह उस लोकतांत्रिक दबाव की स्वीकारोक्ति भी है, जो पिछले कई सप्ताह से देशभर के लाखों युवाओं ने अपने धैर्य, अनुशासन और दृढ़ता से निर्मित किया। हाल के घटनाक्रमों में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत के बाद आंदोलन समाप्त करने की घोषणा हुई और आंदोलन के नेतृत्व ने दावा किया कि उनकी प्रमुख मांगें स्वीकार कर ली गई। यह घटना केवल शिक्षा मंत्रालय तक सीमित नहीं रहेगी। आने वाले वर्षों में इसे उस मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जब भारत की जेन-जी ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और नागरिक भागीदारी से भी संचालित होता है।</div><div><br></div><div>इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसकी शुरुआत किसी स्थापित राजनीतिक दल ने नहीं की। यह आंदोलन सोशल मीडिया की दुनिया से निकला, व्यंग्य से शुरू हुआ और देखते ही देखते करोड़ों युवाओं की सामूहिक चेतना का प्रतीक बन गया। जिस ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग कथित रूप से अपमान के लिए किया गया था, उसी शब्द को युवाओं ने अपने आत्मसम्मान और प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि वह अपमान को भी प्रतिरोध की शक्ति में बदल देता है। इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति को एक नया पाठ पढ़ाया है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि सोशल मीडिया पर चलने वाले अभियान केवल कुछ दिनों की सनसनी होते हैं लेकिन इस बार ‘डिजिटल अभियान’ सड़क पर उतरा, शांतिपूर्ण जनआंदोलन में बदला और अंततः सत्ता को निर्णय लेने के लिए बाध्य कर गया। इससे स्पष्ट है कि भारत की नई पीढ़ी केवल ‘लाइक’ और ‘शेयर’ तक सीमित नहीं है; वह लोकतांत्रिक भागीदारी की नई भाषा लिख रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/dharmendra-pradhan-resignation-a-step-towards-dialogue-with-students" target="_blank">संदर्भ धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र- छात्रों से संवाद की ओर बढ़ते कदम</a></h3><div>हालांकि इस जीत का सबसे बड़ा श्रेय केवल आंदोलन की सफलता को नहीं बल्कि उसके संयम को भी जाता है। अनेक स्थानों पर तनाव और पुलिस कार्रवाई के बावजूद आंदोलन के नेतृत्व ने लगातार संवैधानिक और शांतिपूर्ण विरोध की अपील की। यही कारण है कि इस आंदोलन को व्यापक सामाजिक समर्थन मिला। लोकतंत्र में किसी भी जनआंदोलन की नैतिक शक्ति उसकी अहिंसा और अनुशासन से ही आती है। हालांकि इस जीत के साथ कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े होते हैं। क्या केवल एक मंत्री का इस्तीफा शिक्षा व्यवस्था की उन गहरी समस्याओं का समाधान कर देगा, जिनके कारण यह आंदोलन जन्मा? क्या प्रश्नपत्र लीक की घटनाएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी? क्या भर्ती परीक्षाओं में वर्षों से चली आ रही देरी खत्म हो जाएगी? क्या करोड़ों युवाओं को रोजगार की नई संभावनाएं मिल जाएंगी? इन प्रश्नों का उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में है।</div><div>धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा राजनीतिक जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण उदाहरण अवश्य है किंतु इसे अंतिम समाधान मान लेना भूल होगी। यदि परीक्षा प्रणाली की संरचनात्मक कमियां जस की तस रही, यदि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियों में पारदर्शिता और तकनीकी सुरक्षा नहीं बढ़ी, यदि दोषियों को समयबद्ध दंड नहीं मिला और यदि भर्ती प्रक्रियाएं पहले की तरह वर्षों तक अटकी रही तो आज का यह जनसंतोष भविष्य में फिर नए रूप में सामने आ सकता है। सरकार के लिए भी यह आत्मचिंतन का अवसर है। लोकतंत्र में किसी आंदोलन को केवल राजनीतिक षड्यंत्र मानकर खारिज कर देना कभी भी दूरदर्शी नीति नहीं हो सकती। शुरुआत में यदि युवाओं की शिकायतों को अधिक गंभीरता से सुना जाता, संवाद स्थापित किया जाता और सुधारों की स्पष्ट समय सीमा घोषित की जाती तो शायद स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती। अंततः सरकार ने बातचीत का रास्ता चुना और यही लोकतंत्र की सही दिशा भी है।</div><div><br></div><div>विपक्ष के लिए भी यह अवसर आत्ममंथन का है। इस आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि इसकी ऊर्जा किसी पारंपरिक राजनीतिक दल से नहीं बल्कि युवाओं की स्वतःस्फूर्त भागीदारी से आई। इससे स्पष्ट संदेश मिलता है कि आज की पीढ़ी केवल राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि ठोस समाधान चाहती है। यदि विपक्ष भी केवल राजनीतिक लाभ तक सीमित रहेगा और शिक्षा सुधार के ठोस एजेंडे पर गंभीरता नहीं दिखाएगा तो वह भी युवाओं की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाएगा। मीडिया और खासकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका पर भी प्रश्न उठते हैं। प्रारंभिक दिनों में आंदोलन को सोशल मीडिया की सनसनी समझने वाले अनेक मंच बाद में उसकी गंभीरता को स्वीकार करने के लिए विवश हुए। लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व केवल टकराव के दृश्य दिखाना नहीं बल्कि उन कारणों की पड़ताल करना भी है, जिनके कारण लाखों युवा सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं।</div><div><br></div><div>इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय लोकतंत्र में एक नई राजनीतिक संस्कृति की भी शुरुआत की है। यह संस्कृति व्यक्ति-पूजा से अधिक मुद्दों पर आधारित है। यह आंदोलन किसी जाति, भाषा, क्षेत्र या धर्म के आधार पर नहीं बल्कि समान अवसर, निष्पक्ष परीक्षा और जवाबदेह शासन जैसी सार्वभौमिक लोकतांत्रिक मांगों पर आधारित था। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति रही। आज आवश्यकता इस विजय का उत्सव मनाने से अधिक उसके संदेश को समझने की है। सरकार को परीक्षा प्रणाली में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, डिजिटल सुरक्षा, समयबद्ध भर्ती, स्वतंत्र परीक्षा नियामक और दोषियों के लिए त्वरित दंड जैसी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता देनी होगी। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास तभी लौटेगा, जब छात्र यह महसूस करेगा कि उसकी मेहनत किसी भ्रष्ट तंत्र की भेंट नहीं चढ़ेगी। भारत विश्व का सबसे युवा देश है। यही युवा आने वाले विकसित भारत की सबसे बड़ी पूंजी हैं। यदि यही पीढ़ी व्यवस्था पर विश्वास खो दे तो किसी भी आर्थिक उपलब्धि का महत्व कम हो जाएगा लेकिन यदि यही पीढ़ी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाए, सरकार उसे सुने, विपक्ष जिम्मेदारी निभाए और संस्थाएं स्वयं को सुधारें तो यही ऊर्जा भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है, यह लोकतंत्र की उस जीवंतता का प्रमाण है, जिसमें सत्ता से अधिक शक्तिशाली जनता का विश्वास होता है। जेन-जी ने यह सिद्ध कर दिया है कि शांतिपूर्ण जनशक्ति आज भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। अब अगली परीक्षा सरकार की है कि क्या वह इस जनादेश को केवल एक राजनीतिक संकट मानकर भूल जाएगी या इसे शिक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक सुधारों का अवसर बनाएगी? यदि इस आंदोलन से केवल चेहरा बदला और व्यवस्था नहीं बदली तो इतिहास इसे अधूरी जीत कहेगा लेकिन यदि इससे परीक्षा प्रणाली पारदर्शी बनी, युवाओं का भरोसा लौटा और जवाबदेही संस्थागत रूप ले सकी, तब यह आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में उस क्षण के रूप में दर्ज होगा, जब देश की नई पीढ़ी ने सत्ता को हराया नहीं बल्कि लोकतंत्र को मजबूत किया।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:51:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/dharmendra-pradhan-resignation-the-power-of-gen-z-and-a-major-message-for-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आख़िर क्या हो 'प्रदर्शन प्रोटोकॉल' ताकि न होने पाए उपद्रव?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/what-exactly-should-the-protest-protocol-be-to-prevent-disturbances]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>किसी भी लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार और जन-जीवन की सुरक्षा—दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। इसलिए ऐसा प्रोटोकॉल होना चाहिए जो शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करे, लेकिन हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ को रोके। गत दिनों कॉकरोच जनता पार्टी/सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली या अन्य राज्यों में जो कुछ हुआ, उससे यह प्रश्न एक बार पुनः प्रासंगिक हो चुका है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चूंकि इससे पहले भी अनेक प्रदर्शन उग्र हुए, जिससे सरकारी व निजी संपत्ति की क्षति हुई, पर कार्रवाई वही लीपापोती वाली या फिर दलगत प्रतिशोध जैसी, जबकि दोनों अनुचित हो। ऐसी कोई भी कार्रवाई निष्पक्ष होनी चाहिए। जानकारों की राय में एक संतुलित "प्रदर्शन प्रोटोकॉल" इस प्रकार हो सकता है:-&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/dharmendra-pradhan-resignation-a-step-towards-dialogue-with-students" target="_blank">संदर्भ धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र- छात्रों से संवाद की ओर बढ़ते कदम</a></h3><div>पहला, पूर्व अनुमति और उत्तरदायित्व: आयोजकों को समय, मार्ग, अनुमानित भीड़ और जिम्मेदार पदाधिकारियों की जानकारी पहले से देनी चाहिए।</div><div><br></div><div>दूसरा, शांति की लिखित प्रतिज्ञा: आयोजक यह लिखित आश्वासन दें कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहेगा। हिंसा होने पर दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई में सहयोग करेंगे।</div><div><br></div><div>तीसरा, निर्धारित स्थान और मार्ग: प्रदर्शन के लिए तय मार्ग और स्थान हों, ताकि अस्पताल, स्कूल, एम्बुलेंस और आवश्यक सेवाएं बाधित न हों।</div><div><br></div><div>चौथा, वीडियो रिकॉर्डिंग और बॉडी कैमरा: पुलिस और आयोजकों—दोनों की ओर से रिकॉर्डिंग हो, ताकि बाद में यह स्पष्ट हो सके कि हिंसा किसने शुरू की।</div><div><br></div><div>पांचवां, हथियार और खतरनाक सामग्री पर प्रतिबंध: लाठी, पेट्रोल, पत्थर, ज्वलनशील पदार्थ या अन्य खतरनाक सामान लाने पर रोक हो।</div><div><br></div><div>छठा, चरणबद्ध पुलिस कार्रवाई: पुलिस पहले संवाद करे, फिर चेतावनी दे, उसके बाद ही आवश्यकता पड़ने पर न्यूनतम बल का प्रयोग करे।</div><div><br></div><div>सातवां, तोड़फोड़ की भरपाई: यदि जांच में साबित हो कि किसी व्यक्ति या समूह ने सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, तो उससे क्षतिपूर्ति वसूली जाए। केवल भीड़ में मौजूद होने के आधार पर किसी पर दायित्व न डाला जाए।</div><div><br></div><div>आठवां, उकसाने वालों की पहचान: सीसीटीवी, ड्रोन और वीडियो साक्ष्यों के आधार पर वास्तविक उपद्रवियों की पहचान कर कार्रवाई हो। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसक तत्वों में स्पष्ट अंतर किया जाए।</div><div><br></div><div>नौवां,&nbsp; स्वतंत्र निगरानी: बड़े प्रदर्शनों में न्यायिक या स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की व्यवस्था हो, जिससे पुलिस और प्रदर्शनकारियों—दोनों की जवाबदेही बनी रहे।</div><div><br></div><div>दसवां, समान कानून, समान अनुपालन: नियम किसी भी संगठन, दल, जाति या विचारधारा के लिए अलग-अलग नहीं होने चाहिए। कानून का निष्पक्ष और समान रूप से पालन ही जनता का विश्वास बढ़ाता है।</div><div><br></div><div>ऐसा प्रोटोकॉल लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करेगा। इससे नागरिकों का शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भी सुरक्षित रहेगा और समाज को हिंसा, आगजनी तथा सार्वजनिक संपत्ति की क्षति से भी बचाया जा सकेगा।</div><div><br></div><div># ज्वलंत प्रश्न: प्रोटोकॉल टूटने पर राजनीतिक दलों और संगठनों के नेतृत्व व संलिप्त तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होना चाहिए या नहीं?</div><div><br></div><div>चूंकि यह एक नीतिगत और कानूनी प्रश्न है। लिहाजा इसका संतुलित उत्तर यह है कि सिर्फ नेतृत्व के पद पर होने के कारण कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, लेकिन यदि कानून के अनुसार उनकी जिम्मेदारी या संलिप्तता सिद्ध होती है, तो अवश्य होनी चाहिए।</div><div><br></div><div>लोकतांत्रिक व्यवस्था में निम्न सिद्धांत उचित माने जा सकते हैं:&nbsp;</div><div><br></div><div>एक, यदि नेतृत्व ने हिंसा के लिए उकसाया, उसका निर्देश दिया, या हिंसक गतिविधियों की योजना में शामिल था, तो उसके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए।</div><div><br></div><div>दो, यदि न्यायिक प्रक्रिया या जांच से यह सिद्ध हो कि नेतृत्व ने जानबूझकर हिंसा रोकने के अपने दायित्व की अनदेखी की, तो प्रासंगिक कानूनों के तहत जवाबदेही तय की जा सकती है।</div><div><br></div><div>तीन, यदि प्रदर्शन की शर्तों का गंभीर उल्लंघन हुआ और आयोजक ने सहयोग नहीं किया, तो भविष्य में अनुमति पर प्रतिबंध, आर्थिक दंड या अन्य वैधानिक कार्रवाई जैसे उपाय किए जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>लेकिन केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी दल या संगठन का प्रमुख है, उसके विरुद्ध बिना साक्ष्य के कार्रवाई करना कानून के शासन और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।</div><div><br></div><div>सबसे उपयुक्त व्यवस्था यह होगी कि व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी साक्ष्य के आधार पर तय हो। संगठनात्मक जिम्मेदारी अलग से तय हो, जैसे क्षतिपूर्ति या प्रशासनिक दंड। सभी दलों और संगठनों पर एक ही नियम समान रूप से लागू हों। अंतिम निर्णय स्वतंत्र जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर हो, न कि राजनीतिक दबाव में। इस प्रकार, कठोर जवाबदेही होनी चाहिए, लेकिन वह साक्ष्य, निष्पक्ष जांच और विधि के शासन पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल पद या राजनीतिक पहचान पर।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 18:07:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/what-exactly-should-the-protest-protocol-be-to-prevent-disturbances</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[छात्र आंदोलन: प्रधानमंत्री के सेल्फी वीडियो संवाद के नीतिगत व सियासी मायने]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/student-movement-policy-and-political-implications-of-the-prime-minister-selfie-video-interaction]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जब नई दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में छात्र राजनीति गरमाई तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद ही मोर्चा संभाल लिया और सोशल मीडिया मंच "इंस्टाग्राम" पर किए अपने एक लगभग 2.55 मिनट के सेल्फी वीडियो पोस्ट के माध्यम से जेन-जी से संवाद स्थापित कर विपक्षी नेताओं के सियासी चक्रब्यूह को सफलतापूर्वक भेद दिया। छात्र आंदोलन के दृष्टिगत प्रधानमंत्री के सेल्फी वीडियो संवाद के नीतिगत व सियासी मायने दूरगामी प्रभाव वाले साबित होंगे।</div><div><br></div><div>इस बात में कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी के इस निर्णायक पहल से पुनः यह स्पष्ट हो गया कि पीएम मोदी भारतीय राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं और जब जब सियासी फुटबॉल सुर्खियों में आता है, तब तब वह खुद ही आगे आकर कांग्रेस के नेता प्तिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ राजनीतिक मैदान का तगड़ा गोल मारते हुए उन्हें अप्रासंगिक बना डालते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>बीते 12 वर्षों में ऐसे कई मौके आए जब भाजपा का विकल्प बनने चला कांग्रेस नीत विपक्ष अपने संकल्प सिद्धि की राह से ही भटक गया या प्रधानमंत्री की नीतिगत पहल से भटका दिया गया, राजनीतिक शोधकर्ताओं के लिए अनुसंधान का विषय है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/rahul-gandhi-strong-stance-on-education-system-dharmendra-pradhan-resignation-is-the-first-step" target="_blank">शिक्षा व्यवस्था पर Rahul Gandhi की हुंकार: Dharmendra Pradhan का इस्तीफा पहला कदम, PM Modi अब भी माफी मांगें</a></h3><div>बहरहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 जुलाई दिन गुरुवार की मध्य रात अपनी एक सेल्फी-स्टाइल वीडियो इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया, जिसका केंद्र बिंदु NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसा संवेदनशील मुद्दा था। उस वीडियो में पीएम मोदी ने भावुकता भरे अंदाज में&nbsp; मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें कहीं:&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, उन्होंने कहा कि पेपर लीक कोई साधारण घटना नहीं है, बल्कि इससे लाखों छात्रों और उनके परिवारों को गहरा दुख और मानसिक पीड़ा होती है। दूसरा, उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करेगी और पेपर लीक रोकने के लिए व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, उन्होंने घोषणा की कि केंद्रीय मंत्रिमंडल एक ऐसे विधेयक पर विचार करेगा, जिसमें पेपर लीक से जुड़े मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का प्रावधान, दोषियों के लिए कड़े दंड, और परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा को मजबूत करने के उपाय शामिल होंगे। चौथा और अंतिम, उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की प्राथमिकता रही कि पेपर लीक के कारण छात्रों का एक शैक्षणिक वर्ष बर्बाद न हो।&nbsp;</div><div><br></div><div>देखा जाए तो यह वीडियो इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि प्रधानमंत्री ने इसे रात लगभग 11:52 बजे, अपेक्षाकृत अनौपचारिक सेल्फी वीडियो के रूप में जारी किया, जिसे कई विश्लेषकों ने युवाओं, विशेषकर Gen-Z, से सीधे संवाद स्थापित करने की नई शैली के रूप में देखा।&nbsp;</div><div><br></div><div>बाद में, उन्होंने दूसरे वीडियो में युवाओं को उनकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों के लिए धन्यवाद भी दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे इंस्टाग्राम वीडियो में मुख्य रूप से युवाओं, खासकर छात्रों, को संबोधित किया। उनके संदेश का सार यह था कि पिछले वीडियो पर युवाओं की प्रतिक्रिया और सकारात्मक सुझावों के लिए वे आभारी हैं।</div><div><br></div><div>उन्होंने कहा, "Thank you, friends. कल देर रात आपसे जुड़ने का अवसर मिला। आपने मेरे वीडियो पर जिस तरह प्रतिक्रिया दी और सकारात्मक सुझाव दिए, उसके लिए आप सभी का धन्यवाद।" उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं का यह स्नेह और सुझाव सरकार के प्रयासों को और मजबूत करेंगे तथा उनका युवाओं से जुड़ाव और गहरा होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>दरअसल, यह वीडियो उनके उस पहले इंस्टाग्राम संदेश के बाद आया, जिसमें उन्होंने NEET सहित परीक्षा-पत्र लीक के मुद्दे पर कड़ी कार्रवाई, सख्त कानून और फास्ट-ट्रैक अदालतों की बात कही थी। दूसरे वीडियो का उद्देश्य उस पहले संदेश पर मिली प्रतिक्रिया के लिए युवाओं का आभार व्यक्त करना था।&nbsp;</div><div><br></div><div>राजनीतिक दृष्टि से, कई विश्लेषकों ने इसे Gen-Z युवाओं से सीधे डिजिटल संवाद स्थापित करने की रणनीति के रूप में देखा है, जबकि विपक्ष ने इसकी आलोचना भी की है।&nbsp;</div><div>यदि बात उसी इंस्टाग्राम वीडियो और उसके बाद की घटनाओं की है, तो यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि छात्र आंदोलन पर उसका निर्णायक प्रभाव पड़ा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अब तक मिली जानकारी के आधार पर कुछ संभावित प्रभाव दिखे हैं: जैसे आंदोलन की दिशा बदली, समाप्त नहीं हुई। हां, प्रधानमंत्री द्वारा सीधे छात्रों को संबोधित करने और पेपर लीक पर सख्त कानून तथा फास्ट-ट्रैक अदालतों की बात करने के बाद आंदोलन का फोकस केवल विरोध से हटकर सरकार के वादों के क्रियान्वयन पर भी आ गया।</div><div><br></div><div>वहीं कुछ छात्रों में इसका सकारात्मक संदेश गया। कई छात्रों ने इसे इस संकेत के रूप में देखा कि सरकार ने उनकी चिंता को गंभीरता से लिया है और शीर्ष स्तर से प्रतिक्रिया आई है। वहीं कुछ छात्रों में संदेह भी बना रहा।</div><div>खासकर छात्र संगठनों और विपक्ष के कुछ नेताओं ने कहा कि केवल घोषणा पर्याप्त नहीं है; वास्तविक बदलाव तब माना जाएगा जब पेपर लीक के मामलों में शीघ्र कार्रवाई हो, दोषियों को सजा मिले, और परीक्षा प्रणाली में ठोस सुधार दिखाई दें।&nbsp;</div><div><br></div><div>लिहाजा सोशल मीडिया पर बहस तेज हुई। वीडियो के बाद #PaperLeak, #NEET और युवाओं से जुड़े विषयों पर व्यापक चर्चा हुई। इससे मुद्दा सार्वजनिक विमर्श में बना रहा। जहाँ तक समग्र आकलन की बात है तो इस समय उपलब्ध संकेतों के अनुसार, प्रधानमंत्री के संदेश ने राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव अवश्य डाला है, लेकिन क्या इससे छात्र आंदोलन स्थायी रूप से कमजोर पड़ा या समाप्त हो गया, ऐसा कहना उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उचित नहीं होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार अपनी घोषित कार्रवाइयों को कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से लागू करती है, और छात्र संगठन उन कदमों को कितना पर्याप्त मानते हैं। हालांकि, जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोशल मीडिया पर मध्य रात्रि में विशेष रूप से Gen-Z (जेन-जी) युवाओं को संबोधित किया गया, उसके कई राजनीतिक, प्रशासनिक और संचार-संबंधी मायने हो सकते हैं, जो इस प्रकार हैं:-</div><div><br></div><div>पहला, डिजिटल पीढ़ी तक सीधे पहुंचने की रणनीति:&nbsp; Gen-Z पारंपरिक मीडिया की तुलना में सोशल मीडिया पर अधिक सक्रिय है। देर रात भी इस आयु वर्ग का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन रहता है, इसलिए उस समय संदेश देना अधिक प्रभावी माना जा सकता है।</div><div><br></div><div>दूसरा, भविष्य के मतदाताओं पर फोकस: 18–29 वर्ष के लगभग 50 करोड़ युवा मतदाता चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए जितनी साफगोई पूर्वक उन्होंने नीट पेपर लीक मामले में अपनी सरकार का पक्ष रखा है, उसी तरह से आगे यदि संदेश रोजगार, नवाचार, स्टार्टअप, शिक्षा, कौशल या राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर केंद्रित होकर दें, तो इसे युवाओं के साथ संवाद मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है।</div><div><br></div><div>तीसरा, प्रशासनिक संदेश: जिस तरह से नीट पेपर लीक मामले में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार का पक्ष रखा और दूसरे दिन ही लापरवाह अधिकारियों पर गाज गिरा दी, उससे छात्रों के बीच सकारात्मक और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सख्त संदेश गया है। ऐसे में यदि भविष्य के संबोधन में सरकारी योजनाओं, डिजिटल सेवाओं, साइबर सुरक्षा, कौशल विकास या नागरिक भागीदारी का उल्लेख हो, तो इसका उद्देश्य युवाओं को शासन में सहभागी बनाना भी हो सकता है।</div><div><br></div><div>चौथा, राजनीतिक संचार का नया मॉडल: सोशल मीडिया के माध्यम से सीधे संवाद करने से पारंपरिक मीडिया की मध्यस्थता कम हो गई है। क्योंकि इससे प्रधानमंत्री जैसे नेता ने अपनी बात बिना संपादकीय फिल्टर के सीधे समर्थकों और आम नागरिकों तक अपनी भावनात्मक बात पहुंचा दी है। यह बिल्कुल नई शुरुआत है।</div><div><br></div><div>पांचवां, वैश्विक डिजिटल राजनीति का प्रभाव: दुनिया के कई नेता अब सोशल मीडिया को प्राथमिक संवाद माध्यम बना रहे हैं। ऐसे में यह कदम डिजिटल कूटनीति और आधुनिक राजनीतिक संचार की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा भी हो सकता है।</div><div><br></div><div>हालांकि विपक्ष ने उनके इस पहल की आलोचनाएं भी की हैं। विपक्ष ने इसे राजनीतिक संदेश या चुनावी छवि निर्माण का प्रयास बताया है। कुछ विशेषज्ञ ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या देर रात का समय सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचने के लिए उपयुक्त है। यदि महत्वपूर्ण नीतिगत घोषणा केवल सोशल मीडिया पर की जाए, तो पारदर्शिता और संस्थागत संवाद पर भी चर्चा हो सकती है।</div><div><br></div><div>निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि मध्य रात्रि में Gen-Z युवाओं को सोशल मीडिया के माध्यम से संबोधित करना केवल समय का चयन नहीं, बल्कि डिजिटल संचार, युवा सहभागिता और राजनीतिक संदेश-प्रबंधन का एक रणनीतिक कदम भी है। इसकी वास्तविक राजनीतिक और प्रशासनिक व्याख्या अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि संदेश का नीट पेपर लीक के बाद अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत छात्रों पर क्या प्रभाव पड़ा, उसका उद्देश्य यदि आंदोलनरत छात्रों को प्रभावित करना था, तो उसके बाद सरकार, संसद व संविधान के अन्य स्तम्भों के साथ साथ जनता की प्रतिक्रिया कैसी रही? यह समीचीन विषय है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 18:31:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/student-movement-policy-and-political-implications-of-the-prime-minister-selfie-video-interaction</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन का कुछ राजनेताओं ने कर दिया राजनीतिकरण!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/some-politicians-politicized-the-students-peaceful-protest]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नीट-यूजी की 3 मई 2026 को आयोजित मूल परीक्षा के पेपर लीक होने की खबरों के बाद 12 मई 2026 को सरकार ने नीट की परीक्षा को रद्द कर दिया था। तब से ही छात्रों में आक्रोश व्याप्त है और वह देश के विभिन्न हिस्सों में शांति पूर्ण तरीके से धरना प्रदर्शन करके अपना जबरदस्त विरोध प्रकट कर रहे थे। लेकिन अचानक ही 16 मई 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नामक एक पार्टी बन जाती है और वह पार्टी छात्रों के आंदोलन में कूद पड़ती है, उस पार्टी के द्वारा दिल्ली में जून के प्रथम सप्ताह से धरना प्रदर्शन शुरू किया जाता है, इस धरना प्रदर्शन में सबकुछ ठीक ठाक ही चल रहा था, लेकिन जब से कुछ राजनेताओं की एंट्री हुई है तब से ही छात्रों की मूल मांगो से खिलवाड़ होना शुरू हो गया है। हालांकि केंद्र सरकार ने नीट परीक्षा के पेपर लीक के इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को इस मामले की जांच सौंपी दी थी। वही सरकार के द्वारा नए सिरे से नीट की पुनर्परीक्षा 21 जून 2026 को आयोजित की जा चुकी है, 16 जुलाई 2026 की रात को पुनर्परीक्षा के नतीजे भी एनटीए के द्वारा घोषित कर दिए गए हैं। लेकिन आजकल जबरदस्त प्रतियोगिता के इस दौर में सरकारी नौकरी व महत्वपूर्ण परीक्षाओं के पेपर बार-बार रद्द होने के कारण देशभर के छात्रों में भारी मानसिक तनाव के चलते विरोध की स्थिति जबरदस्त ढंग से देखने को मिल रही है। छात्रों के द्वारा लगातार देश व प्रदेशों के नीति-निर्माताओं से&nbsp; परीक्षाओं की निष्पक्षता और छात्रों के बीच विश्वसनीयता को बरकरार रखने के लिए धरातल पर ठोस आवश्यक कदम उठाने की मांग भी लगातार की जा रही है। वहीं केंद्र सरकार निरंतर छात्रों को आश्वस्त कर रही थी कि वह भविष्य में आयोजित परीक्षाओं में पेपर लीक रोकने के लिए ठोस कदम उठा रही है, फिर भी आंदोलन जारी है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छात्र आंदोलन में जब सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की एंट्री होती है, वह भूख हड़ताल पर बैठ जाते हैं और जब भूख हड़ताल एक-एक दिन करके लंबी चलने लगती है, तो छात्रों का शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा यह आंदोलन देश के कुछ राजनेताओं के लिए अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए एक शानदार पर्यटन स्थल बन जाता है, जिसके चलते धरनास्थल पर बहुत तेज़ी से छोटे व बड़े राजनेताओं का तांता लगने लग जाता है। अब पिछले कुछ दिनों से जिस तरह की स्थिति कुछ लोगों व राजनेताओं के द्वारा देश राजधानी दिल्ली में बनायी जा रही है, उससे अब यह स्पष्ट होता जा रहा कि लंबे अरसे से आंदोलनरत छात्रों की मूल मांगें राजनीतिकरण के चलते अब पीछे छूट गई हैं। छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन को आज कुछ लोगों के गैंग ने छात्र हित के जगह पर्दे के पीछे छिपी सत्ता हथियाने की सीढ़ी से केंद्र व प्रदेशों में सत्ता परिवर्तन करने का हथियार बना लिया है। छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन को कुछ लोगों व राजनेताओं ने पूर्व की भांति ही सत्ता परिवर्तन करने की महत्वाकांक्षा का हथियार बनाते हुए आंदोलन को राजनेताओं की स्वार्थ पूर्ति अखाड़ा बनाकर रख दिया है। हर बार की ही तरह इस बार भी छात्रों के बेहद शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे आंदोलन को कुछ चतुर, चालाक व बेहद ही स्वार्थी राजनेता ने घुसकर के छात्रों व देश युवाओं के केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रोश को अपने क्षणिक हितों को साधने की ताकतवर ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करते हुए अपने व्यक्तिगत एजेंडे व हितों की पूर्ति करने व पार्टी के हितों को साधने वाली राजनीतिक जमीन को मजबूत करने वाला आंदोलन बनाकर रख दिया है। छात्रों के नाम पर शुरू हुए आंदोलन में अब छात्रों&nbsp; के हित की बातें बहुत पीछे छूटते जा रही हैं, राजनेताओं के छिपे हुए एजेंडे छात्र व नौजवानों के हितों पर हावी होते जा रहे हैं, कुछ लोगों के द्वारा आंदोलन को हिंसक बनाते हुए राजनीतिकरण किया जा रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/is-sonam-wangchuk-betray-what-really-happened-behind-the-scenes" target="_blank">सोनम बेवफा निकले? बेपटरी होते आंदोलन के कारण या कुछ और है वजह, वांगचुक के अनशन तोड़ने की इनसाइड स्टोरी</a></h3><div>नीट परीक्षा लीक कांड के बाद से ही सरकारी परीक्षाओं में पेपर लीक रोकते हुए देश में छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए रणनीति बनाने की मांग व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे लेकर के शुरू हुई छात्रों की मांग पर अब पूरी तरह से राजनीति का शिकार होती जा रही है। छात्रों के शांति प्रिय आंदोलन में कुछ राजनेताओं की कृपा से अब तो आलम यह हो गया है कि कुछ राजनेता को छात्रों के विरोध का यह अवसर पर देश व प्रदेशों की सत्ता को परिवर्तित कर सत्ता पर काबिज होने का एक बड़ा अवसर तक लग रहा है। छात्रों के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर देश के पक्ष-विपक्ष के राजनेताओं के द्वारा जमकर के राजनीति की जा रही है, सड़क से लेकर संसद तक हर तरफ़ संग्राम छिड़ा हुआ है, सड़क पर कुछ लोगों के द्वारा जबरदस्त टकराव की स्थिति उपस्थिति उत्पन्न करते हुए, लोगों के जान-माल व देश की बहुमूल्य संपत्तियों व सुरक्षा कर्मियों तक को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं 20 जुलाई 2026 से ही जब से संसद में मानसून सत्र शुरु हुआ है तब से ही छात्रों व अन्य मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा व समस्या के स्थाई निदान पर चर्चा करने की जगह जमकर के हंगामा बरपाया जा रहा है। हालांकि देश की सुरक्षा एजेंसियां छात्र आंदोलन की आड़ में देशविरोधी गतिविधियों होने की लगातार संभावना व्यक्त कर रही हैं, लेकिन फिर भी किसी भी पक्ष को राष्ट्र व छात्रों के हितों की कोई चिंता वास्तव में नज़र नहीं आती है, केवल और केवल किसी भी तरह से सत्ता हथियाने व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा करवाने की चिंता ज्यादा है। हालांकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को दुविधा में डालने से पहले और हंगामा खड़ा होने से पहले ही स्वयं ही नैतिकता के आधार पर बिना किसी भी जोर दवाब के केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा स्वेच्छा से पहले ही दे देना चाहिए था और सरकार का विवेक था कि वह धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को स्वीकार करती या अस्वीकार करती। लेकिन छात्रों, अभिभावकों व हमें भी निष्पक्ष रूप से यह विचार अवश्य करना चाहिए कि क्या केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पूर्ण हो जाने से भविष्य में देश में पेपर लीक की यह घटनाएं रुक जायेंगी, क्या इस्तीफे से छात्रों व युवाओं का भविष्य सुरक्षित हो जायेगा। वैसे भी आज की परिस्थितियों में आंदोलनरत छात्रों को भी यह आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए कि आज उनका शांतिपूर्ण आंदोलन कहां आकर के खड़ा हो गया है, क्या आंदोलन पर कब्जा जमाकर के बैठे नेताओं के द्वारा छात्र हित की बातें आज किसी समाधान करने वाले वास्तविक पटल पर उठायी जा रही हैं या इन नेताओं के द्वारा चतुराई से छात्रों की आड़ में अपने-अपने छिपे हुए एजेंडे को पूरा करा जा रहा है। सभी आंदोलनरत छात्रों को ध्यान रखना चाहिए कि हमारे प्यारे देश में ओछी राजनीति कब क्या करा दें, उसका कोई भरोसा नहीं है, इसलिए वह पूरी तरह से सज़ग रहें और शांतिपूर्ण आंदोलन को छात्र व नौजवानों के हितों तक ही सीमित करते हुए किसी भी कीमत पर हिंसक ना होने दें, तब ही देर सबेर छात्रों के हितों की बात को लेकर के कुछ ठोस निर्णय अवश्य होगा।</div><div><br></div><div>- दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप&nbsp;</div><div>अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 15:36:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/some-politicians-politicized-the-students-peaceful-protest</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[तत्काल स्वास्थ्य लाभ के चक्कर में डॉक्टर शॉपिंग का नया चलन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-new-trend-of-doctor-shopping-in-pursuit-of-immediate-health-benefits]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>समय के साथ सोच में एक बड़ा बदलाव तेजी से यह देखने में आ रहा है कि यदि जुखाम, बुखार, खांसी जैसी सामान्य बीमारी में भी डॉक्टर की दवा से तत्काल राहत नहीं मिलती तो अब डॉक्टर बदलने में कोई गुरेज नहीं होता। देखा जाएं तो तुरंत स्वास्थ्य लाभ की प्रवृति के कारण डॉक्टर के ईलाज पर विश्वास में कहीं ना कहीं कमी देखने में आने लगी है और इसके परिणाम स्वरुप महानगरों में डॉक्टर शापिंग का नया ही चलन चलने लगा है। खासतौर से मरीज से मिलने-मिलाने वाले चिकित्सक बदलने की सलाह देने में किसी तरह का कोई गुरेज नहीं करते। चिकित्सक बदलने में कोई बुराई नहीं है पर जिस चिकित्सक से ईलाज करवा रहे हैं उससे बीमारी ठीक होने की संभावना के संबंध में चर्चा करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अन्य चिकित्सक की सलाह लेना और चिकित्सक बदलने में हमें अंतर करके चलना होगा। बीच ईलाज ही बार बार डाक्टर बदलने के कई साइड इफेक्ट से भी दो चार होना पड़ता है और कई बार तो डॉक्टर बदलने का यह प्रयोग ईलाज पर विपरीत प्रभाव और गंभीर संकट में डाल देता है। मिसाल के तौर पर सामान्य खांसी की बीमारी या पेट में गड़बड़ या वाइरल बुखार होने पर जब डॉक्टर द्वारा दवा का जो कोर्स दिया जाता है उसके पूरा होने के पहले ही यानी की मान लो पांच दिन का कोर्स दिया है तो तीसरे दिन ही अधीर होकर दूसरे डॉक्टर की शरण में जाना आम होता जा रहा है। हांलाकि यह प्रवृति कुछ ही लोगों में है पर महानगरों और बड़े शहरों में इस तरह की प्रवृति जिस तेजी से बढ़ती जा रही है वह गंभीर चिंता का सबब बनती जा रही है। चिकित्सकीय भाषा में कहा जाए तो यह प्रवृति शापिंग का एक नया रुप डॉक्टर शापिंग के रुप में तेजी से फैलती जा रही है। हो यह रहा है कि इसके साइड इफेक्ट से अनजान होकर आगे बढ़ रहे है।&nbsp;</div><div><br></div><div>डॉक्टर शापिंग का कंसेप्ट बीसवीं सदी में नशीली दवाओं की प्राप्ति के लिए किये जाने वाले प्रयासों के लिए चलन में आया था। नशीली दवाओं के आदतन लोग एक से दूसरे डॉक्टर के पास परचा लिखवाने इसलिए जाते थे ताकि नशीली दवाओं का संग्रह कर सके। क्योंकि नशीली दवा एक सीमा तक ही मिलती थी और बिना चिकित्सक के परचे के मिलना लगभग मुश्किल होता था। यही कारण है कि देश और विदेश में नित नए डॉक्टर से परचा लिखवाना औैर केमिस्ट से दवा प्राप्त करना आम होता जा रहा था। खासतौर से रोक वाली दवाओं को लेकर के यह प्रक्रिया अपनाई जा रही थी। हांलाकि इस प्रवृति को रोकने के लिए कई देशों में कानूनी प्रयास किये गए और कुछ हद तक इस पर अंकुश भी लग सका। अमेरिका जैसे देश में इसके लिए डॉक्टर शापिंग लॉ जैसी व्यवस्था की गई। खैर अब चिकित्सा सुविधा के विस्तार और सहजता के साथ ही डॉक्टर शापिंग का कंसेप्ट बदलता जा रहा है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/assaulting-health-workers-corporator-ramesh-mhatre-surrenders-following-bombay-hc-order" target="_blank">स्वास्थ्यकर्मियों से मारपीट पर नहीं चलेगा रौब! Bombay HC के आदेश पर Corporator Ramesh Mhatre ने किया सरेंडर</a></h3><div>हो यह रहा है कि जब कोई मरीज यह महसूस करता है कि चिकित्सक की दवा से उसकी बीमारी में तेजी से सुधार नहीं हो रहा तो वह ईलाज के बीच ही दूसरे डॉक्टर की शरण में चले जाता है। खासतौर से यह प्रवृति महानगरों और बड़े शहरों में अधिक तेजी से फैल रही है। इसका कारण यह है कि आज सलाहकारों की लंबी फौज होने के साथ ही रोगी या रोगी के परिजन मैजिक टच की सोच रखने लगे हैं। दूसरा यह कि अब चिकित्सा सुविधा का भी तेजी से विस्तार हुआ है। निजी और सरकारी क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा की सहज उपलब्धता होने के साथ ही मेडिक्लेम जैसी सुविधाएं प्राप्त होने लगी है। सरकारी और निजी विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता के कारण भी यह होने लगा है। बीमारी चाहे सामान्य हो या गंभीर तत्काल सुधार नहीं दिखने पर दूसरे डॉक्टर को दिखाने चले जाते हैं और डाक्टर बदलने का तत्काल जो प्रभाव पड़ता है वह रीसेट बटन होता है यानी कि दूसरा डॉक्टर फिर अपने तरीके से पहले जॉचों का सिलसिला आरंभ करते हैं क्योंकि पहले की डॉक्टर द्वारा कराई गई जांचों में किसी ना किसी तरह की कमी या अन्य कारण बता कर दुबारा से जांचें करवानी पड़ती है। इसके लिए रक्त जांच से लेकर रोग के अनुसार एक्सरे, एमआरआई या अन्य तरह की जांचें भी हो सकती है। इससे बार बार जांच और एक्सरे किरणों से दो चार होने के साथ ही रुपये पैसे का भार भी पड़ता है। एक तरह से बीमारी के पहचान की नए सिरे से प्रक्रिया आरंभ होती है। दवा का नया सिलसिला आरंभ होता है और पूर्व में चल रही एंटिबायोटिक या अन्य दवाओं के स्थान पर जेनेरिक दवाओं के ही दूसरे ब्राण्ड की दवा दी जाती है व कई बार तो पॉली फार्मेंसी जैसी स्थिति हो जाती है। दवाओं के असर पर विपरीत प्रभाव की संभावनाओं से भी नहीं नकारा जा सकता। ऐसे में सुधार के स्थान पर जटिलताओं की संभावनाओं से नहीं नकारा जा सकता।&nbsp;</div><div><br></div><div>डॉक्टर शापिंग के इस दौर में अन्य चिकित्सक की विशेषज्ञ सलाह लेने और चिकित्सक बदलने में हमें अंतर करना होगा। अन्य विशेषज्ञ की सलाह को तो ईलाज कर रहे चिकित्सक को विश्वास में लेकर लेने से ईलाज में और अधिक सकारात्मकता आती है पर बार बार चिकित्सक बदलना उचित नहीं माना जा सकता। होना यह चाहिए कि जिस चिकित्सक का ईलाज चल रहा है उससे ईलाज के संबंध में स्वयं रोगी या परिजनों द्वारा बीमारी और उसके ईलाज को लेकर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए। यह भी मालूम कर लेना चाहिए कि दवा का असर किस तरह का और कितने समय में दवा असर दिखाना शुरु कर देगी। चिकित्सक को भी मरीज को विश्वास में लेकर आवश्यक सभी जानकारी दे देनी चाहिए, जिससे ईलाज को लेकर किसी तरह के भ्रम के हालात ना रहे। अन्य चिकित्सक से प्राप्त की गई विशेषज्ञ सलाह को भी ईलाज कर रहे चिकित्सक से साझा कर लेना चाहिए। ईलाज कर रहे चिकित्सक की सलाह या रेफर करने पर ही अन्य चिकित्सक की और रुख करना चाहिए। नए चिकित्सक को भी रोगी का रोग कार्ड से पूरी तरह अवगत होते हुए क्या दवा चल रही है? कब से चल रही है? और रोगी के रोग का इतिहास से अवगत कराना चाहिए। डॉक्टर शापिंग को फैशन के रुप में नहीं लिया जाना चाहिए अन्यथा अनावश्यक जांचों, दवाओं, डाक्टरों की नित नई फीस आदि का नुकसान तो उठाना पड़ता ही है। इसके साथ ही अन्य दुष्परिणामों से नहीं नकारा जा सकता।</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 19:34:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-new-trend-of-doctor-shopping-in-pursuit-of-immediate-health-benefits</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[रहने लायक शहरों की रैंकिंग से शर्मसार देश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/country-left-embarrassed-by-livable-cities-ranking]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चुनावों के दौरान भाजपा नारा देती रही है। डबल और ट्रिपल इंजन की सरकार बनाने को। अर्थात भाजपा का शासन केंद्र में हो, राज्य में हो और महानगर निगमों में भी हो तो विकास भी दुगनी ओर तीगुनी रफ्तार से होगा। देश के ज्यादातर मतदाताओं ने भाजपा की बात पर भरोसा भी कर लिया और केंद्र के अलावा कई राज्यों में सरकार और महा नगर निगमों में भाजपा बोर्ड बनवा दिया। अब मतदाता निंश्चिंत हो गए कि चलो जिन जहां तीन स्थानों पर भाजपा की सरकार है, वहां विकास रॉकेट की रफ्तार से उड़ेगा। लेकिन परिणाम जन अपेक्षाओं के विपरीत आए।&nbsp;</div><div><br></div><div>महानगरों में रहने वाले लोगों की हालत नरक में रहने जैसी हो गई। प्रदूषण से लोग जहरीली सांस लेने को मजबूर हो गए। पानी बिजली के लिए हाहाकार मच गया। ट्रेफिक जाम से लोगों की सांस फूल गई। बारिश के दौरान पूरा शहर जलमग्न हो गया। सड़कों पर गडढों में भरे पानी से लोगों की मौत होने लगी। यह हालत अकेले भाजपा के डबल ट्रिपल इंजन वाले राज्यों के महानगरों की नहीं है बल्कि कांग्रेस और दूसरे दलों के राज्यों का भी यही हाल है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-the-challenge-of-ozone-pollution-alongside-air-pollution" target="_blank">दिल्लीः वायु प्रदूषण के साथ ओजोन प्रदूषण की चुनौती</a></h3><div>भारत के महानगरों की यह भयावह तस्वीर इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट द्वारा जारी ग्लोबल लिवेबिलिटी (रहने योग्य) इंडेक्स 2026 में उजागर हुई है। दुनिया के 173 शहरों का स्वास्थ्य, शिक्षा, आधारभूत ढांचा, पर्यावरण, स्थिरता और सांस्कृतिक सुविधाओं जैसे प्रमुख मानकों के आधार पर मूल्यांकन किया गया। जिसमें देश की राजधानी नई दिल्ली 120वें स्थान पर रही, जबकि आर्थिक राजधानी मुंबई 121वें स्थान पर कायम रही। दक्षिण भारत के प्रमुख महानगर चेन्नई को 123वां और बेंगलुरु को लिवेबिलिटी रैकिंग में 127वां स्थान मिला है। यह देश के सत्तारुढ़ दलों के नेताओं के लिए बेशक शर्म का विषय नहीं हो, किन्तु रैकिंग की इस हालत से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की किरकिरी हुई है।</div><div><br></div><div>उल्लेखनीय बात यह है कि पिछले वर्ष की तुलना में इन शहरों की रैंकिंग में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ। यह स्थिति दर्शाती है कि तेज आर्थिक विकास के बावजूद भारतीय महानगरों में जीवन गुणवत्ता, यातायात, प्रदूषण, सार्वजनिक सेवाओं और शहरी सुविधाओं से जुड़ी चुनौतियां और भारी भ्रष्टाचार अभी भी गंभीर समस्या बनी हुई हैं। गौरतलब है कि केंद्र में भाजपा सरकार है, दिल्ली राज्य में भाजपा की सरकार है और दिल्ली के महानगर निगम में भी भाजपा का कब्जा है। इसी तरह महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना की सरकार है। मुंबई महानगर निगम में भाजपा शिवसेना का बोर्ड है। दिल्ली और मुंबई में ट्रिपल इंजिन की सरकार है। इसके बावजूद विश्व लिवेबिलिटी रैंकिंग में नई दिल्ली 120वें स्थान पर जबकि आर्थिक राजधानी मुंबई 121वें स्थान पर रही है।</div><div><br></div><div>कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। राजधानी बेंगलुरु को लिवेबिलिटी रैकिंग में 127वां स्थान प्राप्त हुआ। हालांकि कांग्रेस ने कभी डबल या ट्रिपल इंजिन की सरकार का नारा नहीं दिया। इसी तरह ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन में द्रमुक का बोर्ड है, अब यहां एक इंजिन रह गया है, पिछले महीनों तक जब स्टालिन की सरकार तमिलनाडु में थी, तब यहां डबल इंजिन की सरकार थी। अब तमिलनाडु में अभिनेता विजय की सरकार है। विश्व रहने योग्य रैकिंग में चेन्नई को 123वां मिला है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ग्लोबल लिवेबिलिटी इंडेक्स में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन ने पहला स्थान हासिल करते हुए दुनिया के सबसे रहने योग्य शहर का दर्जा बरकरार रखा। ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना दूसरे और ऑस्ट्रेलिया का मेलबर्न तीसरे स्थान पर रहा। कल्पना की जा सकती है कि जब भारत के चार प्रमुख शहरों की रहने लायक विश्व रैकिंग का ये हाल है तो देश के बाकी शहरों का बुनियादी सुविधाओं के मामले में क्या हाल होगा। ऐसा नहीं है कि इन महानगरों की हालत नरक की तरह है, इनमें कुछ कम या ज्यादा खराब हालत देश के बाकी दूसरे छोटे शहरों की भी है, जो महानगर बनने की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं।</div><div><br></div><div>केंद्र और राज्यों की सरकारों द्वारा किए गए वादे खोखले साबित हुए हैं। पिछले वर्ष शहरी कार्यक्रमों पर खर्च की गई राशि घोषित राशि से 40 प्रतिशत कम थी। सरकार की शहरी स्वच्छता की प्रमुख पहल का बजट आधा कर दिया गया, जबकि कुछ ही सप्ताह पहले इंदौर में कच्चे सीवेज से दूषित पानी पीने से दर्जनों लोगों की मौत हो गई थी। यह वही शहर है जिसे सरकार ने पिछले आठ वर्षों से लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया है। सत्ता के केंद्रों के करीब होने के बावजूद भी स्थानीय लोग कुशासन से सुरक्षित नहीं रह पाते। गुजरात के गांधीनगर में जनवरी 2026 में दूषित जल से टाइफाइड फैल गया था।&nbsp;</div><div><br></div><div>पिछले साल देश भर के 26 शहरों में कम से कम 5,500 लोग दशकों पुरानी खराब पाइपलाइनों के कारण सीवेज से दूषित पानी पीने से बीमार पड़ गए थे और ये तो केवल दर्ज और रिपोर्ट किए गए मामले हैं। क्या स्मार्ट सिटी का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें, चमकदार भवन और आकर्षक परियोजनाएं हैं? क्या स्मार्ट शहर वह नहीं होना चाहिए जो सामान्य से अधिक बारिश को भी सहजता से संभाल सके? यदि अरबों रुपये जल निकासी, सड़क निर्माण और शहरी विकास पर खर्च हो रहे हैं, तो पहली तेज बारिश में ही सड़कें नदी और चौराहे तालाब क्यों बन जाते हैं?</div><div><br></div><div>केंद्र सरकार 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की बात&nbsp; करती हैं। देश को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना दिखाया जा रहा है। विकसित भारत की इमारत उस बुनियाद पर खड़ी की जा रही है जो हर मानसून में हिल जाती है? क्या अब समय नहीं आ गया है कि विकास के दावों से पहले शहरों की जल निकासी व्यवस्था, निर्माण की गुणवत्ता, नगर नियोजन और प्रशासनिक जवाबदेही को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए? लेकिन क्या हर मॉनसून हमारे इन सभी दावों की वास्तविकता सामने नहीं रख देता?&nbsp;</div><div><br></div><div>क्या विकसित भारत केवल बुलेट ट्रेन, एक्सप्रेस वे और गगनचुंबी इमारतों से बनेगा? या फिर उसकी पहचान ऐसी मजबूत बुनियादी व्यवस्था से होगी जो हर मौसम में नागरिकों को सुरक्षित और सुगम जीवन दे सके? भारत शहरी निवासियों को बुनियादी सुविधाएं देने में विफल रहा है। स्वच्छ जल, सांस लेने योग्य हवा और एक ऐसी सरकार जिसे विफल होने पर वे वोट देकर हटा सकें। जब तक भारत लोकतांत्रिक जवाबदेही को गंभीरता से नहीं लेता और निर्वाचित शहरी नेताओं को कर लगाने और कार्रवाई करने का अधिकार नहीं देता, तब तक नागरिकों को दुनिया के कुछ सबसे भयावह शहरी वातावरणों में जीवन व्यतीत करने के लिए विवश होना पड़ेगा।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 12:30:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/country-left-embarrassed-by-livable-cities-ranking</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जंतर-मंतर के मुखौटों के पीछे का सच !]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-truth-behind-the-masks-at-jantar-mantar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चाहे NEET हो याकि कोई भी एग्जाम हो, जो भी स्टूडेंट्स के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं उन्हें कठोरतम दंड मिलना ही चाहिए। कोई भी दोषी बख़्शे नहीं जाने चाहिए। किसी भी एग्जाम में जालसाज़ी, पेपरलीक जैसे घटनाक्रमों की पुनरावृत्ति कहीं भी नहीं होनी चाहिए। ये सुनिश्चित करने की संपूर्ण जवाबदेही सरकार की है। कोई व्यक्ति हो, संगठन हों। सबको अपनी-अपनी मांगों को लेकर विरोध करना चाहिए। आप इस्तीफा मांगिए। याकि जो भी संविधान सम्मत विरोध के शांतिपूर्ण तरीके हों, उन सबको करिए। ये हमारे लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है। यही भारत है‌। संवाद के रास्ते हमेशा ही खुले होने चाहिए। सरकार का ये उत्तरदायित्व भी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि— देश में अराजकता के संगठित कृत्य को आंदोलन कहकर स्वीकार कर लिया जाएगा। भारत के युवाओं को Cockroach कहकर अपमानित करने वाली इंटरनेशनल साज़िशों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। भारत में 'कॉकरोच शब्द और दिल्ली जंतर-मंतर कनेक्शन' अब नए संदर्भ में अपरिचित नहीं रह गया है। सबसे पहले कुछ जमूरों ने अमेरिकी में बैठकर- भारत के युवाओं को- भारत के सुप्रीम कोर्ट की ख़िलाफ़त में Cockroach कहा। फिर भाजपा और मोदी विरोध की पटकथा लिखी गई। जबकि सुप्रीम कोर्ट के CJI जस्टिस सूर्यकांत ने मई 2026 में ये टिप्पणी फर्जी डिग्री के ज़रिए वकालत करने वाले वकीलों पर की थी। इसका उन्होंने स्पष्टीकरण भी दिया था। लेकिन डीप स्टेट ने आम आदमी पार्टी के जमूरों को आगे कर - भारत की न्यायपालिका के ख़िलाफ़ उकसाया। यहीं से Cockroach शब्द को भारत के युवाओं के माथे पर चस्पा करने की योजना को मूर्तरूप दिया गया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/burning-questions-and-political-implications-arising-from-the-cjp-march-to-parliament" target="_blank">कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च से सुलगते सवाल और राजनीतिक निहितार्थ</a></h3><div>आम आदमी पार्टी का जमूरा - दीपके भारत आया, इधर-उधर प्रदर्शन के लिए गया लेकिन धूप तक बर्दाश्त न कर पाया। तत्पश्चात FCRA के विरोध में सोनम वांगचुक को अमेरिकी मूल की उनकी पत्नी —रेबेका नॉर्मन के ज़रिए प्रोटेस्ट का चेहरा बनाकर 'जंतर-मंतर' के मैदान में भूख हड़ताल के लिए उतार दिया गया। जहां इमोशनली-सेंटीमेंट भुनाने के तमाम प्रयोजन रचे जाने लगे। नेपाल और बांग्लादेश जैसे सत्ता की रिजीम चेंज करने का खाका खींचा जाने लगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>फिर मोदी विरोध के जितने भी इकोसिस्टम वाले चेहरे थे, वो सब बिल से बिलबिलाकर सामने आने लगे। उन्होंने पूरी ताक़त झोंक दी कि कैसे भी करके दिल्ली में शाहीन बाग जैसे दंगे फैलाए जाएं। कन्वर्जन कराने वाले गिरोह के वो लोग जो FCRA की मार से चोटिल थे। उन्होंने जी भर के पैसे बहाए। तमाम PR एजेंसीज हायर की गईं। सेलीब्रिटीज कहे जाने वाले क़ौमी लोग— हिंदुत्व को Smash करने के लिए उतर आए। विदेशी और देशी पैसों से सोशल मीडिया कैंपेन को लॉन्च कर दिया गया। भावुक युवाओं ने भी देखा-सुनी ऐसी तमाम स्टोरीज सोशल मीडिया में शेयर कीं। जबकि इस तथाकथित आंदोलन में शिक्षाविद्, डॉक्टर्स और स्टूडेंट्स कहीं नज़र नहीं आए। अगर स्टूडेंट्स नज़र आए भी तो उन्हें मंच पर कहीं स्थान नहीं मिला। सिर्फ़ कुछ हाईजैकर्स , कॉमेडियन, नेता और भारत विरोधी -हिन्दुत्व विरोधी बातें कहने वाले चेहरे नज़र आए। कंटेंट क्रिएटर्स ही दिखते रहे।</div><div><br></div><div>प्रोफेशनल PR STYLE में प्रोटेस्टर्स का जमावड़ा हुआ। AISF, SFI समेत तमाम गद्दार वामपंथियों का इकोसिस्टम एक्टिवेट हुआ। JNU-AMU की तर्ज पर अर्बन नक्सल गिरोह की जिहादी डफली सुनाई देने लगी। LGBTQ का प्रचार-प्रसार किया जाने लगा। हिन्दू घ्रणा का परचम बुलंद किया जाने लगा। लेकिन इन जमूरों में से कोई भूख हड़ताल का साहस न कर पाया जिससे तंग आकर ख़ुद सोनम वांगचुक तक को ये कहना पड़ा कि— “आप लोग यहां आकर ठूंस-ठूंस कर खा रहे हैं, मुझे यह देखकर बहुत दुख होता है।”</div><div><br></div><div>इतना ही नहीं ये जंतर-मंतर वाले कॉकरोच - दिन के बाद रात को एसी रूम में जाकर सोते थे। ‌पार्टियां करने में जुट जाते थे। फिर अपने रुटीन में जुट जाते थे। अंततोगत्वा 18 जुलाई 2026 को सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। किन्तु ये कॉकरोच, कांग्रेस पार्टी के सहयोग से- सोनम वांगचुक को सरकारी अस्पताल से प्रायवेट अस्पताल में भर्ती कराने की ज़िद पर अड़े। दिल्ली हाईकोर्ट गए। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि- सफदरजंग अस्पताल से कहीं और शिफ्ट करने की ज़रूरत नहीं है। वहां उनकी समुचित देखभाल हो रही है।</div><div><br></div><div>20 जुलाई 2026 को बिना परमिशन के संसद मार्च करने का 'शाहीन बाग-CAA दंगे' वाली स्टाइल में अभियान चलाया गया। कांग्रेस, AAP समाजवादी पार्टी, भीम-मीम के गठजोड़, लेफ्ट पार्टियां, कन्वर्जन कराने वाले NGO's, अर्बन नक्सली, ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज, सो-रोस-डीप स्टेट के वालंटियर्स - सब देश के यूथ के कंधों पर बंदूक रखकर उतर आए। सबने भीड़ जुटाने का पर्याप्त प्रबंध किया।</div><div><br></div><div>भाजपा और मोदी विरोध के सभी गिरोह एकजुट हुए। भरपूर पैसा बहाया गया। संसद घेरने के लिए भीड़ को उतार दिया गया। जिन क्षेत्रों में ड्रोन प्रतिबंधित थे, वहां शक्ति प्रदर्शन-प्रचार के लिए ड्रोन कैमरे चलाए गए। कश्मीर की तर्ज़ पर भीड़ के ज़रिए पुलिस पर संगठित योजना के तहत पथराव कराया गया। पुलिस वालों और महिला पत्रकारों की लिंचिंग की कोशिशें की गईं। भारत के संविधान ने जिस 'संसद' का गठन किया। जो संसद हमारे देश की सांविधानिक आधारशिला है। उसे उखाड़ फेंकने की बातें दुहराई गईं। भारत को 'नेपाल' बनाने का कॉकरोचों ने दंभ भरा। ये तब हो रहा था जब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने इनके प्रतिनिधि मंडल को बातचीत के लिए बुलाया और चर्चा की।&nbsp;</div><div><br></div><div>आप सोचिए कि- इस संगठित भीड़ ने जो उपद्रव किए क्या ये लोकतांत्रिक कृत्य हैं? क्या ये किसी मांग को मनवाने की बातें हैं? किसी भी शांतिपूर्ण आंदोलन में पत्थरबाजी कहां से होने लगी, अचानक से इतने पत्थर क्या बिना पूर्व तैयारी के आ गए? क्या ये संगठित अराजकता-भारत की लोकतांत्रिक स्थिरता, प्रगति को रोकने के षड्यंत्र नहीं हैं? ये षड्यंत्र उस युवा के सेंटीमेंट्स के ज़रिए लॉन्च किए जा रहे हैं। जो भारत की प्रगति का आधार है। मैं भी युवा हूं और तथाकथित Gen-Z की परिभाषा में भी आता हूं। मेरे आदर्श स्वामी विवेकानंद हैं। स्वातंत्र्य क्रांति के क्रांतिवीर हैं। भगवान राम और कृष्ण हैं। सरकार से हम सबकी अपेक्षाएं हैं। अपनी मांगों और विरोध के हमारे पास सांविधानिक तौर तरीके हैं। अपनी पीड़ा और आक्रोश की अभिव्यक्ति के माध्यम हैं। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि कोई भी मुझे भारत की स्थिरता के ख़िलाफ़ बरगला लेगा। क्या कोई भी टूल बनाकर हमें किसी आग में झोंक देगा और हम उसमें कूद पड़ेंगे? ये हम युवाओं को सोचना और समझना चाहिए।</div><div><br></div><div>जंतर-मंतर में सोनम वांगचुक को बलि का बकरा बनाकर जिस शातिराना ढंग से 'भारत घ्रणा-हिन्दू घ्रणा' का प्रहसन किया गया।उसे इस देश का युवा अच्छी तरह से जानता है। युवा साथियों को इसे और बारीकी से समझना चाहिए। ताकि हम किसी टूलकिट का शिकार न बनें। जंतर-मंतर में जिस तरह से भगवान राम को अपमानित किया गया। भारत की संस्कृति के ख़िलाफ़ ज़हर उगला गया। ब्राह्मणों, हिन्दुत्व को ख़त्म करने का ऐलान किया जाता रहा।RSS के ख़िलाफ़ नारेबाजी की जाती रही। भारतीयता की बात करने वाली 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020' को ख़त्म करने की जिहादी पोस्टर बनाए गए।नारेबाज़ी की गई।&nbsp; काफ़िरों के कत्लेआम के लिए फ़ैज़ की 'बस नाम रहेगा अल्लाह का' जैसा जिहादी ऐलान किया गया। यानी भारत के 'इस्लामीकरण' का फतवा जारी किया गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>क्या ये सब किसी भी हिसाब से जायज़ कहा जाएगा? क्या ये किसी न्याय की लड़ाई थी? पूरे प्रहसन के दौरान जिस तरीक़े से हर दिन भारत द्वेष का विष वमन किया जाता रहा। संविधान और तिरंगे की ओट में छिपकर— भारत के संविधान को चुनौती दी जाती रही। भारत की न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा। संसद को उखाड़ फेंकने के नारे गढ़े गए। भारत को —हिंसा, दंगों की आग में झोंकने के लिए — 'नेपाल' बनाने के जो संदेश दिए गए। वो गंभीर हैं। हमारी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को खुली चुनौती भी हैं। ये कोरी भावुकता तो कतई नहीं हो सकती। ये निश्चित ही भारत की शक्ति, सामर्थ्य के ख़िलाफ़ एक सुनियोजित साज़िश है। इसमें सत्ता की भूखी राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता भी अव्वल हैं। जो बांग्लादेश और नेपाल हिंसा के बाद वहां हुए तख्तापलट के समय से ही - भारत के युवाओं को हिंसा, उपद्रव के लिए उकसा रहे हैं। कभी वो Gen-Z के नाम पर उकसाते हैं। कभी किसी मुद्दे के नाम पर, लेकिन उनका उद्देश्य है — सत्ता पाना। मोदी को सत्ता से हटाना। इसके लिए ये पार्टियां और नेता - भारत विरोध तक की सीमा पार कर रहे हैं। ऐसे में कॉकरोच के इस लॉन्चिंग पैड के हर छोटे बड़े घटनाक्रम को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है। सुरक्षा व्यवस्था, इंटेलीजेंस से लेकर भारत बोध को लेकर चर्चा आवश्यक है। सरकार और प्रशासन के स्तर पर युवाओं की बातों को सुनने और उन्हें एड्रेस किए जाने की ज़रूरत है। साथ ही ऐसे घटनाक्रमों, आयोजनों—के ज़रिए भारत विरोधी जो नैरेटिव गढ़े गए। उन्हें कतई नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है। ये देश हमारा है, हम इस देश के युवा हैं। हम कॉकरोच तो कतई नहीं हो सकते। जहां कमियां होंगी, उन्हें सुधारेंगे भी और हर साज़िश का समूल नाश करेंगे।हम अपने देश के प्रगति को शीर्ष पर ले जाएंगे&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल&nbsp;</div><div>(साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 16:44:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-truth-behind-the-masks-at-jantar-mantar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[भारतीय रेलवे में नई हाइड्रोजन क्रांति, प्रधानमंत्री ने कई रेलवे स्टेशनों का भी दिया उपहार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-new-hydrogen-revolution-in-indian-railways]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जुलाई 17, 2026 का दिन भारतीय रेलवे के लिए एक स्मरणीय दिन बन गया है क्योंकि इस दिन&nbsp; रेल यातायात में विकसित भारत के नये युग का सूत्रपात हुआऔर भा रत को हाइड्रोजन ट्रेन का उपहार मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरियाणा के जींद रेलवे स्टेश्न से हरी झंडी दिखाकर इसका उद्घाटन किया। अब भारत उन चुनिन्दा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है जहां हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन हो रहा है।अभी तक जर्मनी, फ्रांस और चीन जैसे देश ही इस प्रकार की ट्रेनों का&nbsp; संचालन कर रहे थे ।</div><div><br></div><div>जींद-सोनीपत मार्ग पर चलने वाली यह ट्रेन शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली 10 कोच और 3,200 हार्स पावर क्षमता वाली दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों मे शामिल है। यह ट्रेन पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से तैयार की गई है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से चलने वाली इस ट्रेन में हाइड्रोजन से बिजली बनाई जाती है जिससे ट्रेन संचालित होती है। इस प्रक्रिया में केवल जलवाष्प निकलती है इसलिए इससे शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है। यह ट्रेन डीजल ट्रेनों की तुलना में प्रदूषण नहीं फैलाती, आवाज भी कम करती है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करती है। इसके लिए पारपंरिक इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तरह मार्ग पर ओवरहेड बिजली लाईन की जरूरत भी नहीं होती क्योकि बिजली ट्रेन के भीतर ही तैयार होती है। ऐसी ट्रेनों के संचालन से कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता कम होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/will-the-goal-of-a-developed-india-2047-be-achieved-in-2075" target="_blank">यक्ष प्रश्न: क्या विकसित भारत 2047 का लक्ष्य 2075 में हासिल होगा?</a></h3><div>यह 10 कोच वाली दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेनों में शामिल है। यह अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त ट्रेन है जो बाहर से देखने में तो साधारण ट्रेनों की तरह ही लगती है किन्तु जब यात्री ट्रेन के कोच में बैठकर यात्रा करते हैं तो उन्हें एक अलग प्रकार की सुखद अनुभूति होती है। ट्रेन में आधुनिक सुरक्षा प्रणाली, हाइड्रोजन लीक डिटेक्शन सिस्टम और विशेष फ्यूल सेल तकनीक का उपयोग किया गया है। इस ट्रेन में यात्रियों के लिए टिकट का मूल्य 5 से 25 रुपए तक रखा गया है ताकि आम से खास तक सभी वर्ग के लोग इस पूर्ण रूप&nbsp; से स्वदेशी तथा प्रदूषण रहित ट्रेन की आरामदायक यात्रा का लाभ उठा सकें। भारतीय रेलवे की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा में जींद से सोनीपत के बीच 89 किमी प्रतिदिन दो राउंड ट्रिप यानी कुल 356 किमी का सफर तय करेगी। यह हाइड्रोजन ट्रेन जींद सिटी, गोहाना, पांडु पिंडारा, ललित खेड़ा, भंभेवा, इसापुर खेड़ी, बुटाना, खंडराई, राबरा, लाथ, मोहाना और सोनीपत&nbsp; स्टेशन पर रुकेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत की स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन अन्य देशों की तुलना में सबसे कम लागत मात्र 136 करोड़ रुपए में बनी है। ट्रेन की सामान्य ऑपरेशनल स्पीड 75 किमी प्रति घंटा होगी। ट्रायल रन के दौरान इसने 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार प्राप्त की थी। यह ट्रेन एक घंटे में 90 किमी का सफर तय कर सकती है। जबकि कई पुराने डीजल इंजन वाली ट्रेनों को इतनी दूरी तय करने में लगभग दो घंटे लग जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेलवे में व्यापक बदलाव लाने का संकल्प लिया था जो अब धरातल पर उतरता दिख रहा है। भारतीय रेलवे आगामी वर्षों में और भी आधुनिक बनने की तैयारी कर रहा है। सरकार का लक्ष्य व संकल्प भारतीय रेलवे को अधिक सुरक्षित, तेज और पर्यावरण के अनुकूल बनाना है यह हाइड्रोजन ट्रेन उसी लक्ष्य की दिशा में ले जाने वाली पहल है।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>संक्षिप्त इतिहास - भारत में पहली यात्री ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को मुंबई के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे के बीच चलाई गई थी। यह ट्रेन 34 किमी की दूरी तय करती थी इसमें 14 डिब्बे थे1 960 में भारतीय रेलवे ने डीजल इंजनों को अपनाना शुरू किया। इन इंजनों की मदद से लंबी दूरी की ट्रेनों का संचालन शुरू हुआ। मालगाड़ियों की क्षमता बढ़ी और रेलवे का विस्तार पहले की तुलना में तीव्रगति से हुआ। इसके पश्चात रेलवे में विद्युतीकरण&nbsp; का युग आया जिसमें बिजली से चलने वाले इंजन डीजल की तुलना में अधिक तीव्र ,कम प्रदूषण फैलाने वाले और ऊर्जा की दृष्टि से अधिक किफायती सिद्ध हुए। अब समय पूरी तरह से बदल चुका है। अब यात्रियों को सुविधाएं देने के लिए बेहतर तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, वंदेभारत एक्सप्रेस जैसी हाईस्पीड ट्रेनों,आधुनिक कोच, आटोमेटिक सिग्नल सिस्टम, कवच सुरक्षा प्रणाली, डिजिटल&nbsp; टिकटिंग और बेहतर स्टेशन&nbsp; सुविधाएं रेलवे को नई पहचान दे रही हैं। आगामी समय में बुलेट ट्रेनों की रफ्तार भी भारतीय जनमानस देखने वाला है। केवल यात्रियों के लिए ही नहीं भारतीय रेल अब माल ढुलाई के लिए भी आधुनिक ट्रेनों का संचालन कर रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हाइड्रोजन ट्रेन के उद्घाटन के अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने जींद और पंजाब के जालंधर से रेलवे की विकास व बदलाव की कहानी बताई और साथ ही कांग्रेस सहित समस्त विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए&nbsp; राजनैतिक संदेश भी दिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि जो काम आज हो रहे हैं वो काम तो 30 -40 वर्ष पहले ही हो जाने चाहिए थे लेकिन पहले की सरकारों में&nbsp; यह काम प्राथमिकता में थे ही नहीं। इस पर पहले की सरकारें चर्चा ही नहीं करती थी। 2014 के बाद भाजपा सरकार ने स्थितियों को बदलना शुरू किया। आज पूरे भारत में रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प किया जा रहा है। अमृत भारत स्टेशन योजना के अंतर्गत 1300 स्टेशनों का कायाकल्प किया जा रहा है आज ऐसे ही&nbsp; 75 स्टेशनों का लोकार्पण हुआ है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने अमृतसर -वाराणसी के बीच चलने वाली संत रविदास एक्सप्रेस ट्रेन सेवा को भी हरी झंडी दिखाई।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 13:30:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-new-hydrogen-revolution-in-indian-railways</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गाजियाबाद के मुरादनगर में विपक्षियों पर गरजें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/chief-minister-yogi-adityanath-lashed-out-at-the-opposition-in-ghaziabad-muradnagar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 17 जुलाई 2026 की सांय लगभग 4.30 बजे मुरादनगर के "तेजपाल सिंह त्यागी कुशल पाल त्यागी मेमोरियल डिग्री कॉलेज" में पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वर्गीय राजपाल त्यागी की प्रतिमा का अनावरण किया। भारतीय जनता पार्टी के मुरादनगर विधायक अजीत पाल त्यागी ने अपने पिता की स्वर्णिम अनमोल यादों को संजोने के लिए एक भव्य अनावरण समारोह का आयोजन किया।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रतिमा अनावरण के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनपद गाजियाबाद के मुरादनगर एवं मोदीनगर विधान सभा क्षेत्रों में ₹868 करोड़ से अधिक लागत की 90 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण / शिलान्यास भी किया और गाजियाबाद कलेक्ट्रेट में पंहुच कर के कांवड़ यात्रा की तैयारियों के लिए बैठक करके अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/reviews-on-tea/did-the-bjp-make-mistake-in-datiya-or-was-stirring-up-a-controversy-part-of-the-party-strategy" target="_blank">Chai Par Sameeksha: Bankipur, Datiya में BJP ने कोई गलती की या विवाद खड़ा करना पार्टी की रणनीति थी</a></h3><div>मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वहां उपस्थित अपार जनसमूह को संबोधित करते हुए विपक्षी दलों पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी आज आस्था की बात कर रही हैं, इनको केसरिया रंग से ही चिढ़ होती थी। उन्होंने गाजियाबाद के संदर्भ में बोलते हुए कहा कि अब दिल्ली के ग्रोथ इंजन का काम गाजियाबाद कर रहा है।</div><div><br></div><div>यहां आपको बता दें कि लोकप्रिय जननेता व पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वर्गीय राजपाल त्यागी किसी परिचय व सम्मान के मोहताज नहीं हैं। उन्होंने अपनी निर्भीक, बेबाक, जनसेवा सर्वोपरि वाली कार्यशैली के दम पर जनता की अदालत में जीवन पर्यन्त विशेष प्रेम पाते हुए विशिष्ट सम्मान प्राप्त करने का कार्य किया था। राजपाल त्यागी ने अपने द्वारा किये गये विकास कार्यों के दम पर जनता की अदालत में जीवित रहते हुए ही "विकास पुरुष" का खिताब हासिल करने का कार्य कर लिया था, जोकि सार्वजनिक जीवन में बहुत बड़ी अनमोल उपलब्धि थी। राजपाल त्यागी ने जीवन पथ पर आम जनमानस के बीच व राजनीतिक गलियारों में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाते हुए सफल राजनेता बनने का मुकाम बखूबी हासिल किया था, जो किसी भी राजनेता को बहुत ही मुश्किल से हासिल होता है। पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वर्गीय राजपाल त्यागी की लोकप्रिय का आलम यह था कि वह मुरादनगर विधानसभा से कांग्रेस, सपा व बसपा के टिकट के साथ-साथ निर्दलीय के रूप में छह बार विधायक चुने गए थे। 80 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद 18 जुलाई 2025 को जब राजपाल त्यागी का निधन हो गया था, तो उस वक्त खराब मौसम व कांवड़ यात्रा में रास्ते बंद होने के बावजूद भी उनको अंतिम विदाई देने के लिए हिंडन श्मशान घाट पर भारी संख्या में जन सैलाव उमड़ पड़ा था।</div><div><br></div><div>पूर्व मंत्री राजपाल त्यागी की खूबी थी कि वह अपने राजनीतिक सफ़र में केवल चुनावों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने जनसेवा को सर्वोपरि मानते हुए अपना जीवन क्षेत्र की जनता की सेवा के लिए समर्पित कर रखा था। उनकी सबसे बड़ी खूबी थी वह क्षेत्र के अधिकतर लोगों को नाम से जानते थे और वह अपने क्षेत्र के लोगों के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर के आगे खड़े नज़र आते थे, कोई भी व्यक्ति जब उनकी चौखट पर किसी कार्य को लेकर आता था तो वह कभी भी निराश होकर वापस नहीं आता था। आम जनमानस के बीच उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि वह मुरादनगर क्षेत्र से निर्दलीय विधायक के रूप तक में भी चुनें जाते थे, वह एक व्यवहार कुशल, विकास पुरुष जननेता के रूप में लोगों को याद आते हैं। वह क्षेत्र में राजनीति के पुरोधा माने जाते हैं, क्षेत्र की आम जनता के बीच उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि मुरादनगर विधानसभा क्षेत्र से वह 6 बार विधायक चुने गए थे और अपनी लोकप्रियता व कार्यों के दम पर वह उत्तर सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने। वहीं आज के संदर्भ में अहम बात यह है कि फिलहाल मुरादनगर से भारतीय जनता पार्टी से राजपाल त्यागी के छोटे बेटे अजीत पाल त्यागी लगातार दो बार से विधायक हैं, वह भी अपने पिता राजपाल त्यागी के नक्शे कदम पर चलते हुए उनके विचारों को संजोने का कार्य बखूबी करते हुए अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का कार्य भी बखूबी कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>प्रतिमा अनावरण के अवसर पर स्वर्गीय राजपाल त्यागी के भाई यशपाल त्यागी, पुत्र गिरीश त्यागी, पुत्र अजीत पाल त्यागी, भतीजे राजीव त्यागी व अभिषेक त्यागी व अन्य सभी परिजन, जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार मांदड व पुलिस प्रशासन के आलाधिकारी उपस्थित रहे। वहीं प्रतिमा अनावरण व जनसभा के कार्यक्रम में मंत्री सुनील कुमार शर्मा, मंत्री नरेंद्र कश्यप, मेयर सुनीता दयाल, जिला पंचायत अध्यक्ष ममता बसंत त्यागी, सांसद अतुल गर्ग, सांसद राजकुमार सांगवान, विधायक मंजू सिवाच, विधायक नंद किशोर गुर्जर, विधायक संजीव शर्मा, एमएलसी दिनेश गोयल, पूर्व सांसद रमेश चंद्र तौमर, क्षेत्रीय अध्यक्ष नवाब सिंह नागर, महानगर अध्यक्ष मयंक गोयल, जिलाध्यक्ष चैन पाल सिंह गुर्जर व बड़ी संख्या में जन प्रतिनिधि, राजनेता, भाजपा पदाधिकारी व कार्यकर्ता, सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी, क्षेत्र के गणमान्य लोगों व हजारों की संख्या में राजपाल त्यागी के प्रशंसक क्षेत्रवासी उपस्थित रहे।</div><div><br></div><div>- दीपक कुमार त्यागी</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 12:18:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/chief-minister-yogi-adityanath-lashed-out-at-the-opposition-in-ghaziabad-muradnagar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bangladeshi और Rohingyas की उलटी गिनती शुरू, कई राज्यों में Police और ED की रेड, स्थिति का जायजा लेने Bengal Border पर Amit Shah]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/amit-shah-west-bengal-visit-border-security-illegal-bangladeshi-rohingya-infiltration]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पश्चिम बंगाल दौरा ऐसे समय शुरू हो रहा है जब भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़ी सुरक्षा, बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठ, फर्जी दस्तावेजों के नेटवर्क और राष्ट्रीय सुरक्षा पर बहस अपने चरम पर है। सिलिगुड़ी के रणनीतिक जुमागाछ बॉर्डर आउटपोस्ट से अपने तीन दिवसीय दौरे की शुरुआत कर केंद्रीय गृह मंत्री ने साफ संकेत दिया है कि सीमा सुरक्षा अब केवल चौकसी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आधुनिक तकनीक, खुफिया तंत्र और सख्त कार्रवाई के जरिए हर अवैध घुसपैठिए और उसके पूरे नेटवर्क पर प्रहार किया जाएगा। संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि जो भी बांग्लादेशी या रोहिंग्या अवैध रूप से भारत में घुसकर फर्जी पहचान बनाकर बसने की कोशिश करेगा, उसके लिए अब भारत में कोई जगह नहीं है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि अमित शाह के दौरे का सबसे अहम पड़ाव सिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी "चिकन नेक" है, जिसे देश की सामरिक जीवनरेखा माना जाता है। महज 20-22 किलोमीटर चौड़ा यह गलियारा पूरे पूर्वोत्तर भारत को मुख्य भूमि से जोड़ता है। इसके एक ओर बांग्लादेश, दूसरी ओर नेपाल, ऊपर भूटान और निकट ही चीन का प्रभाव क्षेत्र होने के कारण यह इलाका राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। केंद्रीय गृह मंत्री यहां बीएसएफ जवानों से मुलाकात करेंगे, सीमा चौकियों का निरीक्षण करेंगे और स्मार्ट फेंसिंग, एंटी-ड्रोन सिस्टम, आधुनिक निगरानी तकनीक तथा बेहतर बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में नई परियोजनाओं की शुरुआत करेंगे। यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर सीमा प्रबंधन को पूरी तरह तकनीक आधारित बनाना चाहती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/amit-shah-holds-a-major-meeting-at-rajnath-singh-residence-ahead-of-the-monsoon-session" target="_blank">Monsoon Session से पहले Rajnath Singh के आवास पर Amit Shah की बड़ी बैठक, NDA ने तैयार किया विधायी Strategy का मेगा प्लान</a></h3><div>उधर, सीमा सुरक्षा की यह सख्ती अब जमीन पर भी दिखाई देने लगी है। हरियाणा के गुरुग्राम में पुलिस ने एक महीने पहले अलग-अलग निर्माण स्थलों पर छापेमारी कर 13 बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया था। दस्तावेजों की जांच में उनके भारत में अवैध रूप से रहने की पुष्टि होने के बाद गुरुवार को उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच नई दिल्ली से मालदा टाउन एक्सप्रेस के जरिए पश्चिम बंगाल भेज दिया गया, जहां से उन्हें सीमा सुरक्षा बल और अन्य एजेंसियों को सौंपकर बांग्लादेश वापस भेजने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इस अभियान के लिए 23 पुलिसकर्मियों की विशेष एस्कॉर्ट टीम तैनात की गई। पकड़े गए अधिकांश लोग गुरुग्राम में मजदूर के रूप में काम कर रहे थे और किराये के मकानों में रह रहे थे।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि गुरुग्राम पुलिस की कार्रवाई केवल 13 लोगों तक सीमित नहीं है। पूरे शहर में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ व्यापक सत्यापन अभियान चलाया जा रहा है। कॉलोनियों, झुग्गी बस्तियों, लेबर कॉलोनियों, औद्योगिक क्षेत्रों और किराये के मकानों में रह रहे 1200 से अधिक संदिग्ध लोगों के दस्तावेजों की जांच जारी है। जिन राज्यों के दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं, वहां के जिला प्रशासन से सत्यापन कराया जा रहा है। पुलिस ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि यदि कोई संदिग्ध किरायेदार, घरेलू सहायक, होटल कर्मचारी, निर्माण मजदूर या अन्य विदेशी नागरिक अवैध रूप से रह रहा हो तो तुरंत डायल-112 या नजदीकी थाने में सूचना दें। यह अभियान बताता है कि अब केवल सीमा पर ही नहीं बल्कि देश के भीतर भी अवैध नेटवर्क को तोड़ने की रणनीति अपनाई जा रही है।</div><div><br></div><div>हरियाणा के बाद कर्नाटक के मंगलुरु में भी इसी तरह की कार्रवाई सामने आई है। यहां पुलिस ने दो अलग-अलग निर्माण स्थलों से 11 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया है। विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) को उनकी रिपोर्ट भेजी जा रही है ताकि उन्हें हिरासत में लेकर निर्वासित किया जा सके। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि पश्चिम बंगाल से इन लोगों को काम दिलाने वाले बिचौलिये के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया जाएगा। इससे स्पष्ट है कि जांच अब केवल घुसपैठियों तक सीमित नहीं बल्कि उन्हें रोजगार दिलाने और देशभर में बसाने वाले पूरे नेटवर्क तक पहुंच रही है।</div><div><br></div><div>इसी बीच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठ के वित्तीय नेटवर्क पर बड़ा शिकंजा कस दिया है। ईडी ने उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पश्चिम बंगाल के 13 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। जांच एजेंसी का दावा है कि कुछ चैरिटेबल ट्रस्ट, जिन्हें विदेशी अंशदान (FCRA) के तहत धन प्राप्त होता था, कथित तौर पर विदेशी फंड का इस्तेमाल अवैध घुसपैठियों को भारत में बसाने के लिए कर रहे थे। जांच में यह भी सामने आया कि हवाला, म्यूल अकाउंट और कई परतों वाले बैंक लेन-देन के जरिए छोटी-छोटी रकम जैसे 6 हजार, 8 हजार और 10 हजार रुपये, घुसपैठियों तक पहुंचाई जाती थी ताकि वे भारत में आर्थिक रूप से स्थापित हो सकें।</div><div><br></div><div>ईडी की जांच के अनुसार यह संगठित गिरोह केवल लोगों को सीमा पार कराने तक सीमित नहीं था। उनके लिए फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड, पासपोर्ट और अन्य भारतीय पहचान पत्र तैयार कराए जाते थे। इसके बाद उन्हें अलग-अलग राज्यों में रोजगार दिलाया जाता था और कुछ मामलों में ई-रिक्शा, नकद सहायता तथा अन्य आर्थिक साधन उपलब्ध कराकर स्थायी रूप से बसाने की कोशिश की जाती थी। यह खुलासा राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की उस आशंका को मजबूत करता है कि अवैध घुसपैठ अब केवल सीमा का मुद्दा नहीं बल्कि फर्जी दस्तावेज, हवाला, मानव तस्करी और संगठित अपराध से जुड़ा एक बड़ा नेटवर्क बन चुका है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि अमित शाह के पश्चिम बंगाल दौरे का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू राज्य की कानून-व्यवस्था और नए आपराधिक कानूनों की समीक्षा है। गृह मंत्री सिलिगुड़ी और कोलकाता में उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के क्रियान्वयन की समीक्षा करेंगे। साथ ही डिजिटल एफआईआर, फोरेंसिक जांच, अभियोजन प्रणाली, साइबर अपराध, महिलाओं के खिलाफ अपराध, सीमा पार अपराध और संवेदनशील जिलों की सुरक्षा व्यवस्था का भी विस्तृत मूल्यांकन किया जाएगा। जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण प्रणाली की समीक्षा भी इसी रणनीति का हिस्सा है ताकि फर्जी पहचान और अवैध नागरिकता के दावों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। सरकार का उद्देश्य सुरक्षा और डिजिटल प्रशासन को एकीकृत कर मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचा तैयार करना है।</div><div><br></div><div>इस पूरे घटनाक्रम के बीच संयुक्त राष्ट्र की एक चिंताजनक रिपोर्ट भी सामने आई है। म्यांमार के रखाइन प्रांत से निकली दो नौकाओं के डूबने की आशंका जताई गई है, जिनमें 500 से अधिक रोहिंग्या शरणार्थी सवार थे। इनमें कई लोग बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों से भी बताए जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी और अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के अनुसार दोनों नौकाएं खराब समुद्री परिस्थितियों के बीच लापता हो गईं और बड़ी संख्या में लोगों की मौत की आशंका है। यह त्रासदी एक ओर रोहिंग्या समुदाय की मानवीय पीड़ा को दर्शाती है, तो दूसरी ओर यह भी याद दिलाती है कि अवैध और असुरक्षित प्रवासन मानव तस्करी तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, अमित शाह का पश्चिम बंगाल दौरा राष्ट्रीय सुरक्षा की व्यापक रणनीति का संकेत है। सीमा पर तकनीकी निगरानी, देश के भीतर अवैध घुसपैठियों की पहचान, फर्जी दस्तावेजों के नेटवर्क पर प्रहार, आर्थिक मदद पहुंचाने वाले गिरोहों पर ईडी की कार्रवाई, राज्यों में चल रहे सत्यापन अभियान और नए आपराधिक कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन, ये सभी कदम एक समन्वित सुरक्षा मॉडल की तस्वीर पेश करते हैं। सरकार का संदेश स्पष्ट है कि भारत की सीमाओं, पहचान व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। अवैध घुसपैठ, चाहे वह बांग्लादेशी हो या रोहिंग्या नेटवर्क से जुड़ी, अब कानून की सख्त कार्रवाई का सामना करेगी, जबकि सीमा क्षेत्रों का विकास, तकनीकी आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा समानांतर रूप से आगे बढ़ाए जाएंगे।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 13:27:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/amit-shah-west-bengal-visit-border-security-illegal-bangladeshi-rohingya-infiltration</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[पंजाब में कांग्रेस को आपसी खींचतान में उलझा देख भाजपा ने मोदी को आगे कर पलट दी बाजी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/punjab-politics-bjp-development-ravidassia-outreach-congress-crisis-2027]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पंजाब में विधानसभा चुनावों से पहले का राजनीतिक परिदृश्य बड़ा हैरान कर देने वाला है। एक ओर सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी अपनी नाकामियों और तमाम तरह के आरोपों का सामना कर रही है, वहीं खुद को सत्ता की प्रबल दावेदार मान रही कांग्रेस में एकाएक जबरदस्त आपसी खींचतान मच गयी है। साथ ही पंजाब में कई बार राज कर चुका शिरोमणि अकाली दल अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है तो वहीं राज्य में पहली बार अपने दम पर सभी विधानसभा सीटों पर लड़ने का ऐलान कर चुकी भाजपा ने मौका देख कर अपनी चुनावी रणनीति को नई धार दे दी है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को लक्ष्य बनाकर विकास, धार्मिक-सामाजिक समीकरणों और नए राजनीतिक संदेश के सहारे अपनी जमीन मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 जुलाई को जालंधर दौरे पर आ रहे हैं। उनका दौरा केवल विकास परियोजनाओं के उद्घाटन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे 2027 की चुनावी बिसात का स्पष्ट राजनीतिक संदेश छिपा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/guardian-expresses-disappointment-over-the-awards-given-to-pm-modi" target="_blank">प्रधानमंत्री मोदी को मिले पुरस्कारों पर गार्जियन की हताशा</a></h3><div>भाजपा के लिए प्रधानमंत्री मोदी का पंजाब दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब राज्य की राजनीति सतलुज फिल्म विवाद से गर्माई हुई है। इस पूरे विवाद में भाजपा सबसे अधिक राजनीतिक दबाव में दिखाई दी। पार्टी लगातार यह कहती रही कि फिल्म को ओटीटी मंच से हटाने में उसकी कोई भूमिका नहीं है, लेकिन विपक्ष ने पूरे विवाद का राजनीतिक ठीकरा भाजपा पर ही फोड़ दिया। भाजपा के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आए। केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म को पंजाब की त्रासदी का "एकतरफा चित्रण" बताते हुए इसकी आलोचना की और कहा कि इसमें आतंकवाद की पृष्ठभूमि तथा पुलिसकर्मियों के बलिदान की अनदेखी की गई है। दूसरी ओर वरिष्ठ भाजपा नेता इकबाल सिंह लालपुरा ने सार्वजनिक रूप से बिट्टू को "अपनी सीमाओं में रहने" की सलाह दी। पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने भी माहौल शांत करने की अपील करते हुए कहा कि पंजाब ने बहुत खून-खराबा देखा है, इसलिए पुराने जख्मों को कुरेदने की बजाय शांति और जिम्मेदार संवाद की जरूरत है। पार्टी के भीतर यह स्वीकार किया जा रहा है कि फिल्म कांग्रेस शासनकाल की घटनाओं पर आधारित होने के बावजूद राजनीतिक जवाब भाजपा को देना पड़ रहा है।</div><div><br></div><div>ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री मोदी का विकास एजेंडा भाजपा के लिए राजनीतिक नैरेटिव बदलने का प्रयास माना जा रहा है। जालंधर कैंट रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास का उद्घाटन, मोहाली, श्री मुक्तसर साहिब और श्री आनंदपुर साहिब समेत कई रेलवे स्टेशनों का वर्चुअल लोकार्पण केवल आधारभूत ढांचे का विस्तार नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है कि भाजपा पंजाब में विकास की राजनीति को केंद्र में रखना चाहती है। साथ ही यह भी तय माना जा रहा है कि भाजपा पंजाब में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ेगी।</div><div><br></div><div>इस दौरे का दूसरा बड़ा आयाम रविदासिया समाज तक पहुंच बनाना है। प्रधानमंत्री इससे पहले भी गुरु रविदास जयंती पर डेरा सचखंड बल्लां पहुंच चुके हैं। जालंधर और पूरा दोआबा क्षेत्र रविदासिया समुदाय का प्रभावशाली राजनीतिक केंद्र माना जाता है, जहां अनुसूचित जाति मतदाता चुनावी परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आनंदपुर साहिब और मोहाली जैसे धार्मिक एवं शहरी क्षेत्रों को भी इस दौरे में शामिल करना भाजपा की व्यापक सामाजिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। श्री मुक्तसर साहिब का चयन भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल का गृह जिला है। हम आपको बता दें कि भाजपा पहले ही 2027 का चुनाव अपने दम पर लड़ने का ऐलान कर चुकी है, हालांकि उसने गठबंधन के विकल्प पूरी तरह बंद भी नहीं किए हैं। ऐसे में विकास और सामाजिक आउटरीच के जरिए पार्टी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत करने की कोशिश कर रही है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि उसका अपना संगठन बन गया है। लंबे समय से चली आ रही गुटबाजी के बावजूद पार्टी हाईकमान ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला किया है। पार्टी का आकलन है कि विधानसभा चुनाव से पहले नेतृत्व परिवर्तन संगठन को कमजोर कर सकता है। कांग्रेस सूत्रों का दावा है कि राज्य के 29 में से 25 जिला अध्यक्ष, सात में से चार सांसद और 18 में से 10 विधायक वड़िंग के साथ हैं। पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल ने भी स्पष्ट संकेत दिया कि फिलहाल यथास्थिति ही बनी रहेगी और मीडिया में चल रही अटकलों पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>हालांकि यह फैसला कांग्रेस के भीतर नई खींचतान का कारण बन गया है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर शक्ति संतुलन बनाने की कोशिश की गई, लेकिन चन्नी समर्थक इसे पर्याप्त नहीं मानते। उनका तर्क है कि चुनाव अभियान का नेतृत्व करने और पंजाब में पार्टी का प्रमुख चेहरा बनने के बाद चन्नी को अधिक अधिकार मिलने चाहिए थे। वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा समेत कई नेता भी वड़िंग के नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि लोकतांत्रिक दल में मतभेद स्वाभाविक हैं और समय आने पर असंतुष्ट नेताओं को साथ लेकर चलने का प्रयास किया जाएगा, लेकिन फिलहाल संगठन में स्थिरता सबसे बड़ी प्राथमिकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, स्पष्ट है कि पंजाब की राजनीति अब केवल विकास बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं रह गई है। भाजपा अतीत की बहसों से निकलकर विकास, रेलवे परियोजनाओं और रविदासिया समाज के जरिए नया राजनीतिक विमर्श गढ़ना चाहती है, जबकि कांग्रेस अपने ही संगठनात्मक संकट से जूझते हुए एकजुटता बचाने में लगी है। इस बीच, सतलुज विवाद ने पंजाब के पुराने जख्मों को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है, लेकिन असली मुकाबला इस बात का होगा कि 2027 तक कौन-सी पार्टी जनता के सामने सबसे विश्वसनीय राजनीतिक कथा स्थापित कर पाती है। फिलहाल भाजपा विकास और सामाजिक समीकरणों के सहारे नई जमीन तलाश रही है, जबकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी परीक्षा अपने घर की कलह पर नियंत्रण पाने की है। पंजाब की चुनावी बिसात बिछ चुकी है और आने वाले महीनों में यही दोनों ध्रुव राज्य की राजनीति की दिशा तय करेंगे क्योंकि आम आदमी पार्टी के प्रति बढ़ती नाराजगी को देखते हुए सत्ता से उसकी विदाई तय मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 11:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/punjab-politics-bjp-development-ravidassia-outreach-congress-crisis-2027</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Border Trade में आया नया मोड़, Myanmar सीमा पर व्यापार शुरू, मगर घोषणा के बावजूद China सीमा पर ट्रेड शुरू नहीं हो पाया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/india-myanmar-border-trade-resumes-after-6-years-lipulekh-india-china-trade-awaits-new-market]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कभी सीमाओं पर पसरा सन्नाटा कहानी का अंत लगता है, तो कभी वही खामोशी नए दौर की सबसे बड़ी दस्तक बन जाती है। सीमाएं जब खुलती हैं तो केवल रास्ते नहीं खुलते, बल्कि बाजारों में रौनक लौटती है, रोजी रोटी की उम्मीदें जागती हैं और सीमावर्ती बस्तियों की धड़कन फिर तेज हो जाती है। इस बार भी सीमाई व्यापार के मंच पर दो अलग अलग दृश्य सामने हैं। एक ओर भारत और म्यांमार के बीच छह वर्षों से बंद पड़ा व्यापारिक रास्ता फिर जीवन से भरने जा रहा है, जबकि दूसरी ओर लिपुलेख के रास्ते भारत और चीन के बीच व्यापार की पटकथा अभी अधूरी है। वहां बाजार तैयार नहीं होने से कारोबारी इंतजार की अगली कड़ी लिखने को मजबूर हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि भारत के सीमाई व्यापार मोर्चे पर एक साथ दो महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं। एक ओर भारत और म्यांमार के बीच पांगसाउ दर्रे से छह वर्ष बाद सीमाई व्यापार दोबारा शुरू होने जा रहा है, जिससे पूर्वोत्तर के सीमावर्ती इलाकों में आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है। दूसरी ओर भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे से व्यापार सत्र शुरू होने के बावजूद भारतीय व्यापारियों को अभी भी नए बाजार की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। बताया जा रहा है कि चीन की ओर से व्यापार व्यवस्था पूरी तरह तैयार नहीं होने के कारण कारोबार शुरू होने में देरी हो रही है। दोनों घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि सीमाई व्यापार केवल आर्थिक विषय नहीं, बल्कि कूटनीतिक, सामरिक और स्थानीय आजीविका से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-south-china-sea-japan-protest-j16-fighter-jet-military-analysis-hindi" target="_blank">South China Sea में 14 देशों ने चीन को मिलकर 'घेर लिया', जवाब में J-16 Fighter Plane की ताकत दिखाने लगा Dragon</a></h3><div>सबसे पहले भारत और म्यांमार के बीच व्यापार बहाली की बात करें तो अरुणाचल प्रदेश के पांगसाउ दर्रे से सीमाई व्यापार छह वर्षों के लंबे अंतराल के बाद फिर शुरू होने जा रहा है। यह व्यापार वर्ष 2019 में दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के कारण रोक दिया गया था। इसके बाद महामारी ने भी सीमाई आवाजाही और व्यापारिक गतिविधियों को पूरी तरह ठप कर दिया। अब दोनों देशों के बीच सहमति बनने के बाद व्यापार दोबारा शुरू करने का निर्णय लिया गया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार व्यापार जुलाई के अंत तक आरंभ होने की संभावना है।</div><div><br></div><div>इस व्यापार की सबसे बड़ी विशेषता मुक्त आवाजाही व्यवस्था है। इस व्यवस्था के अंतर्गत सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग बिना औपचारिक अनुमति के दस किलोमीटर तक एक दूसरे के क्षेत्र में आ जा सकते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर व्यापार, छोटे कारोबार, सांस्कृतिक संपर्क और सामाजिक संबंध मजबूत होंगे। सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपनी जरूरत का सामान आसानी से उपलब्ध होगा और स्थानीय उत्पादों के लिए नया बाजार भी मिलेगा।</div><div><br></div><div>साथ ही पांगसाउ मार्ग के फिर खुलने से सबसे अधिक लाभ अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले और आसपास के इलाकों को मिलने की उम्मीद है। स्थानीय व्यापारिक संगठनों का कहना है कि पिछले छह वर्षों में व्यापार बंद रहने से छोटे व्यापारियों, परिवहन से जुड़े लोगों और स्थानीय बाजारों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। सीमाई व्यापार फिर शुरू होने से रोजगार के नए अवसर बनेंगे, बाजारों में चहल पहल लौटेगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार मिलेगा।</div><div><br></div><div>स्थानीय व्यापार संगठन के अध्यक्ष जोंगखाम मोरांग ने मीडिया से कहा कि व्यापार बहाल होने से क्षेत्र के हजारों छोटे व्यापारियों और आम लोगों को सीधा लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि महामारी और व्यापार बंदी के दौरान जो आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह ठहर गई थीं, अब उनके फिर से पटरी पर लौटने की उम्मीद है। सीमा चौकी प्रत्येक महीने की दस, बीस और तीस तारीख को संचालित होगी, जिससे नियमित व्यापारिक गतिविधियां सुनिश्चित की जा सकेंगी।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर उत्तराखंड स्थित लिपुलेख दर्रे से भारत और चीन के बीच व्यापार सत्र औपचारिक रूप से शुरू तो हो गया है, लेकिन वास्तविक कारोबार अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। इसका कारण यह है कि चीन की ओर से नया बाजार और गोदाम पूरी तरह तैयार नहीं हो सके हैं। तिब्बत के तकलाकोट क्षेत्र में नया व्यापारिक केंद्र बनने का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है, जिसके चलते चीनी अधिकारियों ने भारतीय व्यापारियों से कुछ समय और प्रतीक्षा करने को कहा है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि लिपुलेख मार्ग से व्यापार वर्ष 2020 में गलवान घाटी की घटना के बाद रोक दिया गया था। इसके बाद लगातार चार वर्षों तक यह मार्ग बंद रहा। इस वर्ष व्यापार फिर शुरू होने की घोषणा से व्यापारियों में उत्साह तो बढ़ा, लेकिन बाजार तैयार नहीं होने के कारण उनकी उम्मीदों को फिलहाल झटका लगा है। व्यापारियों का कहना है कि यदि बाजार समय पर तैयार हो जाता तो इस बार खच्चरों की जगह सीधे मालवाहक वाहनों से सामान पहुंचाया जा सकता था। इसका सबसे बड़ा कारण धारचूला से लिपुलेख तक सड़क निर्माण का पूरा हो जाना है।</div><div><br></div><div>हालांकि भारतीय पक्ष ने अपनी तैयारियां लगभग पूरी कर ली हैं। हम आपको बता दें कि व्यापार सत्र की औपचारिक शुरुआत जून में हो चुकी है और भारतीय व्यापारी जुलाई के शुरू में ही सीमा पार करने की तैयारी में थे। लेकिन इसी दौरान चीनी व्यापारिक साझेदारों की ओर से संदेश मिला कि नया बाजार और आवश्यक ढांचा अभी निर्माणाधीन है। इसलिए व्यापारियों को फिलहाल सीमा पार नहीं भेजा जाए। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद नई तिथि की सूचना देने का आश्वासन भी दिया गया है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, दोनों घटनाएं इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि सीमाई व्यापार केवल वस्तुओं के आदान प्रदान तक सीमित नहीं है। यह सीमावर्ती क्षेत्रों की आजीविका, स्थानीय अर्थव्यवस्था, आधारभूत ढांचे और दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों से सीधे जुड़ा हुआ है। जहां म्यांमार सीमा पर व्यापार बहाली पूर्वोत्तर के लिए नई आर्थिक संभावनाओं का द्वार खोल रही है, वहीं लिपुलेख पर चीन की धीमी तैयारी यह दिखाती है कि सीमाई व्यापार की सफलता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि समय पर आधारभूत सुविधाएं और पारस्परिक समन्वय सुनिश्चित होने पर ही संभव है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 14:39:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/india-myanmar-border-trade-resumes-after-6-years-lipulekh-india-china-trade-awaits-new-market</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[PM Modi ने दस सालों में Indian Navy को कहां से कहां पहुँचा दिया, समुद्र की लहरों पर दौड़ती भारतीय शक्ति को पूरी दुनिया सलाम करती है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/ins-mahendragiri-indian-navy-project-17a-stealth-frigate-strategic-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय नौसेना की युद्धक क्षमता को नई ऊंचाई देते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विशाखापत्तनम में स्वदेशी स्टील्थ युद्धपोत आईएनएस महेंद्रगिरि को पूर्वी बेड़े में शामिल किया। प्रोजेक्ट सत्रह ए के तहत निर्मित यह छठा और अंतिम स्टील्थ युद्धपोत सिर्फ एक नया जहाज नहीं, बल्कि समुद्री शक्ति, स्वदेशी रक्षा निर्माण और सामरिक आत्मनिर्भरता का सशक्त प्रतीक है। महेंद्रगिरि के नौसेना में शामिल होने के साथ ही भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह केवल अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में भी अपने हितों की प्रभावी सुरक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि करीब छह हजार छह सौ सत्तर टन वजन और अट्ठाइस नॉट की अधिकतम गति वाला यह बहुउद्देशीय युद्धपोत आधुनिक समुद्री युद्ध की हर चुनौती से निपटने के लिए तैयार किया गया है। इसमें रडार पर कम दिखाई देने वाली स्टील्थ क्षमता, अत्याधुनिक स्वचालित प्रणालियां, हमलों को झेलने की बेहतर क्षमता और पचहत्तर प्रतिशत से अधिक स्वदेशी उपकरण लगाए गए हैं। इसे ब्रह्मोस प्रहारक मिसाइल, लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली, बहुउद्देशीय रडार, पनडुब्बी रोधी रक्षा प्रणाली, टारपीडो प्रक्षेपक, स्वदेशी रॉकेट प्रक्षेपक तथा उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली से लैस किया गया है। यही कारण है कि यह हवा, समुद्र की सतह और समुद्र के भीतर छिपे दुश्मनों पर एक साथ प्रभावी प्रहार करने में सक्षम है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि महेंद्रगिरि को ब्लू वाटर युद्धपोत की श्रेणी में रखा गया है। इसका अर्थ है कि यह केवल तटीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर गहरे समुद्र में कई सप्ताह तक लगातार अभियान चलाने की क्षमता रखता है। खोज और बचाव अभियान, मानवीय सहायता, आपदा राहत, समुद्री सुरक्षा तथा हिंद महासागर क्षेत्र में लंबी तैनाती जैसे दायित्व भी यह समान दक्षता से निभा सकता है। पूर्वी घाट की महेंद्रगिरि पर्वतमाला के नाम पर रखे गए इस युद्धपोत के प्रतीक चिह्न में दर्शाया गया शिकरा पैनी दृष्टि, धैर्य और निर्णायक प्रहार का प्रतीक है, जो इसकी युद्धक भूमिका को भी प्रतिबिंबित करता है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो महेंद्रगिरि का सामरिक महत्व केवल इसकी मारक क्षमता तक सीमित नहीं है। हिंद महासागर आज विश्व व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक प्रतिस्पर्धा का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है। ऐसे समय में भारत के पास जितने अधिक आधुनिक और दूर तक अभियान चलाने वाले युद्धपोत होंगे, उतनी ही मजबूत उसकी समुद्री प्रतिरोधक क्षमता होगी। यह युद्धपोत समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, शत्रु की गतिविधियों पर निगरानी, पनडुब्बियों की खोज और आवश्यकता पड़ने पर त्वरित जवाबी कार्रवाई में निर्णायक भूमिका निभाएगा। इससे हिंद महासागर और हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत की स्थिति एक भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार के रूप में और मजबूत होगी।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि हाल के महीनों में भारतीय नौसेना का विस्तार अभूतपूर्व गति से हुआ है। 21 जून 2026 को एक साथ तीन महत्वपूर्ण पोत नौसेना में शामिल किए गए थे। इनमें आईएनएस दुनागिरि स्टील्थ युद्धपोत, आईएनएस संशोधक गहरे समुद्र का सर्वेक्षण पोत और आईएनएस अग्रय पनडुब्बी रोधी युद्धपोत शामिल हैं। इसके पहले 31 मार्च 2026 को आईएनएस मालवन को शामिल किया गया, जबकि साल 2025 में बहुउद्देशीय स्टील्थ युद्धपोत आईएनएस तमाल भी नौसेना का हिस्सा बना। अब महेंद्रगिरि के शामिल होने से भारतीय नौसेना की मारक क्षमता, निगरानी शक्ति और समुद्री उपस्थिति पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ हो गई है।</div><div><br></div><div>यदि दस वर्ष पहले की तुलना करें तो भारतीय नौसेना में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देता है। तब अधिकांश प्रमुख युद्धपोतों और हथियार प्रणालियों के लिए विदेशी निर्भरता अधिक थी, जबकि आज स्वदेशी डिजाइन, निर्माण और अत्याधुनिक हथियारों से लैस युद्धपोत तेजी से बेड़े में शामिल हो रहे हैं। विमानवाहक पोत, आधुनिक विध्वंसक, स्टील्थ युद्धपोत, पनडुब्बी रोधी पोत, सर्वेक्षण पोत, उन्नत प्रहारक मिसाइल और स्वदेशी रक्षा प्रणालियों ने नौसेना की शक्ति को कई गुना बढ़ा दिया है। इस तरह अब भारत केवल समुद्री सुरक्षा करने वाला देश नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने वाली महत्वपूर्ण समुद्री ताकत के रूप में उभर चुका है।</div><div><br></div><div>साथ ही महेंद्रगिरि का नौसेना में शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना अब केवल नारा नहीं, बल्कि समुद्र की लहरों पर दौड़ती वास्तविक शक्ति बन चुकी है। यह युद्धपोत आने वाले वर्षों में भारत की समुद्री सुरक्षा का मजबूत प्रहरी बनने के साथ साथ स्वदेशी रक्षा निर्माण की सफलता का भी सबसे प्रभावशाली उदाहरण साबित होगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 16:15:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/ins-mahendragiri-indian-navy-project-17a-stealth-frigate-strategic-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vishwakhabram: Turkey में मुगलों के सम्मान पर भारत में मचा बवाल, NATO Summit में आखिर क्यों दिखाए गए 16 Turkic Empires?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/turkey-mughal-empire-erdogan-nato-summit-india-history-strategic-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अंकारा में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान तुर्की ने केवल वैश्विक कूटनीति का मंच ही नहीं सजाया, बल्कि इतिहास, संस्कृति और प्रतीकों के जरिये अपनी वैचारिक पहचान का भी जोरदार प्रदर्शन किया। राष्ट्रपति रेचेप तैयप एरदोगान ने दुनिया के शीर्ष नेताओं के स्वागत के लिए जिस भव्य राजकीय समारोह का आयोजन किया, उसका सबसे चर्चित और विवादास्पद पक्ष रहा तुर्की के कथित सोलह महान तुर्क साम्राज्यों का प्रदर्शन। इन्हीं सोलह साम्राज्यों में भारत के मुगल साम्राज्य को भी शामिल किया गया और बाबर की सेना का प्रतिनिधित्व करने वाला एक सैनिक विशेष पोशाक में समारोह का हिस्सा बनाया गया। इस कदम ने केवल इतिहासकारों के बीच ही नहीं, बल्कि भारत में भी एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या तुर्की ने भारत के इतिहास पर अपना दावा जताने की कोशिश की है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि तुर्की के राष्ट्रपति भवन में आयोजित स्वागत समारोह में आधुनिक सैन्य टुकड़ियों, उस्मानी काल के मेहतर सैन्य वाद्य दल और ऐतिहासिक वेशभूषा में सजे सोलह सैनिकों को एक साथ प्रस्तुत किया गया। यह परंपरा वर्ष 2015 में एरदोगान ने शुरू की थी और तब से हर बड़े राजकीय स्वागत का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। इन सोलह सैनिकों को तुर्की के राष्ट्रपति चिह्न पर बने सोलह सितारों का प्रतीक माना जाता है। तुर्की का दावा है कि ये सितारे उन सोलह ऐतिहासिक तुर्क साम्राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्होंने तुर्क सभ्यता की निरंतरता को आगे बढ़ाया।</div><div><br></div><div>इन्हीं 16 साम्राज्यों की सूची में हूण, गोकतुर्क, खजर, उइगर, गजनवी, महान सलजूक, ख्वारज्म, स्वर्ण गिरोह, तैमूरी, मुगल और उस्मानी साम्राज्य शामिल हैं। समारोह में बाबर द्वारा स्थापित मुगल साम्राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सैनिक को भी विशेष स्थान दिया गया। हम आपको बता दें कि तुर्की के इतिहास लेखन में मुगल साम्राज्य को बाबर साम्राज्य कहा जाता है। वहां यह पढ़ाया जाता है कि बाबर तैमूर का प्रत्यक्ष वंशज था, उसकी मातृभाषा चगताई तुर्की थी और इसलिए मुगल साम्राज्य तुर्क इतिहास की निरंतर कड़ी है।</div><div><br></div><div>इतिहास का यह पक्ष अपनी जगह है कि बाबर मध्य एशिया से आया था और उसकी सांस्कृतिक जड़ें तुर्क परंपरा से जुड़ी थीं। यह भी निर्विवाद है कि मुगल शासन के विभिन्न दौर में अनेक मंदिरों को ध्वस्त किया गया और भारतीय धार्मिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं पर प्रहार हुए, जिनकी स्मृति आज भी इतिहास और जनचेतना का हिस्सा है। लेकिन इसके साथ ही यह भी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत में स्थापित होने के बाद मुगल साम्राज्य ने यहां की अनेक परंपराओं, प्रशासनिक व्यवस्थाओं, कला, स्थापत्य, भाषा और जीवन शैली को भी अलग अलग स्तरों पर आत्मसात किया। अकबर से लेकर शाहजहां तक मुगल शासन भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचना का अभिन्न हिस्सा बन गया था।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, एरदोगान का पूरा आयोजन केवल सैन्य प्रतीकों तक सीमित नहीं था। उन्होंने इस अवसर को तुर्की की सांस्कृतिक शक्ति के प्रदर्शन में भी बदल दिया। दुनिया भर से आए राष्ट्राध्यक्षों, उनकी पत्नियों और लगभग ढाई हजार अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के लिए तुर्की के विभिन्न क्षेत्रों के पारंपरिक व्यंजनों की विशेष व्यवस्था की गई थी। राष्ट्रपति भवन में परोसे गए भोजन में देश के अलग अलग प्रांतों के प्रसिद्ध पकवान शामिल थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया केंद्र में भी तुर्की के व्यंजनों का विशाल संग्रह प्रस्तुत किया गया। तुर्की के संचार निदेशक ने इसे जन कूटनीति का प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि कई बार एक साथ किया गया भोजन उन बातों को कह देता है जिन्हें दस्तावेजों के अनेक पन्ने भी व्यक्त नहीं कर पाते।</div><div><br></div><div>तुर्की ने केवल भोजन ही नहीं, बल्कि अपनी कला, शिल्प, तकनीकी उपलब्धियों, मानवीय सहायता अभियानों और सांस्कृतिक विरासत की प्रदर्शनियां भी लगाईं। राष्ट्राध्यक्षों की पत्नियों के लिए अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। उस्मानी सैन्य संगीत, 21 तोपों की सलामी, तुर्की के वायु प्रदर्शन दल की उड़ान और ऐतिहासिक प्रतीकों के जरिये एरदोगान ने यह संदेश देने की कोशिश की कि आधुनिक तुर्की स्वयं को हजारों वर्षों की एक अखंड सभ्यता का उत्तराधिकारी मानता है।</div><div><br></div><div>लेकिन भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या मुगल साम्राज्य को तुर्की की सभ्यतागत विरासत का हिस्सा बताना भारत के इतिहास में हस्तक्षेप है? वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखें तो तुर्की ने भारत के भूभाग या संप्रभुता पर कोई औपचारिक दावा नहीं किया है। उसने केवल अपने इतिहास लेखन और राष्ट्रीय प्रतीकों के अनुरूप मुगल साम्राज्य को तुर्क परंपरा की एक कड़ी के रूप में प्रस्तुत किया है। इसलिए इसे प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप कहना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जब किसी दूसरे देश के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय किसी अन्य राष्ट्र की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा बनाकर विश्व मंच पर प्रस्तुत किया जाता है, तब वह स्वाभाविक रूप से संवेदनशील प्रश्न खड़े करता है।</div><div><br></div><div>भारत और तुर्की के संबंध पहले ही कई मुद्दों पर तनावपूर्ण हैं। कश्मीर पर तुर्की का रुख, पाकिस्तान के साथ उसकी बढ़ती सामरिक निकटता, रक्षा सहयोग और अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी बयान दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी को और गहरा कर चुके हैं। ऐसे माहौल में यदि तुर्की मुगल साम्राज्य को गर्व के साथ अपनी ऐतिहासिक विरासत के रूप में प्रस्तुत करते हुए यह संदेश देना चाहता है कि भारत पर शासन और अत्याचार करने वाले उसके पूर्वज थे, तो उसे यह भी समझ लेना चाहिए कि यह प्रतीकात्मक राजनीति उसके लिए उलटी पड़ सकती है। भारत का इतिहास किसी विदेशी आक्रांता के गौरवगान का विषय नहीं है, बल्कि उन आक्रमणों का डटकर सामना करने वाले असंख्य भारतीय वीरों के संघर्ष और बलिदान की गाथा भी है। इसलिए इस तरह के ऐतिहासिक प्रतीकों का प्रदर्शन भारत में सकारात्मक संदेश देने की बजाय दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद वैचारिक और कूटनीतिक दूरियों को और बढ़ा सकता है। भले ही केवल इस एक घटनाक्रम से कोई तत्काल कूटनीतिक संकट उत्पन्न होने की संभावना न हो, लेकिन यह निश्चित रूप से दोनों देशों के संबंधों में एक और असहज अध्याय जोड़ता है।</div><div><br></div><div>वैसे इस पूरे घटनाक्रम के सामरिक और रणनीतिक निहितार्थ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। एरदोगान लंबे समय से तुर्की को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि व्यापक तुर्क सभ्यता के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। मध्य एशिया, काकेशस और इस्लामी दुनिया में प्रभाव बढ़ाने की उनकी नीति में इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों का लगातार उपयोग किया जा रहा है। मुगल साम्राज्य को इस प्रतीकात्मक श्रृंखला में जोड़ना उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है, जिसके जरिये तुर्की अपनी ऐतिहासिक पहुंच को वर्तमान कूटनीति की शक्ति में बदलना चाहता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, नाटो शिखर सम्मेलन के मंच से एरदोगान ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक कूटनीति अब केवल समझौतों और बैठकों तक सीमित नहीं रही। इतिहास, संस्कृति, भोजन, सैन्य परंपरा और राष्ट्रीय प्रतीक भी वैश्विक शक्ति प्रदर्शन के प्रभावी हथियार बन चुके हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि 21वीं सदी की भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में इतिहास की व्याख्या भी एक रणनीतिक औजार बन चुकी है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 16:26:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/turkey-mughal-empire-erdogan-nato-summit-india-history-strategic-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vanakkam Poorvottar: Bangladeshi Infiltrators के खिलाफ Assam ने छेड़ा सबसे बड़ा अभियान, अब तक 228 KM से अधिक क्षेत्र में कंटीली बाड़ लगाई]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/assam-border-security-bangladeshi-infiltrators-himanta-biswa-sarma-crackdown]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>असम में बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ अभियान अब और तेजी से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। दरअसल सीमा सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार ने विधानसभा में जो जानकारी दी है, उससे स्पष्ट है कि अवैध घुसपैठ रोकने के लिए चौतरफा तैयारी की जा रही है। सीमा पर कंटीली बाड़, संवेदनशील इलाकों में निगरानी, संदिग्ध घुसपैठियों की लगातार धरपकड़ और घुसपैठ कराने वाले गिरोहों की तलाश ने यह संदेश दे दिया है कि अब भारत की सीमा को हल्के में लेने वालों के लिए कोई जगह नहीं बची है। बांग्लादेशी घुसपैठियों को यह समझ लेना चाहिए कि भारत की सुरक्षा और संप्रभुता से खिलवाड़ करने की हर कोशिश का कड़ा कानूनी जवाब मिलेगा।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि असम और बांग्लादेश के बीच लगभग 276 किलोमीटर लंबी सीमा है। राज्य सरकार के अनुसार इसमें से 228 किलोमीटर से अधिक हिस्से में कंटीली बाड़ का निर्माण पूरा हो चुका है। श्रीभूमि, कछार, धुबरी और दक्षिण सलमारा मांकाचार जिलों में सीमा सुरक्षा को मजबूत बनाने का काम तेजी से आगे बढ़ा है। हालांकि नदी वाले क्षेत्रों में लगभग 34 किलोमीटर से अधिक हिस्से में बाड़ लगाना संभव नहीं हो सका है। इसके अलावा श्रीभूमि जिले में कुशियारा नदी के किनारे 4.35 किलोमीटर क्षेत्र में बांग्लादेश सीमा सुरक्षा बल के विरोध के कारण बाड़ का निर्माण अटका हुआ है। वहां भारतीय नागरिक रहते हैं, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है।</div><div><br></div><div>सीमा सुरक्षा एवं विकास मंत्री अतुल बोरा ने विधानसभा में स्पष्ट किया कि अवैध घुसपैठ रोकना राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। जिन इलाकों में बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहां आधुनिक निगरानी व्यवस्था स्थापित की गई है। संवेदनशील स्थानों पर निगरानी कैमरे लगाए गए हैं और सीमा सुरक्षा बल की 14 चौकियां लगातार वास्तविक समय में निगरानी कर रही हैं। राज्य सरकार का मानना है कि सीमा की हर गतिविधि पर नजर रखने से घुसपैठ की घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि भारत और बांग्लादेश के बीच अब तक प्रत्यर्पण संधि नहीं होने के कारण कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया जटिल बनी हुई है।</div><div><br></div><div>राज्य सरकार ने यह भी दोहराया कि असम समझौते की धारा-6 को लागू करना उसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायमूर्ति बिप्लब कुमार शर्मा समिति की 40 महत्वपूर्ण सिफारिशों को लागू करने की प्रक्रिया जारी है, जिनका उद्देश्य असम के मूल निवासियों के अधिकारों और पहचान की रक्षा करना है।</div><div><br></div><div>हालांकि इन सब प्रयासों के बीच असम के हैलाकांडी जिले में एक 42 वर्षीय बांग्लादेशी नागरिक की गिरफ्तारी ने सीमा सुरक्षा की चुनौती को फिर उजागर कर दिया है। पुलिस के अनुसार सिलहट निवासी यह व्यक्ति अवैध रूप से श्रीभूमि के रास्ते भारत में घुसा था। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि उसने भारत की एक महिला से विवाह किया था और उसकी पत्नी तथा बेटी पिछले ढाई वर्षों से हैलाकांडी में रह रही हैं। पूछताछ में उसने परिवार को बांग्लादेश ले जाने की इच्छा जताई है। पुलिस अब यह पता लगा रही है कि उसने किस रास्ते से सीमा पार की और किन लोगों ने उसकी मदद की। इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सीमा पार कराने वाले संगठित गिरोह अब भी सक्रिय हैं।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर रेलवे सुरक्षा बल द्वारा 11 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़े जाने की घटना भी बेहद गंभीर है। सभी संदिग्ध चेन्नई जाने की तैयारी में थे। शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि वे मेघालय के तुरा क्षेत्र से भारत में दाखिल हुए और उन्हें सीमा पार कराने में एक बिचौलिए की भूमिका हो सकती है। जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करने में जुटी हैं ताकि अवैध घुसपैठ के पीछे काम कर रहे एजेंटों और सहयोगियों तक पहुंचा जा सके।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो असम में चल रही कार्रवाई यह स्पष्ट कर रही है कि सीमा सुरक्षा केवल बाड़ लगाने का मामला नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, जनसांख्यिक संतुलन और कानून व्यवस्था से जुड़ा विषय है। जो लोग अवैध तरीके से भारत में प्रवेश करने का सपना देख रहे हैं, उन्हें अब यह समझ लेना चाहिए कि हर रास्ते पर सुरक्षा एजेंसियों की नजर है। घुसपैठ कराने वाले गिरोहों, फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों और सीमा पार करने वालों के लिए अब बच निकलना आसान नहीं रहेगा। भारत की सीमा का सम्मान करना ही एकमात्र विकल्प है, क्योंकि अवैध घुसपैठ करने वालों के लिए अब कानून का शिकंजा पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुका है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ सबसे कड़ा रुख अपनाने वाले नेताओं में गिना जाता है। उन्होंने अवैध घुसपैठियों की पहचान, गिरफ्तारी और उन्हें भारत से बाहर भेजने की मुहिम को लगातार तेज किया है। इसी सप्ताह उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि असम में एक लाख बहत्तर हजार से अधिक अवैध घुसपैठियों की पहचान की जा चुकी है और उनमें से लगभग इकतीस हजार को उनके देश वापस भेजा जा चुका है। सीमा पर कड़ी निगरानी, आधार जारी करने के नियम सख्त करना, असम समझौते के प्रावधानों को लागू करने पर जोर और सीमा पर बाड़ निर्माण में तेजी जैसे फैसलों को भी उनकी इसी नीति का हिस्सा माना जा रहा है। सरमा लगातार यह कहते रहे हैं कि असम किसी भी अवैध घुसपैठिए की शरणस्थली नहीं बन सकता और राज्य की जनसंख्या, सुरक्षा तथा मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून के दायरे में रहकर हर संभव कदम उठाया जाएगा। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज और व्यापक होती दिखाई दे रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 17:45:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/assam-border-security-bangladeshi-infiltrators-himanta-biswa-sarma-crackdown</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Indonesia के सफल दौरे के बाद Australia Visit पर PM Modi, Mission Indo Pacific का जलवा देख दुनिया हैरान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/modi-indonesia-australia-visit-strategic-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा भारत की लुक-ईस्ट नीति को नई गति देने वाला निर्णायक कदम साबित हुई। तीन दिन की इस यात्रा में भारत और इंडोनेशिया के बीच 14 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिन्होंने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, खाद्य सुरक्षा, अंतरिक्ष, शिक्षा, दूरसंचार, अनुसंधान तथा नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग का नया अध्याय खोल दिया। लेकिन इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण रहा सबांग बंदरगाह के संयुक्त विकास पर सहमति, जिसने हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य के सामरिक समीकरणों में भारत की उपस्थिति को कहीं अधिक प्रभावशाली बना दिया है।</div><div><br></div><div>मलक्का जलडमरूमध्य विश्व व्यापार की सबसे व्यस्त समुद्री धमनियों में से एक है। वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। पूर्वी एशिया की अर्थव्यवस्थाओं और विशेष रूप से चीन की ऊर्जा आपूर्ति के लिए यह समुद्री मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में सबांग बंदरगाह के विकास में भारत की भागीदारी केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक निवेश भी है। यह बंदरगाह भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के निकट स्थित है। दोनों परियोजनाएं मिलकर हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री निगरानी, रसद क्षमता और रणनीतिक पहुंच को कई गुना मजबूत कर सकती हैं।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने मुक्त, सुरक्षित और शांतिपूर्ण इंडो पैसिफिक की आवश्यकता पर बल देते हुए आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता की साझा नीति दोहराई। यह संदेश केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक स्पष्ट रणनीतिक संकेत भी था कि भारत और इंडोनेशिया समुद्री सुरक्षा तथा नियम आधारित व्यवस्था के पक्षधर हैं।</div><div><br></div><div>इस यात्रा का सांस्कृतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो ने लगभग एक हजार वर्ष पुराने प्रम्बानन मंदिर परिसर का संयुक्त दौरा किया। भारत ने इस विश्व धरोहर मंदिर के संरक्षण और पुनर्स्थापन में सहयोग देने की घोषणा की। यह सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का निर्णय ही नहीं, बल्कि दोनों देशों के हजारों वर्ष पुराने सभ्यतागत संबंधों को आधुनिक कूटनीति से जोड़ने का सशक्त प्रयास भी है। सांस्कृतिक विश्वास और सामरिक साझेदारी का यह संतुलन भारत की विदेश नीति की नई पहचान बनता दिखाई दे रहा है।</div><div><br></div><div>इंडोनेशिया की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को मिला विशेष सम्मान भी दोनों देशों के बदलते रिश्तों की गहराई का संकेत देता है। आगमन और प्रस्थान दोनों अवसरों पर लड़ाकू विमानों द्वारा उनके विमान को सुरक्षा प्रदान करना तथा स्वयं राष्ट्रपति का हवाई अड्डे तक पहुंचकर अगवानी करना और विदाई देना इस बात का प्रमाण है कि जकार्ता नई दिल्ली को अपने सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में शामिल कर रहा है।</div><div><br></div><div>इंडोनेशिया में नई सामरिक नींव रखने के बाद प्रधानमंत्री मोदी अब ऑस्ट्रेलिया पहुंचे हैं, जहां अगले चरण की कूटनीति का केंद्र महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला बनने जा रहे हैं। देखा जाये तो बदलते वैश्विक परिदृश्य में आधुनिक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा अब केवल सैन्य शक्ति से तय नहीं होती, बल्कि उन खनिज संसाधनों से भी निर्धारित होती है जिनसे विद्युत वाहन, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा भंडारण प्रणाली, रक्षा उपकरण, दूरसंचार और उन्नत प्रौद्योगिकी संचालित होती है।</div><div><br></div><div>भारत इन क्षेत्रों में तेजी से विस्तार कर रहा है, लेकिन लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, तांबा और दुर्लभ मृदा तत्व जैसे अधिकांश महत्वपूर्ण खनिजों के लिए अभी भी आयात पर निर्भर है। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया विश्व के उन देशों में शामिल है जो इन प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हैं। ऐसे में दोनों देशों की साझेदारी केवल व्यापार नहीं, बल्कि भारत की औद्योगिक आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हुई है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि ऑस्ट्रेलिया के पास विश्व के सबसे बड़े लिथियम भंडारों में से एक है, जबकि यूरेनियम के वैश्विक भंडार का भी बड़ा हिस्सा वहीं मौजूद है। भारत अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है और स्वच्छ ऊर्जा, विद्युत वाहन तथा सेमीकंडक्टर निर्माण को नई गति देना चाहता है। इसलिए ऑस्ट्रेलिया के साथ स्थायी खनिज आपूर्ति व्यवस्था भारत की विकास यात्रा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा का दूसरा बड़ा आयाम रक्षा सहयोग है। भारत और ऑस्ट्रेलिया पहले ही समुद्री अभ्यास, रक्षा साझेदारी और क्वॉड समूह के माध्यम से लगातार निकट आए हैं। अब दोनों देश रक्षा उद्योग, समुद्री निगरानी, प्रौद्योगिकी साझेदारी और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊंचाई देने की दिशा में बढ़ रहे हैं। बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में जब आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा एक दूसरे से जुड़ चुकी हैं, तब यह साझेदारी भारत की रणनीतिक स्थिति को और मजबूत करेगी।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया यात्राओं को यदि एक साथ देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि भारत सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार नहीं कर रहा, बल्कि पूरे इंडो पैसिफिक क्षेत्र में एक व्यापक रणनीतिक ताना बाना तैयार कर रहा है। इंडोनेशिया भारत को समुद्री पहुंच और सामरिक गहराई देता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। एक ओर समुद्री मार्गों पर मजबूत उपस्थिति है तो दूसरी ओर उद्योग, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के लिए आवश्यक खनिजों की दीर्घकालिक उपलब्धता। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा श्रृंखला भारत की बदलती वैश्विक भूमिका का स्पष्ट संकेत है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, समुद्री शक्ति, संसाधन सुरक्षा, विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला, सांस्कृतिक विरासत और रणनीतिक साझेदारी को एक साथ जोड़ते हुए भारत अब इंडो पैसिफिक में केवल सहभागी नहीं, बल्कि भविष्य की शक्ति संरचना को आकार देने वाले प्रमुख देशों में अपनी जगह मजबूत करता दिखाई दे रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 18:08:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/modi-indonesia-australia-visit-strategic-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mayawati की जमीन पर Akhilesh Yadav की एंट्री, UP में बड़ा खेल शुरू, सपा के Dalit Card से BJP भी हैरान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/samajwadi-party-dalit-candidates-up-election]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों समाजवादी पार्टी ने ऐसा दांव चला है, जिसने बहुजन समाज पार्टी की बेचैनी बढ़ा दी है और भारतीय जनता पार्टी को भी माथा खुजलाने पर मजबूर कर दिया है। बात सिर्फ टिकट बांटने की नहीं है, बल्कि उस नई सामाजिक बिसात की है, जिस पर अखिलेश यादव अब दलित, पिछड़ा और मुस्लिम समीकरण को नए अंदाज में जमाने की कोशिश कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि सियासी गलियारों में चर्चा गर्म है कि समाजवादी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में लगभग सौ दलित उम्मीदवार मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। इनमें सामान्य सीटों पर भी दलित चेहरों को मौका देने की रणनीति शामिल है। समाजवादी पार्टी का मानना है कि अगर बहुजन समाज पार्टी की पारंपरिक जमीन पर सेंध लगानी है तो केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा, बल्कि टिकट वितरण में भी साहस दिखाना होगा।</div><div><br></div><div>दरअसल, यह पूरी कवायद उस बदले हुए राजनीतिक माहौल का नतीजा है, जिसमें बहुजन समाज पार्टी धीरे धीरे अपने पुराने प्रभाव से दूर होती दिखाई दे रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला और उसका मत प्रतिशत भी तेजी से नीचे आया। उधर समाजवादी पार्टी ने यह समझ लिया है कि अगर दलित मतदाता का एक हिस्सा भी उसके साथ मजबूती से आ गया, तो उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता और आसान हो सकता है।</div><div><br></div><div>इसी सोच के तहत पार्टी अब आरक्षित सीटों तक सीमित रहने की बजाय सामान्य सीटों पर भी दलित प्रत्याशी उतारने की तैयारी में है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि जहां समाजवादी पार्टी का संगठन बहुत मजबूत नहीं है, वहां दलित उम्मीदवारों को उतारकर नया सामाजिक समीकरण बनाया जाएगा। यानी जहां जमीन कमजोर है, वहां जातीय गणित से जीत का पुल तैयार करने की कोशिश होगी।</div><div><br></div><div>दिलचस्प बात यह है कि यह प्रयोग पूरी तरह नया भी नहीं है। लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कई दलित उम्मीदवार उतारे थे और उसका फायदा भी मिला। अयोध्या, मेरठ और फैजाबाद जैसी सीटों पर पार्टी ने दलित चेहरों को मौका देकर राजनीतिक संदेश दिया था कि अब पार्टी केवल यादव मुस्लिम पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहती।</div><div><br></div><div>राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अखिलेश यादव अब उस छवि से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें समाजवादी पार्टी को केवल यादव और मुस्लिम मतों की पार्टी माना जाता था। यही कारण है कि पार्टी अब दलित समाज में लगातार संवाद बढ़ा रही है। पंचायत स्तर से लेकर विधान परिषद तक प्रतिनिधित्व का नया खाका तैयार किया जा रहा है।</div><div><br></div><div>समाजवादी पार्टी के भीतर भी यह समझ बन रही है कि बहुजन समाज पार्टी के कमजोर पड़ने से जो राजनीतिक खालीपन बना है, उसे भरने का यह सबसे सही समय है। पार्टी नेताओं का दावा है कि दलित समाज का एक हिस्सा अब नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में है। ऐसे में अगर सम्मानजनक भागीदारी दी जाए, तो यह वर्ग स्थायी रूप से नए गठजोड़ की तरफ आ सकता है।</div><div><br></div><div>उधर, भारतीय जनता पार्टी भी इस बदलते समीकरण को लेकर सतर्क दिखाई दे रही है। भाजपा को मालूम है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि चुनावी दिशा तय करने वाला निर्णायक वर्ग है। इसी कारण भाजपा लगातार अपने दलित संपर्क अभियान को तेज कर रही है और यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका सामाजिक विस्तार अभी भी कायम है।</div><div><br></div><div>बहुजन समाज पार्टी के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है। कभी दलित राजनीति की सबसे बड़ी धुरी रही पार्टी अब दो तरफा दबाव में है। एक तरफ भाजपा उसका परंपरागत वोट बैंक खींच रही है, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी नए अंदाज में दलित नेतृत्व को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।</div><div><br></div><div>राजनीति के पुराने खिलाड़ी मानते हैं कि यह पूरा खेल केवल टिकटों का नहीं, बल्कि प्रतीकों और संदेशों का है। अखिलेश यादव यह जताना चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी अब केवल एक जाति विशेष की पार्टी नहीं रही। वहीं भाजपा यह साबित करने में जुटी है कि उसका सामाजिक समीकरण अभी भी सबसे व्यापक है। और बहुजन समाज पार्टी इस कोशिश में लगी है कि उसका कोर मतदाता पूरी तरह छिटकने न पाए।</div><div><br></div><div>बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह नया दौर बेहद दिलचस्प होने वाला है। अब चुनावी मंचों पर केवल विकास और वादों की बात नहीं होगी, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व की नई पटकथा भी लिखी जाएगी। फिलहाल इतना तय है कि दलित राजनीति अब केवल एक पार्टी की जागीर नहीं रही। साइकिल, कमल और हाथी तीनों अब उसी मैदान में उतर चुके हैं, जहां हर वोट के पीछे पूरा सामाजिक गणित छिपा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 12:20:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/samajwadi-party-dalit-candidates-up-election</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आस्था के मुखौटे में अवसरवादी राजनीति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/opportunistic-politics-under-the-guise-of-faith]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राम मंदिर चढ़ावा अपहार प्रकरण ने हिंदू समाज के विश्वास को ठेस पहुंचाई है। धर्म शास्त्रों में मंदिर से जुड़ी संपत्ति के लिए ‘देवद्रव्य’ शब्द का प्रयोग मिलता है। इसमें केवल देवताओं के आभूषण ही नहीं, बल्कि भूमि, दान, अनाज, पशुधन और पूजा सामग्री जैसी सभी वस्तुएं शामिल थीं। एक बार समर्पित हो जाने के बाद यह संपत्ति व्यक्तिगत नहीं रह जाती थी, और इसके अपहार को प्राय: केवल आर्थिक अपराध के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इन्हें आस्था और सामाजिक विश्वास पर चोट के रूप में भी समझा जाता है।</div><div><br></div><div>विपक्षी दल इस प्रकरण की आड़ में भारतीय जनता पार्टी पर आक्षेपों की बौछार कर रहे हैं। ये वहीं दल और नेता हैं जिन्होंने अयोध्या केस, राम मंदिर निर्माण और मंदिर से जुड़े विशेष अवसरों पर बड़ी निर्लज्जता से निम्नस्तरीय राजनीति की। रामकाज में पग—पग पर बाधा डाली। ऐसे में इन दलों और नेताओं का एकाएक भगवान राम और राम मंदिर के प्रति उमड़ा प्रेम, आदरभाव,&nbsp; चिंता और सक्रियता उन्हें प्रश्नों और संदेह के घेरे में खड़ा करती है।</div><div>&nbsp;</div><div>देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस को सनातन धर्म, हिंदुओं और राम मंदिर से कितनी चिढ़ है, इसके तमाम प्रमाण हैं। गांधी परिवार ने राम मंदिर निर्माण का कभी समर्थन नहीं किया। कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि राम, सीता, हनुमान और वाल्मीकि काल्पनिक किरदार हैं। तीन तलाक पर सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने इस्लामी कुरीति की तुलना भगवान श्रीराम से की थी। राम मंदिर वाद का निर्णय टालने का हरसंभव प्रयास कांग्रेस ने किया। राम मंदिर के भूमि पूजन पर रोक लगाने के लिए राहुल गांधी के करीबी साकेत गोखले ने याचिका दायर की थी।</div><div>&nbsp;</div><div>कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने अपने 7 नेताओं को इसलिए निष्कासित कर दिया, क्योंकि उन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में ‘जय श्रीराम’ लिखा था। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने जय श्रीराम कहने वालों की तुलना राक्षस से की थी। अमेरिका के रटगर्स विश्वविद्यालय में इतिहास की सहायक प्रोफेसर ऑड्रे ट्रुश्के ने एक ट्वीट में, भगवान राम को महिला से द्वेष करने वाला और असभ्य बताया था। विवादित ट्वीट करने वाली महिला के समर्थन में कांग्रेस पार्टी न सिर्फ ट्वीट किया बल्कि अपने अखबार नेशनल हेराल्ड में एक लेख भी छापा।</div><div><br></div><div>1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर&nbsp; मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर पुलिस ने गोलियां चलाई थी। कारसेवकों के रक्त से सरयू का जल लाल हो गया था। अपने विशेष वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए भगवान राम के अपमान और उससे जुड़े मुद्दों पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव की चुप्पी सर्वविदित है।</div><div>&nbsp;</div><div>राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण में उस समय प्रमुख बाधा बने थे, जब रथ लेकर निकले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को बिहार में गिरफ्तार किया था। राजद नेता जगदानंद सिंह ने अयोध्या में बन रहे भगवान श्रीराम के मंदिर की जगह को ‘नफरत की जमीन बताकर भगवान श्रीराम का अपमान किया था।</div><div>&nbsp;</div><div>आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने कहा था, "जब बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ तो मैंने नानी से पूछा कि नानी अब तो आप बहुत खुश होगे। अब आपके भगवान राम का मंदिर बनेगा। नानी ने कहा कि ना बेटा, मेरा राम किसी की मस्जिद तोड़कर ऐसे मंदिर में नहीं बस सकता।" तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जय श्रीराम के उद्घोष पर कैसे नाराज होती थी, ये दृश्य देशवासियों ने देखे हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>इसमें कोई दो राय नहीं है कि आजादी के बाद के लंबे कालखंड तक तथाकथित सेक्युलर और तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों ने हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना कर रखा। पिछले एक दशक में हिंदू मानस सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक तौर जाग्रत हुआ है। इसका श्रेय मोदी सरकार के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रयासों को जाता है। वहीं तुष्टिकरण की राजनीति के तहत जब भी किसी दल ने सनातन संस्कृति पर अनुचित टिप्पणियां कीं या हिंदू समाज का अहित सोचा, उस समय हिंदू समाज के साथ भाजपा ने उसकी निंदा की और सुदृढ़ पक्ष लिया। इसी कारण उसने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए शुरू किए गए आंदोलन का खुलकर समर्थन किया।</div><div>&nbsp;</div><div>भाजपा विरोधी दल भले ही अपने एजेंडे के तहत हिंदुत्व को कटघरे में खड़ा करते रहे हों, लेकिन भाजपा ने उससे कभी समझौता नहीं किया। राम मंदिर का निर्माण भाजपा के एजेंडे में शामिल रहा। हिंदूवादी संगठनों और भाजपा के प्रयासों, संघर्षों और प्रतिबद्धता के फलस्वरूप अयोध्या में भव्य, राम मंदिर बना है। राम मंदिर का निर्माण करोड़ों हिंदुओं के सहयोग से हुआ है। सरकारी कोष का एक नया पैसा भी मंदिर निर्माण में नहीं लगा। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुआ। मंदिर प्रबंधन, व्यवस्था और रोजमर्रा के कामकाज में न भाजपा का कोई दखल और न कोई भूमिका ही है।</div><div>&nbsp;</div><div>चढ़ावा अपहार प्रकरण के बाद केजरीवाल रामलला के दर्शन करने पहुंचे। कांग्रेस के कई नेता रामलला के दर्शनों को आतुर हैं। हालांकि केजरीवाल, कांग्रेस और अन्य नेताओं की अयोध्या आने की टाइमिंग सवाल तो खड़े करती ही है? ये वही लोग हैं जो अयोध्या विवाद को उलझाए रखना चाहते थे। यह वही लोग हैं जो अयोध्या में राम मंदिर के स्थान पर स्कूल, अस्पताल और सर्वधर्म स्थान बनाने की तर्क देते थे। कहते थे, मंदिर बनने से देश का विकास होगा क्या? मंदिर निर्माण में इनका योगदान शून्य है। 27 साल से ज्यादा रामलला टेंट में रहे, तब ये नेता और राजनीतिक दल कहां थे?</div><div>&nbsp;</div><div>चढ़ावा प्रकरण में पॉलिटिकल माइलेज लेने के लिए राम विरोधी मां सीता और लव कुश का मंदिर बनाने और अयोध्या का अनुपम-अनुकरणीय धार्मिक नगरी के रूप में विकसित करने के दावे पेश कर रहे हैं। असल में,&nbsp; इन्हें भगवान राम, राम मंदिर, हिंदू और सनातन से कोई लेना—देना नहीं है। और न ही इन्हें राम भक्तों की पीड़ा से कोई मतलब है। चढ़ावा अपहार प्रकरण में अखिलेश यादव दुखी होने की बजाय, मजे लेते हुए, व्यंग्य करते हुए दिखते हैं। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी, डिम्पल यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव आदि नेताओं को अब तक राम लला के दर्शन नहीं किये हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>इसमें कोई दो राय नहीं है कि, तथाकथित सेक्युलर वादी और फर्जी नैरेटिव चलाने वालों की राजनीति तेजी से सिमट रही है। हिंदू मानस इनके फर्जी नैरेटिव और प्रोपेगेंडा में अब फंस नहीं रहा। ऐसे में अपनी बची खुची राजनीति बचाने के लिये ये हिंदू समाज को बांटने का षड्यंत्र रचते रहते हैं। राम मंदिर चढ़ावा अपहार प्रकरण में विपक्ष को राजनीतिक ऑक्सीजन मिलती दिख रही है। इस प्रकरण में भाजपा की छवि धूमिल कर विपक्ष उसके जनाधार और वोट बैंक को प्रभावित करने के सपने देख रहा है। लेकिन इस राजनीति और पैंतरेबाजी के बीच विपक्ष यह भूल जाता है कि हिंदू मानस सुनता सबकी है; वो सबको अवसर भी देता है; सबको आजमाता भी है। लेकिन एक बार&nbsp; जांचने-परखने और समझने के बाद वो ऐतिहासिक निर्णय लेता है। इसका सबसे ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे हैं।</div><div><br></div><div>चढ़ावा अपहार प्रकरण से हिंदू मानस व्यथित है। उसके विश्वास को गहरी ठेस लगी है। लेकिन अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के प्रति उसकी आस्था और श्रद्धा अटूट है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आश्वस्त कर चुके हैं कि दोषी बचेंगे नहीं। जनमानस योगी जी के वचनों पर विश्वास करता है। विशेष जांच दल मामले की जांच कर रहा है। आठ आरोपी जेल में हैं। इस दुखद प्रकरण से सबक लेते हुए ऐसी फूलप्रूफ व्यवस्था होनी चाहिए कि भविष्य में गड़बड़ी की गुंजाइश ने रहे। वहीं हिंदू मानस के विश्वास जो ठेस लगी है, उसकी पुनर्प्रतिष्ठा भी जरूरी है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 15:39:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/opportunistic-politics-under-the-guise-of-faith</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[रामलला मंदिर दान चोरी प्रकरण: आस्था की रक्षा केवल श्रद्धा से नहीं, जवाबदेही से भी होगी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/protecting-faith-requires-not-just-reverence-but-also-accountability]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अयोध्या के श्री रामलला मंदिर में दानपात्रों से धन चोरी की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, धार्मिक संस्थानों की विश्वसनीयता और उनके प्रशासनिक प्रबंधन से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले का सार्वजनिक वक्तव्य विशेष महत्व रखता है।</div><div><br></div><div>इस वक्तव्य का सबसे बड़ा संदेश यह है कि आस्था के केंद्र भी जवाबदेही से ऊपर नहीं हो सकते। यदि किसी धार्मिक संस्थान में सुरक्षा या प्रशासनिक व्यवस्था में चूक होती है, तो उसे छिपाने के बजाय स्वीकार करना और सुधारना ही उसकी गरिमा को बढ़ाता है। यही स्वस्थ संस्थागत संस्कृति का आधार है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/an-empire-worth-crores-built-ayodhya-ram-mandir-donations-anukalp-mishra-12-properties-scanner" target="_blank">Ayodhya में राम मंदिर के चंदे से खड़ा किया करोड़ों का साम्राज्य? Anukalp Mishra की 12 संपत्तियां रडार पर</a></h3><div>राम मंदिर केवल एक भव्य निर्माण नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना, विश्वास और लंबे ऐतिहासिक संघर्ष का प्रतीक है। ऐसे संस्थान की प्रतिष्ठा उसकी ऊँची दीवारों या भव्य शिखरों से नहीं, बल्कि उसके प्रबंधन की पारदर्शिता और नैतिकता से भी तय होती है। श्रद्धालु जब दानपात्र में धन डालता है, तो वह केवल रुपये नहीं देता, बल्कि अपना विश्वास भी सौंपता है। उस विश्वास की रक्षा करना प्रत्येक संबंधित संस्था और प्रशासन की सर्वोच्च जिम्मेदारी है।</div><div><br></div><div>दत्तात्रेय होसबाले का वक्तव्य इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि उसमें घटना को हल्के में लेने का कोई संकेत नहीं दिखता। यह स्पष्ट संदेश है कि दोषियों की पहचान हो, निष्पक्ष जांच हो और कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई हो। इससे यह भी संकेत मिलता है कि धार्मिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने के लिए पारदर्शिता आवश्यक है, न कि मौन।</div><div><br></div><div>इस घटना को राजनीतिक चश्मे से देखने की जल्दबाजी भी उचित नहीं होगी। किसी भी सार्वजनिक वक्तव्य की व्याख्या उसके शब्दों और आशय के आधार पर होनी चाहिए, न कि पूर्वाग्रहों के आधार पर। यदि वक्तव्य का केंद्र बिंदु आस्था की रक्षा, जवाबदेही और निष्पक्ष जांच है, तो उसी संदर्भ में उसका मूल्यांकन होना चाहिए।</div><div><br></div><div>यह घटना एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श का अवसर भी देती है। देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर प्रतिदिन करोड़ों रुपये का दान आता है। क्या सभी संस्थानों में आधुनिक सुरक्षा प्रणाली, डिजिटल निगरानी, नियमित लेखा-परीक्षा और स्वतंत्र ऑडिट जैसी व्यवस्थाएँ पर्याप्त रूप से लागू हैं? यदि नहीं, तो अब इस दिशा में गंभीर और समयबद्ध पहल होनी चाहिए।</div><div><br></div><div>धार्मिक संस्थाओं की पवित्रता केवल पूजा-पद्धति से नहीं, बल्कि उनके प्रशासनिक चरित्र से भी तय होती है। पारदर्शी व्यवस्था आस्था को मजबूत करती है, जबकि लापरवाही या अपारदर्शिता संदेह को जन्म देती है। इसलिए यह समय दोषारोपण का नहीं, बल्कि व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाने का है।</div><div><br></div><div>रामलला मंदिर दान चोरी प्रकरण अंततः हमें यही सिखाता है कि आस्था और उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ श्रद्धा है, वहाँ ईमानदारी और पारदर्शिता भी उतनी ही अनिवार्य होनी चाहिए। यदि इस घटना से सबक लेकर व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाता है, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना भी भविष्य के लिए एक सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकती है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 18:42:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/protecting-faith-requires-not-just-reverence-but-also-accountability</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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