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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[तपती धरती, झुलसता जीवन: जनता के समक्ष हीटवेव की चुनौती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/scorching-earth-scorched-lives-the-challenge-of-heatwaves-facing-the-public]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वर्ष 2026 की गर्मी केवल एक मौसमीय घटना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के सामने खड़ी एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आई है। अप्रैल-मई के दौरान भारत सहित दक्षिण एशिया के अनेक हिस्सों में पड़ी रिकॉर्ड हीटवेव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का संकट नहीं, वर्तमान की भयावह वास्तविकता है। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में तापमान 46 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। कई शहरों में बिजली की मांग ने रिकॉर्ड तोड़ दिए। सड़कें सूनी दिखने लगीं, श्रमिकों का श्रम ठहरने लगा और बच्चों, बुजुर्गों तथा गरीब तबकों के सामने जीवन बचाने की चुनौती खड़ी हो गई। यह संकट अचानक नहीं आया। यह दशकों से प्रकृति के साथ किए गए असंतुलित व्यवहार, अंधाधुंध शहरीकरण, जंगलों की कटाई, संसाधनों के दोहन और सुविधावादी जीवनशैली का परिणाम है। प्रकृति ने बार-बार संकेत दिए, लेकिन विकास की अंधी दौड़ में हमने उन संकेतों को अनसुना किया। आज वही उपेक्षित चेतावनियां लू बनकर हमारे सामने खड़ी हैं।</div><div><br></div><div>हीटवेव का सबसे बड़ा कारण केवल बढ़ता तापमान नहीं, बल्कि वह विकास मॉडल है जिसने धरती की प्राकृतिक ढाल को कमजोर कर दिया। जंगल सदियों से पृथ्वी के प्राकृतिक एयर कंडीशनर रहे हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, वाष्पोत्सर्जन द्वारा वातावरण को शीतल रखते हैं और वर्षा चक्र को संतुलित बनाए रखते हैं। लेकिन विडंबना है कि विकास के नाम पर जंगलों का तेजी से विनाश हुआ। हर वर्ष लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त हो रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि स्थानीय स्तर पर तापमान बढ़ा, नमी कम हुई, वर्षा चक्र प्रभावित हुआ और गर्म हवाओं की अवधि लंबी होती गई। आज शहर “कंक्रीट के जंगल” बन चुके हैं। महानगरों में हरित क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं और उनकी जगह सीमेंट, डामर और शीशे की ऊंची इमारतें ले रही हैं। इससे “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव तेजी से बढ़ा है। शहर अब आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक गर्म हो चुके हैं। कंक्रीट दिनभर सूर्य की ऊष्मा को सोखता है और रात में धीरे-धीरे छोड़ता है। परिणामस्वरूप रातें भी गर्म होती जा रही हैं और शरीर को राहत नहीं मिल पाती।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india" target="_blank">भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए</a></h3><div>दिल्ली, मुंबई, जयपुर और लखनऊ जैसे शहरों में रात का तापमान पहले की तुलना में लगातार बढ़ रहा है। गरीब बस्तियों में स्थिति और भी गंभीर है। वहां न हरित क्षेत्र हैं, न पर्याप्त जल आपूर्ति, न शीतलन के साधन। टीन की छतों वाले घर दिन में भट्ठी बन जाते हैं। गर्मी की मार सामाजिक असमानता को और गहरा करती है। अमीर वर्ग एयर कंडीशनर और बंद कमरों में राहत खोज लेता है, लेकिन मजदूर, रिक्शाचालक, रेहड़ी वाले और निर्माण कार्य में लगे श्रमिक खुले आसमान के नीचे झुलसते रहते हैं। विडंबना यह भी है कि गर्मी से राहत का सबसे लोकप्रिय साधन एयर कंडीशनर स्वयं संकट को बढ़ाने वाला कारक बनता जा रहा है। एक एयर कंडीशनर कमरे को ठंडा करता है, लेकिन बाहर उतनी ही गर्म हवा छोड़ता है। इसके साथ ही बिजली की खपत बढ़ती है, जिसका बड़ा हिस्सा अभी भी कोयला आधारित ऊर्जा से आता है। रेफ्रिजरेंट गैसें अतिरिक्त ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करती हैं। इस प्रकार एक दुष्चक्र निर्मित हो गया है-गर्मी बढ़ती है, एसी बढ़ते हैं, उत्सर्जन बढ़ता है और फिर गर्मी और बढ़ जाती है।</div><div><br></div><div>जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल तापमान तक सीमित नहीं है। यह कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक असर डाल रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि बढ़ती गर्मी और अनिश्चित मौसम के कारण गेहूं, धान और अन्य फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है। गर्म हवाएं पौधों की वृद्धि रोकती हैं, जल स्रोतों को सुखाती हैं और मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित करती हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में खाद्य संकट भी गहरा सकता है। स्वास्थ्य क्षेत्र पर भी इसका गंभीर प्रभाव दिख रहा है। लू लगना, निर्जलीकरण, हीट स्ट्रोक, हृदय रोग और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। अस्पतालों में गर्मी से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। सबसे अधिक खतरा बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बाहर काम करने वाले श्रमिकों को है।</div><div><br></div><div>गर्मी का यह संकट सामाजिक और मानवीय संकट भी बन सकता है। जल स्रोतों के सूखने, कृषि संकट और जीवन परिस्थितियों के बिगड़ने से बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ सकता है। जैव विविधता पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा है। अनेक जीव-जंतु और वनस्पतियां अपने प्राकृतिक आवास खो रही हैं। हजारों प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। ऐसी स्थिति में सरकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। केवल रेड अलर्ट और ऑरेंज अलर्ट जारी करना पर्याप्त नहीं है। हीटवेव को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के प्रमुख विषय के रूप में स्वीकार करते हुए दीर्घकालिक नीतियां बनानी होंगी। सबसे पहले शहरों में हीट एक्शन प्लान को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। प्रत्येक शहर में हरित क्षेत्र बढ़ाने, जल संरक्षण, छायादार मार्ग, सार्वजनिक प्याऊ और शीतलन केंद्रों की व्यवस्था आवश्यक है। स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों के समय निर्धारण में क्षेत्रीय तापमान को ध्यान में रखा जाना चाहिए। तीखी दोपहर में श्रमिकों के लिए कार्यावधि सीमित की जाए और उनके लिए विश्राम तथा पेयजल की व्यवस्था अनिवार्य हो।</div><div><br></div><div>सरकार को भवन निर्माण नीति में भी परिवर्तन लाना होगा। पारंपरिक भारतीय वास्तुकला-हवादार घर, आंगन, मिट्टी आधारित निर्माण, हरित छतें और प्राकृतिक वेंटिलेशन को बढ़ावा देना चाहिए। कांच की चमचमाती इमारतों और ऊष्मा अवशोषित करने वाले निर्माणों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। “कूल रूफ” तकनीक, वर्षा जल संचयन और सौर ऊर्जा आधारित शीतलन प्रणाली को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। वन संरक्षण और वृक्षारोपण केवल अभियान नहीं, राष्ट्रीय प्राथमिकता बनना चाहिए। शहरों में माइक्रो फॉरेस्ट, पार्क और हरित गलियारों का निर्माण किया जाए। जल निकायों और पारंपरिक तालाबों को पुनर्जीवित किया जाए क्योंकि वे स्थानीय तापमान नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन केवल सरकारें यह लड़ाई नहीं जीत सकतीं। आम जनता को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। हमें उपभोगवादी जीवनशैली पर पुनर्विचार करना होगा। पानी का संयमित उपयोग, ऊर्जा की बचत, वृक्षारोपण, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग और स्थानीय पर्यावरण संरक्षण अब व्यक्तिगत विकल्प नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी हैं।</div><div><br></div><div>भारतीय समाज में कभी सार्वजनिक प्याऊ, छायादार विश्राम स्थल और जल सेवा की समृद्ध परंपरा थी। गर्मियों में राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था पुण्य कार्य माना जाता था। आज उस परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। समाज, धार्मिक संस्थाएं और स्वयंसेवी संगठन मिलकर जल सेवा और राहत कार्यों का अभियान चला सकते हैं। गर्मी और जल संकट को राजनीति का विषय बनाने के बजाय सहयोग और समाधान का विषय बनाना होगा। जल विवादों और संसाधनों पर स्वार्थपूर्ण राजनीति भविष्य को और कठिन बनाएगी। आवश्यकता इस बात की है कि जल प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु अनुकूलन को राष्ट्रीय सहमति का विषय बनाया जाए।</div><div><br></div><div>वर्ष 2026 की यह झुलसाती गर्मी हमें चेतावनी दे रही है कि यदि हमने अभी भी प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित नहीं किया तो आने वाले वर्षों में स्थिति और विकराल होगी। पृथ्वी का तापमान बढ़ेगा, जैव विविधता नष्ट होगी, खाद्य संकट गहराएगा और मानव जीवन अधिक कठिन हो जाएगा। यह समय प्रकृति से संघर्ष का नहीं, उसके साथ सामंजस्य का है। हमें विकास की ऐसी दिशा चुननी होगी जिसमें पर्यावरण, मानव जीवन और भविष्य सुरक्षित रह सके। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब सूरज की तपिश केवल असुविधा नहीं, अस्तित्व का संकट बन जाएगी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक,पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 18:29:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/scorching-earth-scorched-lives-the-challenge-of-heatwaves-facing-the-public</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[डबल गेम खेल रही Congress को Mayawati ने किया Out, Uttar Pradesh की इस राजनीतिक हलचल ने सबको चौंकाया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mayawati-shows-congress-the-door-big-game-in-up-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ने एक बार फिर बसपा प्रमुख मायावती के करीब जाने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। चूंकि कांग्रेस इस समय समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में है, इसलिए उसके शीर्ष नेता खुलकर मायावती से संपर्क नहीं कर सकते थे। ऐसे में कांग्रेस से जुड़े कुछ दलित नेताओं के माध्यम से मायावती तक पहुंचने की कोशिश की गई, लेकिन मायावती ने इस प्रयास को पूरी तरह विफल कर दिया। लखनऊ स्थित अपने आवास पर पहुंचे कांग्रेस नेताओं को उन्होंने मिलने का समय तक नहीं दिया। इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए संकेत दे दिए हैं।</div><div><br></div><div>दरअसल मंगलवार शाम कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया मायावती से मिलने उनके आवास पहुंच गए। बताया गया कि उनके साथ कुछ अन्य दलित नेता भी थे। हालांकि उन्हें मायावती से मिलने का समय नहीं मिला और पूरा प्रयास असफल हो गया। बाद में कांग्रेस नेतृत्व ने खुद को इस घटनाक्रम से अलग दिखाने की कोशिश की और दोनों नेताओं को नोटिस जारी कर दिया। पार्टी ने इसे अनधिकृत और निजी मुलाकात बताकर राजनीतिक नुकसान को सीमित करने का प्रयास किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/mayawati-big-attack-on-sp-for-insulting-brahmins-said-akhilesh-yadav-should-apologize-immediately" target="_blank">ब्राह्मण अपमान पर Mayawati का SP पर बड़ा हमला, कहा- Akhilesh Yadav तुरंत माफी मांगें</a></h3><div>कांग्रेस के लिए यह स्थिति इसलिए भी असहज हो गई क्योंकि उसी समय राहुल गांधी रायबरेली और अमेठी के दौरे पर थे तथा दलित समाज से जुड़े कार्यक्रमों में भाग ले रहे थे। हम आपको याद दिला दें कि राहुल गांधी पहले भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने मायावती को गठबंधन का प्रस्ताव दिया था। राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि उन्होंने मायावती को मुख्यमंत्री पद तक की पेशकश की थी, लेकिन बसपा प्रमुख ने प्रस्ताव ठुकरा दिया था। इसके बाद कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाया और लोकसभा चुनावों में इस गठबंधन को अपेक्षाकृत अच्छा परिणाम मिला। अब जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, कांग्रेस के भीतर फिर यह सोच मजबूत होती दिखाई दे रही है कि बसपा को साथ लाए बिना भाजपा के खिलाफ व्यापक सामाजिक समीकरण तैयार करना कठिन होगा।</div><div><br></div><div>लेकिन यह कोशिश ऐसे समय हुई है जब समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव लगातार यह कह रहे हैं कि उनका मौजूदा गठबंधन आगे भी जारी रहेगा। लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने स्पष्ट कहा कि भविष्य के चुनावों में भी सहयोगियों के साथ गठबंधन बना रहेगा और उसका आधार सीटों की सौदेबाजी नहीं बल्कि जीत का लक्ष्य होगा। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी गठबंधन चलाना जानती है और उसने कभी अपने सहयोगियों को धोखा नहीं दिया। अखिलेश का यह बयान सीधे तौर पर कांग्रेस के लिए भी संदेश माना गया, क्योंकि राजनीतिक गलियारों में लगातार यह चर्चा चल रही थी कि कांग्रेस समानांतर राजनीतिक विकल्प तलाश रही है।</div><div><br></div><div>उधर, कांग्रेस नेताओं की मायावती से मुलाकात की असफल कोशिश ने इन अटकलों को और तेज कर दिया। कांग्रेस की ओर से सफाई दी गई कि यह केवल शिष्टाचार भेंट थी और नेताओं ने मायावती के स्वास्थ्य का हाल जानने के लिए जाने का फैसला किया था। लेकिन राजनीतिक जानकार इसे सहज घटना मानने को तैयार नहीं हैं। खासकर तब, जब कांग्रेस नेतृत्व ने इतनी तेजी से नोटिस जारी कर दूरी बनाने की कोशिश की। इससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी को डर था कि समाजवादी पार्टी इस घटनाक्रम को संदेह की नजर से देख सकती है।</div><div><br></div><div>उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस सत्ता और राजनीतिक अवसरों के लिए सहयोगी बदलने में कभी देर नहीं लगाती। हाल के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण माने जा रहे हैं। चुनाव के दौरान कांग्रेस द्रमुक के साथ खड़ी थी, लेकिन परिणाम आते ही सत्ता की संभावनाओं को देखते हुए उसने तेजी से पाला बदलकर टीवीके के साथ गठबंधन कर लिया और उसकी सरकार में भी शामिल हो गयी। ऐसे में उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की वर्तमान सक्रियता को केवल औपचारिक राजनीतिक संपर्क मानना आसान नहीं है।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर देखें तो कांग्रेस नेताओं की मायावती से असफल मुलाकात ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस भले ही इसे निजी पहल बताकर पीछे हटने की कोशिश कर रही हो, लेकिन यह साफ दिखाई दे रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी राजनीति के भीतर नए समीकरणों की तलाश शुरू हो चुकी है। वहीं मायावती ने बिना कुछ कहे यह संकेत दे दिया है कि वह फिलहाल किसी भी राजनीतिक संदेश या दबाव में आने वाली नहीं हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 12:28:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mayawati-shows-congress-the-door-big-game-in-up-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[शुभेंदु सरकार के त्वरित निर्णयों से उभरता नया बंगाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-new-bengal-emerging-from-shubhendu-sarkar-swift-decisions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बंगाल में 69 वर्षों के अथक संघर्ष के बाद बनी शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने चुनावी संकल्प पत्र के अनुरूप काम पर लग गई है। सत्ता परिवर्तन होते ही सभी धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर बंद करवाए गए। अवैध बूचड़खानों पर बुलडोजर एक्शन के आदेश जारी हुए। सभी विद्यालयों में अब सम्पूर्ण वंदेमातरम का गायन अनिवार्य कर दिया गया है। सड़कों पर नमाज व अन्य धार्मिक गतिविघियों पर पाबंदी लगा दी गई है। सीमा पर फेंसिंग के लिए सीमा सुरक्षा बल को जगह दे दी गई है और सम्पूर्ण भूमिहस्तांतरण निर्णय के 45 दिन में पूरा हो जाएगा। चिकन नेक क्षेत्र केंद्र को सौंप दिया गया है। धार्मिक आधार पर चलने वाली योजनाएं जैसे इमामों को वेतन बंद कर दिया गया है। आर.जी.कर केस की फाइल दोबारा खुलने के आदेश हो गए हैं। आयुष्मान भारत जैसी केंद्रीय जन कल्याण योजनाएं अब बंगाल पहुँच रही हैं।</div><div><br></div><div>शुभेंदु सरकार की गति और संकल्प सिद्धि के प्रयासों से जुड़े निर्णयों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगा है। हालत यह हो गई है पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का डायमंड हार्बर मॉडल का पुष्पा ”जहागीर खान” बहाना बनाकर फलटा विधानसभा उपचुनाव में ठीक उसी समय पलटा मारकर कर भाग गया जब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार को विजयी बनने के लिए रोड शो निकाल रहे थे। यह वही क्षेत्र है जहां विधानसभा चुनावों के दौरान ईवीएम मशीन पर भाजपा के चुनाव चिन्ह के आगे काला टेप लगा दिया गया था। यूपी के एक तेजतर्रार पुलिस अफसर अजय पाल शर्मा की आब्जर्वर के रूप में नियुक्ति हुई थी जिसके बाद जहांगीर खान ने पोस्टर जारी करके अपने आप को पुष्पा बताने की जुर्रत की थी। आज वही तथाकथित पुष्पा चुनावी मैदान बीच में छोड़कर भाग खड़ा हुआ। यह भय बनाम भरोसे में भरोसे की एक और बड़ी जीत है। यह सब कुछ हिंदुओं की एकजुटता और उनके जागरण से ही संभव हो सका है अगर हिंदू समाज आगे भी इसी प्रकार एकजुट रहता है तो सनातन का अपमान करने व उन्हें भयभीत करने वाले लोग इसी प्रकार से स्वतः प्रेरणा से भागते रहेंगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/battles-erupt-as-bjp-comes-to-power-in-bengal-tmc-to-protest-against-bulldozer-action-on-may-21" target="_blank">Bengal में BJP राज आते ही सड़क पर संग्राम, Bulldozer एक्शन पर TMC का 21 मई को Protest</a></h3><div>बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने प्रचार के दौरान उत्तर प्रदेश के भगवावस्त्र धारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चरण स्पर्श किए थे और उनके शपथ ग्रहण में योगी जी ने अपना भगवा पटका उनके गले में डाला था तभी यह बात तय हो गई थी कि बंगाल भी उत्तर प्रदेश की तरह सांस्कृतिक पुनर्जागरण के मार्ग पर चलने वाला है। बंगाल में भी दंगाइयों व उत्पातियों का इलाज यूपी की ही तरह होगा। कोलकाता के जिस थाने पर दगांइयों ने हमला करने का प्रयास किया था वहां मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी खुद पहुंचे और पुलिस बलों का मनोबल बढ़ाते हुए दंगाइयों व उपद्रवियों के प्रति जीरो टालरेंस की नीति अपनाने को कहा। मुख्यमंत्री अधिकारी ने कहा कि पुलिस पहले ममता दीदी के गुंडों से डरती थी किंतु अब समय बदल चुका है।&nbsp;</div><div><br></div><div>शुभेंदु सरकार के बड़े निर्णयों में वर्ष 2021 के चुनावों के बाद राज्य में हुई राजनतिक हत्याओं व हिंसक घटनाओं&nbsp; की सभी फाइलें खोलना भी है जिसके कारण ममता दीदी इतनी अधिक भयभीत हो गयीं कि वह काला कोट पहनकर हाईकार्ट पहुंच गयीं और 2021 की हिंसा से ध्यान भटकाने के लिए 2026 के चुनावों&nbsp; के बाद घटी कुछ छुटपुट घटनाओं को सनसनीखेज बताने का असफल प्रयास किया। जब वह कोर्ट परिसर से बाहर निकलने लगीं तब वकीलों के एक बड़े समूह ने उन्हें घेर लिया ओैर चोर -चोर के नारे लगाए।</div><div>&nbsp;</div><div>बंगाल में अब सीबीआई तथा ईडी जैसे केंद्रीय जांच एजेंसियों का प्रवेश संभव हो गया है, जिससे वहां 69 वर्षों में हुए घोटालों की जांच में गति आएगी। ईडी ने टीएमसी के बड़े नेताओं को हिरासत में ले भी लिया है। शुभेंदु अधिकारी के 145 एकड़ जमीन बीएसफ को देने के ऐतिहासिक निर्णय से बांग्लादेशी घुसपैठ की रोकथाम में महत्वपूर्ण सफलता मिलने की आशा है क्योंकि बांग्लादेश से लगी हुई बंगाल की लंबी खुली सीमा से&nbsp; बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठिए आसानी प्रवेश कर लेते थे। अब सीमा पर तीव्रता के साथ फेंसिंग का कार्य होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए धर्म के आधार पर चलने वाली सभी योजनाएं बंद कर दी गई हैं। नई सरकार ने वोटबैंक के पुराने ढर्रे को ध्वस्त करने के एजेंडे पर आगे बढ़ चुकी है। बंगाल कैबिनेट ने धर्म के आधार पर चलाई जा रही सभी वित्तीय सहायता योजनाओ को पूरी&nbsp; तरह से बंद करने का निर्णय लिया है। यह मात्र एक प्रशासनिक निर्णय&nbsp; नहीं अपितु बंगाल की राजनीतिक दिशा को बदलने वाला वैचारिक परिवर्तन है। चुनावी बिसात पर इमामों, मुअज्जिनों और पुरोहितों के लिए शुरू की गई मासिक भत्ता पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। बंगाल के खेल मंत्री नीशिथ प्रामाणिक ने कोलकाता के युवा भारती क्रीडांगन परिसर में लगी व लोगो वाली फुटबालर की आधी प्रतिमा को तोड़े जाने का आदेश दिया है, बंगाल सरकार की विभिन्न वेबसाइाटो से भी इसे हटाया जा रहा है। दिसंबर 22 में अर्जेंटीना के फुटबॉलर मेसी के कार्यक्रम में मची भगदड़ और कुप्रबंधन की जांच की जाएगी। उस घटना की फाइलें खोलने के आदेश जारी हो चुके हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी व अन्य सभी सहयोगी मंत्री यह बात लगातार कह रहे हैं कि जिन लोगों ने बंगाल को लूटा और जनता के मन मे भय पैदा किया उन सभी पर कार्यवाही जरूर की जाएगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल में अब आयुष्मान भारत योजना सहित केंद्र सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं के लागू होने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। भाजपा ने बंगाल की महिलाओं से किए गए वादों&nbsp; को भी लागू करना भी आरंभ कर दिया है। आगामी एक जून 2026 से महिलाओं को 3000 रुपये की मासिक सहायता वाली अन्नपूर्णा योजना को भी मंजूरी दे दी गई है। बंगाल की महिलाओ को बस में फ्री यात्रा की सुविधा भी मिलने जा रही है। सरकारी कर्मचारियों के साथ किया गया 7वें वेतन आयोग का वादा भी पूरा होने जा रहा है। बंगाल मे पड़ोसी राज्यों से ट्रकों की आवाजाही के दौरान 100 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक की जो कटमनी टीएमसी के गुंडे वसूल रहे थे उनके अनधिकृत टोल नाके बंद किए जाने के आदेश आ चुके हैं। बंगाल का आलू अब पूरे भारत में जाएगा।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>बंगभूमि पर वंदेमातरम की गूंज व जयश्रीराम का नारा सुनाई दे रहा है। बंगाल परिवर्तन की डगर पर चल पड़ा है। भय पर भरोसे की विजय हो रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 12:57:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-new-bengal-emerging-from-shubhendu-sarkar-swift-decisions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[आखिर सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति कितनी जायज या नाजायज है? चिंतन कीजिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/ultimately-to-what-extent-is-the-tendency-to-attack-the-system-justified-or-unjustified]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 53वें&nbsp; मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के क्रम में याचिकाकर्ता की अपरिपक्व भाषा और समकालीन “सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति” पर एक तल्ख टिप्पणी की और परजीवी तक कह डाला। लिहाजा इसको भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि, यह टिप्पणी केवल न्यायपालिका तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद, चुनाव आयोग, मीडिया, नौकरशाही और संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार बढ़ते अविश्वास, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया आधारित आक्रामक विमर्श की ओर संकेत करती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए इसके अहम सियासी और प्रशासनिक मायने हैं और संविधान का संरक्षक होने के नाते सर्वोच्च न्यायालय भी अपने नैतिक दायित्व से सिर्फ छिछली टिप्पणी करके बच नहीं सकता, क्योंकि उसे हासिल स्वतः संज्ञान का अधिकार भी गरीबों की भलाई में एक हदतक निरर्थक प्रतीत होता आया है। बावजूद इसके सीजेआई की टिप्पणी कई मायनों में जायज मानी जा सकती है, क्योंकि आज भारत सहित दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में यह प्रवृत्ति बढ़ी है कि यदि किसी संस्था का निर्णय किसी राजनीतिक या वैचारिक समूह के पक्ष में नहीं जाता, तो पूरी संस्था की वैधता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। इससे संस्थागत विश्वास कमजोर होता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता से भी चलता है।</div><div><br></div><div>मीडिया माध्यमों का अनुभव बताता है कि हाल के वर्षों में न्यायपालिका पर “पक्षपात”, चुनाव आयोग पर “सरकारी प्रभाव”, मीडिया पर “प्रोपेगेंडा”, और जांच एजेंसियों पर “राजनीतिक उपयोग” जैसे आरोप लगातार तेज हुए हैं, जो दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का तर्क रहता है कि कई बार आलोचना के नाम पर संस्थाओं को जानबूझकर बदनाम करने का अभियान चलाया जाता है। ऐसे माहौल में सीजेआई का यह कहना कि “पूरे सिस्टम पर हमला” लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है, एक संतुलित चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/maneka-gandhi-enraged-by-the-supreme-courts-order-on-stray-dogs" target="_blank">Stray Dogs पर Supreme Court के आदेश से भड़कीं Maneka Gandhi, कहा- कोर्ट ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा</a></h3><div>हालांकि, इस टिप्पणी का दूसरा स्याह पक्ष भी है। लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना करना नागरिकों और विपक्ष का अधिकार है। यदि किसी संस्था के निर्णयों, कार्यशैली या पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो उन्हें “सिस्टम पर हमला” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। चूंकि स्वस्थ लोकतंत्र में जवाबदेही और आलोचना दोनों जरूरी हैं। न्यायपालिका स्वयं कई ऐतिहासिक फैसलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार को लोकतंत्र का मूल तत्व बता चुकी है।</div><div><br></div><div>दरअसल समस्या तब पैदा होती है जब आलोचना तथ्यों और संवैधानिक बहस की जगह व्यक्तिगत हमलों, दुष्प्रचार, ट्रोलिंग या संस्थाओं को पूरी तरह अवैध बताने तक पहुंच जाती है। इससे जनता का भरोसा टूटता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इसलिए सीजेआई की टिप्पणी को पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता और इसे आलोचना-विरोधी बयान भी नहीं माना जाना चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>वस्तुतः इसका सार सत्य यह है कि संस्थाओं की आलोचना हो, लेकिन तथ्यों और संवैधानिक मर्यादा के साथ। असहमति हो, लेकिन लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने वाली भाषा से बचा जाए। संस्थाएं भी पारदर्शिता, निष्पक्षता और आत्मसुधार बनाए रखें, ताकि जनता का विश्वास मजबूत रहे। लोकतंत्र में सबसे बड़ा संतुलन यही है कि संस्थाओं का सम्मान भी बना रहे और उनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित होती रहे।</div><div><br></div><div>जहां तक विद्रूप होती व्यवस्था के कड़वे सच से सामना की बात है तो बेरोजगार युवाओं के भीतर यह भावना तेजी से बढ़ती जा रही है कि व्यवस्था में अवसर समान नहीं हैं। जब भर्ती प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, राजनीतिक संरक्षण, जातीय ध्रुवीकरण, क्षेत्रीय पक्षपात या आर्थिक प्रभाव की खबरें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से निराशा और आक्रोश पैदा होता है। बांग्लादेश और नेपाल में हुई जेन-जेड क्रांति और नेतृत्व परिवर्तन के पीछे भी यही आरोप थे। यही कारण है कि कई युवा यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि योग्यता के बजाय “पहचान”, “संपर्क” या “प्रभाव” ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए, तो मेहनत और प्रतिभा का मूल्य क्या रह जाता है। आखिर ऐसी व्यवस्था को लोकतंत्र और संविधान की आड़ में कबतक झेला जाएगा?</div><div><br></div><div>लेकिन इस प्रश्न को संतुलन से समझना जरूरी है। चूंकि भारत जैसे विशाल और विविध समाज में कुछ नीतियां—जैसे- सामाजिक न्याय, आरक्षण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व या कल्याणकारी योजनाएं—ऐतिहासिक असमानताओं को कम करने के उद्देश्य से बनाई गई थीं। लिहाजा, समस्या तब पैदा होती है जब इनका उपयोग वास्तविक सुधार के बजाय राजनीतिक लाभ, वोट बैंक या सत्ता-सुरक्षा के साधन के रूप में होने लगे। तब योग्य युवाओं को लगता है कि व्यवस्था निष्पक्ष नहीं है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, आज बेरोजगार युवाओं की सबसे बड़ी पीड़ा केवल नौकरी की कमी नहीं, बल्कि “समान अवसर पर भरोसे का संकट” है। उनकी शिकायतें मुख्यतः इन बिंदुओं पर केंद्रित हैं- भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण और भाई-भतीजावाद, लंबे समय तक भर्तियों का अटकना, योग्यता की तुलना में पहचान आधारित लाभ का अनुभव, निजी क्षेत्र में भी नेटवर्क और प्रभाव की भूमिका और बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सीमित अवसर। लिहाजा, यह आक्रोश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चेतावनी भी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसे में यदि युवाओं को लगे कि मेहनत का उचित प्रतिफल नहीं मिलेगा, तो सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है। इसलिए किसी भी सरकार और व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह- भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बनाए, पेपर लीक और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई करे, कौशल आधारित रोजगार बढ़ाए, शिक्षा और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल बनाए, अवसरों को अधिक निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धात्मक बनाए तथा सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में मेरिट को मजबूत करे। साथ ही यह भी जरूरी है कि व्यवस्था की कमियों के खिलाफ आवाज लोकतांत्रिक और रचनात्मक तरीके से उठे।&nbsp;</div><div><br></div><div>यद्यपि पूरे संविधान, लोकतंत्र या किसी समुदाय के खिलाफ घृणा पैदा करना समाधान नहीं बनता। बल्कि वास्तविक सुधार संस्थागत दबाव, जन-जागरूकता, न्यायिक हस्तक्षेप, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही से आता है। चूंकि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। यदि यही वर्ग व्यवस्था से पूरी तरह निराश हो जाए, तो यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संकट भी बन सकता है। इसलिए “योग्यता आधारित अवसर” और “सामाजिक न्याय”- दोनों के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती होगी।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 19:16:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/ultimately-to-what-extent-is-the-tendency-to-attack-the-system-justified-or-unjustified</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mussoorie की जगह Bangladesh को भाने लगा Lahore, भारत की बजाय पाक में अपने अफसरों को ट्रेनिंग दिला रहे हैं Tarique Rahman]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/tarique-rahman-is-training-his-officers-in-pakistan-instead-of-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बांग्लादेश में नई सरकार आने के बाद लगा था कि मुहम्मद युनूस वाली गलतियां नहीं दोहराई जाएंगी और चीन तथा पाकिस्तान के खेमे में जाने की बजाय ढाका का झुकाव भारत की ओर ही रहेगा लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। हम आपको बता दें कि ताजा घटनाक्रम के तहत बांग्लादेश ने अपने नौकरशाहों के प्रशिक्षण के लिए भारत के मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी की बजाय पाकिस्तान के लाहौर स्थित सिविल सर्विसेज अकादमी को चुना है। यह कदम दक्षिण एशिया की बदलती कूटनीतिक राजनीति और बांग्लादेश की नई विदेश नीति का संकेत माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि करीब एक दशक तक बांग्लादेशी अधिकारियों के लिए मसूरी प्रशिक्षण का प्रमुख केंद्र रहा। वर्ष 2014 में शेख हसीना सरकार के दौरान बांग्लादेश के लोक प्रशासन मंत्रालय और भारत के राष्ट्रीय सुशासन केंद्र के बीच समझौता हुआ था। इसके बाद 2019 और 2024 में भी नए समझौते हुए। 2019 से 2024 के बीच भारत में 1019 से अधिक बांग्लादेशी सिविल सेवकों को प्रशिक्षण दिया गया, जबकि कुल मिलाकर लगभग 2500 अधिकारी भारत में प्रशिक्षित हुए। लेकिन अब पहली बार 12 बांग्लादेशी अधिकारी 4 से 21 मई तक लाहौर में प्रशिक्षण ले रहे हैं और इसका पूरा खर्च पाकिस्तान सरकार उठा रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/dangerous-women-were-planning-against-india-even-russia-was-shaken" target="_blank"> भारत के खिलाफ प्लान बना रही थी खतरनाक महिलाएं, रूस भी हिल गया!</a></h3><div>यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब शेख हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद ढाका और इस्लामाबाद के बीच रिश्ते तेजी से मजबूत हो रहे हैं। हाल ही में बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबायद इस्लाम और पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री सैयद मोहसिन रजा नकवी के बीच हुई बैठक में दोनों देशों ने व्यापार, खेल, संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और डिजिटल नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। दोनों पक्षों ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन को फिर से सक्रिय बनाने और क्षेत्रीय संपर्क मजबूत करने की आवश्यकता भी दोहराई।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति में अधिक रणनीतिक स्वतंत्रता दिखाना चाहता है। नई राजनीतिक व्यवस्था के बाद ढाका भारत पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के साथ भी संतुलित संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि नई सरकार भारत के साथ संबंध बनाए रखते हुए दूसरे विकल्पों की ओर भी बढ़ रही है। हालांकि बांग्लादेश और भारत दोनों यह समझते हैं कि टकराव लंबे समय तक उनके हित में नहीं है। इसी वजह से दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग, आर्थिक संपर्क और राजनयिक संवाद फिर से शुरू करने की कोशिशें भी हो रही हैं।</div><div><br></div><div>फिर भी दोनों देशों के बीच अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। शेख हसीना का भारत में रहना बांग्लादेश की राजनीति में लगातार विवाद का विषय बना हुआ है। ढाका में यह धारणा मजबूत हुई है कि भारत बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में जरूरत से ज्यादा प्रभाव बनाए रखना चाहता है। खासकर युवा वर्ग में राष्ट्रवाद और राजनीतिक स्वायत्तता की भावना पहले से अधिक मजबूत हुई है। भारत विरोधी भावना अब केवल वैचारिक मुद्दा नहीं रह गई, बल्कि घरेलू राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनती जा रही है।</div><div><br></div><div>सीमा प्रबंधन, अवैध तस्करी, प्रवासन और जल बंटवारे जैसे पुराने विवाद भी अब तक हल नहीं हो पाए हैं। तीस्ता जल समझौता वर्षों से लंबित है और जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में यह विवाद और गंभीर हो सकता है। हालांकि पश्चिम बंगाल की राजनीति में हुए बदलाव के बाद कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि इस दिशा में नई पहल संभव हो सकती है।</div><div><br></div><div>इसके बावजूद आर्थिक संबंध दोनों देशों के रिश्तों को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक भारतीय बाजार और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर है, जबकि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बांग्लादेश का भूभाग संपर्क और व्यापार के लिहाज से बेहद अहम है। यही आर्थिक परस्पर निर्भरता हर तनाव के बावजूद रिश्तों को पूरी तरह टूटने से बचाती रही है।</div><div><br></div><div>इसी बीच, चीन भी बांग्लादेश की विदेश नीति में तेजी से प्रभाव बढ़ा रहा है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान अपनी पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा चीन को समर्पित कर सकते हैं। चीन पहले ही बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाई पर पहुंचा हुआ बता चुका है। इससे साफ संकेत मिलता है कि ढाका अब बहुध्रुवीय कूटनीति अपनाते हुए भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो दक्षिण एशिया की बदलती राजनीति में बांग्लादेश का यह नया रुख केवल एक देश की विदेश नीति का बदलाव नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन के नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत और बांग्लादेश अपने ऐतिहासिक रिश्तों को नई राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ किस तरह संतुलित करते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति का सबसे मजबूत पक्ष यह रहा है कि भारत ने तमाम राजनीतिक उतार चढ़ाव और तनाव के बावजूद बांग्लादेश के साथ संवाद और सहयोग के रास्ते कभी पूरी तरह बंद नहीं किये। चाहे ऊर्जा सहयोग हो, व्यापार, संपर्क परियोजनाएं, सुरक्षा साझेदारी या मानवीय सहायता, भारत ने हर कठिन समय में ढाका का साथ दिया है। दूसरी ओर चीन और पाकिस्तान की नीतियों को दक्षिण एशिया में अक्सर रणनीतिक हितों और अवसरवाद से प्रेरित माना जाता रहा है। चीन निवेश और बुनियादी ढांचे के जरिये प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करता है, जबकि पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के रिश्तों का इतिहास भी कई संवेदनशील अध्यायों से जुड़ा रहा है। ऐसे में आने वाले समय में बांग्लादेश को यह एहसास हो सकता है कि स्थायी, भरोसेमंद और निस्वार्थ सहयोगी के रूप में भारत का महत्व सबसे अधिक है। हालांकि सवाल यह भी है कि जब तक ढाका इस वास्तविकता को पूरी तरह समझेगा, तब तक कहीं रणनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर बहुत देर ना हो जाये।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 16 May 2026 13:38:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/tarique-rahman-is-training-his-officers-in-pakistan-instead-of-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बंगाल में “शुभ राज“ के साथ सनातन का सूर्योदय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-sunrise-of-sanatan-in-bengal-accompanied-by-auspicious-rule]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में 69 वर्षों के अथक संघर्ष के बाद भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार प्रथम सरकार शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में कार्यभार ग्रहण करके काम पर लग गयी है। बंगाल में बीजेपी की विजय बहुत बड़ी व ऐतिहासिक है। बंगाल ही नहीं भारत के अन्य भागों में भी इस विजय का आनंद दिखाई वातावरण दे रहा है। इस विजय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कर्नाटक, तेलंगना और गुजरात के दौरे में जो भीड़ उमड़ रही है उससे स्पष्ट रूप से जनसामान्य और भाजपा कायकर्ताओं के उत्साह का अनुमान लगाया जा सकता है। बंगाल विधानसभा चुनावों मे हिंदू समाज ने पहली बार बांग्लादेशी घुसपैठ और मुस्लिम तुष्टिकरण की विकृत राजनीति के विरुद्ध एकजुट होकर मतदान किया और जिसका परिणाम आज पूरा भारत देख रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल की जिस धरती पर 75 वर्ष पूर्व डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की वैचारिक नींव रखी थी उसी बंगाल में पहली बार भाजपा 27 सीटों के साथ सत्ता के शिखर पर पंहुची और भगवा वस्त्रों में शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बंगाल की कैबिनेट में अभी पांच मंत्रियों को ही शपथ दिलाई गई है, जिसमें बंगाल में भाजपा का संगठन खड़ा करने में अहम भूमिका निभाने वाले दिलीप घोष, फैशन डिजाइनर से बंगाल भाजपा की सबसे मुखर नेत्री बनी अग्निमित्रा पॉल जिन्होंने तृणमूल के खिलाफ आक्रामक मोर्चा संभाला, बांग्लादेश के हिंदू शरणार्थी मतुआ समुदाय के प्रमुख चेहरे अशोक कीर्तनिया जो उत्तर 24 परगना जिले के भारत-बांग्लादेश सीमा से सटे इलाको में भाजपा के जमीनी संगठनकर्ता के रूप मे अत्यंत सक्रिय रहे हैं, छात्र राजनीति से उभरे नेता निशीथ प्रामाणिक जो 2019 में भाजपा से जुड़े और जंगल महल के आदिवासी समुदाय के बड़े नेता खुदीराम टुडू शामिल हैं। अभी इस मंत्रिमंडल है का विस्तार होना बाकी है। बंगाल में शपथ ग्रहण समारोह के मंच पर एक भारत श्रेष्ठ भारत की संकल्पना के अनुरूप लघु भारत के भव्य दर्शन हो रहे थे तथा भविष्य की राजनीति के संकेत भी मिल रहे थे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/west-bengal-will-now-be-free-from-infiltration" target="_blank">अब घुसपैठ से मुक्त होगा पश्चिम बंगाल</a></h3><div>स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से आज तक बंगाल में कांग्रेस, वामपंथ और तृणमूल की सरकारें रहीं जो तुष्टिकरण में आकंठ डूबी रहीं और हिंदुओ को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया। स्थितियां इतनी विकट हो गयी थीं कि बंगाल की धरती पर जय श्रीराम बोलने पर नफरत का कहर टूट पड़ता था। आज उसी बंगाल में जब जयश्रीराम के नारे गूंज रहे हैं तो बंगाल का हर सनातनी खुशी से सराबोर हो रहा है। बंगाल में भाजपा सरकार आने से पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं को तुष्टिकरण की दमनकारी नीतियों और भय के माहौल से आजादी मिली है। यह विजय केवल सत्ता का परिवर्तन नही अपितु बंगाल के पुनरुत्थान का शंखनाद है। अब बंगाल सही मायने में सोनार बांग्ला बनने की ओर अग्रसर होगा। भाजपा&nbsp; नेताओं&nbsp; का कहना है कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व आर्थिक उत्थान के नए दौर मे प्रवेश करेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>हार की कुंठा से ग्रसित तृणमूल&nbsp; व विरोधी दलों के नेता अभी भी एसआईआर, चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षाबलों वाले आरोप दोहरा रहे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि भाजपा ने यह चुनाव लम्बे संघर्ष और अपने कार्यकर्ताओं के बलिदान के बाद जीता है। तृणमूल के राज में वर्ष&nbsp; 2011 से 2025 के बीच भाजपा के 321 कार्यकर्ता मारे गए, उनके विरुद्ध हुई हिंसा में&nbsp; हजारों घर उजाड़ दी गए, भाजपा व संघ के किसी कार्यकर्ता को बम से उड़ाया गया किसी को पेड़ से लटकाया गया। 2021 में तो भाजपा कार्यकर्ताओं के प्रति तृणमूल के लोगों ने क्रूरता की सभी सीमाएं लांघ दी थीं। नंदीग्राम से लेकर वीरभूम तक, कूच बिहार हो या वशीर हाट चुनाव के बाद बदले के नाम पर पूरे-पूरे गांव खाली करवा दिए गए थे। 2021 की चुनावी हिंसा में हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए किंतु ममता सरकार उन सभी में अड़ंगा डालती रही। आज संदेशखाली से आर जी कर कांड तक सभी पीड़ित परिवारों के मन में एक नया सबेरा आया है कि अब न्याय होकर रहेगा। बंगाल के हिंदू जनमानस को नयी सरकार पर भरोसा है इसलिए नई सरकार को भी अत्यंत तत्परता और सतर्कता के साथ संकल्प पत्र को पूरा करना होगा। नई सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट की पहली बैठक में जो निर्णय लिए हैं उनसे उसकी गंभीरता तथा बंगाल की जनता के प्रति प्रतिबद्धता का पता चलता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>नई सरकार के पहले फैसले- शुभेंदु मंत्रिपरिषद ने अपनी पहली बैठक में ही कई बड़े निर्णय लिए हैं। जिनमें आयुष्मान भारत योजना को बंगाल में लागू करना, भारतीय न्याय सहिंता के तीन कानूनों को लागू करना, बीएसएफ को सीमावर्ती क्षेत्रों में 45 दिनों के अन्दर जमीन स्थानांतरित करना शामिल है। ममता बनर्जी की सरकार इन सभी कार्यों में&nbsp; लगातार अड़ंगा ही डालती रही थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 14:20:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-sunrise-of-sanatan-in-bengal-accompanied-by-auspicious-rule</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पीएम मोदी के राष्ट्रहित के आह्वान में भी राजनीति क्यों?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-is-there-politics-even-in-pm-modi-call-for-the-national-interest]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज पूरी दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं ने मानव सभ्यता को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है। खाड़ी देशों में लंबे समय से चल रहे संघर्ष और युद्ध की विभीषिका ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे तक प्रभावित किया है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखलाओं का बाधित होना, डॉलर के मुकाबले विभिन्न देशों की मुद्राओं का कमजोर होना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उत्पन्न असंतुलन ने लगभग हर राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित किया है। भारत भी इन परिस्थितियों से अछूता नहीं रह सकता। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है और सोने का भी विश्व के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से ईंधन के संयमित उपयोग और सोने की खरीद को सीमित करने का आह्वान केवल एक आर्थिक सलाह नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में किया गया दूरदर्शी चिंतन है। दुर्भाग्य यह है कि मोदी की मितव्ययिता की अपील पर पूरे देश को एकजुट होकर गंभीरता से विचार करना चाहिए था, उस विषय को भी राजनीतिक विवाद का हथियार बना दिया गया। कुछ विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री की इस अपील को जनता में भय फैलाने वाला कदम बताया, तो कुछ ने इसे सरकार की विफलताओं को छिपाने का प्रयास कहा। जबकि वस्तुतः यह अपील राष्ट्र को भविष्य की संभावित चुनौतियों के प्रति सचेत करने और समय रहते आत्मानुशासन अपनाने का संदेश है। यह राजनीति का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी का प्रश्न है। जब विश्व के बड़े-बड़े राष्ट्र आर्थिक संकटों से जूझ रहे हों, तब भारत के प्रधानमंत्री यदि नागरिकों को संयम एवं मितव्ययिता का सूत्र देते हैं तो उसे राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाना चाहिए। यह पहला अवसर नहीं है, जब प्रधानमंत्री ने देश की तरक्की को बनाए रखने की सामूहिक चिन्ता करते हुए मितव्ययिता एवं संयम की अपील की हो।</div><div><br></div><div>भारत की संस्कृति मूलतः संयम प्रधान रही है। भारतीय जीवन-दर्शन में संयम को केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। हमारे ऋषियों, मुनियों और महापुरुषों ने सदैव आवश्यकता और विलासिता के बीच अंतर करना सिखाया। महावीर, बुद्ध, गांधी और विनोबा भावे जैसे महापुरुषों ने त्याग और संयम को ही मानवता की सबसे बड़ी शक्ति बताया। भारतीय संस्कृति कहती है कि जितना आवश्यक हो उतना ही उपभोग करो, क्योंकि असीमित उपभोग अंततः संकट को जन्म देता है। यही कारण है कि भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों तक टिकाऊ और संतुलित बनी रही। आज जब पूरी दुनिया उपभोक्तावाद के दुष्परिणाम भुगत रही है, तब भारत की यही संयम आधारित संस्कृति समाधान का मार्ग दिखा सकती है। सोने के प्रति भारतीय समाज का आकर्षण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर गहरा रहा है। विवाह, पारिवारिक उत्सव, धार्मिक परंपराएं और सामाजिक प्रतिष्ठा में सोने का विशेष स्थान है। लेकिन यह भी एक कठोर सत्य है कि भारत का अधिकांश सोना आयातित होता है। हर वर्ष अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सोने के आयात पर खर्च होता है। यह सोना उत्पादन या औद्योगिक विकास में उपयोग होने के बजाय घरों और लॉकरों में बंद होकर निष्क्रिय पड़ा रहता है। ऐसे समय में जब विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा हो और रुपये की कीमत लगातार गिर रही हो, तब सोने की खरीद में संयम बरतने की अपील आर्थिक दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है। यह किसी की परंपराओं के विरोध में नहीं, बल्कि देश की आर्थिक मजबूती के पक्ष में उठाया गया कदम है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/how-justified-is-the-politics-surrounding-prime-minister-modi-appeal" target="_blank">प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर राजनीति कितनी जायज</a></h3><div>इसी प्रकार ईंधन के उपयोग में संयम भी समय की आवश्यकता है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित तेल पर निर्भर है। खाड़ी देशों में युद्ध और अस्थिरता के कारण तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। इसका सीधा प्रभाव पेट्रोल, डीजल, परिवहन, उद्योग और महंगाई पर पड़ता है। यदि नागरिक ईंधन के अनावश्यक उपयोग को सीमित करें, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करें, ऊर्जा बचत को जीवनशैली का हिस्सा बनाएं, तो इससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी। संयम का अर्थ केवल त्याग नहीं होता, बल्कि दूरदर्शिता और जिम्मेदारी भी होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील इसी जिम्मेदारी की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है। उन्होंने किसी प्रकार की जबरदस्ती या प्रतिबंध की बात नहीं की, बल्कि नागरिकों से स्वैच्छिक सहयोग की अपेक्षा की। यह लोकतांत्रिक नेतृत्व की पहचान है।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री का कर्तव्य केवल संकट आने पर कदम उठाना नहीं होता, बल्कि संकट के संकेतों को पहचानकर समय रहते जनता को तैयार करना भी होता है। आज जब दुनिया के कई देशों में आर्थिक अस्थिरता के कारण भारी महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक तनाव देखने को मिल रहे हैं, तब भारत अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति में है। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पिछले वर्षों में अपनाई गई आर्थिक नीतियों, बुनियादी ढांचे के विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भर भारत अभियान और वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत स्थिति का परिणाम है। यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वव्यापी संकटों के बावजूद भारत ने अपने नागरिकों पर अत्यधिक आर्थिक बोझ नहीं पड़ने दिया। महामारी से लेकर युद्धजनित परिस्थितियों तक भारत सरकार ने लगातार राहत योजनाएं चलाईं, गरीबों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया, किसानों और मध्यम वर्ग को विभिन्न प्रकार की सहायता दी तथा अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने के लिए अनेक कदम उठाए। वैश्विक मंदी और युद्ध के वातावरण में भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना हुआ है। यह प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व और दूरदर्शिता का प्रमाण है।</div><div><br></div><div>दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देशहित के ऐसे विषयों पर भी कुछ राजनीतिक दल संकीर्ण राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहे। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सभी को है, लेकिन हर विषय को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू में तौलना राष्ट्रहित के विरुद्ध है। यदि प्रधानमंत्री जनता से संयम की अपील करते हैं तो विपक्ष को चाहिए कि वह भी जनता को जागरूक करे, न कि भय और भ्रम का वातावरण बनाए। राजनीति तब तक स्वस्थ मानी जाती है जब तक वह राष्ट्रहित से जुड़ी रहे। लेकिन जब राजनीति केवल विरोध के लिए विरोध करने लगे और राष्ट्रीय संकटों को भी अवसर की तरह देखने लगे, तब वह लोकतंत्र को कमजोर करती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि पूरा देश एक परिवार की तरह सोचते हुए राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि माने। संकट के समय संयम, अनुशासन और सहयोग ही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। भारत ने इतिहास में अनेक बार यह सिद्ध किया है कि जब भी राष्ट्र पर संकट आया, भारतीय समाज ने अद्भुत त्याग और एकता का परिचय दिया। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर युद्धकाल तक, भारतीय जनता ने अपने निजी हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को महत्व दिया है। आज फिर वही समय है जब हमें समझना होगा कि अनावश्यक उपभोग, दिखावे की प्रवृत्ति और अंधाधुंध विलासिता अंततः देश की आर्थिक मजबूती को कमजोर करती है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। यह केवल सोना न खरीदने या ईंधन बचाने का संदेश नहीं, बल्कि आत्मसंयम, आत्मअनुशासन और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का संदेश है। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर भी यही रहा है कि व्यक्ति अपने आचरण से समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाए। यदि हम संयम को जीवन का हिस्सा बना लें तो अनेक आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान स्वतः संभव हो सकता है। आज दुनिया जिस अनिश्चितता और संकट के दौर से गुजर रही है, उसमें भारत अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में खड़ा है। इसका श्रेय देश की जनता की सामर्थ्य के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को भी जाता है। ऐसे समय में आवश्यकता राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सकारात्मक सोच की है। संयम केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का आधार है। यदि हम इस भावना को समझ सकें, तो न केवल वर्तमान संकटों का सामना कर पाएंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर सकेंगे।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 13:01:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-is-there-politics-even-in-pm-modi-call-for-the-national-interest</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अब घुसपैठ से मुक्त होगा पश्चिम बंगाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/west-bengal-will-now-be-free-from-infiltration]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार के तौर पर शुभेन्दु अधिकारी ने शासन की बागडोर संभाल ली है। भाजपा का यह स्पष्ट नारा रहा है कि वह विदेशी घुसपैठियों को देश से बाहर करेगी। इसलिए पश्चिम बंगाल के जनादेश में इस पर अब जनता की मुहर भी लग गई है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देकर अपने शासन का संचालन किया। इसमें बांग्लादेश के घुसपैठियों का भी समर्थन भी शामिल रहा। अब भाजपा की सरकार बनने के बाद यह तय हो चुका है कि अब पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश से लगी हुई सीमाएं पहले से ज्यादा सुरक्षित होंगी और एक बड़ी समस्या से छुटकारा भी मिलेगा। इससे यह भी आशय निकलता है कि सबका साथ और सबका विकास वाली राजनीतिक अवधारणा को स्वीकार किया जाने लगा है। देश में इसी प्रकार की राजनीति की आवश्यकता है। क्योंकि राजनीतिक दलों ने आज देश में रहने वाले समाज के बीच इतना भेद पैदा कर दिया है कि कई जगह समाज बंधु एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। हिन्दू और मुसलमान समाज के ही हिस्से हैं, इसलिए इनको अलग अलग देखने की राजनीति नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत देश के कुछ राजनीतिक दलों का आधार ही मुस्लिम वोट हैं। जबकि यह भी सही है कि तुष्टिकरण से किसी का भला न तो हुआ है और न ही होगा।</div><div><br></div><div>लम्बे समय से पश्चिम बंगाल में जनसंख्या का अप्रत्याशित रूप से बढ़ना कई प्रकार के सवाल खड़ा करता रहा है। इसके पीछे बांग्लादेश से आए घुसपैठिए भी एक बड़ा कारण है। इस समस्या से बंगाल ही नहीं, असम भी प्रभावित है, लेकिन अच्छी बात यह है कि विपक्षी राजनीतिक दलों को यह समस्या दिखाई नहीं देती। असम और पश्चिम बंगाल की जनता इस घुसपैठ के विरोध में खड़ी हो गई है, इसलिए इस बार का जनादेश भी बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरोध में आया। इसी के चलते असम में भाजपा सरकार का पुनः बनना और पश्चिम बंगाल में एक नए राजनीतिक उदय के साथ सत्तारूढ़ होना इसी बात का परिचायक है कि भाजपा ही नहीं, जनता भी देश से घुसपैठियों को निकालने का मन बना चुकी है। सुनने में यह भी आ रहा है जो बांग्लादेशी नागरिक पश्चिम बंगाल में घुसपैठ करके आए, वे अपने देश वापस जाने का मानस बना चुके हैं। इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि अब पश्चिम बंगाल घुसपैठ की समस्या से मुक्त हो जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/fortunes-of-jhalmuri-vendor-who-have-become-medium-for-political-discourse-are-set-to-turn-around" target="_blank">राजनीतिक विमर्श का जरिया बनी झालमुढ़ी वालों के फिरेंगे दिन</a></h3><div>भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में प्रारंभ से ही इस बात पर जोर दिया था कि वह विदेशी घुसपैठियों के खिलाफ है। भाजपा के नेताओं के भाषण भी इसी पर केंद्रित रहते थे। इस मुद्दे पर भाजपा को जनता का भी समर्थन मिला और जनता ने भाजपा को बहुमत दे दिया। इसके अलावा ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने जो कार्य किए, वह कहीं न कहीं हिन्दू समाज को नीचा दिखाने वाले ही थे, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के नेता शायद इस बात को भूल गए कि बहुसंख्यक समाज को नकारने की राजनीति एक प्रकार से उसके लिए सत्ता से अलग होने की तस्वीर पेश कर सकती है।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल घुसपैठ की समस्या से बहुत प्रभावित हुए हैं। यहां पर अप्रत्याशित रूप से ज़मीनों पर अवैध कब्जे हो रहे हैं। कई जगह अचानक ही मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र बनते जा रहे हैं। जिनमें मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और मालदा आदि है। यह तीनों जिले बांग्लादेश की सीमा से लगे हुए हैं। इसके चलते बंगाल में अपराध भी बहुत होने लगे हैं। इसका कारण यही माना जा रहा है कि जो व्यक्ति घुसपैठ करके आए हैं, उनके सामने रोजगार का संकट है। जब रोजगार नहीं मिलेगा तो स्वाभाविक रूप से व्यक्ति गलत कार्य भी करने लगता है। इससे की दशा और दिशा भी ख़राब हो रही है।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के रास्ते कई बांग्लादेशी नागरिक घुसपैठ करते रहे हैं। स्थानीय नागरिकों की मदद से वे सभी अपने आशियाने भी बना रहे थे, इनके ज्यादातर आशियाने अवैध कब्ज़ा करके ही बने हैं। तृणमूल कांग्रेस की सरकार के समय इनको पर्याप्त संरक्षण भी मिला। उल्लेखनीय है जिन क्षेत्रों में मुस्लिमों की जनसंख्या अचानक बढ़ी है, वे सभी तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे हैं। इन क्षेत्रों में हिन्दू समाज का कोई भी व्यक्ति जाने से डरता है। सवाल यह है कि यह डर किसने पैदा किया और इसको संरक्षण देने वाले कौन हैं। तृणमूल कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राह पर चलते हुए इनको ताकत देने का काम किया। और यही उसकी हार का कारण भी बना।&nbsp;</div><div><br></div><div>अब पश्चिम बंगाल का राजनीतिक दृश्य परिवर्तित हो चुका है। जिन्होंने लम्बे समय तक अमानुषिक अत्याचार सहन किए, वे सत्ता में आ चुके हैं, लेकिन भाजपा को यह सत्ता ऐसे ही नही मिल गई। उसके सैकड़ों कार्यकर्ता का बलिदान इस जीत के नींव के पत्थर बने। चुनाव के बाद शुभेन्दु अधिकारी के निजी सहायक देवनाथ की हत्या इसका ताजा उदाहरण है। जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह कार्य प्रशिक्षित अपराधियों ने किया। संभावना इस बात की भी है कि घटना के बाद ये बांग्लादेश भाग चुके हैं। इसे राजनीतिक हत्या के तौर पर भी देखा जा रहा है और इसके आरोप तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर लग रहे हैं।</div><div><br></div><div>घुसपैठियों की समस्या से त्रस्त पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद विदेशी घुसपैठिओं के चेहरे उतरने लगे हैं, क्योंकि अब इन विदेशी घुसपैठियों को सहन नहीं किया जाएगा। अब उनको बाहर जाना ही होगा। भाजपा की सरकार ही इनको बाहर निकलेगी। देश के गृह मंत्री अमित शाह इसकी चेतावनी पहले से ही देते रहे हैं। यहां यह कहना भी उचित होगा कि भाजपा ने केवल घुसपैठियों को बाहर निकालने की ही बात की है, भारत के मुसलमानों की नहीं, लेकिन विपक्ष और खासकर तृणमूल कांग्रेस ने ऐसा भ्रम फैलाने का प्रयास किया कि सारे मुस्लिमों पर इसका प्रभाव होगा। विदेशी घुसपैठियों को बाहर निकालना सभी चाहते हैं, विपक्ष को इस मुद्दे पर भाजपा का साथ देना चाहिए, क्योंकि यह राष्ट्रीय हित की बात है।</div><div><br></div><div>- सुरेश हिंदुस्तानी,&nbsp;</div><div>वरिष्ठ पत्रकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 12:51:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/west-bengal-will-now-be-free-from-infiltration</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “विदेशी मुद्रा बचाने” के आह्वान के राजनीतिक-आर्थिक निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-economic-implications-of-pm-modi-call-to-save-foreign-exchange]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी प्रकार की आपदा को अवसर में बदलना जानते हैं। पहले कृत्रिम वैश्विक महामारी कोरोना (कोविड-19), फिर रूस-यूक्रेन युद्ध और अब अमेरिका/इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान भी उन्होंने कुछ ऐसा ही किया है। फिलवक्त मौजूदा वैश्विक संकट से भारत को निजात दिलाने और इससे प्रभावित हो रहे आम भारतीयों के हितों की रक्षा करने के लिए ही उन्होंने विदेशी मुद्रा बचाने, आयातित वस्तुओं का उपभोग मितव्ययिता पूर्वक करने और इनके मौजूद देशी विकल्प को आजमाते हुए स्थायी हल निकालने और उनपर निर्भर होने की दिशा में जनसहयोग का आह्वान करके सबको चौंका दिया है।</div><div><br></div><div>समझा जाता है कि अमेरिका, चीन, यूरोप और अरब के कुछ देशों के द्वारा लगातार भारत विरोधी षड्यंत्र किए जा रहे हैं। कोई अपना इस्लामिक एजेंडा भारत पर थोपना चाहता है तो कोई भारत-रूस के भरोसेमंद सम्बन्धों में पलीता लगाना चाहता है और कोई भारत को पाकिस्तान, बंग्लादेश और चीन के त्रिपक्षीय कुचक्र में उलझा कर अपना आर्थिक हित साधना चाहता है। जबकि, तेजी से आर्थिक और सैन्य उन्नति कर रहा 21वीं सदी का भारत अब रूस-ईरान-इजरायल के सहयोग से मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और यूरोप के बाजारों तक पहुंच बढ़ाने की दिशा में अग्रसर है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-modi-forbidding-people-from-buying-gold-will-work-from-home-be-allowed-again" target="_blank">सोना खरीदने से क्यों मना कर रहे हैं मोदी? क्या फिर से होने वाला है Work From Home? पेट्रोल-डीजल के दाम कबसे बढ़ेंगे?</a></h3><div>भारत-यूरोप की बढ़ती नजदीकियों और उसको निकट भविष्य में और अधिक बल देने वाली विभिन्न महत्वाकांक्षी योजनाओं पर अमल से चिढ़े अमेरिकी डीप स्टेट और उनके चीनी-अरबी पिट्ठुओं ने पहले ईरान को बर्बाद करने और फिर इंडिया को उसकी तपिश में झुलसाने की जो कुचक्र रची है, अब भारत उसकी भी काट ढूंढ चुका है। इस बार भारत ने लोकल फ़ॉर वोकल और चीनी वस्तुओं के बहिष्कार करने की जगह विदेशी मुद्रा बचाने हेतु विभिन्न सकारात्मक पहल करने का आह्वान किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मौजूदा सरकार अपनी त्रासदी से निपटने के लिए आपसे कोई सोना नहीं मांग रही है, बल्कि अगले 1 साल तक इनकी खरीदारी कम करने की बात कह रही है ताकि विदेशी मुद्रा बचे। इसी कड़ी में उन्होंने उन तमाम वस्तुओं का जिक्र बारी-बारी से किया और कहा कि इनपर विदेशी मुद्रा ज्यादा खर्च होते हैं, इसलिए अगले 1 साल तक इनका संयमित उपभोग कीजिए। दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित कीजिए।</div><div><br></div><div>स्पष्ट है कि यह सिर्फ “देशभक्ति” वाला संदेश नहीं होता; बल्कि यह आर्थिक संकेत भी होता है कि सरकार को वैश्विक अनिश्चितता, महंगे आयात, या डॉलर पर दबाव की चिंता है। ऐसा इसलिए कि जब विदेशी मुद्रा पर दबाव होता है, तब देश कोशिश करता है कि रुपये पर ज्यादा दबाव न पड़े, जरूरी आयात (तेल, दवा, रक्षा) जारी रह सकें, महंगाई नियंत्रित रहे, विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहे। उल्लेखनीय है कि भारत की विदेशी मुद्रा कई बड़े क्षेत्रों में खर्च होती है, लेकिन सबसे ज्यादा खर्च आयात पर होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अगर “सबसे ज्यादा” की बात करें, तो आमतौर पर क्रम कुछ ऐसा रहता है: 1. कच्चा तेल → 2. इलेक्ट्रॉनिक्स/मशीनरी → 3. सोना → 4. रसायन/उर्वरक → 5. रक्षा खरीद। हाल के वर्षों में भारत का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा खर्च कच्चे तेल के आयात पर ही रहा है। उनके हाल के बयान की बात करें तो मौजूदा वैश्विक संकट (जैसे युद्ध, तेल कीमतें, सप्लाई-चेन दबाव) के बीच प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा (Forex) बचाने की बात जब कही, तो इसका अर्थ आमतौर पर यह होता है कि भारत डॉलर में होने वाले खर्च को कम करे और आय बढ़ाए।&nbsp;</div><div><br></div><div>उल्लेखनीय है कि ऐसे आह्वानों के मुख्य बिंदु आमतौर पर ये होते हैं: आयात कम करना/ आत्मनिर्भरता बढ़ाना– खासकर तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, खाद्य तेल जैसी चीजों में विदेश निर्भरता घटाना। “लोकल खरीदें” और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की बात इसी से जुड़ती है। इसलिए प्रधानमंत्री द्वारा “विदेशी मुद्रा बचाने” की बात का राजनीतिक-आर्थिक मतलब संदर्भ पर निर्भर करता है, लेकिन आम तौर पर इसके कई स्तर होते हैं। इसके मायने क्या हैं? इसे ऐसे समझते हैं।</div><div><br></div><div>पहला, आर्थिक मायने: आयात बिल कम करने का संकेत। चूंकि भारत का बड़ा विदेशी मुद्रा खर्च तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स आयात पर होता है। लिहाजा जब सरकार विदेशी मुद्रा बचाने की बात करती है, तो अक्सर मतलब होता है: घरेलू उत्पादन बढ़ाओ (“मेक इन इंडिया” जैसी नीति), आयातित वस्तुओं पर निर्भरता घटाओ, ऊर्जा बचत या वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा दो और रुपये और व्यापार घाटे पर दबाव कम करो। क्योंकि अगर बहुत ज्यादा डॉलर बाहर जाते हैं तो रुपये पर दबाव पड़ सकता है और व्यापार घाटा बढ़ सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए विदेशी मुद्रा बचाने का संदेश बाजार को यह संकेत भी देता है कि सरकार बाहरी आर्थिक जोखिमों को लेकर सतर्क है। चूंकि ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा अहम है इसलिए तेल आयात महंगा होने पर सरकार कभी-कभी ईंधन बचत, एथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक वाहन, या घरेलू उत्पादन पर जोर देती है ताकि डॉलर खर्च कम हो। वहीं, विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत रखने से आयात भुगतान, संकट प्रबंधन और निवेशकों का भरोसा बनाए रखने में मदद मिलती है।</div><div><br></div><div>दूसरा, राजनीतिक मायने: आत्मनिर्भरता की राजनीतिक कथा जैसा संदेश अक्सर “देशी बनाम विदेशी निर्भरता” या आत्मनिर्भरता के नैरेटिव से जुड़ता है—यानी आर्थिक राष्ट्रवाद का तत्व। वहीं जनता से व्यवहार परिवर्तन की अपील के पीछे कभी-कभी सरकार जनता से कुछ आदतें बदलने (जैसे ऊर्जा बचत, आयातित वस्तुओं का कम उपयोग) की नैतिक अपील करती है, ताकि नीति को सामाजिक समर्थन मिले। इससे कठिन आर्थिक समय का संकेत भी मिलता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>स्पष्ट है कि यदि बयान ऐसे समय आए जब तेल महंगा हो, डॉलर मजबूत हो, या वैश्विक संकट हो, तो यह आर्थिक सावधानी का संकेत भी माना जा सकता है—हालाँकि जरूरी नहीं कि संकट ही हो। जहां तक नीतिगत फैसलों की पृष्ठभूमि तैयार करने की बात है तो ऐसे बयान आगे चलकर कुछ कदमों (आयात शुल्क, उत्पादन प्रोत्साहन, ऊर्जा नीति, निर्यात बढ़ावा) के लिए राजनीतिक आधार भी बना सकते हैं।</div><div><br></div><h2># आइए, यहां पर हमलोग समझते हैं कि किन-किन वस्तुओं पर विदेशी मुद्रा ज्यादा खर्च होती है-&nbsp;</h2><div><br></div><div><b>पहला, कच्चा तेल और पेट्रोलियम आयात:</b> भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा खर्च तेल, गैस और पेट्रोलियम उत्पादों पर होता है। उदाहरण: ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) जैसी घरेलू कंपनियाँ उत्पादन करती हैं, फिर भी आयात बहुत अधिक है।</div><div><br></div><div><b>दूसरा, सोना आयात:</b> भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में है। ज्वेलरी और निवेश के लिए भारी मात्रा में सोना आयात किया जाता है, जिससे डॉलर में भुगतान करना पड़ता है।</div><div><br></div><div><b>तीसरा, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी: </b>मोबाइल फोन के पार्ट्स, सेमीकंडक्टर, कंप्यूटर उपकरण, औद्योगिक मशीनें आदि विदेशों से आती हैं। जैसे एप्पल इंक. या अन्य ब्रांडों के कंपोनेंट्स का आयात।</div><div><br></div><div><b>चौथा, रक्षा उपकरण:</b> लड़ाकू विमान, हथियार, रक्षा तकनीक और सैन्य उपकरणों की खरीद पर भी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। उदाहरण: राफेल जैसे विमान खरीद।</div><div><br></div><div><b>पांचवां, रसायन, उर्वरक और दवाओं का कच्चा माल: </b>खेती के लिए उर्वरक और दवा उद्योग के लिए कई सक्रिय रसायन विदेशों से मंगाए जाते हैं।</div><div><br></div><div><b>छठा, विदेश यात्रा और शिक्षा:</b> भारतीय जब विदेश में पढ़ाई, इलाज, पर्यटन या बिज़नेस के लिए खर्च करते हैं, तब भी विदेशी मुद्रा बाहर जाती है।</div><div><br></div><div><b>सातवां, विदेशी कंपनियों को भुगतान:</b> टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर लाइसेंस, रॉयल्टी, निवेशकों को मुनाफा आदि के रूप में भी डॉलर/विदेशी मुद्रा जाती है।</div><div><br></div><div><b>आठवां, ऊर्जा बचत: </b>तेल आयात भारत का बड़ा विदेशी मुद्रा खर्च है। पेट्रोल-डीजल की खपत कम करना, गैस/बिजली की बचत, वैकल्पिक ऊर्जा अपनाना—इनका सीधा असर डॉलर बचत पर पड़ता है। वैश्विक संघर्षों से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की चिंता सरकार ने भी जताई है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>नौवां, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा: </b>विदेशी सामान की जगह भारतीय उत्पाद खरीदने से डॉलर बाहर कम जाता है। “वोकल फॉर लोकल” का आर्थिक मतलब यही है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>दसवां, निर्यात और निवेश बढ़ाना:</b> विदेश से डॉलर कमाने के लिए निर्यात, सेवाएँ, और विदेशी निवेश आकर्षित करने पर जोर।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 14:22:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-economic-implications-of-pm-modi-call-to-save-foreign-exchange</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहा 'इंडिया गठबंधन' तोड़ रहा है सियासी दम? जानिए कैसे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/is-the-india-alliance-adrift-in-the-mirage-of-secularism-gasping-for-political-breath]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा मूलतः “सर्वधर्म समभाव” और राज्य की धार्मिक निष्पक्षता पर आधारित रही है। लेकिन पिछले कई दशकों में भारतीय राजनीति के एक हिस्से ने इसे सामाजिक संतुलन के बजाय “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” के राजनीतिक औजार के रूप में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि आज अनेक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल वैचारिक संकट से गुजरते दिखाई दे रहे हैं। सच कहूं तो वे सभी धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहे हैं, 'इंडिया गठबंधन' के सहयोगी दल कांग्रेस की बेरुखी से अपना अपना सियासी दम तोड़ते जा रहे हैं! जानिए कैसे</div><div><br></div><div>जहां कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक खुद को धर्मनिरपेक्ष राजनीति की केंद्रीय धुरी के रूप में स्थापित रखा। परंतु समय के साथ उस पर यह आरोप मजबूत होता गया कि उसने बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक आकांक्षाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया और वोट बैंक आधारित राजनीति को प्राथमिकता दी। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा ने “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” और “बहुसंख्यक अस्मिता” के प्रश्न को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-clear-mandate-a-grueling-trial-by-fire-awaits-the-new-governments" target="_blank">विधानसभा चुनाव परिणाम: स्पष्ट जनादेश, नई सरकारों की होगी कड़ी अग्निपरीक्षा</a></h3><div>आज स्थिति यह है कि जो दल कभी भाजपा के हिंदुत्व विमर्श का तीखा विरोध करते थे, वे भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मंदिर, सनातन परंपरा, जातीय-सामाजिक प्रतिनिधित्व और राष्ट्रवाद की भाषा बोलने लगे हैं। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि भारतीय मतदाता अब केवल “धर्मनिरपेक्षता” के पारंपरिक नारों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि वह सांस्कृतिक आत्मसम्मान और विकास के संतुलन की अपेक्षा कर रहा है।</div><div><br></div><div>कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि उसकी राजनीति की मूल दिशा क्या होगी—पारंपरिक अल्पसंख्यक केंद्रित गठजोड़?</div><div>सामाजिक न्याय आधारित नई राजनीति? या फिर भारतीय सांस्कृतिक चेतना के साथ सामंजस्य? यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल समय रहते अपने वैचारिक ढांचे का पुनर्मूल्यांकन नहीं करते, तो उनके सामने तीन बड़े खतरे बने रहेंगे—</div><div><br></div><div>पहला, बहुसंख्यक समाज से लगातार बढ़ती दूरी उनके लिए सियासी चिंता का सबब बन सकती है। क्योंकि क्षेत्रीय दलों द्वारा उनके पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाया जा चुका है। दूसरा, भाजपा के राष्ट्रवादी विमर्श के सामने वैकल्पिक नैरेटिव का अभाव उतपन्न हो गया है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि भारतीय लोकतंत्र केवल बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक राजनीति पर नहीं चलता। तीसरा, अंततः जनता विकास, सुशासन, सुरक्षा, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आत्मविश्वास—इन सभी का संतुलन चाहती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए भविष्य उसी राजनीतिक शक्ति का होगा जो पहचान की राजनीति से ऊपर उठकर विश्वसनीय शासन मॉडल प्रस्तुत कर सके। कांग्रेस के लिए चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक प्रासंगिकता बचाने की है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि वह अपने पुराने ढांचे से बाहर निकलकर नई राजनीतिक भाषा गढ़ पाती है या नहीं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 09 May 2026 18:23:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/is-the-india-alliance-adrift-in-the-mirage-of-secularism-gasping-for-political-breath</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विधानसभा चुनाव परिणाम: स्पष्ट जनादेश, नई सरकारों की होगी कड़ी अग्निपरीक्षा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-clear-mandate-a-grueling-trial-by-fire-awaits-the-new-governments]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आ चुके हैं। नई सरकारों के गठन की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है। बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुद्दुचेरी के ये विधानसभा चुनाव परिणाम कई स्पष्ट संकेत देने वाले हैं। बंगाल, असम, और पुद्दुचेरी ने जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा व राजग गठबंध को दो तिहाई बहुमत के साथ चुना वहीं तमिलनाडु और केरल में भी सत्ता बदल गई। बंगाल, असम और पुद्दुचेरी में विकास, कल्याणकारी योजनाओं व हिंदुत्व का कमाल रहा। असम में कल्याणकारी योजनाओं के सहारे भाजपा जहां महिलाओं और युवाओं को साधने में सफल रही वहीं मुख्यंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ मुहिम छेड़कर नस्ल, क्षेत्र और भाषा में बनते हिंदुओं को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। असम और बंगाल की जनता को भाजपा यह भरोसा दिलाने में सफल रही कि केवल भाजपा ही बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या से मुक्ति दिला सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल और असम के बाद सबसे अधिक चर्चा तमिलनाडु को लेकर हो रही है। तमिलनाडु के चुनाव परिणामों ने सभी को हैरान कर दिया है। एक बार द्रमुक और एक बार अन्नाद्रमुक का मिथक टूट गया है। फिल्म स्टार विजय की झोली वोटों से भरी है। केरलम में पराजय के बाद देश भर से वामपंथी सरकारों का अंत हो चुका है तथापि वह अपना राजनैतिक और वैचारिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए दो विधायकों के बल पर तमिलनाडु में एक्टर थलपति विजय की नई सरकार मे घुस रही है। सभी राज्य विधानसभाओं में भाजपा का खाता खुल चुका है। पहली बार केरलम में भाजपा के तीन व तमिलनाडु में एक विधायक जीतने में सफल रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/amid-resort-politics-in-tamil-nadu-eps-big-claim-good-news-is-coming-tvks-tension-increases" target="_blank">Tamil Nadu में Resort Politics के बीच EPS का बड़ा दावा, Good News आ रही है, TVK की बढ़ी टेंशन</a></h3><div>तमिलनाडु में थलपति विजय की सरकार- तमिलनाडु की जनता द्रविड़ राजनीति से हताश और निराश हो चुकी थी। कभी द्रमुक और कभी अन्ना द्रमुक राज्य इनके बीच में झूलता रहता था। तमिल राजनीति में फिल्मी कलाकारों की अहम भूमिका रही है एम. जी. रामचंद्रन से लेकर करुणानिधि और जयललिता जैसे सितारों ने वहां की राजनीति में अहम भूमिका निभाई और लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे।</div><div><br></div><div>तमिलनाडु में एक्टर थलपति विजय की इतनी प्रचंड लहर चली कि मुख्यमंत्री स्टालिन अपनी सीट तक हार गए। इस लहर का आभास किसी भी राजनैतिक विश्लेषक को नही था। एक्टर थलपति विजय की विजय में मुख्य भूमिका उनके चुनावी वायदों ने की है जो अधिकांशतः मुफ्त की रेवड़ी वाले हैं। विवाह के लिए महिलाओं को 22 कैरेट का आठ ग्राम सोना देने से लेकर 60 सल से कम आयु की महिलाओं को 2500 रुपए मासिक सहायता प्रति परिवार छह फ्री सिलेंडर देने का वादा काम कर गया। गरीब दुल्हनों के लिए रेशमी साड़ी और महिलाओं द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूहों&nbsp; के लिए पांच लाख रुपए तक के बयाज मुक्त ऋण का आश्वासन भी विजय ने दिया है। थलपति विजय ने वैसे ही कई लेाक लुभावन वायदे किये है जैसे कभी आप नेता अरविंद केजरीवाल किया करते थे। यह थलपति विजय तमिलनाडु के केजरीवाल सिद्ध हो सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>ईसाई पिता ओर हिंदू मां की संतान विजय ने अपनी पार्टी की विचारधारा तैयार करने में द्रविड़ विचारधारा और तमिल राष्ट्रवाद के तत्वों को जोड़ा है। इनकी पार्टी तमिलगा वेटी कझागम की स्थापना फरवरी 2024 में हुई, जो&nbsp; तमिलनाडु और पुद्दुचेरी तक फैली हुई है। लोग सेाच रहे हैं कि विजय की आखिर इतनी बड़ी विजय कैसे हो गई– विजय लम्बे समय से कई घरों&nbsp; के चूल्हों&nbsp; के ईंधन, बेटियों की पढ़ाई ओर बहनों&nbsp; की शादी का खर्च लगातार उठा रहे थे। उनके वोटबैक में सबसे बड़ी हिस्सेदारी महिलाओं और युवाओं की रही है। वह अपनी फिल्मों में गरीबों के मसीहा के तौर पर पेश किए जाते थे जिसका परिणाम अब सबके सामने है। विजय की&nbsp; चुनावी जनसभाओं&nbsp; में अभूवपूर्व भीड़ उमड़ रही थी किंतु कोई राजनैतिक विश्लेषक यह मानकर नहीं चल रहा था कि वह सरकार बनाने तक पहुंच जाएंगे।</div><div>&nbsp;</div><div>तमिलनाडु में यदि कोई सबसे बड़ा परजीवी दल साबित हुआ है तो वह कांग्रेस है क्य उसने हर बार की तरह अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए एक और क्षेत्रीय दल की सरकार में गठबंधन के बहाने सेंधमारी कर ली है। जो दल कांग्रेस के साथ गए व कांग्रेस जिन दलों के साथ गई उन दलों का क्या हाल हो रहा है सभी को पता है। वैसे अभी थलपति विजय का शपथ ग्रहण समारोह भी ग्रहण ग्रस्त लग रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>– मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 16:43:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-clear-mandate-a-grueling-trial-by-fire-awaits-the-new-governments</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सियासत का नया व्याकरण लिखता जनादेश 2026]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mandate-2026-writing-a-new-grammar-of-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>2026 के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता वापसी की घटना मात्र नहीं हैं बल्कि ये देश की राजनैतिक दिशा और मतदाता के बदलते मनोविज्ञान का एक ऐसा विस्तृत दस्तावेज हैं, जिसने भविष्य की राजनीति के लिए नए प्रतिमान स्थापित कर दिए हैं। इन परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय मतदाता अब केवल भावनात्मक नारों या पारंपरिक वोट बैंक के गणित में उलझने वाला नहीं है बल्कि वह शासन की जवाबदेही, नेतृत्व की विश्वसनीयता और विकास के ठोस धरातल पर अपना निर्णय सुना रहा है। पूर्वोत्तर की पहाड़ियों से लेकर दक्षिण के तटीय मैदानों तक फैली इस राजनैतिक हलचल का यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखाई देता है कि ‘भगवा’ राजनीति का पूर्वी विस्तार अब अपने चरम पर है जबकि दक्षिण में क्षेत्रीय अस्मिता और नए राजनैतिक विजन के बीच एक दिलचस्प संघर्ष छिड़ गया है। ये चुनाव परिणाम उन तमाम राजनैतिक पंडितों के लिए एक सबक हैं, जो केवल पुराने आंकड़ों के आधार पर भविष्यवाणियां करते थे क्योंकि इस बार मतदाताओं ने एक ऐसी ‘परिवर्तन की आंधी’ का सूत्रपात किया है, जिसने कई दिग्गजों के राजनैतिक भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए ‘महाभूकंप’ को देखे बिना 2026 के इस जनादेश की व्याख्या अधूरी है। लगभग डेढ़ दशक से राज्य की सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस का ढहना और भाजपा का 150 सीटों के पार जाना यह दर्शाता है कि बंगाल की जनता ‘सिंडिकेट राज’ और ‘कट मनी’ की संस्कृति से ऊब चुकी थी। बंगाल का यह परिणाम केवल एक चुनावी जीत नहीं बल्कि एक वैचारिक क्रांति है, जहां मतदाताओं ने ‘बंगाली अस्मिता’ के साथ ‘राष्ट्रीय विकास’ के समन्वय को स्वीकार किया है। संदेशखाली जैसी घटनाओं ने शासन के प्रति जो आक्रोश पैदा किया था, वह ईवीएम के माध्यम से ज्वालामुखी की तरह फटा। भाजपा ने यहां जिस प्रकार से हिंदू मतों का ध्रुवीकरण किया और साथ ही मतुआ एवं राजवंशी समुदायों को अपने पक्ष में संगठित किया, उसने टीएमसी के अभेद्य दुर्ग की ईंट से ईंट बजा दी। ग्रामीण बंगाल में ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ और ‘जल जीवन मिशन’ जैसी केंद्रीय योजनाओं ने एक नया ‘लाभार्थी वर्ग’ तैयार किया, जिसने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की पारदर्शिता को राज्य सरकार की भ्रष्टाचार युक्त मशीनरी से बेहतर पाया। यह चुनाव परिणाम ममता बनर्जी के उस करिश्मे के अंत का भी संकेत है, जो कभी अपराजेय माना जाता था और अब बंगाल की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सुशासन और कानून-व्यवस्था ही सत्ता की एकमात्र कसौटी रह गई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-opposition-breaching-constitutional-norms" target="_blank">मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू, संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ता विपक्ष</a></h3><div>असम की ओर रुख करें तो यहां की स्थिति बंगाल से बिल्कुल भिन्न लेकिन उतनी ही प्रभावशाली है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा की ‘हैट्रिक’ ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब विकास को सांस्कृतिक अस्मिता के साथ जोड़ दिया जाता है तो वह एक अजेय फॉर्मूला बन जाता है। असम में भाजपा की जीत केवल सत्ता की निरंतरता नहीं है बल्कि यह उस विश्वास की पुष्टि है, जो जनता ने सरमा के प्रभावी और साहसी नेतृत्व में दिखाया है। निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन ने राजनैतिक भूगोल को इस तरह बदला कि घुसपैठ और बाहरी प्रभाव की राजनीति हाशिए पर चली गई और ‘असमिया राष्ट्रवाद’ का नया स्वरूप उभरकर सामने आया। ‘ओरुनोडोई’ जैसी योजनाओं ने महिला मतदाताओं के बीच भाजपा को एक ऐसे रक्षक के रूप में स्थापित कर दिया है, जिसके पास उनके दैनिक जीवन की समस्याओं का ठोस समाधान है। असम का जनादेश संदेश देता है कि यदि नेतृत्व के पास विजन हो और वह जमीनी मुद्दों पर आक्रामक तरीके से कार्य करे तो जनता उसे फिर सेवा का अवसर प्रदान करती है। यहां विपक्ष की बिखरी हुई ताकत और कांग्रेस की वैचारिक शून्यता ने भाजपा की राह को और भी आसान बना दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि पूर्वोत्तर में भाजपा अब एक विकल्प नहीं बल्कि एक स्थायी शक्ति बन चुकी है।</div><div><br></div><div>दक्षिण भारत के राजनैतिक परिदृश्य में तमिलनाडु ने इस बार पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। थलपति विजय के रूप में एक नए राजनैतिक सूर्य का उदय यह बताता है कि तमिलनाडु की जनता अब डीएमके और एआईएडीएमके के दशकों पुराने द्वंद्व से मुक्ति चाहती थी। विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ द्वारा 100 सीटों का आंकड़ा पार करना एक राजनैतिक चमत्कार है, जिसने एमजीआर के उस दौर की याद ताजा कर दी, जब सिनेमा और राजनीति का संगम सत्ता की चाबी बन गया था। विजय ने खुद को केवल एक फिल्मी सितारे के रूप में नहीं, एक ‘संकटमोचक’ और ‘युवा आइकन’ के रूप में पेश किया। उन्होंने गठबंधन की राजनीति को ठेंगा दिखाते हुए ‘अकेले शेर’ की तरह चुनावी मैदान में उतरने का जो साहस दिखाया, उसने तमिल युवाओं के बीच एक नई ऊर्जा का संचार किया। यह परिणाम कमल हासन और विजयकांत जैसे पूर्ववर्ती सितारों की तुलना में कहीं अधिक गहरा है क्योंकि विजय ने ‘बौद्धिक राजनीति’ के बजाय ‘जमीनी और मास-अपील’ वाली राजनीति को चुना। तमिलनाडु का यह जनादेश द्रविड़ राजनीति के भविष्य को एक नई दिशा देने वाला है, जहां अब ‘तीसरी शक्ति’ केवल संभावना नहीं बल्कि एक हकीकत बन चुकी है।</div><div><br></div><div>केरल का चुनाव परिणाम भी कम दिलचस्प नहीं रहा, जहां ‘एक बार इधर, एक बार उधर’ की पारंपरिक रीत ने पिनाराई विजयन की तमाम कोशिशों के बावजूद एलडीएफ को सत्ता से बाहर कर दिया। यूडीएफ की यह प्रचंड वापसी यह दर्शाती है कि केरल का शिक्षित मतदाता भ्रष्टाचार और राजकोषीय कुप्रबंधन को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं था। विभिन्न घोटालों ने एलडीएफ की नैतिक साख को जो चोट पहुंचाई, उसकी भरपाई उसकी जनहितैषी योजनाओं से भी नहीं हो सकी। राहुल गांधी की वायनाड में सक्रियता और ‘न्याय’ जैसी योजनाओं के वादे ने कांग्रेस नीत यूडीएफ के पक्ष में एक सकारात्मक माहौल बनाया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर ईसाइयों और मुस्लिमों के बीच उपजे असंतोष ने सत्ता के संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया। केरल का मतदाता यह संदेश दे रहा है कि वह किसी भी दल को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ नहीं लेता और सत्ता की चाबी हमेशा जनता के हाथ में रहती है, जो हर पांच साल में शासन की समीक्षा बड़ी निर्ममता से करती है।</div><div><br></div><div>पुडुचेरी जैसे छोटे केंद्रशासित प्रदेश ने भी यह दिखाया कि राजनीति में स्थिरता और केंद्र के साथ तालमेल का कितना महत्व है। एन. रंगासामी की सहज छवि और भाजपा के साथ उनके गठबंधन ने मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया कि विकास के लिए केंद्र और स्थानीय सरकार का एक पटरी पर होना जरूरी है। पुडुचेरी के परिणामों ने यह साबित किया कि छोटे क्षेत्रों में व्यक्तिगत संपर्क और सामाजिक समीकरण ही हार-जीत की रेखा खींचते हैं। यहां का मतदाता प्रशासनिक गतिरोध के बजाय स्थिरता को अधिक महत्व देता है और यही कारण रहा कि गठबंधन की राजनीति ने यहां अपनी सफलता का परचम फहराया।</div><div><br></div><div>पांचों राज्यों के परिणामों को यदि एक व्यापक कैनवास पर रखकर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि भारतीय राजनीति अब ‘परफॉर्मेंस’ के युग में प्रवेश कर चुकी है। अब केवल जातिगत समीकरण बैठाकर या बड़े-बड़े विज्ञापन देकर चुनाव नहीं जीते जा सकते। पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत और असम में उसकी वापसी दर्शाती है कि ‘हिंदुत्व’ और ‘विकास’ का मिश्रण अभी भी भारतीय राजनीति का सबसे शक्तिशाली तत्व है लेकिन तमिलनाडु और केरल के परिणाम यह भी सचेत करते हैं कि क्षेत्रीय आकांक्षाएं और स्थानीय नेतृत्व का महत्व कभी कम नहीं होगा। इन चुनावों ने राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के लिए केरल में संजीवनी का काम किया है तो वहीं भाजपा के लिए दक्षिण में नए मित्र तलाशने की चुनौती पेश की है। कुल मिलाकर, 2026 के इस जनादेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता अब अधिक अपेक्षा-केंद्रित हो गया है। वह केवल यह नहीं देखता कि सरकार ने क्या किया बल्कि यह भी देखता है कि नेतृत्व कितना विश्वसनीय है और भविष्य के लिए उसके पास क्या रोडमैप है। थलपति विजय जैसे नए चेहरों का स्वागत और ममता बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं की हार बताती है कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं है। आने वाले समय में वही दल और नेता प्रासंगिक रहेंगे जो जनता की आकांक्षाओं को समझेंगे और विकास, पहचान एवं सुशासन के बीच एक कुशल संतुलन स्थापित कर सकेंगे।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 07 May 2026 19:43:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mandate-2026-writing-a-new-grammar-of-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[चुनाव परिणामों ने दिखाया नया राजनीतिक ट्रेंड, हिंदू भाजपा के साथ, मुस्लिम कांग्रेस की ओर!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/election-results-reveal-new-political-trend-hindus-with-bjp-muslims-with-congress]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरलम, असम और पुडुचेरी में संपन्न विधानसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस और उसके सहयोगियों के लिए मिला जुला चित्र प्रस्तुत किया है। कुछ राज्यों में पार्टी को निराशा हाथ लगी, जबकि कुछ क्षेत्रों में उसे उल्लेखनीय सफलता भी मिली। इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पक्ष मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन रहा, जिसने कई राज्यों में राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दी है। खास तौर पर असम और केरलम में कांग्रेस तथा उसके सहयोगी दलों के मुस्लिम प्रत्याशियों ने प्रभावशाली जीत दर्ज कर यह संकेत दिया है कि इन इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा अभी भी इस गठबंधन के साथ बना हुआ है।</div><div><br></div><div>केरलम में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा ने दस वर्षों के लंबे अंतराल के बाद सत्ता में वापसी की। राज्य में चुने गए 35 मुस्लिम विधायकों में से 30 संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा से संबंधित हैं। इनमें कांग्रेस के आठ और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के 22 विधायक शामिल हैं। यह परिणाम बताता है कि राज्य में मुस्लिम मतदाताओं ने संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा पर व्यापक भरोसा जताया। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की उम्मीदवार फातिमा तहलिया की जीत विशेष रूप से चर्चा में रही। उन्होंने कोझिकोड जिले की पेराम्ब्रा सीट पर माकपा नेता टीपी रामकृष्णन को पांच हजार से अधिक मतों से हराया। इस जीत के साथ वह पार्टी की पहली मुस्लिम महिला विधायक बन गईं। उनकी सफलता को मुस्लिम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-defeat-of-ruthlessness-the-attack-on-appeasement-and-the-wind-of-development-in-bengal" target="_blank">बंगाल में निर्ममता की हार, तुष्टिकरण पर प्रहार और विकास की बयार</a></h3><div>असम में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन और भी अधिक प्रभावशाली रहा। पार्टी ने राज्य में 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 18 ने जीत दर्ज की। इसके विपरीत कांग्रेस के अधिकांश गैर मुस्लिम उम्मीदवार हार गए और केवल एक गैर मुस्लिम प्रत्याशी को सफलता मिली। कांग्रेस ने कुल 101 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मुस्लिम उम्मीदवारों की सफलता दर अत्यंत ऊंची रही। कांग्रेस के सहयोगी रायजोर दल को भी दो सीटों पर जीत मिली, जिनमें एक मुस्लिम उम्मीदवार की थी, जबकि दूसरी सीट अखिल गोगोई ने जीती। अखिल गोगोई पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा माओवादी गतिविधियों से जुड़े आरोपों की जांच चल रही है।</div><div><br></div><div>असम में कई सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों ने भारी अंतर से जीत दर्ज की। गौरिपुर सीट पर कांग्रेस के अब्दुल सोबहान अली सरकार ने भाजपा समर्थित उम्मीदवार निजानुर रहमान को 19097 मतों से हराया। जलेश्वर सीट पर कांग्रेस के आफताब मोल्ला ने एआईयूडीएफ नेता शेख आलम को 109688 मतों के भारी अंतर से पराजित किया। समागुरी में तंजिल हुसैन ने भाजपा के अनिल सैकिया को 108310 मतों से हराया। इसके अलावा अलगापुर कटलीछड़ा जैसी सीटों पर भी कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत का अंतर एक लाख से अधिक रहा। इन परिणामों ने यह संकेत दिया कि असम के कई क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के पक्ष में मजबूती से एकजुट हुए।</div><div><br></div><div>हालांकि असम में कांग्रेस की इस सफलता के बावजूद एआईयूडीएफ प्रमुख मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने एआईयूडीएफ को खत्म करने की कोशिश की, लेकिन अब स्वयं समाप्त हो गई है। अजमल ने यह भी कहा कि कांग्रेस अब मुस्लिम लीग बन गई है और यह स्थिति उन्हें दुखी करती है। उनका यह बयान असम की राजनीति में मुस्लिम मतों को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है। हम आपको यह भी याद दिला दें कि चुनाव प्रचार के दौरान असम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए उसे “माओवादी मुस्लिम लीग कांग्रेस” करार दिया था। आखिरकार उनकी बात सही साबित हुई।</div><div><br></div><div>वहीं पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को केवल दो सीटों पर जीत मिली, लेकिन दोनों सीटें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से थीं। पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस की तुलना में अधिक मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। वहीं तमिलनाडु में कांग्रेस ने दो मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिनमें से एक को जीत मिली। इन परिणामों से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस ने कई राज्यों में मुस्लिम समुदाय को साधने की रणनीति अपनाई थी और कुछ स्थानों पर उसे इसका लाभ भी मिला।</div><div><br></div><div>मत प्रतिशत के आंकड़े भी इन चुनावों की राजनीतिक दिशा को स्पष्ट करते हैं। असम में भाजपा को 37.81 प्रतिशत मत मिले, जबकि कांग्रेस को 29.84 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। दूसरी ओर केरलम में कांग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को मिलाकर कुल 39.80 प्रतिशत मत मिले। इससे यह स्पष्ट होता है कि केरलम में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ।</div><div><br></div><div>बहरहाल, इन विधानसभा चुनावों ने यह संकेत दिया है कि देश की राजनीति में धार्मिक और सामाजिक आधार पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण और अधिक स्पष्ट होता जा रहा है। एक ओर जहां भाजपा को व्यापक रूप से हिंदू मतदाताओं का समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय का झुकाव फिर से कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। खासकर असम और केरलम में मुस्लिम उम्मीदवारों की उल्लेखनीय सफलता ने कांग्रेस को नई राजनीतिक ऊर्जा दी है। वहीं भाजपा और अन्य दलों द्वारा कांग्रेस पर तुष्टीकरण तथा वोटबैंक की राजनीति के आरोपों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। आने वाले समय में यह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अधिक तीखी हो सकती है, क्योंकि विभिन्न दल अपने अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश में जुटे हुए हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 06 May 2026 14:47:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/election-results-reveal-new-political-trend-hindus-with-bjp-muslims-with-congress</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में अब 'बदला' नहीं 'बदलाव' की राजनीति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/in-west-bengal-it-is-now-the-politics-of-change-not-revenge]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में स्वाधीनता के पश्चात पहली बार है जब भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड और ऐतिहासिक बहुत मिला है। भाजपा ने बंगाल में दो शतक का आंकड़ा पार कर कर एक नई लकीर खींच दी है। पश्चिम बंगाल में भाजपा को जहां साल 2016 में 3 और 2021 में 77 सीटें मिलीं। वहां 4 मई 2026 को घोषित हुए चुनाव परिणाम में भाजपा ने 206 सीटों के साथ नया अध्याय लिख दिया है। अंततः भाजपा के लिए कभी असंभव माने जाने वाले पश्चिम बंगाल में भगवा लहरा गया है। भाजपा ने ममता बनर्जी के अभेद्य किले को भेदकर वहां अपना विजय का परचम लहरा दिया है। बीजेपी की ये जीत कई मायनों में विशेष है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में जिसने भी वहां के जनमानस को देखा, वहां के लोगों के मनोभावों, मुखरता और मौन को देखा। उन्हें ये परिणाम अप्रत्याशित नहीं लगे। क्योंकि 2026 के चुनाव में बंगभूमि में परिवर्तन की लहर सुस्पष्ट दिखाई दे रही थी। हालांकि जिनकी आंखों में वामपंथी, कांग्रेसी और समाजवादी चश्मा लगा था। वो बारंबार ये कह रहे थे कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार नहीं बनेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>लेकिन वो भूल गए कि ये वही बंगाल है जहां पूज्य रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द हुए। संन्यासी क्रांति हुई। महर्षि अरविन्द हुए। बंकिम बाबू ने वंदेमातरम् की राष्ट्रीय चेतना का जयघोष किया। गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रगान लिखा। स्वदेशी और स्व का गौरवबोध जगाया। वो बंगाल जहां संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार क्रांतिकारियों की अनुशीलन समिति से जुड़े और यहीं उनका नाम 'कोकेन' पड़ा। बंगाल जहां नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे क्रांतिवीर हुए। यही वो भूमि है जहां जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे बलिदानी हुए। वो श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए स्वाधीन भारत की नेहरू कैबिनेट से त्यागपत्र दे दिया। "एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान नहीं चलेंगे" — इस उद्घोष के साथ जम्मू-कश्मीर की मुक्ति का पथ प्रशस्त किया। सत्ता का मोह नहीं किया बल्कि भारतभूमि की अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उन्हीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भाजपा ने 2026 में बंगभूमि में नव परिवर्तन का इतिहास रच दिया। ऐसे में पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के गहरे अर्थ हैं। ये कोई सामान्य चुनावी जीत नहीं है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/bengal-vijay-sangh-grassroots-efforts-from-peace-to-power" target="_blank">बंगाल विजयः संघ की जमीनी साधना शांति से शक्ति तक</a></h3><div>ये जीत केवल ममता बनर्जी की दमनकारी सत्ता की हार नहीं है।बल्कि ये जीत संगठित राजनीतिक अपराध, तुष्टिकरण, माफिया और कट मनी के पूरे सिंडिकेट और माड्यूल पर जनता का प्रहार है। ये विजय — 'त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी' की जीत है। बंगाल में भाजपा की ये विजय उन असंख्य बलिदानों की विजय है, जिन्होंने अपना जीवन बंगभूमि के 'स्व' के लिए अर्पित कर दिया।ये जीत हिंदुत्व की है।ये जीत राष्ट्रीयता की जीत है। भाजपा की जीत हिंदू समाज की संगठित शक्ति की जीत है। ये विजय वंदेमातरम् की जागृत चेतना का शंखनाद है। ये जीत इस बात का प्रमाण है कि अन्याय, अत्याचार, हिंसा , रक्तपात, आतंक का अंत सुनिश्चित है। भाजपा की ये जीत श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे उन सैकड़ों बलिदानियों की जीत है जिन्होंने राष्ट्रीयता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। कई पीढ़ियां जिस संकल्प में खप गईं। वो अब साकार हो चुका है। क्योंकि वहां का समाज संगठित हुआ। बच्चा-बच्चा राष्ट्रीय अस्मिता का ध्वजवाहक बना। उसका परिणाम भाजपा की प्रचंड जीत हुई‌।&nbsp;</div><div><br></div><div>लेकिन ये जीत केवल पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की ही कहानी बयां नहीं कर रही है बल्कि नए समीकरणों की ओर संकेत कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जीत के बाद 4 मई 2026 को बीजेपी मुख्यालय नई दिल्ली में अपने संबोधन के दौरान जनादेश के लिए न सिर्फ़ आभार जताया। बल्कि उन्होंने सुस्पष्ट कहा कि— “ ये जीत भारत के लोकतंत्र और संविधान की जीत है। चुनाव में हार-जीत अलग बात है। लेकिन बदला नहीं बल्कि बदलाव की बात होनी चाहिए।भय नहीं भविष्य की बात होनी चाहिए।”</div><br><div>इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों से आह्वान किया कि— “हिंसा के अंतहीन चक्र को हमेशा के लिए ख़त्म करें। बंगाल की सेवा के लिए काम करें।विवाद नहीं विकास, विभाजन नहीं विश्वास चाहिए।'' वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बंगाल के विकास, सुशासन, विकसित भारत के संकल्प को दुहराया। साथ ही ये चेतावनी भी दी कि दोषियों को सज़ा ज़रूर मिलेगी। स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए सत्ता नहीं बल्कि उसकी नीति महत्वपूर्ण है।इसके संकेत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दे दिए हैं। यानी पश्चिम बंगाल में वर्षों के कम्युनिस्ट आतंक, ममता बनर्जी की क्रूरता से त्रस्त जनता अब परिवर्तन की नई दिशा की ओर बढ़ चली है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वैसे बंगाल के आकाश से अंधेरा छटा और कमल खिला लेकिन भाजपा की ये जीत इतनी आसान नहीं थी। भाजपा ने साल 2021 के विधानसभा चुनाव की हार से कई सबक लिए। माइक्रो लेवल से लेकर BROAD PERSPECTIVE में प्लानिंग की।बूथ से लेकर वोटर्स तक डायरेक्ट कनेक्ट किया। स्थानीय मुद्दों और नैरेटिव पर अपनी पकड़ मजबूत की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और मोदी की गारंटी को बीजेपी ने ब्रांड इमेज बनाया। सुशासन की नीति और स्पष्टता ने बीजेपी की चुनावी ज़मीन को बेहद मजबूत कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समवैचारिक संगठनों की वर्षों से राष्ट्रीय अस्मिता को लेकर की जा रही अपील ने लोगों को संगठित किया। इसका ये परिणाम हुआ कि पश्चिम बंगाल का जनमानस जो ममता बनर्जी के क्षेत्रवाद के विभाजनकारी प्रोपेगैंडा का शिकार हो जाता था। बंगाल के उस समाज ने समझा कि उनके आदर्श राष्ट्रीय संस्कृति में निहित हैं‌।उस संस्कृति में निहित हैं जिसके आभूषण बंगाल की भाषा-बोली, पहनावे, खान-पान और परंपराएं हैं।</div><div>जहां कोई विभाजन नहीं है बल्कि सहकार है। समरसता और समन्वय के साथ जीवन का सौंदर्यबोध है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में वर्षों से चली आ रही राजनीतिक हिंसा, सत्ता के संरक्षण में जारी रहे रक्तपात, गुंडागर्दी, दुराचार से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। ऐसे में भाजपा में जनता को अपना हित दिखा।भाजपा की जीत के कुछ महत्वपूर्ण फैक्टर्स की बात करें तो - बीजेपी ने खुद को हिंदुत्व और बंगाली अस्मिता का स्टेक होल्डर और रक्षक बताया। इसके चलते पश्चिम बंगाल में 'हिन्दू पहचान' प्रमुख पहचान बनकर उभरी‌। बंगाल के समाज ने इस बात को प्रमुखता दी कि— “हमारी अलग-अलग जितनी भी पहचाने हैं। उन सबमें सबसे बड़ी पहचान हिन्दू होने की पहचान है। इसी पर आक्रमण हो रहा है।” ऐसे में हिन्दू और हिन्दुत्व के बोध ने बंगाल की अन्तश्चेतना में नया सांस्कृतिक जागरण किया। इसके चलते लोग मुखर हुए।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी , केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, सुवेंदु अधिकारी की आक्रामक शैली को लोगों ने दिल में जगह दी। अमित शाह के —' 5 मई को टीएमसी के गुंडों को उल्टा लटकाकर- सीधा कर दूंगा'— इस बयान को जनता ने हाथों हाथ लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पीपुल कनेक्ट के हर सांकेतिक प्रतीक को लोगों ने अपने से जोड़ा। चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का झालमुड़ी खाने वाला प्रकरण हो। याकि जनसभा के दौरान ख़ुद मोबाइल निकालकर —उसकी वीडियोग्राफी करनी हो। याकि टीएमसी और ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ आक्रामक बयान देना हो। '4 मई दीदी गई' के नारे हों। इन सबने जनता को भाजपा के पक्ष में किया।&nbsp;</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल के कोने-कोने से ऐसे ऐसे दृश्य देखने को मिले जो किसी को भी भावुक कर दें। कहीं चिलचिलाती धूप में माता-पिता के साथ छोटे-छोटे बच्चे नज़र आए। वहीं बुजुर्ग महिलाएं प्रधानमंत्री के फोटो/ पोस्टर बैनर की आरती उतारती और टीका लगाती नज़र आईं। बुजुर्ग महिलाएं — प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो दीवारों में चिपकाती दिखीं। लोग प्रधानमंत्री मोदी को किसी बड़े उद्धारक के तौर पर देख रहे थे। यहीं से पूरी बिसात बीजेपी के पाले में चली गई। अब पश्चिम बंगाल में भाजपा नहीं बल्कि जनता— भाजपा की ओर से चुनावी मैदान में उतरने लगी। ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ लोगों का आक्रोश फूटा।</div><div><br></div><div>महिला सुरक्षा के मुद्दे, आर जी कर मेडिकल कॉलेज, संदेशखाली जैसे मुद्दों को बीजेपी ने चुनाव के केंद्र में ला दिया‌। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह से लेकर हर बीजेपी नेता ने महिला सुरक्षा, हिन्दू हित और डेमोग्राफी बदलाव के मुद्दे को जनता तक ले गए।SIR, केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती ने फर्जी वोटिंग पर लगाम लगाई। भयमुक्त मतदान के चलते भाजपा को सीधा फायदा मिला। वहीं महिलाओं और युवाओं को हर महीने 3 हजार रु देने के वादों ने भी भाजपा को बढ़त दिलाई।&nbsp;</div><div><br></div><div>मुस्लिम तुष्टिकरण के आकंठ तक डूबी ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं के साथ कुठाराघात किया‌ । हिन्दू त्योहारों पर प्रतिबंध, मुस्लिमों को खैरात पर खैरात। हिन्दुओं के ख़िलाफ़ होने वाली सुनियोजित हिंसा पर ममता बनर्जी के मौन ने— वहां के समाज को उद्वेलित किया। पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशियों, रोहिंग्याओं की घुसपैठ को ममता बनर्जी के मौन समर्थन ने ख़ूब तूल दिया। इससे बंगाल के लोगों के मन में भय का वातावरण बना। चहुंओर हिंसा, रक्तपात, गुंडागर्दी, गौ हत्या, गौ-तस्करी, माफियाओं के बढ़ते हौसलों ने ममता के शासन के अंत की पटकथा लिख दी। बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से वहां हिन्दुओं के ख़िलाफ़ हुई सुनियोजित हिंसा और हर समय ममता बनर्जी का मौन रहना। मुस्लिमों की वकील बनकर सामने आना। ये सब पश्चिम बंगाल की जनता ने देखा। वो उससे सीधे प्रभावित हुए। फिर अपना धैर्य बनाए रखा और मतदान के दिन बदला ले लिया।</div><div><br></div><div>बांग्लादेश की सीमा से लगे जिलों की डेमोग्राफी में हुए अप्रत्याशित परिवर्तन ने लोगों को झकझोर कर रख दिया।मुर्शिदाबाद हिंसा के साथ ही मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदुओं के साथ हुई हिंसा में भी ममता का चुप रहना। कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं की बढ़ती अराजकता ने ममता के प्रति लोगों की सहानुभूति ख़त्म कर दी‌। वहीं चुनाव के पूर्व मालदा में सुप्रीम कोर्ट की ओर से SIR के काम में लगे न्यायिक अधिकारियों को 9 घंटे तक बंधक बनाने की घटना ने पूरे देश का अपनी ओर ध्यान खींचा। देर रात को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद सेना ने जब रेस्क्यू किया तब जाकर न्यायिक अधिकारियों की जान बची। इन सारे घटनाक्रमों को पश्चिम बंगाल समेत देश की जनता देख रही थी ‌</div><div><br></div><div>साथ ही जब ममता बनर्जी ने लोगों को खान-पान के नाम पर डराना शुरू किया। ये कहना शुरू किया कि — 'अगर बीजेपी आ गई तो मछली नहीं खाने देगी' और मां-माटी-मानुष के नैरेटिव को चलाया। भाजपा ने इन सभी नैरेटिव को बड़ी ही चतुराई से ममता के ख़िलाफ़ चुनावी हथियार में बदल दिया। आचार संहिता लगने के कई महीनों से देशभर से भाजपा के दिग्गज नेता, कार्यकर्ता, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक ज़मीन पर काम करते दिखे। बूथ-बूथ पर तैनाती और लोगों से सीधे जुड़े। वहीं सुवेंदु अधिकारी को पश्चिम बंगाल बीजेपी के मुख्य चेहरे के तौर पर रखा। सुवेंदु अधिकारी की आक्रामकता और अथक परिश्रम ने ममता बनर्जी के 'बांग्ला' - बंगाली अस्मिता के सियासी टूल को विफल कर दिया।सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के हर स्थानीय नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया। ममता के आख़िरी सहारा— टीएमसी के गुंडों को केंद्रीय सुरक्षा बलों ने नियंत्रित किया। फलस्वरूप लोग घर से बाहर निकले। भयमुक्त होकर व्यापक स्तर पर मतदान किया। हिंदुत्व, मोदी की गारंटी पर आंख मूंदकर भरोसा जताया । परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक 93% मतदान हुआ और बंगाल में कमल खिला। भाजपा की इस प्रचंड और ऐतिहासिक विजय ने एक बार फिर से मोदी मैजिक पर मुहर लगा दी है। यानी मोदी है तो मुमकिन है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ये परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि ये वहां के जनमानस के परिवर्तन का प्रतिबिम्ब है। जो ये बता रहा है कि जनता अब —अस्थिरता , अराजकता, हिंसा नहीं बल्कि स्थिरता, शांति, सुशासन, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राष्ट्रीय अस्मिता को सर्वोपरि बना रही है। राष्ट्रहित सर्वोपरि की यही भावना 'वंदेमातरम्' की शक्ति-चेतना को प्रकट कर रही है। बंगभूमि ने एक बार पुनः सिद्ध किया है की राष्ट्र की जय चेतना का गीत वंदेमातरम् है।</div><div><br></div><div>— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल&nbsp;</div><div>(साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 06 May 2026 10:25:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/in-west-bengal-it-is-now-the-politics-of-change-not-revenge</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[श्यामा बाबू के संकल्प की जीत, विवेकानंद के विचारों की प्रीति: बंगाल में राष्ट्रवाद का नया सूर्योदय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-new-dawn-of-nationalism-in-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बंगाल केवल एक भौगोलिक भूभाग नहीं है, बल्कि यह वह विचार है जिसने आधुनिक भारत की आधारशिला रखी। आज का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित होने वाला है, क्योंकि यह मात्र एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि उस माटी की अपनी जड़ों की ओर वापसी है, जिसने कभी 'वंदे मातरम्' के उद्घोष से पूरे आर्यावर्त को जगाया था। यह जीत उस संकल्प की सिद्धि है जो दशकों से बंगाल की गलियों में मौन था, किंतु मरा नहीं था। आज जब बंगाल में राष्ट्रवाद का भगवा ध्वज लहरा रहा है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि गंगासागर की लहरें डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उन बलिदानों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हैं, जिन्होंने एक विधान, एक प्रधान और एक निशान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। यह उस विचारधारा की विजय है जो मानती है कि राष्ट्र सर्वोपरि है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही भारत की नियति है।</div><div><br></div><div>डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो भारतीय जनसंघ के प्रणेता थे, उनके विचारों की प्रासंगिकता आज बंगाल की इस ऐतिहासिक जीत में साफ झलकती है। उन्होंने उस समय बंगाल के विभाजन के संकट को समझा था और यह सुनिश्चित किया था कि बंगाल का एक हिस्सा भारतीय संस्कृति और अस्मिता के साथ सुरक्षित रहे। आज उनकी आत्मा निश्चित रूप से तृप्त हो रही होगी, क्योंकि जिस बंगाल को वैचारिक शून्यता और तुष्टीकरण की राजनीति ने जकड़ लिया था, उसने अब अपने सबसे प्रतापी पुत्र के सपनों को साकार करने का मार्ग चुन लिया है। यह जीत बताती है कि समय कितना भी क्यों न बदल जाए, सत्य और राष्ट्रवाद की धारा कभी सूखती नहीं है; वह बस सही समय की प्रतीक्षा करती है। बंगाल ने आज यह सिद्ध कर दिया है कि वह अपनी गौरवशाली विरासत को पुनः प्राप्त करने के लिए तत्पर है।</div><div><br></div><div>इस परिवर्तन की गहराई को समझने के लिए हमें स्वामी विवेकानंद के उन संदेशों को स्मरण करना होगा, जिन्होंने विश्व पटल पर भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता को स्थापित किया था। संघ और उससे प्रेरित सभी समवैचारिक संगठनों के लिए विवेकानंद केवल एक पथ-प्रदर्शक नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने कहा था कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।" बंगाल की जनता ने आज उसी मंत्र को आत्मसात किया है। दशकों की राजनीतिक हिंसा, वैचारिक दमन और सांस्कृतिक विस्मृति के बाद, बंगाल की चेतना जागृत हुई है। यह उस 'सिंह-गर्जना' की गूंज है जिसने कभी शिकागो के मंच से दुनिया को हिला दिया था। आज विवेकानंद की उस कर्मठता और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की विजय हुई है, जो समावेशी भी है और अजेय भी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/industry-happiness-is-a-sign-of-bengal-once-again-becoming-a-hub-of-investment-and-jobs" target="_blank">उद्योग जगत की खुशी बंगाल के फिर से निवेश और नौकरियों का केंद्र बनने का संकेत है</a></h3><div>गंगोत्री से गंगासागर तक शुरू हुई यह संकल्प यात्रा अब अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर है। जिस प्रकार गंगा नदी हिमालय की दुर्गम चोटियों को चीरते हुए मैदानों को सींचती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में जाकर सागर से एकाकार हो जाती है, उसी प्रकार राष्ट्रवाद की यह लहर उत्तर से दक्षिण और पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए आज बंगाल के हृदय में समा गई है। यह यात्रा केवल सत्ता के परिवर्तन की नहीं, बल्कि व्यवस्था के परिवर्तन और विचारों के शुद्धिकरण की यात्रा है। 'वंदे मातरम्' के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जिस भारत माता की कल्पना की थी, वह सुजलाम-सुफलाम होने के साथ-साथ शक्तिस्वरूपा भी थी। आज बंगाल ने उसी शक्ति की आराधना की है और दिखा दिया है कि माँ भारती के सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।</div><div><br></div><div>बंगाल के इस ऐतिहासिक जनादेश के पीछे उन अनगिनत कार्यकर्ताओं का लहू और पसीना है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रवाद का दीप जलाए रखा। यह उन बलिदानियों को नमन करने का दिन है जिन्होंने अपनी आँखों में 'सोनार बांग्ला' का सपना संजोया था—एक ऐसा बंगाल जो सांप्रदायिकता से मुक्त हो, जहाँ विकास की धारा अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और जहाँ दुर्गा पूजा का शंखनाद बिना किसी भय के सुनाई दे। आज की यह जीत बंगाल की उस महान परंपरा का सम्मान है जिसमें चैतन्य महाप्रभु की भक्ति, सुभाष चंद्र बोस का शौर्य और रवींद्रनाथ टैगोर की लेखनी का प्रभाव समाहित है। यह जीत घोषणा करती है कि बंगाल अब केवल पीछे मुड़कर नहीं देखेगा, बल्कि नए भारत के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएगा।</div><div><br></div><div>यह ऐतिहासिक दिन इस विश्वास को सुदृढ़ करता है कि विचारधारा की जड़ें यदि सत्य में हों, तो उसे कोई भी दमनकारी शक्ति मिटा नहीं सकती। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' और स्वामी विवेकानंद के 'मानव निर्माण' के संकल्प ने आज बंगाल की भूमि पर एक नए युग का सूत्रपात किया है। यह जीत केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान है। आज बंगाल मुस्कुरा रहा है, क्योंकि उसने अपनी पहचान को पुनः प्राप्त कर लिया है। 'वंदे मातरम्' का स्वर आज बंगाल के आकाश में पहले से कहीं अधिक तीव्र और स्पष्ट सुनाई दे रहा है, जो पूरे भारत को यह संदेश दे रहा है कि राष्ट्रवाद की विजय ही शाश्वत विजय है।</div><div><br></div><div>- भारत भूषण अरजरिया</div><div>(मीडियाध्यक्ष दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 05 May 2026 15:08:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-new-dawn-of-nationalism-in-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Suvendu Adhikari को Giant Killer और भूमिपुत्र के रूप में देखती है जनता, Bengal में BJP को अपने पैरों पर खड़ा करके दिखा दिया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/suvendu-adhikari-political-profile-family-details-and-net-worth]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर एग्जिट पोल्स के अनुमानों ने राज्य की राजनीति को अत्यंत रोचक बना दिया है। विभिन्न सर्वेक्षणों में यह संकेत मिल रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी को इस बार प्रचंड बहुमत प्राप्त हो सकता है। इस राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी हैं, जिनकी भूमिका इस चुनाव में निर्णायक मानी जा रही है। भवानीपुर और नंदीग्राम जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर उनकी उपस्थिति ने चुनाव को अत्यधिक हाई प्रोफाइल बना दिया है।</div><div><br></div><div>शुभेंदु अधिकारी का नाम पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक प्रभावशाली और जमीनी नेता के रूप में स्थापित हो चुका है। उनका जन्म 15 दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले के करकुली में हुआ था। वह वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सिसिर कुमार अधिकारी के पुत्र हैं। बचपन से ही राजनीतिक माहौल में पले बढ़े शुभेंदु ने ग्रामीण राजनीति की बारीकियों को नजदीक से समझा, जिससे उनकी छवि एक भूमिपुत्र नेता के रूप में मजबूत हुई।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bjp-tmc-both-claim-victory-on-supreme-court-counting-order" target="_blank">Bengal Vote Counting पर Supreme Court का निर्देश, TMC-BJP दोनों ने ठोका अपनी-अपनी जीत का दावा</a></h3><div>उनकी शिक्षा भी उनके व्यक्तित्व को संतुलित बनाती है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कांथी हाई स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने प्रभात कुमार कॉलेज से कला स्नातक की डिग्री प्राप्त की और फिर कोलकाता स्थित रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से कला में परास्नातक किया। साथ ही उन्होंने नेताजी सुभाष मुक्त विश्वविद्यालय से भी अध्ययन किया।</div><div><br></div><div>राजनीतिक जीवन की शुरुआत उन्होंने 1995 में कांग्रेस के साथ की, जब वह कांथी नगरपालिका के पार्षद चुने गए। वर्ष 2006 में वह पहली बार विधानसभा पहुंचे। लेकिन उनकी असली पहचान नंदीग्राम आंदोलन के दौरान बनी, जब उन्होंने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया। इस आंदोलन ने राज्य की राजनीति को बदल दिया और ममता बनर्जी के सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त किया। बाद में वह तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकार बने और तमलुक से दो बार सांसद भी चुने गए। वर्ष 2016 से 2020 तक उन्होंने राज्य सरकार में परिवहन, सिंचाई और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले।</div><div><br></div><div>दिसंबर 2020 में उन्होंने वैचारिक मतभेदों का हवाला देते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट से ममता बनर्जी को 1956 मतों से हराकर इतिहास रच दिया। इसके बाद उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया और वह भाजपा का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। 2026 के चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम के साथ-साथ भवानीपुर सीट से भी चुनाव लडा, जहां उनका सीधा मुकाबला ममता बनर्जी से है। एग्जिट पोल के अनुसार वह भवानीपुर में भी जीत दर्ज कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है और भाजपा को बहुमत मिलता है, तो शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>शुभेंदु अधिकारी की आर्थिक स्थिति भी अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण है। 2026 के चुनावी हलफनामे के अनुसार उनकी कुल संपत्ति लगभग 85.87 लाख रुपये है। इसमें चल संपत्ति लगभग 20.72 लाख रुपये और अचल संपत्ति लगभग 65.15 लाख रुपये है। उनकी आय का मुख्य स्रोत पारिवारिक संपत्ति है और उन पर कोई देनदारी नहीं है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक प्रभाव विशेष रूप से जंगलमहल और मेदिनीपुर क्षेत्र में बेहद मजबूत है। इन क्षेत्रों में उनकी संगठन क्षमता और जनसमर्थन भाजपा के लिए महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। वह लगातार दक्षिण बंगाल में पार्टी को मजबूत करने और विधानसभा में सक्रिय विपक्ष की भूमिका निभाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। उनका पारिवारिक प्रभाव भी राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। उनके पिता सिसिर कुमार अधिकारी, भाई दिव्येंदु अधिकारी और सौमेंदु अधिकारी सभी भाजपा से जुड़ चुके हैं। इस प्रकार अधिकारी परिवार ने एकजुट होकर पूर्व मेदिनीपुर में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर, शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर एक साधारण पार्षद से लेकर संभावित मुख्यमंत्री तक का है। 2026 का चुनाव उनके कॅरियर का सबसे महत्वपूर्ण चरण साबित हो सकता है। यदि एग्जिट पोल के अनुमान सही साबित होते हैं, तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू होगा, जिसमें शुभेंदु अधिकारी केंद्र में होंगे।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 02 May 2026 18:37:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/suvendu-adhikari-political-profile-family-details-and-net-worth</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की सियासी कमर तोड़कर निरंतर आगे बढ़ रही है भाजपा, मजबूत हो रहा एनडीए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/bjp-continues-to-forge-ahead-by-breaking-the-political-backbone-of-its-rivals]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय जनता पार्टी अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की सियासी कमर तोड़कर निरंतर आगे बढ़ रही है। इससे भाजपा नीत एनडीए का कुनबा भी लगतार मजबूत हो रहा है। देश के मतदाता भी जातीय और भाषाई प्रतिद्वंद्विता से ऊपर उठकर धुर मुस्लिम तुष्टिकरण की चुनावी राजनीति की बखिया उघेड़ रहे हैं, जबकि फ्रीबिज की घोषणाओं पर अब भी मतदाता फिदा हैं। 29 अप्रैल को देश के पांच राज्यों—पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी—के विधानसभा चुनावों के जो एग्जिट पोल आए, उससे भी इसी बात के संकेत मिल रहे हैं। इससे भाजपा और उसके एनडीए साथियों की बल्ले बल्ले है।</div><div><br></div><div>वैसे तो अंतिम परिणाम 4 मई को ही आएंगे, लेकिन अब मीडिया की सजगता से अधिकांश एग्जिट पोल के औसत&nbsp; सत्य के निकट होते हैं।लिहाजा यदि एग्जिट पोल सही होते हैं तो इससे जो बड़ा राजनीतिक निष्कर्ष निकलकर सामने आया है, वह यह है कि देश की राजनीति में भाजपा के बेहतर प्रदर्शनों के बावजूद क्षेत्रीय दल अभी भी मजबूत स्थिति में हैं, क्योंकि देश पर 12 वर्षों से शासन कर रही भाजपा, बहुतेरे प्रशासनिक मामलों में कांग्रेस और समाजवादियों की राजनीतिक नकल करके और जरूरत के मुताबिक हिंदुत्व के चोलों को उतार फेंककर उन राज्यों में भी अव्वल प्रदर्शन करती दिखाई दे रही है, जहां अल्पसंख्यक मुस्लिम और ईसाई वोट अबतक निर्णायक रहते आये हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-country-politics-will-change-after-may-4" target="_blank">4 मई के बाद बदल जाएगी देश की राजनीति</a></h3><div>ऐसा उलटफेर करके भाजपा/एनडीए कई राज्यों में अपनी पकड़ बढ़ाते दिख रहे हैं। खासकर उत्तरपूर्वी, दक्षिणी और जम्मूकश्मीर जैसे राज्यों में, जो उसकी बड़ी सफलता है। इससे आम चुनाव 2029 में भी उसे राजनीतिक फायदा मिलेगा, क्योंकि भाजपा समेत एनडीए को इससे नई सोच और नई ऊर्जा मिलेगी। जबकि इंडिया गठबंधन की आपसी रस्साकशी उन्हें 2024 की आंशिक सफलता के बाद निरंतर कमजोर करते हुए रसातल की ओर ले जा रही है। इससे कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गांधी को राजनीतिक सबक लेनी होगी, क्योंकि वर्ष 2027 और 2028 में भी दर्जनाधिक राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।</div><div><br></div><div>यदि राजनीतिक बारीकीपूर्वक इन एग्जिट पोल्स से संकेतों को पढ़ा जाए तो स्पष्ट दिखाई दे रहा हैं कि उत्तर भारत, पश्चिम भारत, मध्य भारत, पूर्वी भारत में मजबूत सियासी पैठ बना चुकी भाजपा अब उत्तर-पूर्व समेत पूर्वी भारत में अपना विस्तार बनाए हुए है। जबकि दक्षिण भारत में भी अपने विरोधियों को राजनीतिक रूप से तोड़ने में वह सफल हो चुकी है। तमिलनाडु में डीएमके और केरल में एलडीएफ का कमजोर होकर सत्ता गंवाने की ओर बढ़ना यह सियासी चुगली कर रहा है कि जल्द ही भाजपा दक्षिण भारत में भी उसी तरह का करिश्मा करेगी, जैसा कि उसने उत्तर-पूर्व के असम और त्रिपुरा में किया है, जबकि पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल में करने जा रही है। इसी प्रकार तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना आदि उसकी पकड़ में जल्द आएंगे। वहीं कर्नाटक में तो वह मजबूत है ही और आंध्रप्रदेश में एनडीए की सरकार है।</div><div><br></div><div>यह बात दीगर है कि अपने सियासी गर्दिश के दिनों में भी कांग्रेस दक्षिण भारत, खासकर केरल में पुनर्जीवन के संकेत दे रही है। ऐसा पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर के पुनः कांग्रेस के खेमे में सटने से हुआ। वहीं, क्षेत्रीय दल—डीएमके, टीएमसी आदि—अब भी अपने-अपने राज्यों में थोड़ा कमजोर होने के बावजूद निर्णायक बने हुए दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा, 2029 लोकसभा चुनाव की दिशा में ये चुनाव “राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय राजनीति” की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं। दक्षिण भारत में भाजपा अभी भी पूर्ण प्रभुत्व से दूर दिख रही है, जबकि बंगाल उसका सबसे बड़ा विस्तार क्षेत्र बना हुआ है। पुड्डुचेरी में भी एनडीए मजबूत हुआ है।</div><div><br></div><div>चूंकि 2027 और 2028 में भी कई महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिन पर इन पांच राज्यों के चुनावी फलाफल का असर पड़ेगा। 2027 में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, उनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात जैसे अहम राज्य शामिल हैं। वहीं, 2028 में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, उनमें कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम जैसे महत्वपूर्ण राज्य शामिल हैं। चूंकि इन चुनावों की अंतिम तिथियाँ भारत निर्वाचन आयोग की अधिसूचना के अनुसार तय होंगी, इसलिए कार्यक्रम में बदलाव संभव है।</div><div><br></div><div>इसलिए मौजूदा चुनावी एग्जिट पोल के कतिपय मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, असम में भाजपा मजबूत हुई है, क्योंकि एग्जिट पोल भाजपा-एनडीए को लगातार तीसरी बार स्पष्ट बहुमत देते दिख रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि हिमंता विश्व सरमा (Himanta Biswa Sarma) की नेतृत्व शैली और भाजपा का पूर्वोत्तर मॉडल अभी भी प्रभावी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, भाजपा की रणनीति से पुडुचेरी में भी एनडीए को फायदा होता हुआ नजर आ रहा है, क्योंकि एग्जिट पोल एनडीए की वापसी दिखा रहे हैं। यहां भाजपा ने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर अपना आधार मजबूत किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा,&nbsp; पश्चिम बंगाल में टीएमसी और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर के बीच भाजपा को बढ़त मिलने के स्पष्ट आसार नजर आ रहे हैं। क्योंकि अधिकांश एग्जिट पोल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच बेहद करीबी मुकाबला दिखाया गया है। वहीं कुछ सर्वे यानी 5 में से 4 भाजपा को सीधी बढ़त दे रहे हैं, जबकि कुछ ममता बनर्जी की वापसी बता रहे हैं। इसका मतलब है कि बंगाल में सत्ता विरोधी लहर और ध्रुवीकरण दोनों साथ-साथ काम कर रहे हैं। चूंकि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत लाखों वोटरों के नाम हटाने को लेकर विवाद है, जिसे भाजपा ने बोगस वोट हटाने के रुप में सही ठहराया है, जबकि टीएमसी ने इसे अपने वोटरों को हटाने की साज़िश बताया है। रुझानों के मुताबिक, महिलाओं ने ममता बनर्जी पर पुनः भरोसा जताया है,जो टीएमसी की बड़ी ताकत है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चौथा, तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति कायम, लेकिन नया मोड़ आने के आसार, क्योंकि टीवीके मजबूती से उभरी है और राज्य की सत्ता पाने के करीब पहली बार में ही पहुंच चुकी है। भले ही अधिकांश सर्वे डीएमके गठबंधन की वापसी का संकेत दे रहे हैं, लेकिन अभिनेता विजय (Vijay) की पार्टी टीवीके (TVK) को बड़ी ताकत के रूप में उभरता दिखाया गया है। इसका मतलब है कि एआईडीएमके (AIDMK) का सहयोग टीवीके (TVK) को तमिल राजनीति में मिला तो एक नया राजनीतिक ध्रुव भी बन सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां, केरल में कांग्रेस गठबंधन की वापसी से इंडिया गठबंधन को कुछ राहत मिल सकती है। चूंकि लगभग सभी एग्जिट पोल कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ को बढ़त दे रहे हैं। इसलिए यह संकेत मिलता है कि वाम मोर्चे की लगातार दो कार्यकाल वाली सरकार के खिलाफ सत्ता परिवर्तन की भावना बनी है। इससे कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ को फायदा मिला, जो कांग्रेस के राजनेता शशि थरूर की बड़ी उपलब्धि है।</div><div><br></div><div>यदि समग्र राजनीतिक निष्कर्ष निकाला जाए तो भाजपा उत्तर-पूर्व और पूर्वी भारत में विस्तार बनाए हुए है। कांग्रेस दक्षिण भारत, खासकर केरल में पुनर्जीवन के संकेत दे रही है। क्षेत्रीय दल—डीएमके, टीएमसी आदि—अब भी अपने राज्यों में निर्णायक हैं। 2029 लोकसभा चुनाव की दिशा में ये चुनाव “राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय राजनीति” की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं। दक्षिण भारत में भाजपा अभी भी पूर्ण प्रभुत्व से दूर दिख रही है, जबकि बंगाल उसका सबसे बड़ा विस्तार क्षेत्र बना हुआ है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 12:50:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/bjp-continues-to-forge-ahead-by-breaking-the-political-backbone-of-its-rivals</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[प्रदेश के विकास का एक्सप्रेस वे बनेगा गंगा एक्सप्रेस वे ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-ganga-expressway-will-become-the-expressway-of-the-state-development]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश में अवस्थापना विकास के क्रम में निर्मित गंगा एक्सप्रेस वे आम जनमानस के लिए खुल रहा है जिसे प्रदेश के विकास में मील का पत्थर माना जा रहा है। 594 किलोमीटर लंबा गंगा एक्सप्रेस वे प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र (दिल्ली-एनसीआर) को पूर्वी क्षेत्र से जोड़ने वाला पहला सीधा हाई स्पीड एक्सप्रेस वे है। इस परियोजना पर 36,230 करोड़ की लागत आर्इ है। यह एक्सप्रेस वे मेरठ के बिजौली गाँव से प्रारंभ होकर बुलंदशहर, हापुड़, अमरोहा, शाहजहांपुर, संभल, बंदायू, उन्नाव, हरदोई, प्रतापगढ़, रायबरेली होते हुए प्रयागराज जिले के जुडापुर दांदू गांव तक जाएगा। इस एक्सप्रेस वे के प्रारंभ हो जाने के बाद देश के एक्सप्रेस वे नेटवर्क में यूपी की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत हो जाएगी और परियोजनाओं की कुल लंबाई 1910 किमी हो जाएगी। छह लेन का यह एक्सप्रेस वे पूरी तरह ग्रीनफील्ड व एक्सेस-कंट्रोल्ड है। इसमें 3.75 मीटर चौड़ी सर्विस रोड, 17 टोल प्लाजा 8 मुख्य पुल और 381 अंडरपास शामिल हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह भारत का पहला ऐसा एक्सप्रेस है जिस पर होटल, ढाबा और ईवी चार्जिंग स्टेशन से लेकर अस्पताल तक बनाए गए हैं। इस एक्सप्रेस वे पर विश्वस्तरीय फूड चेन और मोटेल तक की सुविधाएं मिलेगी। 594 किमी लंबे इस एक्सप्रेस वे का 80 प्रतिशत निर्माण अडानी इंटरप्राइजेज ने किया है। अडानी ने प्रयागराज से बदायूं तक 464 किमी लंबा एक्सप्रेस वे बनाया है जबकि शेष 20 प्रतिशत आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर ने बनाया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/ganga-expressway-to-travel-from-meerut-to-prayagraj-in-6-7-hours-new-lifeline-for-development-in-up" target="_blank">Ganga Expressway का रूट क्या है? टोल कितना लगेगा? UP में विकास की नई लाइफलाइन शुरू होने से क्या बड़े फायदे होंगे</a></h3><div>एक्सप्रेस वे मतल्टीनेशनल चेन भी उपलब्ध- एक्सप्रेस वे पर लखनऊ के खानपान और चिकनकारी की झलक दिखाई पड़ेगी। इस वे पर एक बड़ा डाइनिंग फूड एरिया विकसित किया गया है। पहली बार किसी एक्सप्रेस वे पर ट्रक लेन बनाया गया है। मोटेल भी तैयार हो गया है जहां विश्राम के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त कमरे उपलब्ध हैं। स्टारबक्स जैसे बड़े ब्रांड के साथ गंगा भोग ढाबा भी है। इसमें लोकप्रिय मुरथल ढाबे को लाने का भी प्रयास चल रहा है। यहां पर एक ट्रामा सेन्टर भी तैयार किया गया है। एक्सप्रेस वे पर सुविधा केंद्रों में बच्चों के लिए चिल्ड्रन प्ले एरिया भी बनाया गया है जहां बच्चों के खेलने के लिए झूला पार्क भी बनाया गया है।ड्राइवरों के लिए भी अलग-अलग विश्राम एरिया बनाया गया है। हर क्षेत्र में वाहनों के लिए सर्विस सेंटर बनाया गया है। यह एक्सप्रेस वे 12 जिलों को जोड़ते हुए प्रयागराज से मेरठ की दूरी मात्र 6 घंटे में समेट देगा। वाहनों की 120 किमी प्रति घंटा गति, एयर स्ट्रिप, हाईटेक टेाल और दुर्घटना रोकने वाली अलर्ट स्ट्रिप्स जैसी आधुनिक सुविधाओं से लैस यह एक्सप्रेस वे प्रदेश की कनेक्टिविटी के परिदृश्य को बदलकर रख देगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>वायुसेना के लिए भी अहम बनेगा एक्सप्रेस वे- यह एक्सप्रेस वे&nbsp; नागरिकों का सफर आसान बनाने के साथ ही भारतीय वायुसेना की ताकत भी बनने वाला है। एक्सप्रेस वे पर शाहजहांपुर के जलालाबाद में 3.5 किमी&nbsp; की हवाई पट्टी का भी निर्माण किया गया है। आपातकालीन स्थिति व युद्ध होने पर रणनीतिक तौर पर यह हवाई पट्टी लड़ाकू विमानों के उतरने व उड़ान भरने के लिए भी इस्तेमाल की जा सकेगी। इस हवाई पट्टी का निर्माण सभी प्रकार के लड़ाकू व परिवहन विमानों के हिसाब से किया गया है। इस पर राफेल सुखोई-0 एमकेआई मिराज 2000 जगुआर और मिग 29 जैसे लडाकू और सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस और एएन -32 जैसे वायुसेना के विमान उतरने के साथ-साथ उड़ान भी भर सकेंगे। इस पर रात में भी लड़ाकू विमानो के उतरने और उड़ान भरने की सुविधा होगी। इसके लिए एक्सप्रेस वे पर प्रीसिज़न अप्रोच लाइंटिंग&nbsp; सिस्टम व उन्नत नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। साथ ही इाई इंटेसिटी रनवे लाइटिंग का उपयोग किया गया है। हवाई पट्टी की सुरक्षा के लिए 250 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। जो किसी भी आपातकालीन स्थिति पर नज़र रखने के लिए सहायक हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>इस एक्सप्रेस वे का संचालन पूरी तरह आरम्भ हो जाने के बाद 12 जिलों के औद्योगिक विकास को गति मिलेगी जिससे क्षेत्र के युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे तथा पलायन कम होगा। प्रदेश सरकार की योजना इसके किनारे 27 औद्योगिक क्लस्टर बनाने की है जिसके लिए भूमि का अधिग्रहण हो चुका है और आवंटन चल रहा है। इससे रसद आपूर्ति, खाद्य प्रसंस्करण वस्त्र उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र को नई ऊर्जा मिलेगी। मेरठ के खेल उद्योग, हापुड़ के हथकरघा, बंदायू के जरी जरदोजी और प्रयागराज के कृषि उत्पादों को अब दिल्ली और पूर्वांचल के बाजारो तक पहुंचना आसान होगा।</div><div><br></div><div>प्रमुख विशेषताएं- इस एक्सप्रेस वे की पूरी सड़क पर जल संचयन प्रणाली लगाई गई है ताकि वर्षा का जल सीधे जमीन के अंदर जाए और भूजल स्तर पर बना रहे। यह भारत का सबसे लंबा निरंतर नियंत्रित प्रवेश एक्सप्रेस वे है जहां आवारा पशुओं व स्थानीय यातायत के अनियंत्रित प्रवेश को पूरी तरह से रोका गया है। यह परियोजना टिकाऊ इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसके निर्माण में भारी मात्रा में कोयले की राख का उपयोग किया गया है जो प्रदूषणा कम करने में सहायक है। पहले सभ्यताएं नदियों के किनारे बसती थीं किंतु अब एक्सप्रेस वे के किनारे होती हैं इसे ध्यान मे रखते हुए एक्सप्रेस वे किनारे 18 लाख से अधिक पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है। गंगा एक्सप्रेस वे के निर्माण की गुणवत्ता को एक्सीलेंट रेटिंग मिली है।&nbsp;</div><div><br></div><div>विशिष्ट सुरक्षा तकनीक भी- यहां पर विशिष्ट सुरक्षा तकनीक का प्रयोग किया गया है। सड़क के दोनों किनारों पर व्हाइट एलर्ट स्ट्रिप लगाई गई है। यदि किसी चालक को झपकी आ जाए और वाहन इन स्ट्रिप पर चढ़ जाए तो तेज कंपन और आवाज पैदा होगी जिससे चालक तुरंत सतर्क हो जाएगा और दुर्घटना टल जाएगी। इस सड़क पर चलने के दौरान झटके और कंपन महसूस नही होंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>मंदिर आर्थिकी व पर्यटन को गति मिलेगी- गंगा एक्सप्रेस वे का निर्माण हो जाने के बाद अब मंदिर आधारित आर्थिकी व पर्यटन को भी गति मिलेगी। यह एक्सप्रेस वे यात्रा को ही आसान नहीं करेगा अपितु प्रदेश में आध्यात्मिक व धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा देगा। 12 जिलों से होकर गुजरने वाले इस एक्सप्रेस वे से प्रमुख आध्यात्मिक व धार्मिक स्थल जुड़ रहे हैं– इनमें गढ़मुक्तेश्वर, कल्कि धाम, बेल्हा देवी धाम, चंद्रिकादेवी शक्ति पीठ और त्रिवेणी संगम शामिल हैं। एक्सप्रेस वे शुरू हो जाने के बाद श्रद्धालु इन तीर्थों के दर्शन आसानी से कर सकेंगे। आगामी समय में वाराणसी, मिर्जापुर और सोनभद्र तक इसका विस्तार किया जिससे वाराणसी, विन्ध्याचल और अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि होगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 18:43:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-ganga-expressway-will-become-the-expressway-of-the-state-development</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के “नया चेहरा और नया नारा” से पश्चिम बंगाल में चल गई भाजपा की लहर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/samrat-choudhary-new-face-and-new-slogan-a-bjp-wave-has-swept-across-west-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार में नए मुख्यमंत्री पद पर सम्राट चौधरी के चयन ने भाजपा को एक “नया चेहरा और नया नारा” दिया है, जिसे पार्टी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में केंद्र में लेकर चल रही है। इसी वजह से बिहार के नए प्रमुख चेहरे के इस चयन से बंगाल में भी भाजपा की “लहर की बात” तेज़ी से चलने लगी है। चूंकि बिहार में सम्राट चौधरी का महत्व निर्द्वन्द है, इसलिए पश्चिम बंगाल के लोगों में भाजपा के प्रति विश्वास और गहरा हुआ। उल्लेखनीय है कि बिहार में नीतीश कुमार के बाद भाजपा ने पहली बार अपने प्रत्यक्ष नेता को मुख्यमंत्री बनाकर संकेत दिया है कि पार्टी अब “एनडीए के नेतृत्व” को भी भाजपा के नाम से बेचेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>बता दें कि तारापुर की सियासत को लोककल्याण कारी दिशा देने वाले पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शकुनि चौधरी के यशस्वी पुत्र सम्राट चौधरी कुशवाहा (कोईरी/ओबीसी) समाज से हैं; लेकिन सवर्णों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। तारापुर से परवत्ता के लोग इसकी गवाही देते हैं। इससे भाजपा ने बिहार के लव कुश (कुर्मी–कुशवाहा) समीकरण को अपने पक्ष में खींचने की कोशिश की है, जो राज्य की 50–60 सीटों पर असर डालता माना जाता है। साथ ही पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की तरह कोई भी बड़ा सवर्ण नेता व्यक्तिगत रूप से इनका विरोधी नहीं हो सकता है। इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की पूर्वी भारत की राजनीति को असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्वशर्मा से भी बड़ा चेहरा बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के रूप में मिल गया है, जिन्हें दिल्ली में भाजपा की लहर चलवाने और यूपी में भाजपा को मजबूत बनवाने के नजरिए से आगे बढ़ाया गया है। इसके पीछे बिहार के नौकरशाही की फीडबैक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि उनकी राजनीतिक छवि बेदाग है, इस मीडिया और राजनीतिक प्रायोजित मामलों को छोड़ दिया जाए तो।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bihar-politics-samrat-choudhary-wins-the-floor-test-with-a-decisive-response-to-tejashwi-yadav" target="_blank">Bihar Politics: Floor Test में सम्राट चौधरी की बड़ी जीत, तेजस्वी को दिया करारा जवाब</a></h3><h2># समझिए, पश्चिम बंगाल में कैसे बनी “लहर”</h2><div><br></div><div>सम्राट चौधरी अपने उपमुख्यमंत्री पद के बाद पश्चिम बंगाल में भी भाजपा के प्रमुख प्रचारक के रूप में सक्रिय हुए हैं; उन्होंने बंगाल के चुनावी दौर में बार बार दावा किया है कि बंगाल में लोग “बदलाव” के लिए तैयार हैं और भाजपा की सरकार बनेगी। चौधरी ने बर्बरता, घुसपैठ, रोज़गार और “सोनार बंगाल” की वापसी जैसे मुद्दे उठाकर बिहार मॉडल के नाम पर एक नयी राजनीतिक कहानी बंगाल में बेचनी शुरू की है; इससे भाजपा को एक नया नारा और एक नया चेहरा मिल गया है, जिसे मीडिया व जनता ने “लहर” की तरह पेश किया है।&nbsp;</div><div><br></div><h2># खास रणनीतिक तालमेल: बिहार और बंगाल के बीच का</h2><div><br></div><div>बिहार में ओबीसी केंद्रित और सवर्ण, दलित, अल्पसंख्यक समर्थित मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के उभार के बाद भाजपा तर्क दे रही है कि अब यह गैर संस्कृतिक (संयुक्त तरह के राष्ट्रवादी ओबीसी) चेहरा बंगाल में भी विपक्षी भावनाओं को एकजुट कर सकता है। दोनों राज्यों में भाजपा एक ही नारा बेच रही है: “पुरानी सत्ता संरचना का अंत और नई नेतृत्व पीढ़ी की शुरुआत”; इसी जोड़ को देखते हुए बिहार में सम्राट के चयन को पश्चिम बंगाल में भाजपा की “लहर” का तर्क प्रतीक माना जा रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><h2># पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में सम्राट चौधरी भाजपा के एक प्रमुख स्टार प्रचारक के रूप में उभरे</h2><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में सम्राट चौधरी भाजपा के एक प्रमुख स्टार प्रचारक और “मिशन बंगाल” के आगे बढ़े चेहरे के रूप में उभर रहे हैं। उनकी भूमिका मुख्यतः तीन तरह की है: नारा निर्माता, बिहारी बंगाल जुड़ाव बनाने वाला चेहरा, और ममता सरकार की आलोचना के लिए उग्र आवाज़। उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में जिम्मेदारी मिली, क्योंकि भाजपा ने पश्चिम बंगाल के लिए 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की है, जिसमें बिहार से सम्राट चौधरी को विशेष प्राथमिकता दी गई है; वे बिहार के उन चुनिंदा नेताओं में हैं जिन्हें बंगाल में बड़ा चुनावी जिम्मा सौंपा गया है। उन्हें बंगाल के कई चरणों में रैलियों और चुनावी सभाओं के लिए तैयार किया गया है, खासकर 23 व 29 अप्रैल के चरणों में जहां भाजपा जीत सुनिश्चित करने की तैयारी कर रही है।&nbsp;</div><div><br></div><h2># बिहार–बंगाल कनेक्शन को भुनाना</h2><div><br></div><div>बिहार के उपमुख्यमंत्री होने के नाते चौधरी बिहार मूल के मतदाताओं (खासकर हावड़ा और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले मजदूर, व्यापारी, कामगार) को निशाना बना रहे हैं, जहां बिहारी समुदाय की संख्या अधिक मानी जाती है।&nbsp; वे बिहार में “नौकरी वाला मॉडल” (लगभग 50 लाख लोगों को नौकरी/रोज़गार के अवसर) का उदाहरण देकर यह वादा कर रहे हैं कि बंगाल में भी वही तरह का रोज़गार आधारित विकास “सोनार बंगाल” के नाम से लाया जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2># नारा और विचारधारा संबंधी भूमिका</h2><div><br></div><div>सम्राट चौधरी ने घुसपैठ, NRC, बंगाली अस्मिता और “हिंदू उत्पीड़न” जैसे मुद्दों पर खुले आरोप लगाए हैं और कहा है कि भाजपा सत्ता में आकर घुसपैठियों को बाहर करेगी और बंगाली पहचान को फिर से स्थापित करेगी। वे ममता बनर्जी सरकार को “अराजक, हिन्दू विरोधी और घुसपैठियों की हिमायती” कहकर जनता में बदलाव की भावना जगाने की कोशिश कर रहे हैं, और बार बार दावा कर रहे हैं कि इस बार बंगाल में भाजपा की ही सरकार बनेगी। संक्षेप में "कहें तो, सम्राट चौधरी पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए “बिहार मॉडल व बदलाव की आवाज़” बनकर आगे बढ़ रहे हैं, जिससे पार्टी को गैर बंगाली (खासकर बिहारी) मतदाताओं से जुड़ने और राष्ट्रवाद घुसपैठ रोज़गार के मुद्दे पर एकीकृत नारा बेचने में मदद मिल रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 15:22:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/samrat-choudhary-new-face-and-new-slogan-a-bjp-wave-has-swept-across-west-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[India-New Zealand FTA ने खोले बड़ी संख्या में नौकरी और निवेश के रास्ते, छोटे-बड़े उद्योगों को भी होगा भरपूर लाभ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/india-new-zealand-fta-opens-up-avenues-for-large-number-of-jobs-and-investment]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत और न्यूजीलैंड के बीच लंबे समय से प्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौता आखिरकार आज नई दिल्ली में हस्ताक्षरित हो गया, जिसे दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। इस समझौते पर भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के व्यापार मंत्री टॉड मकले की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए गए। इस अवसर पर न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने इसे एक पीढ़ी में एक बार होने वाला महत्वपूर्ण समझौता बताया, जो वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार, निवेश प्रवाह और श्रम गतिशीलता के लिए नए रास्ते खोलेगा।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निवेश, तकनीकी सहयोग और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा देगा। भारत सरकार ने इस अवसर को वैश्विक व्यापार के नए द्वार के रूप में प्रस्तुत किया है। पीयूष गोयल ने कहा कि भारत में व्यापार करना आसान बनाया जा रहा है, नियमों को सरल किया जा रहा है और निवेश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जा रहा है ताकि विदेशी कंपनियां यहां आकर लाभ कमा सकें और वैश्विक स्तर पर विस्तार कर सकें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/india-nz-trade-deal-a-strategic-indo-pacific-move" target="_blank">भारत-New Zealand की ऐतिहासिक Trade Deal: 5000 भारतीयों को मिलेगा Visa, IT-प्रोफेशनल्स की बल्ले-बल्ले</a></h3><div>यह समझौता विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके तहत भारत को न्यूजीलैंड के बाजार में अपने सभी 8284 निर्यात उत्पादों के लिए शत प्रतिशत शुल्क मुक्त पहुंच मिल जाएगी। पहले भारतीय उत्पादों पर औसतन 2.2 प्रतिशत तक शुल्क लगता था और कुछ क्षेत्रों जैसे वस्त्र और चमड़ा उद्योग पर यह शुल्क 10 प्रतिशत तक पहुंच जाता था। अब इन सभी शुल्कों को समाप्त कर दिया गया है, जिससे भारतीय उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।</div><div><br></div><div>इसका सीधा लाभ वस्त्र, चमड़ा, इंजीनियरिंग सामान, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक और खाद्य उत्पादों जैसे क्षेत्रों को मिलेगा। विशेष रूप से आगरा का चमड़ा उद्योग, जो लंबे समय से वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा था, अब नई संभावनाओं के साथ उभर सकेगा। औषधि क्षेत्र को भी बड़ी राहत मिली है क्योंकि न्यूजीलैंड अब वैश्विक नियामकों की जांच रिपोर्ट को स्वीकार करेगा, जिससे बार बार जांच की आवश्यकता नहीं रहेगी और लागत कम होगी।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, न्यूजीलैंड को भी इस समझौते से बड़ा लाभ मिलेगा। भारत ने अपने लगभग 70 प्रतिशत शुल्क लाइनों को न्यूजीलैंड के लिए खोल दिया है, जिससे वहां के निर्यातकों को ऊन, लकड़ी, कोयला, शराब, एवोकाडो और ब्लूबेरी जैसे उत्पादों में अवसर मिलेगा। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ेगा, जहां कीवी, सेब और शहद उत्पादन में तकनीकी सहायता प्रदान की जाएगी। हालांकि भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा है। लगभग 30 प्रतिशत शुल्क लाइनों को समझौते से बाहर रखा गया है। इनमें दुग्ध उत्पाद, खाद्य तेल, चीनी, प्याज, दालें, रत्न और आभूषण तथा धातु क्षेत्र शामिल हैं। इस संतुलन को विशेषज्ञों ने भारत की रणनीतिक सफलता बताया है, जिससे घरेलू उद्योगों को नुकसान नहीं होगा।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि इस समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू पेशेवरों के लिए नए अवसर खोलना है। न्यूजीलैंड हर वर्ष 1667 अस्थायी कार्य वीजा देगा और एक समय में अधिकतम 5000 भारतीय पेशेवर वहां काम कर सकेंगे। इससे सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, इंजीनियरिंग और शिक्षा क्षेत्रों के लोगों को विशेष लाभ मिलेगा। निवेश के क्षेत्र में भी यह समझौता अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में लगभग 20 अरब डॉलर निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है। यह निवेश अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में किया जाएगा। इससे भारत में रोजगार सृजन और आर्थिक विकास को गति मिलेगी।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि यह समझौता 20 अध्यायों में विभाजित है, जिनमें वस्तु व्यापार, सेवाएं, सीमा शुल्क प्रक्रिया, तकनीकी बाधाएं, विवाद समाधान और कानूनी ढांचा जैसे महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं। सेवाओं के क्षेत्र में भारत को सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त, पर्यटन, शिक्षा और निर्माण जैसे क्षेत्रों में बेहतर बाजार पहुंच मिली है। देखा जाये तो भारत और न्यूजीलैंड के बीच वर्तमान में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 1.3 अरब डॉलर के आसपास है, जिसे अगले पांच वर्षों में बढ़ाकर 5 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। उद्योग संगठनों का मानना है कि यह समझौता सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए भी नए अवसर पैदा करेगा और उन्हें वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ने में मदद करेगा।</div><div><br></div><div>खास बात यह है कि इस समझौते को भारत की उदार व्यापार नीति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल शुल्क घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निवेश, तकनीक और लोगों के बीच संबंधों को भी मजबूत करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस समझौते को लेकर अपने संदेश में कहा है कि यह भारत के लिए एक व्यापक और संतुलित कदम है, जो एक ओर भारतीय निर्यात पर शुल्क समाप्त कर श्रम आधारित क्षेत्रों को मजबूती देगा, वहीं सूक्ष्म लघु और मध्यम उद्यमों को भी नया बल प्रदान करेगा। उन्होंने रेखांकित किया कि इस समझौते में कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की पूरी तरह सुरक्षा सुनिश्चित की गई है, जिससे घरेलू किसानों और उद्योगों के हित प्रभावित नहीं होंगे। साथ ही यह समझौता छात्रों और कुशल पेशेवरों के लिए नए अवसरों का विस्तार करेगा, कृषि उत्पादकता बढ़ाने में सहयोग देगा और निवेश को प्रोत्साहित करेगा, जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी और मजबूत होगी।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर देखें तो भारत न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के लिए आर्थिक सहयोग का एक नया अध्याय खोलता है। यह समझौता व्यापार को गति देगा, निवेश बढ़ाएगा और रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा। आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव न केवल व्यापार आंकड़ों में दिखाई देगा, बल्कि यह दोनों देशों के बीच गहरे और स्थायी संबंधों की नींव भी मजबूत करेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 16:29:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/india-new-zealand-fta-opens-up-avenues-for-large-number-of-jobs-and-investment</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[लोकतंत्र में लोक की आस्था का प्रमाण– बम्पर मतदान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-testament-to-the-people-faith-in-democracy-bumper-voter-turnout]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुआ अभूतपूर्व बम्पर मतदान लोकतंत्र में लोक की आस्था का प्रमाण है। यह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। यह बताता है कि भारत के आम नागरिक का अपने संविधान, संवैधानिक प्रक्रियाओं और संस्थाओं पर कितना अटूट विश्वास है। राजनैतिक दलों के लिए इस मतदान में क्या छुपा है वो तो 4 मई 2026 को ज्ञात होगा किन्तु जनता जनार्दन अपना कर्तव्य निभाने में जीत चुकी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>राजनैतिक विश्लेषक बंगाल में बंपर मतदान के पीछे कई कारण बता रहे हैं जैसे कि मतदाता जागरूकता अभियानों में लगातार वृद्धि, महिलाओं और युवाओं की बढ़ती भागीदारी, बेहतर चुनाव प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था के साथ ही स्थानीय मुद्दों पर जागरुकता। बंगाल में एक बड़ा कारण जनमानस में राजनीतिक चेतना जाग्रत होना भी माना जा रहा है। कुछ लोग एसआईआर के कारन कम हुए मतदाताओं को ही इसका एकमात्र कारण बता रहे हैं जबकि कुछ लोग टीएमसी व बीजेपी द्वारा अपने-अपने मतदाताओं को मतदान केंद्रो तक पहुंचाने को भी महत्वपूर्ण कारण मान रहे हैं। चुनावी हिंसा के लिए कुख्यात पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव आयोग द्वारा सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए हैं अतः भयमुक्त वातावरण स्वाभाविक रूप से यहाँ अधिक मतदान का एक कारण है। बंगाल में केंद्रीय सुरक्षा बलों के 2 लाख 40 हजार जवानों की तैनाती की गई है और अधिकतर सीटों पर मतदान शांत रहा है। पश्चिम बंगाल में रिकार्ड मतदान ने चुनावी मनोविज्ञान पूरी तरह से बदल दिया है और चुनावी सर्वे करने वाली संस्थाओं को भी हैरान कर दिया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/mamata-banerjee-makes-a-special-appeal-to-voters" target="_blank">मां, माटी, मानुष..ममता बनर्जी ने वोटरों से की खास अपील, बंगाल की पहचान पर दिया जोर</a></h3><div>सभी के मन में यह प्रश्न है कि क्या भयमुक्त वातावरण में हुआ भारी मतदान बीजेपी के पक्ष में हो रहा है ? इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि बंगाल में भाजपा बहुत मजबूती से करो या मरो के जूनून से चुनाव लड़ रही है। स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा के चालीस स्टार प्रचारकों ने पूरे बिहार को मथ डाला है। ठेठ बंगाली में बोलती स्मृति ईरानी, भीड़ खींचती कंगना रानौत, लोगों का मन मोहती मैथिली के साथ साथ हिंदुत्व को धर देते योगी जी और हिमंता जी और फिर स्वयं गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी जी।&nbsp;</div><div><br></div><div>भाजपा इतने उत्साह में है कि उसकी ओर से पहले चरण के बाद ही घोषणा तो कर दी गई है कि महाजंगलराज का समापन हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चिंतामुक्त होकर कोलकाता में हुगली नदी के किनारे समय बिता रहे हैं हुए और नौका विहार का आनंद लेते हुए फोटोग्राफी कर पूरी दुनिया को कोलकोता दर्शन करा रहे हैं। ये बात और है कि इससे बंगाल का चुनावी वातावरण गर्म हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “मां गंगा का बंगालियों के जीवन में एक विशेष स्थान है, इसका जल एक प्राचीन सभ्यता की भावना को अपने साथ समेटे हुए है”। उन्होंने लिखा कि कोलकाता में मैंने हुगली नदी के तट पर कुछ समय बिताया यह मा गंगा के प्रति&nbsp; आभार व्यक्त&nbsp; करने का एक अवसर था। हुगली के तट पर मैंने पश्चिम बंगाल के विकास और महान बंगाली लोगों की समृद्धि के लिए काम करने की प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने यह भी बताया कि नौका विहार के दौरान&nbsp; उन्हें प्रसिद्ध विद्यासागर सेतु और हावड़ा ब्रिज को देखने का अवसर मिला। इस दौरान उन्होने नाव की सवारी कराने वाले नाविक को गले लगाया। जब प्रधानमंत्री मोदी नाव की सवारी कर रहे थे उस समय नदी के तट पर हजारों&nbsp; की भीड़ एकत्र हो गई ओैर मोदी-मोदी के नारे लगाने लगी। प्रधानमंत्री मोदी का यह नौका विहार सोशल मीडिया पर खूब वायरल है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि अब भय जा रहा हे और भरोसा आ रहा है। पीएम मोदी ने एक अत्यंत विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि लंबे समय से बंगाल में परिवर्तन की जो लहर दिख रही थी पहले चरण के मतदान ने उस पर मुहर लगा दी है। पहले चरण के मतदान से बीजेपी की विजय का शखनाद हो चुंका है। पीएम मोदी ने अगले चरण के लिए कहा कि अब आपको अगले चरण में विजय पताका फहरानी है। उन्होंने कहा कि टीएमसी का दीया बुझने से पहले फड़फड़ा रहा है। बंगाल को फिर से अवसरों की भूमि बनाने के लिए टीएमसी से आजादी बहुत जरूरी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में जिन 152 सीटों पर मतदान संपन्न हो चुका है वहां भाजपा की स्थिति अच्छी थी किंतु अगला चरण भाजपा की अग्निपरीक्षा से कम नहीं है क्योकि इन 140 सीटों पर ममता बनर्जी की टीएमसी का व्यापक प्रभाव है। पिछली बार यहाँ पर टीएमसी ने 89 सीटें जीती थीं। अगर यह बात सही है कि बंगाल के प्रथम चरण के मतदान में मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं&nbsp; ने एकजुट होकर टीएमसी को और हिंदू बाहुल्य सीटों में 65 प्रतिशत से अधिक हिंदू मतदाताओं&nbsp; ने भाजपा को मत दिया है और यही रुख अगले चरण में भी रहता है&nbsp; तो यह अधिक मतदान बंगाल में परिवर्तन के लिए ही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रथम चरण के मतदान के बाद ममता दीदी के पक्ष में केवल शिवसेना के संजय राउत ने बयान जारी कर कहा है कि बंपर मतदान एसआईआर के खिलाफ आक्रोश है जबकि राहुल गांधी और कांग्रेस के नेता दबी जुबान से कुछ और ही बयान दे रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>यद्यपि चुनाव पांच प्रान्तों में हो रहे हैं किन्तु पूरे भारतीय जनमासनस की दृष्टि बंगाल में अटकी है। भीषण गर्मी के बीच लगभग 93 प्रतिशत मतदान हो जाने के बाद भारतीय जनता पाटी और अधिक&nbsp; आक्रामकता के साथ प्रचार कर रही है। बंगाल के विधानसभा चुनावों में इस बार&nbsp; मुर्शिदाबाद और&nbsp; कुछ अन्य जगहों को छोड़कर कहीं और व्यापक हिंसा नहीं हुई। बंगाल के मतदाताओं ने मतदान केंद्रों पर जो बंपर उत्साह दिखाया है उसे ममता दीदी एसआईआर के खिलाफ जनता का आक्रोश बता रही हैं और पहली बार उन्होंने यह कह दिया है कि बीजेपी को कैसे पता कि वह बंगाल में जीत रही है क्या उन्होंने ईवीएम को फिक्स कर लिया है। यह बात तय हो गई है कि अगर 4 मई को बंगाल से ममता की सरकार जाती है तो वह चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली, एसआईआर और ईवीएम पर ही निशाना साधेंगी।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 14:36:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-testament-to-the-people-faith-in-democracy-bumper-voter-turnout</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jhalmuri और Fish Curry के जरिये BJP ने मिटा दिया बाहरी होने का ठप्पा, West Bengal Elections में पलट गयी बाजी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/jhalmuri-and-fish-curry-the-bjp-erased-the-outsider-tag-and-turned-the-tables-in-bengal-elections]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार एक बड़ा बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। भाजपा, जिस पर लंबे समय से बाहरी होने का आरोप लगता रहा, उसने इस धारणा को काफी हद तक कमजोर कर दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह पार्टी के नेता स्थानीय खानपान, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़ते नजर आए हैं, उससे बंगाल के लोगों के बीच यह संदेश गया है कि यह दल अब बाहरी नहीं, बल्कि अपना ही है। स्थानीय भोजन के साथ जुड़ाव ने इस राजनीतिक दूरी को कम करने में अहम भूमिका निभाई है और मतदाताओं के मन में अपनापन पैदा किया है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य में इस बार राजनीति और भोजन का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। यह केवल प्रचार का तरीका नहीं, बल्कि पहचान, सांस्कृतिक जुड़ाव और स्वीकार्यता का प्रतीक बन गया है। जिस तरह फिल्मकार सत्यजीत रे ने अपनी फिल्मों में काशी को बंगालियों के दूसरे घर के रूप में दिखाया था, ठीक उसी तरह अब राजनीतिक दल बंगाल के लिए अपनापन दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में स्थानीय खानपान को एक प्रमुख माध्यम बनाया गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/himanta-biswa-sarma-big-claim-will-score-a-century-in-assam-and-a-double-century-in-west-bengal" target="_blank">Himanta Biswa Sarma का बड़ा दावा- Assam में शतक और West Bengal में दोहरा शतक लगाएंगे</a></h3><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का झारग्राम में झालमुरी खाना हो या अन्य नेताओं का मछली के साथ प्रचार करना, यह सब एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। लंबे समय से बंगाल में बाहरी होने के आरोप से जूझ रही भाजपा का स्थानीय भोजन को अपनाना एक संकेत है कि वह खुद को बंगाल की संस्कृति के करीब दिखाना चाहते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान खासतौर पर भोजन केवल खाने की वस्तु नहीं, बल्कि पहचान और जुड़ाव का माध्यम बन गया है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में बाहरी का अर्थ केवल भौगोलिक नहीं है, बल्कि यह भाषा, व्यवहार और खानपान से भी जुड़ा हुआ है। वर्ष 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने इस बाहरी मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया था। इसी के बाद अब भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है और स्थानीय संस्कृति के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश कर रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि चुनाव प्रचार में भाजपा के कई नेता जैसे अनुराग ठाकुर मछली खाते हुए नजर आए, वहीं कुछ उम्मीदवार मछली हाथ में लेकर प्रचार करते दिखे। विशेषज्ञों के अनुसार, मोदी का झालमुरी खाना एक सुरक्षित और संतुलित विकल्प था। चूंकि वह शाकाहारी हैं, इसलिए उनके लिए मछली खाना संभव नहीं था। हम आपको बता दें कि बंगाल का खानपान अपने आप में विविधता से भरा है। इसमें इस्लामी, डच और अंग्रेजी प्रभाव भी देखने को मिलता है। साथ ही घोटी और बंगाल समुदायों के बीच भी भोजन को लेकर अलग अलग परंपराएं हैं। ऐसे में झालमुरी एक ऐसा विकल्प है जो हर वर्ग में समान रूप से स्वीकार्य है। यह सस्ता, सरल और सर्वव्यापी है, इसलिए राजनीतिक रूप से भी सुरक्षित माना जाता है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, चुनावी माहौल में केवल नेता ही नहीं, बल्कि मीडिया भी इस भोजन राजनीति का हिस्सा बन गया है। विभिन्न समाचार चैनल और पत्रकार चुनाव कवरेज के दौरान स्थानीय भोजन को प्रमुखता से दिखा रहे हैं। कहीं किसी होटल से चर्चा हो रही है तो कहीं सड़कों पर खाने के दृश्य दिखाए जा रहे हैं। इस तरह भोजन अब एक समाचार विषय भी बन गया है। वैसे जब कोई नेता स्थानीय भोजन खाता है तो वह यह संदेश देना चाहता है कि वह उस जगह का हिस्सा है। लेकिन जब यह सब कैमरे के सामने किया जाता है, तो यह कृत्रिम भी लग सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि इस चुनाव में भोजन एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपकरण बन गया है। लेकिन यह बात भी सही है कि जब चुनावी मुद्दे रोजगार, विकास और प्रवासन से हटकर केवल खानपान पर केंद्रित हो जाते हैं, तो असली समस्याएं पीछे छूटने का खतरा पैदा हो जाता है। वैसे इस बार चुनावी मुकाबले में भोजन केवल प्रतीक नहीं, बल्कि प्रभावी राजनीतिक संदेश बनकर उभरा है। जिस तरह भाजपा ने स्थानीय स्वाद और संस्कृति के जरिए अपनी छवि को बदला है, उससे यह संकेत मिल रहा है कि रणनीति असर दिखा रही है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस चुनाव में झालमुरी और मछली केवल खानपान की चीजें नहीं रहीं, बल्कि वह ऐसे प्रतीक बन गई हैं जो भाजपा की नैया पार लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 13:26:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/jhalmuri-and-fish-curry-the-bjp-erased-the-outsider-tag-and-turned-the-tables-in-bengal-elections</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[महिला आरक्षण बिल: भावनाओं का जाल- विपक्ष गिरफ्तार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/women-reservation-bill-the-web-of-emotion-opposition-trapped]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच केंद्र सरकार ने देश की महिलाओं को संसद व राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ वर्ष 2034 की बजाए 2029 से देने के लिए 131वां संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया। यह संशोधन विधेयक पारित होने के लिए इसके पक्ष में दो तिहाई बहुमत चाहिए था। कांग्रेस, सपा, तृणमूल कांग्रेस व डीएमके जैसे दलों ने इस संशोधन को समर्थन नहीं दिया जिससे दो तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह 298 मतों के मुकाबले 230 मतों से गिर गया। लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक गिरने के बाद विपक्षी दलों ने इसको प्रधानमंत्री की हार बताते हुए मेजें थपथपाकर जश्न मनाया।&nbsp;</div><div><br></div><div>लोकसभा में विधेयक पर हुई चर्चा के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया था कि इन सभी विधेयकों में उत्तर दक्षिण से कोई भेदभाव नहीं किया गया है तथा सरकार इसका कोई क्रेडिट भी लेना नहीं चाहती। साथ ही प्रधानमंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा था कि महिला आरक्षण का विरोध करने वाले लंबे समय तक इसका खामियाजा भुगतेंगे, नंबर का खेल समय तय करेगा किंतु नारी नीयत देखेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने सदन में मतदान से पूर्व कई बार विरोधी दलों से बिल का समर्थन प्राप्त करने के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से विपक्षी सांसदों से भावुक अपील भी की थी। प्रधानमंत्री के सभी प्रयासों के बाद भी राजनैतिक स्वार्थ, अहंकार व सामंतवादी मानसिकता से त्रस्त परिवारवादी राजनैतिक दलों ने यह बिल पारित नहीं होने दिए। यदि यह विधेयक पारित हो जाते तो यह सत्र भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव बन जाता।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/women-participation-in-power-remains-far-below-the-global-average" target="_blank">वैश्विक औसत से बहुत दूर है सत्ता में महिलाओं की भागीदारी</a></h3><div>विधेयक को दो तिहाई मत मिलने पर विरोधी दल ऐसे आनंदित हो रहे हैं जैसे उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की सरकार गिरा दी हो। वो इसे मोदी की हार कह रहे हैं और यही विरोधी दलों ने एक राजनैतिक भूल है। महिला आरक्षण बिल भाजपा के लिए “चित भी मेरी - पट भी मेरी” वाला खेल बन गया है और पार्टी इस विषय को लेकर आक्रामक रूप से जनता में जा रही है। सदन में सभी विरोधी दलों ने परिसीमन और आरक्षण को लेकर भ्रम व झूठ का मायाजाल फैलाया। कुछ दलों ने जातीय जनगणना पर झूठ बोला और एससी-एसटी, ओबीसी, दलित आदिवासी व मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग कर डाली। समाजवादी पार्टी ने दो कदम आगे जाकर 33 प्रतिशत आरक्षण के अंदर ही मुस्लिम महिलाओं के लिए पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग करते हुए बिल को असंवैधानिक बताकर अपने मुस्लिम तुष्टिकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाया। वास्तविकता यह है कि धर्म आधारित आरक्षण संविधान के विरुद्ध है जिसका असफल प्रयास कुछ दक्षिणी राज्यों में किया गया था जिसे सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है। वहीं यदि परिसीमन करने वाला बिल और महिला आरक्षण बिल पारित हो जाते तो जनसंख्या वृद्धि के अनुसार 2029 में महिला सांसदों की संख्या 272 हो जाती और देश के राजनैतिक परिदृश्य में एक व्यापक परिवर्तन दिखाई पड़ता।&nbsp;</div><div><br></div><div>विरोधी दलों ने लोकसभा में यह विधेयक गिरा दिया है लेकिन अब यह उनके लिए, “चिड़िया चुग गई खेत” वाली कहावत सिद्ध करने जा रहा है। भाजपा ने इसे अपने पक्ष में बड़ा राजनैतिक हथियार बना लिया है। इस विषय को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करके अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कांग्रेस का काला चिट्ठा खोलकर विस्तारपवूर्वक देशवासियों के समक्ष रखा और बताया कि किस प्रकार कांग्रेस ने सभी सुधारवादी प्रयासों का विरोध किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि परिवारवादी पार्टियों को डर है कि अगर नारी सशक्त हो गई तो इनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ये कभी नही चाहेंगे कि उनके परिवार के बाहर की महिलाएं आगे बढ़ें। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमारा अत्मबल अजेय है, हमारे प्रयास रुकेंगे नहीं। देश की 100 प्रतिशत नारी शक्ति आशीर्वाद हमारे साथ है और हम इस संकल्प को पूरा करके रहेंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल और तमिलनाडु जहां अभी विधानसभा का मतदान शेष है वहां प्रधानमंत्री मोदी व गृहमंत्री अमित शाह सहित भाजपा के सभी स्टार प्रचारक अपनी रैलियों में यह मुद्दा आक्रामक ढंग से उठा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित बीजेपी व राजग शासित राज्यों के मुख्यमंत्री महिला आरक्षण पर प्रेस वार्ता करके राज्यों में विपक्षी व क्षेत्रीय दलों को बेनकाब कर रहे हैं। महिला आरक्षण बिल पास न होने पर मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि संसद में उस दिन द्रौपदी के चीरहरण जैसा दृश्य था। योगी जी ने कहा कि अगर ये बिल पारित हो जाता तो महिलाओं को उनका हक मिलता लेकिन इंडी गठबंधन के कारण ऐसा नहीं हो सका।</div><div><br></div><div>यदि यह विधेयक सर्वसम्मति से पास हो जाता तो स्वाभाविक रूप से इसका श्रेय पूरे सदन व सभी राजनैतिक दलों को मिलता, विरोधी दलों ने एक बहुत बड़ा अवसर खो दिया है। इस घटनाक्रम ने राजनैतिक दृष्टि से राजग गठबंधन को स्पष्ट&nbsp; बढ़त दी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 12:26:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/women-reservation-bill-the-web-of-emotion-opposition-trapped</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में सत्ता विरोधी लहर का फायदा क्या उठा पाएगी भाजपा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/will-bjp-be-able-to-take-advantage-of-the-anti-incumbency-wave-in-west-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सवाल सीधा है कि क्या सत्ताविरोधी माहौल को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने पक्ष में मोड़ पाएगी? या फिर ममता बनर्जी का जादू एक बार फिर कायम रहेगा? वैसे राज्य में चुनावी हवा भले ही बदलाव की सुगबुगाहट दिखा रही हो, लेकिन जमीन पर हालात इतने सरल नहीं हैं। देखा जाये तो इस बार के चुनावों में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार रैलियां, केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता और संगठन की आक्रामक रणनीति यह संकेत देती है कि पार्टी किसी भी कीमत पर बंगाल में सत्ता का स्वाद चखना चाहती है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी अपनी पकड़ ढीली पड़ने देने के मूड में नहीं है। ममता बनर्जी, जो लंबे समय से राज्य की राजनीति का केंद्र रही हैं, अब भी अपने जनाधार और कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे मैदान में डटी हुई हैं।</div><div><br></div><div>उधर, भाजपा के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी वजह है ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ यानी सत्ता के खिलाफ बढ़ती नाराज़गी। टीएमसी सरकार पर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और कानून-व्यवस्था के सवालों को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर रहा है। भर्ती घोटाले, स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं की दबंगई और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दे भाजपा के चुनावी एजेंडे के केंद्र में हैं। पार्टी का दावा है कि जनता बदलाव चाहती है और इस बार वोट उसी दिशा में जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/wave-of-change-in-west-bengal-mamata-haunted-by-the-fear-of-defeat" target="_blank">पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की लहर: ममता को सताने लगा हार का डर</a></h3><div>लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही मजबूत है। ममता बनर्जी ने बीते वर्षों में महिला मतदाताओं, ग्रामीण गरीबों और अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की है। ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच भरोसा पैदा किया है, जबकि अन्य सामाजिक योजनाओं ने गरीब तबकों को सीधे लाभ पहुंचाया है। यही कारण है कि भाजपा के आक्रामक अभियान के बावजूद टीएमसी का आधार पूरी तरह हिलता नजर नहीं आता।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, भाजपा की रणनीति में एक अहम किरदार हैं शुभेन्दु अधिकारी, जो कभी ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी थे और अब उनके सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं। शुभेन्दु अधिकारी ने नंदीग्राम में ममता बनर्जी को मात दी थी और इस बार ममता बनर्जी को उनके गढ़ भवानीपुर में चुनौती दे रहे हैं। शुभेन्दु अधिकारी राज्य में भाजपा का चेहरा बनने का प्रयास कर रहे हैं हालांकि, उनका प्रभाव सीमित इलाकों तक ही केंद्रित माना जाता है, और पूरे बंगाल में एक व्यापक लहर खड़ी करना उनके लिए आसान नहीं है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल में टर्निंग प्वाइंट साबित हुए थे। पार्टी ने उस चुनाव में अप्रत्याशित सफलता हासिल करते हुए खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया था। उसी प्रदर्शन के आधार पर भाजपा को उम्मीद थी कि वह विधानसभा चुनाव में सत्ता तक पहुंच सकती है। लेकिन बाद के चुनावी अनुभवों ने यह भी दिखाया कि लोकसभा और विधानसभा की राजनीति में मतदाताओं का व्यवहार अलग हो सकता है।</div><div><br></div><div>एक और चुनौती भाजपा के सामने सांस्कृतिक और भाषाई असंतुलन की है। बंगाल की अपनी विशिष्ट पहचान है, और यहां बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा अक्सर उभरता रहता है। भाजपा के कई नेताओं के बयान और रणनीतियां कभी-कभी स्थानीय संवेदनशीलताओं से मेल नहीं खातीं, जिससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है। टीएमसी इस मुद्दे को भुनाने में माहिर रही है और खुद को ‘बंगाल की असली आवाज’ के रूप में पेश करती है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, मतदाताओं के एक हिस्से में यह धारणा भी है कि भाजपा की राजनीति अत्यधिक ध्रुवीकरण पर आधारित है। धार्मिक और पहचान की राजनीति का असर भले कुछ क्षेत्रों में दिखता हो, लेकिन पूरे राज्य में यह रणनीति कितनी कारगर होगी, इस पर सवाल बना हुआ है। बंगाल का सामाजिक ताना-बाना जटिल है, और यहां की राजनीति सिर्फ एक मुद्दे पर नहीं टिकती।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, टीएमसी के खिलाफ असंतोष को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। ग्रामीण इलाकों में विकास की असमानता, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और रोजगार के अवसरों की कमी जैसे मुद्दे लोगों के बीच चर्चा में हैं। भाजपा इन्हीं सवालों को उठाकर खुद को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहती है।</div><div><br></div><div>वैसे बंगाल की चुनावी लड़ाई सिर्फ आंकड़ों और नारों की नहीं है, बल्कि भावनाओं, पहचान और भरोसे की भी है। भाजपा के पास आक्रामक अभियान और राष्ट्रीय नेतृत्व का समर्थन है, लेकिन टीएमसी के पास जमीनी नेटवर्क और ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता है। इसलिए, यह कहना जल्दबाजी होगी कि सत्ताविरोधी लहर किसके पक्ष में जाएगी। भाजपा के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी क्योंकि उसे नाराज़गी को वोट में बदलना होगा। वहीं ममता बनर्जी के लिए यह अपनी विश्वसनीयता और जनसंपर्क की सबसे बड़ी परीक्षा है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, इस चुनाव का नतीजा सिर्फ सत्ता परिवर्तन या सत्ता में पुनरावृत्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि बंगाल की राजनीति आने वाले वर्षों में किस दिशा में आगे बढ़ेगी। फिलहाल, मैदान सजा है, दांव बड़े हैं और फैसला पूरी तरह जनता के हाथ में है, जो इस बार सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि राजनीतिक कथा का अगला अध्याय लिखने जा रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 16:24:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/will-bjp-be-able-to-take-advantage-of-the-anti-incumbency-wave-in-west-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[छात्रों का आत्मघातः सपनों का बोझ है या सिस्टम की नाकामी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/student-suicides-the-burden-of-dreams-or-the-failure-of-the-system]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कुरुक्षेत्र स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कुरुक्षेत्र में दो महीनों के भीतर चार छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं केवल एक संस्थान की त्रासदी एवं नाकामी नहीं हैं, बल्कि पूरे भारतीय समाज, शिक्षा व्यवस्था और हमारी सामूहिक संवेदनहीनता पर लगा गहरा प्रश्नचिह्न हैं। ये घटनाएं हमें झकझोरती हैं कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिनमें देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं जीवन से हार मानने को विवश हो जाती हैं। कोई भी युवा, जो कठिन प्रतिस्पर्धा से गुजरकर ऐसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचता है, वह सहज रूप से जीवन का परित्याग नहीं करता, वह तब यह निर्णय लेता है जब उसे हर ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देता है। यह अंधकार केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक, पारिवारिक और संस्थागत विफलताओं का सम्मिलित परिणाम है। एक बड़ा सवाल है कि इस तरह छात्रों का आत्मघात करना क्या सपनों का बोझ है या सिस्टम की नाकामी? आज भारत का भविष्य कहे जाने वाले युवा जिस मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के बोझ तले दबे हैं, वह अभूतपूर्व चिन्ताजनक है। कोटा जैसे शिक्षा नगरों में हर वर्ष दर्जनों छात्र आत्महत्या करते हैं। इन घटनाओं को हम आंकड़ों में बदल देते हैं, लेकिन हर आंकड़े के पीछे एक जीवित सपना, एक संघर्षरत परिवार और टूटती उम्मीदों की कहानी होती है। कोटा, दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई और अन्य शिक्षा केंद्रों में बढ़ती आत्महत्याएं इस बात का संकेत हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में कुछ मूलभूत त्रुटियां हैं। यह केवल पढ़ाई का दबाव नहीं है, यह उस मानसिक संरचना का संकट है, जिसमें सफलता को जीवन का पर्याय बना दिया गया है और असफलता को जीवन का अंत।</div><div><br></div><div>भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2023 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में 98 छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें सबसे अधिक घटनाएं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हुईं, इसके बाद एनआईटी और केंद्रीय विश्वविद्यालयों का स्थान है। यह तथ्य इस धारणा को तोड़ता है कि केवल कमजोर छात्र ही मानसिक तनाव का शिकार होते हैं। सच्चाई यह है कि सबसे प्रतिभाशाली और संवेदनशील छात्र ही अक्सर सबसे अधिक दबाव महसूस करते हैं, क्योंकि वे स्वयं से अत्यधिक अपेक्षाएं रखते हैं और असफलता को स्वीकार नहीं कर पाते। यहां प्रश्न केवल संस्थानों का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का भी है जिसने सफलता को एक संकीर्ण परिभाषा में बांध दिया है। परिवार अपने बच्चों को बचपन से ही यह सिखाते हैं कि जीवन का लक्ष्य केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करना है। अभिभावक अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर कोचिंग संस्थानों में बच्चों को भेजते हैं, बैंक से कर्ज लेते हैं और अपनी अधूरी इच्छाओं को बच्चों के माध्यम से पूरा करने का प्रयास करते हैं। यह अपेक्षाओं का बोझ बच्चों के मन पर इतना भारी पड़ता है कि वे स्वयं को एक प्रोजेक्ट की तरह देखने लगते हैं, एक इंसान की तरह नहीं। जब यह प्रोजेक्ट असफल होता है, तो उन्हें लगता है कि उनका अस्तित्व ही निरर्थक हो गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/a-massive-conspiracy-was-afoot-in-the-name-of-education-in-kashmir" target="_blank">Kashmir में शिक्षा के नाम पर चल रही थी बड़ी साजिश! खुफिया रिपोर्ट के बाद तीन विश्वविद्यालयों ने लिया बड़ा एक्शन</a></h3><div>शिक्षा व्यवस्था का ढांचा भी इस संकट के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चों को ज्ञान तो देती है, लेकिन जीवन जीने की कला नहीं सिखाती। उन्हें बताया जाता है कि गणित कैसे हल करना है, लेकिन यह नहीं सिखाया जाता कि जीवन की समस्याओं का समाधान कैसे करना है। उन्हें भौतिकी के नियम याद कराए जाते हैं, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखना है। परिणामस्वरूप, जब वे वास्तविक जीवन की चुनौतियों से सामना करते हैं तो वे टूट जाते हैं। आज के शिक्षण संस्थानों में शिक्षक और छात्र के बीच का संबंध भी बदल गया है। पहले शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संरक्षक होते थे। आज यह संबंध औपचारिक हो गया है। कई शिक्षक अपनी भूमिका को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रखते हैं। वे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, उनके भावनात्मक संघर्षों और उनके आंतरिक द्वंद्व को समझने का प्रयास नहीं करते। यह दूरी छात्रों को और अधिक अकेला बना देती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>विचित्र है कि जो देश दुनिया भर में अपनी संतुलित जीवनशैली एवं अहिंसा के लिये जाना जाता है, वहां के शिक्षा-संस्थानों में हिंसा का भाव पनपना एवं छात्रों के आत्महंता होते जाने की प्रवृत्ति का बढ़ना अनेक प्रश्नों को खड़ा कर रहा है। ऐसे ही अनेक प्रश्नों एवं खौफनाक दुर्घटनाओं के आंकड़ों ने शासन-व्यवस्था के साथ-साथ समाज-निर्माताओं को चेताया है और गंभीरतापूर्वक इस विडम्बनापूर्ण एवं चिन्ताजनक समस्या पर विचार करने के लिये जागरूक किया है, लेकिन क्या कुछ सार्थक पहल होगी? बहुत जरूरी है कि उच्च शिक्षण संस्थान अपनी कार्यशैली एवं परिवेश में आमूल-चूल परिर्वतन करें ताकि छात्रों पर बढ़ते दबावों को खत्म किया जा सके। फिलहाल जरूरी यह भी है कि इन संस्थानों में एक ऐसे तंत्र को विकसित किया जाए, जो निराश, हताश और अवसादग्रस्त छात्रों के लगातार संपर्क में रहकर उनमें आशा का संचार कर सके, उन्हें सकारात्मकता के संस्कार दे सके। इसके लिए स्थाई तौर पर कुछ मनोवैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास द्वारा इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग करना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन केवल जांच समितियां बनाना समस्या का समाधान नहीं है। समितियां रिपोर्ट दे सकती हैं, लेकिन वे खोए हुए जीवन को वापस नहीं ला सकतीं। आवश्यकता इस बात की है कि हम समस्या की जड़ तक पहुंचें और उसे दूर करने के लिए ठोस और दीर्घकालिक उपाय करें। छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति को केवल मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा मानना भी पर्याप्त नहीं है। यह एक व्यापक सामाजिक संकट है, जिसमें शिक्षा प्रणाली, पारिवारिक संरचना, सामाजिक अपेक्षाएं और व्यक्तिगत मनोविज्ञान सभी शामिल हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहां सफलता की अंधी दौड़ ने मानवीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ दिया है। यहां हर कोई आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन यह भूल जाता है कि इस दौड़ में पीछे छूटने वाले भी इंसान हैं। इस समस्या का समाधान केवल नीतिगत बदलावों से नहीं होगा, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की आवश्यकता है। सबसे पहले, हमें शिक्षा की परिभाषा को बदलना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक संतुलित और सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। छात्रों को यह सिखाया जाना चाहिए कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरे, अभिभावकों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। उन्हें अपने बच्चों को यह समझाना होगा कि वे उनसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, न कि उनकी सफलता। उन्हें बच्चों पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ नहीं डालना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने सपनों को पहचानने और उन्हें पूरा करने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। तीसरे, शिक्षण संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से समझना होगा। उन्हें केवल अकादमिक उत्कृष्टता पर नहीं, बल्कि छात्रों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना होगा। हर संस्थान में प्रभावी काउंसलिंग सिस्टम होना चाहिए, जहां छात्र बिना किसी डर या संकोच के अपनी समस्याएं साझा कर सकें। शिक्षकों को भी इस दिशा में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे छात्रों के व्यवहार में होने वाले बदलावों को पहचान सकें और समय रहते उनकी सहायता कर सकें। निश्चिततौर पर समाज को भी अपनी संवेदनशीलता को पुनर्जीवित करना होगा। हमें यह समझना होगा कि हर जीवन अमूल्य है और किसी भी सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है। हमें एक ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहां बच्चे बिना किसी भय के अपने सपनों का पीछा कर सकें और असफल होने पर भी सम्मान के साथ जी सकें। यदि हम इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते, तो यह संकट और गहराता जाएगा। हर आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि हमारे समाज की विफलता का प्रमाण होती है। अब समय आ गया है कि हम इस विफलता को स्वीकार करें और इसे सुधारने के लिए एकजुट होकर प्रयास करें। तभी हम अपने युवाओं को इस आत्मघाती मार्ग से बचा सकेंगे और उन्हें एक उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जा सकेंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 12:11:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/student-suicides-the-burden-of-dreams-or-the-failure-of-the-system</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की लहर: ममता को सताने लगा हार का डर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/wave-of-change-in-west-bengal-mamata-haunted-by-the-fear-of-defeat]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल चुनाव दिनों-दिन बेहद दिलचस्प होता दिख रहा है। अजेय समझी जाने वाली ममता बनर्जी हैरान, परेशानी और आक्रोशित दिखाई दे रही हैं। हाल ही में एक चुनावी सभा में उनका ये बयान - 'रहा तृणमूल तो फिर मिलेंगे' ; ख़ूब चर्चा में है। जहां कुछ सियासी पंडित इसे ममता बनर्जी के चुनाव में सरेंडर करने से जोड़ रहे हैं। वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि- ये उनका शक्ति प्रदर्शन का अंदाज़ ए बयां है। लेकिन जिस तरह से पश्चिम बंगाल के चुनाव में दृश्य दिखाई दे रहे हैं। वो किसी भी लिहाज़ से ममता बनर्जी के पक्ष में नहीं हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>अपने चुनावी अभियान के बीच ममता बनर्जी उकसावे वाले बयान दे रही हैं।चुनाव कराने आए सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ लोगों को उकसा रही हैं। 25 मार्च 2026 को दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में नंदप्रसाद गर्ल्स हाई स्कूल के मैदान में आयोजित एक जनसभा में उनका उकसावे वाला बयान सामने आया। एक वीडियो में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कथित तौर पर CRPFके जवानों को ‘धमकाती’ नजर आ रही हैं। आरोप है कि जनसभा के दौरान उन्होंने सभी महिलाओं और लड़कियों से अपील की कि- वे भारी संख्या में पोलिंग बूथ पर मौजूद रहें। चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार उन्होंने कथित तौर पर यह भी कहा कि —“अगर जरूरत पड़े तो महिलाएं CRPF जवानों से ‘निपटने’ के लिए घरेलू रसोई के उपकरणों (जैसे बर्तन या अन्य सामान) का इस्तेमाल करें।”&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-modi-muslims-and-women-a-do-or-die-election-in-west-bengal" target="_blank">ममता, मोदी, मुस्लिम और महिला- पश्चिम बंगाल में 'करो या मरो' का चुनाव</a></h3><div>इस खीझ, उकसावे से — ये आईने की तरह साफ़ हो रहा है कि बंगाल की सियासी पिच से ममता बाहर हो चुकी हैं। इसी के चलते वो किसी भी मुद्दे पर जनता के बीच ख़ुद को साबित नहीं कर पा रही हैं।तिस पर ऐसे बयान दे रही हैं मानो पश्चिम बंगाल — भारत से अलग कोई देश है। जहां ममता बनर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलेगा। ममता बनर्जी को लगता है कि वो संविधान से ऊपर हैं।लेकिन ऐसा कतई नहीं है। यहां जनता से बढ़कर कोई नहीं।ममता बनर्जी जिस मुस्लिम वोटबैंक के नाम पर एक छत्र राज कर रही थीं। वो मुस्लिम समुदाय अब अपने 'इस्लामी' एजेंडे की ओर बढ़ चला है। हुमायूं कबीर, असद्दुदीन ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता — मुस्लिम सत्ता और वर्चस्व की वकालत कर रहे हैं। कांग्रेस, टीएमसी की वोटकटवा वाली भूमिका में है। साफ़ है कि इसका सीधा फायदा बीजेपी के खाते में क्रेडिट होगा। कांग्रेस के दिग्गज नेता कहे जाने वाले अधीर रंजन चौधरी,ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ बिगुल फूंक रहे हैं। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वर्ग भी भाजपा की रैलियों और जनसभाओं में नज़र आ रहा है। मुस्लिम महिलाएं और पुरुष ये कहते देखे गए हैं कि —“ममता बनर्जी ने भ्रष्टाचार किया है। उन्होंने कोई काम नहीं किया है। ममता मुसलमानों को बीजेपी के नाम पर केवल डराने का काम कर रही हैं। जबकि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है। वहां मुसलमानों में कोई भय नहीं है वहां विकास हो रहा है।”&nbsp;</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले मेरे कई परिचित लोग जिनका राजनीति से कोई विशेष सरोकार नहीं है। उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। 2021 के चुनाव में जहां वो बीजेपी की राह कठिन बता रहे थे। वहीं इस बार पश्चिम बंगाल में बड़े परिवर्तन को भांप रहे हैं। उनका कहना है कि — इस बार पश्चिम बंगाल, कुछ अलग तरह के चुनावी माहौल में है। जहां पिछले चुनावों में ममता समर्थकों की गुंडागर्दी, हिंसा और उत्पात से लोग डरे-सहमे रहते थे। वहीं अब लोग ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ रहे हैं। उन्हें अब किसी चीज़ का भय नहीं लग रहा है। जिन पोलिंग बूथों में टीएमसी के गुंडों का खौफ़ रहता था। वहां अब लोग ममता बनर्जी का खुला विरोध जता रहे हैं । साथ ही साइलेंटली भी बीजेपी के पक्ष में वहां हवा चल पड़ी है। ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण से बंगाल की जनता मुक्ति चाहती है। डेमोग्राफिक बदलाव को लेकर स्थानीय लोग ख़ासे चिंतित हैं। पश्चिम बंगाल में खुलेआम होती गौहत्याएं, जनसांख्यिकी बदलाव, गुंडागर्दी, हिंसा, अराजकता और अपराधियों को मिलते संरक्षण से वहां की जनता त्रस्त हो चुकी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ये संकेत बता रहे हैं कि वंदेमातरम् की राष्ट्रीय चेतना वाली बंगभूमि जागृत हो चुकी है। वहां का जन-मानस ऐतिहासिक परिवर्तन करने वाला है। बंगाली भद्रोलोक में इस बार गहन चिंतन मंथन चला है।उनका मानना है कि अगर ममता बनर्जी, अपने मज़हबी तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठियों को संरक्षण न देतीं। दुर्गा पूजा, रामनवमी, हिन्दू त्योहारों पर लगातार अंकुश लगाने का प्रयास न करती तो उनके प्रति सहानुभूति बनी रहती।लेकिन ममता बनर्जी ने जिस ढंग से हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ हुई हिंसाओं में मौन साधे रखा। मज़हबी कट्टरपंथियों को संरक्षण देती रहीं। उससे बंगाली समुदाय के स्वाभिमान को धक्का लगा। संदेशखाली, आर जी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, दुर्गापुर लॉ कॉलेज, साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में महिलाओं के साथ हुए दुराचार, अत्याचार की — वीभत्स घटनाओं ने, उनके महिला सुरक्षा के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक महिला होने के नाते भी ममता बनर्जी का असंवेदनशील रूप पश्चिम बंगाल की जनता ने देखा है। जो ये बताता है कि वो सिर्फ़ अपने वोटबैंक की राजनीति करती हैं। उनके लिए महिला सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं ममता बनर्जी का खुलकर मुस्लिम पक्षकार के तौर पर आना। लगातार केंद्र की जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू न करना। केंद्र से हर मुद्दे पर टकराव लेना। SIR— के विरोध में उतरना। मालदा में ममता राज में, एसआइआर के काम में लगे 3 महिला सहित 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की झकझोर देने वाली घटना ने एक गंभीर ख़तरे की ओर संकेत किया है। जब एक भीड़ ने 9 घंटे तक उन्हें बंधक बनाए रखा। उकसावे के बयान दिए जाते रहे। अधिकारी अपनी जान बचाने की गुहार लगाते रहे। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय सुरक्षाबलों ने उन्हें रेस्क्यू किया।&nbsp;</div><div><br></div><div>स्थिति की भयावहता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वत: संज्ञान लिया। देर रात 2बजे तक सुनवाई की और NIA को जांच सौंपी। मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि —“कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल ने उन्हें देर रात और फिर सुबह इस स्थिति के बारे में सूचित किया था। सूचना मिलने के बावजूद मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और स्थानीय एसपी की भूमिका को 'बेहद निराशाजनक' है।”&nbsp;</div><div><br></div><div>मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि — “न्यायाधीशों को डराने-धमकाने या उनके काम में बाधा डालने के प्रयासों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और न्यायपालिका अपने अधिकारियों की सुरक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्पित है। पीठ ने आगे कहा कि राज्य सरकार की निष्क्रियता 'बेहद निंदनीय' है। यह घटना न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने और चल रही चुनावी प्रक्रिया को रोकने के लिए सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है।”&nbsp;</div><div><br></div><div>सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां ममता बनर्जी सरकार का असल चरित्र पेश करती हैं। आप सोचिए कि सीमावर्ती राज्य में ऐसे दृश्य कितने ख़तरनाक हैं। जहां एक संगठित भीड़ न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लेती हो। खुलेआम देश के संविधान और कानून को चुनौती दी जाती हो। हिंसा, उत्पात के दृश्य दिखाई देते हों। क्या ये देश की एकता और अखंडता को चुनौती नहीं है? आख़िर ये दुस्साहस कहां से आया? स्पष्ट है राज्य की ममता बनर्जी सरकार की उस तानाशाही और तुष्टिकरण की नीति से, जो केवल सत्ता चाहती है। उनके लिए राष्ट्रीयता जैसे मूल्य कोई मायने नहीं रखते हैं। कोई आम नागरिक भी सोचे कि — अगर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप ना करता, केंद्रीय बल रेस्क्यू न करते— तो क्या न्याय अधिकारी सुरक्षित रहते? अगर वहां न्याय अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं तो क्या आम नागरिक सुरक्षित हो सकता है? क्या ये दृश्य अलगाव, आतंक को स्पष्ट बयां नहीं करते हैं? क्या किसी भी नेता, राजनीतिक दल को, देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने की छूट दी जा सकती है?&nbsp;</div><div><br></div><div>पहले कम्युनिस्ट शासन उसके बाद ममता बनर्जी सरकार के लंबे समय के अराजक शासन से बंगाल त्रस्त हो गया है। वो अब इन सबसे मुक्ति चाहता है। इसी के दृश्य पश्चिम बंगाल में सर्वत्र दिखाई देते हैं। कोलकाता के रहने वाले एक युवा ने कहा कि— “पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाक़ों में अचानक बदलती डेमोग्राफी। पश्चिम बंगाल के संसाधनों पर डाका डालते, बांग्लादेशी घुसपैठियों, रोहिंग्याओं से लोगों में भय का वातावरण बना है।” लेकिन ममता सरकार में उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। ये सारी बातें ममता बनर्जी को ख़ासा डैमेज कर रही हैं। सुवेंदु अधिकारी के नामांकन रोड शो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सभाओं में लगातार उमड़ता विशाल जनसमूह—बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा है। बीजेपी को‌ लेकर जनता में जैसा उत्साह 2026 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है। वो परिवर्तन की बड़ी आहट के तौर पर दिखाई दे रहा है। महिलाओं, युवा, बुजुर्ग — सभी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के केन्द्रीय नेतृत्व, भाजपा की नीतियों को लेकर विश्वास की लहर दौड़ रही है। छोटे-छोटे बच्चे तक अपने माता-पिता के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैलियों में, सभाओं में पहुंच रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र के इंतज़ार में बच्चों के निश्छल, भावुक कर देने वाले वीडियो देखने को मिल रहे हैं। जहां तक नज़र जाती है वहां विशाल जनसमूह दिखाई देता है। जबकि दूसरी ओर ममता बनर्जी की संभाएं खाली दिख रही हैं। इसी के चलते प्रेशर से बचने के लिए उन्होंने जनसभाओं के आकार को छोटा कर दिया। ममता बनर्जी की सभाओं में लोग उनका बॉयकॉट करते नज़र आ रहे हैं। ये सब स्पष्ट संकेत हैं कि — पश्चिम बंगाल की भूमि इस बार अपने मूल स्वरूप में लौट आई है। संन्यासी क्रांति, वंदेमातरम् की भूमि- हिंसा, अत्याचार, अराजकता से मुक्ति चाहती है। वहीं पश्चिम बंगाल के अतिसंवेदनशील और संवदेनशील इलाक़ों में सेना ने जिस तरह से भयमुक्त निर्वाचन के लिए मोर्चा संभाला है। उससे जनता में उत्साह की लहर देखने को मिली है। लोग भयमुक्त होकर अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं। नए परिवर्तन के लिए आगे आ रहे हैं। स्पष्ट है कि हाल-फिलहाल पूरा गेम ममता के हाथों से फिसलता जा रहा है। पश्चिम बंगाल भाजपा की ओर रुख कर रहा है।‌ये आश्चर्य की कोई बात नहीं होगी कि — 4 मई को रिजल्ट के दिन हरियाणा और महाराष्ट्र जैसा मैजिक देखने को मिले। टीएमसी दो अंकों में सिमट जाए और बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ विजय तिलक करे।&nbsp;</div><div><br></div><div>— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल&nbsp;</div><div>(साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 19:22:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/wave-of-change-in-west-bengal-mamata-haunted-by-the-fear-of-defeat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[महिला कोटे से जुड़े संविधान बिल के लुढ़कने के सियासी निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-political-implications-of-the-constitutional-bill-on-women-quotas-falling-through]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इंडिया गठबंधन की विपक्षी एकजुटता ने पुनः सत्ताधारी गठबंधन एनडीए की नींद उड़ा दी है। ऐसा इसलिए कि लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, जो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लाने से जुड़ा था, 16 अप्रैल 2026 को वोटिंग में गिर गया। इसके पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े, जबकि न्यूनतम दो-तिहाई बहुमत (लगभग 352 वोट) की आवश्यकता थी, जो सरकार के रणनीतिकारों ने नहीं जुटा पाए। शायद पहली बार सदन में अमित शाह की रणनीति पिट गई। इसका राजनीतिक प्रभाव यह रहा कि मोदी सरकार के लिए 12 साल में पहली बड़ी संवैधानिक हार हुई है, जो विपक्ष की एकजुटता को दर्शाता है।</div><div><br></div><div>लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसे "संविधान पर हमला" बताकर कांग्रेस-विपक्ष की रणनीति की जीत घोषित की, जबकि भाजपा इसे विपक्ष विरोधी हथियार बनाने की योजना बना रही है। एक सत्ता विरोधी रणनीति के तहत जहां विपक्ष ने बिल को "छलावा" करार दिया, वहीं दावा किया कि यह परिसीमन और चुनावी नक्शा बदलने की साजिश है। वहीं, एक एनडीए नेता के अनुसार, बिल गिरने से सरकार अब सड़क पर विपक्ष को महिलाओं के अधिकारों के नाम पर घेरेगी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nari-shakti-vandan-adhiniyam-equality-in-power" target="_blank">नारी शक्ति वंदन अधिनियम: सत्ता में समानता</a></h3><div>हालांकि, सरकार ने शेष दो बिल (परिसीमन और अन्य) आगे नहीं बढ़ाए, क्योंकि वे मुख्य बिल पर निर्भर थे। एचएम अमित शाह और पीएम मोदी विपक्ष के विरोध को कांग्रेस के इतिहास से जोड़कर जनता में प्रचार करेंगे। यह 2029 चुनावों से पहले राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज कर सकता है। लेकिन इसका साइड इफेक्ट्स पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में भी दिख सकता है, क्योंकि विपक्षी एकजुटता का पुनः संदेश गया है।</div><div><br></div><div>वहीं, मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल को दोबारा लाने के लिए रणनीतिक बदलाव कर सकती है, खासकर 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में हार के बाद। समझा जाता है कि सरकार नई विधेयक रणनीति के तहत दो या तीन नए विधेयक ला सकती है: पहला लोकसभा सीटें बढ़ाकर (543 से 850 तक) 33% महिला आरक्षण सुनिश्चित करेगा, जिसमें एससी/एसटी के लिए सब-कोटा भी शामिल होगा। लेकिन फिर सवाल उठेगा कि ओबीसी और ईडब्ल्यूएस के लिए क्यों नहीं? दूसरा परिसीमन आयोग स्थापित करेगा, लेकिन इसे राज्यों के अनुमोदन से अलग रखा जा सकता है ताकि दो-तिहाई बहुमत आसान हो।</div><div><br></div><div>सरकार का मानना है कि विपक्ष से सहमति निर्माण के बाद आवश्यक कदम उठाए जाएंगे, क्योंकि पीएम मोदी सभी दलों को पत्र लिखकर सर्वसम्मति की अपील कर चुके हैं, इसी सिलसिले में कांग्रेस और अन्य विपक्षियों से बातचीत जारी है। महिला कोटा बिल को 2029 चुनावों से पहले लागू करने के लिए 2011 जनगणना पर आधारित संशोधन पर जोर दिया, और नई जनगणना-परीक्षण का इंतजार खत्म किया जाएगा। इसके निमित्त संसदीय प्रक्रिया यह हैं कि विशेष सत्र बुलाकर संशोधित बिल पेश करना संभव होगा, जहां 18 घंटे लोकसभा और 10 घंटे राज्यसभा चर्चा होगी। वहीं सड़क पर प्रचार के साथ विपक्ष को ओबीसी हितों पर घेराव, जिससे राजनीतिक दबाव बनेगा। यह 2029 से पहले बहुमत जुटाने की कोशिश होगी।</div><div><br></div><div>इस प्रकार देखा जाए तो महिला आरक्षण बिल को 2029 से पहले लागू करना संवैधानिक रूप से जटिल है, क्योंकि इसके लिए परिसीमन प्रक्रिया अनिवार्य है जो 2011 जनगणना पर आधारित होनी चाहिए। इसका संभावित विकल्प संशोधित बिल पुनर्प्रस्तावहै जिसके तहत सरकार दोबारा संशोधित विधेयक ला सकती है, जिसमें लोकसभा सीटें बढ़ाकर (543 से 850 तक) 33% महिला कोटा सुनिश्चित हो, लेकिन विपक्ष सहमति के बिना दो-तिहाई बहुमत मुश्किल है। इसलिए विपक्ष से सर्वसम्मति की पहल तेज है। सरकार सभी दलों से बातचीत तेज कर विशेष सत्र बुलाना, परिसीमन को अलग रखकर बिल पास करवाना, हालांकि विपक्ष इसे "परिसीमन साजिश" मान रहा है।</div><div><br></div><div>जहाँ तक व्यावहारिक बाधाओं की बात है तो परिसीमन आयोग को पब्लिक हियरिंग और प्रक्रिया में कम से कम 2-3 वर्ष लगते हैं, इसलिए 2029 चुनाव से पहले पूरा होना असंभव है। वहीं बिल गिरने से अब अगली जनगणना (2031) और उसके बाद के परिसीमन तक (2034+) देरी तय, दक्षिणी राज्यों की चिंताएं टल सकती हैं। सरकार सड़क प्रचार पर जोर देगी। वहीं विपक्ष ने लोकसभा में गिरे महिला आरक्षण संविधान संशोधन बिल पर मुख्य रूप से परिसीमन प्रक्रिया, ओबीसी/एससी/एसटी सब-कोटा और राजनीतिक साजिश को लेकर आपत्तियां दर्ज कीं। मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:-</div><div><br></div><div>पहला, परिसीमन साजिश: बिल को लोकसभा/विधानसभा सीटें बढ़ाने और 2011 जनगणना पर परिसीमन से जोड़ा गया, जिसे विपक्ष ने उत्तर भारत (विशेषकर भाजपा शासित राज्यों) को लाभ पहुंचाने वाली "सीट रिबनिंग" करार दिया। फलतः दक्षिणी राज्य अपनी सीटें खोने के डर से विरोधी हो गए।</div><div><br></div><div>दूसरा, ओबीसी/ईडब्ल्यूएस आरक्षण अनुपस्थिति: 33% महिला कोटा में ओबीसी, ईडब्ल्यूएस के लिए सब-कोटा न होने से सामाजिक न्याय का उल्लंघन ठहराया, और इसे "सवर्ण महिलाओं के लिए" नया मौका बताया।</div><div><br></div><div>तीसरा, संविधान पर हमला: राहुल गांधी ने इसे "संविधान बचाओ" का मुद्दा बनाया, और दावा किया कि बिल चुनावी नक्शा बदलकर विपक्ष कमजोर करेगा।</div><div><br></div><div>इस प्रकार राजनीतिक तर्क देते हुए विपक्ष ने इसे "छलावा" कहा, क्योंकि लागू होने में 2029-34 तक देरी होगी। इसलिए एकजुट होकर वोटिंग में भाजपा नीत एनडीए को हराया।</div><div><br></div><div>वहीं, मोदी सरकार ने विपक्ष की आपत्तियों का जवाब देते हुए बिल को महिलाओं के सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम बताया, जो 25-30 साल पहले ही लागू हो जाना चाहिए था। परिसीमन पर स्पष्टीकरण देते हुए सरकार ने कहा कि परिसीमन 2011 जनगणना पर आधारित होगा, जो निष्पक्ष है और दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा; यह सीट वृद्धि के साथ संतुलित होगा। अमित शाह ने चुनौती दी कि यदि विपक्ष संशोधन चाहे तो सदन एक घंटा रोकें, वे तुरंत बदलाव लाएंगे।</div><div><br></div><div>वहीं, ओबीसी/एससी/एसटी कोटा पर जवाब देते हुए सरकार ने ओबीसी/ईडब्ल्यूएस सब-कोटा की मांग पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सरकार ने स्पष्ट कहा कि संविधान धर्म या जाति आधारित अतिरिक्त आरक्षण की अनुमति नहीं देता; इसलिए मौजूदा एससी/एसटी कोटा में महिलाओं को प्राथमिकता रहेगी। पीएम मोदी ने विपक्ष को "महिलाओं के खिलाफ" करार दिया, और कहा कि पंचायत स्तर पर सफलता साबित हो चुकी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हालांकि राजनीतिक आरोपों का खंडन करते हुए और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के "संविधान पर हमला" सम्बन्धी दावे पर शाह ने कहा कि विपक्ष सैद्धांतिक रूप से सहमत था लेकिन वोटिंग में नकारा; अब सड़क पर इसका जवाब मिलेगा। सभी दलों से सर्वसम्मति की अपील की गई।</div><div><br></div><div>उल्लेखनीय है कि महिला आरक्षण बिल (संविधान 131वां संशोधन विधेयक 2026) के प्रमुख प्रावधान लोकसभा, और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए कुल सीटों का एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित करने से जुड़े हैं, जिसका&nbsp;</div><div>मुख्य प्रावधान इस प्रकार है:-</div><div><br></div><div>पहला, आरक्षण का दायरा: लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में कुल सीटों का 33% महिलाओं के लिए आरक्षित, जिसमें एससी/एसटी आरक्षित सीटों का भी एक-तिहाई हिस्सा शामिल है।</div><div><br></div><div>दूसरा, परिसीमन प्रक्रिया: 2011 जनगणना पर आधारित परिसीमन आयोग द्वारा सीटों का आवंटन और रोटेशन, जिसमें लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 तक प्रस्तावित है।</div><div><br></div><div>तीसरा, अवधि और प्रभावी तिथि: 15 वर्ष के लिए (संसद द्वारा विस्तार योग्य), अगले परिसीमन के बाद 2029 चुनावों से लागू होगा।</div><div><br></div><div>चौथा, अतिरिक्त विशेषताएं: रोटेशन आधारित सीटें प्रत्येक परिसीमन में बदलेंगी, लेकिन ओबीसी/ईडब्ल्यूएस सब-कोटा शामिल नहीं होना भी विवाद का कारण बना।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:53:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-political-implications-of-the-constitutional-bill-on-women-quotas-falling-through</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[चुनौतियों के चक्रव्यूह के बीच खड़ा बिहार का नया ‘सम्राट’]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/bihar-new-emperor-stands-amidst-a-labyrinth-of-challenges]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार की राजनीति में सत्ता का शिखर छूना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है उस शिखर पर टिके रहकर अपनी सर्वमान्यता सिद्ध करना। सम्राट चौधरी का बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में उदय राज्य के सियासी इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात माना जा रहा है। यह केवल एक व्यक्ति का मुख्यमंत्री बनना नहीं है बल्कि भारतीय जनता पार्टी का बिहार में उस ‘बड़े भाई’ की भूमिका को आधिकारिक रूप से स्वीकार करना है, जिसका इंतजार पार्टी कार्यकर्ता दशकों से कर रहे थे। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने की जिम्मेदारी अब सम्राट चौधरी के कंधों पर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह नीतीश कुमार की उस लंबी और गहरी छाया से बाहर निकल पाएंगे, जिसने पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति को परिभाषित किया है? यही वह कसौटी है, जिस पर अब सम्राट चौधरी को परखा जाएगा।</div><div><br></div><div>सम्राट चौधरी का राजनीतिक उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह उनके पिता शकुनी चौधरी की विरासत, और उनके स्वयं के आक्रामक संघर्ष, दशकों की राजनीतिक यात्रा, रणनीतिक धैर्य और समयानुकूल निर्णयों का परिणाम है। 16 नवंबर 1968 को मुंगेर के लखनपुर में जन्मे सम्राट ने बहुत कम उम्र में ही सत्ता का स्वाद चख लिया था। 1999 में राबड़ी देवी सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बनने से लेकर आज मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर वैचारिक बदलावों और रणनीतिक फैसलों से भरा रहा है। राजद और जदयू जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ काम करने के बाद 2017 में भाजपा का दामन थामना उनके करियर का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भाजपा ने उनमें एक ऐसे पिछड़ा नेतृत्व (ओबीसी) को देखा, जो न केवल संगठन में जान फूंक सकता था बल्कि राजद के ‘माई’ (एमवाई) समीकरण के सामने एनडीए के ‘लव-कुश’ समीकरण को मजबूती दे सकता था। विशेषकर कुशवाहा समुदाय से आने के कारण सम्राट चौधरी भाजपा के लिए सामाजिक संतुलन का सबसे सटीक मोहरा साबित हुए। भाजपा ने उन्हें न केवल स्वीकार किया बल्कि प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद देकर उनकी नेतृत्व क्षमता पर भरोसा भी जताया। यही भरोसा आज उन्हें मुख्यमंत्री पद तक ले आया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-command-of-bihar-is-in-the-hands-of-samrat-choudhary" target="_blank">सम्राट को सुशासन का हस्तांतरण</a></h3><div>मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी की नियुक्ति के साथ ही बिहार की राजनीति में एक दुर्लभ संयोग भी जुड़ा है। जननायक कर्पूरी ठाकुर के बाद वह दूसरे ऐसे नेता बने हैं, जिन्होंने पहले उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली और बाद में मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे। यह उपलब्धि उनके कद को तो बढ़ाती है लेकिन इसके साथ आने वाली अपेक्षाएं उनके लिए हिमालयी चुनौतियों जैसी हैं। नीतीश कुमार केवल एक राजनेता नहीं थे बल्कि वह बिहार के लिए एक ‘इंस्टीट्यूशन’ बन चुके थे। उनके 20 वर्षों के शासनकाल ने राज्य में सुशासन की एक ऐसी परिभाषा गढ़ी, जिसमें महिला सुरक्षा, सड़कें, बिजली और शराबबंदी जैसे मुद्दे हर घर से जुड़े थे। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वे स्वयं को नीतीश कुमार के विकल्प के रूप में पेश करते हैं या एक ऐसी नई पहचान गढ़ते हैं, जो नीतीश के ‘विकास’ और भाजपा की ‘वैचारिक प्रखरता’ का संगम हो।</div><div><br></div><div>अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि नीतीश कुमार जैसा सर्वमान्य नेता बनना सम्राट चौधरी के लिए रातों-रात संभव नहीं होगा। नीतीश कुमार की स्वीकार्यता समाज के हर वर्ग, चाहे वह महादलित हो, अति पिछड़ा हो या आधी आबादी (महिलाएं) हो, में गहराई तक थी। सम्राट चौधरी के पास फिलहाल एक मजबूत सांगठनिक ढांचा और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का आशीर्वाद है लेकिन उन्हें अपनी ‘आक्रामक छवि’ को अब ‘प्रशासकीय संयम’ में बदलना होगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद अब उनके हर फैसले की तुलना नीतीश कुमार के मानकों से की जाएगी। क्या वह उसी सहजता से महादलितों और अति पिछड़ों के हितों की रक्षा कर पाएंगे? क्या वह शराबबंदी जैसी पेचीदा नीतियों को लेकर जनता के बीच अपना स्पष्ट नजरिया रख पाएंगे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर उनके कार्यकाल के शुरुआती सौ दिन ही तय करेंगे।</div><div><br></div><div>चुनौतियां केवल बाहर ही नहीं, गठबंधन के भीतर भी हैं। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद जदयू के भविष्य और निशांत कुमार के सक्रिय राजनीति में प्रवेश ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है। जदयू के भीतर इस बदलाव को लेकर एक दबी हुई छटपटाहट है। सम्राट चौधरी को यह सुनिश्चित करना होगा कि गठबंधन के सहयोगी दल खुद को उपेक्षित महसूस न करें। साथ ही, उन्हें भाजपा के भीतर भी उन वरिष्ठ नेताओं को विश्वास में लेना होगा, जो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पीछे रह गए। सम्राट चौधरी पर उनके पुराने विवादों, जैसे कम उम्र में मंत्री पद से हटाए जाने की घटना और उनके शैक्षणिक पहलुओं को लेकर विपक्ष हमलावर रहेगा। एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पेशेवर छवि और शुचिता पर उठने वाले सवालों का सामना उन्हें अपनी कार्यशैली से ही करना होगा।</div><div><br></div><div>बिहार में 2025 का जनादेश एक तरह से ‘फेयरवेल मैंडेट’ जैसा रहा है, जहां जनता बदलाव की मानसिक तैयारी कर चुकी थी। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी ताकत उनका ओबीसी समुदाय से होना और भाजपा आलाकमान का पूर्ण समर्थन है लेकिन उनकी राह का सबसे बड़ा कांटा ‘नीतीश कुमार का औरा’ है। भाजपा ने अब तक बिहार में नीतीश कुमार के साये में राजनीति की है, अब उसे अपनी स्वतंत्र इमारत खड़ी करनी है, जिसकी नींव सम्राट चौधरी को रखनी है। यह सफर कांटों भरा है क्योंकि उन्हें न केवल विकास की रफ्तार बनाए रखनी है बल्कि बिहार की उस जटिल सामाजिक संरचना को भी साधे रखना है, जहां जाति की राजनीति कभी खत्म नहीं होती। सम्राट चौधरी की कहानी एक ऐसे संघर्षशील नेता की है, जिसने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनकी असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। क्या वे बिहार को ‘बीमारू’ छवि से पूर्णतः मुक्त कर ‘विकसित बिहार’ के संकल्प को सिद्ध कर पाएंगे? यह भविष्य के गर्भ में है मगर फिलहाल बिहार की सत्ता का यह नया ‘सम्राट’ चुनौतियों के चक्रव्यूह के बीच खड़ा है। सम्राट चौधरी के पास अवसर भी है और चुनौती भी, अब यह उनके नेतृत्व पर निर्भर करेगा कि वे इस अवसर को इतिहास में कैसे दर्ज कराते हैं।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:17:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/bihar-new-emperor-stands-amidst-a-labyrinth-of-challenges</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[लाल गलियारे का अंत: शाह की 'जीरो टॉलरेंस' नीति ने रची सुरक्षा की नई इबारत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-end-of-the-red-corridor-shah-zero-tolerance-policy-scripts-a-new-chapter-in-security]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में यदि किसी एक समस्या ने दशकों तक देश की प्रगति को बाधित किया और हजारों निर्दोषों का लहू बहाया, तो वह नक्सलवाद था। एक समय ऐसा भी था जब तत्कालीन सरकारों ने इसे देश के लिए 'सबसे बड़ा खतरा' स्वीकार किया था, लेकिन इसके समाधान के लिए वह ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई थी जो आज नजर आ रही है। आज जब हम 2026 के मुहाने पर खड़े हैं, तो भारत के नक्शे से 'लाल गलियारे' का सिकुड़ता दायरा और बस्तर के जंगलों में गूंजती शांति इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की 'जीरो टॉलरेंस' नीति ने इस नासूर को जड़ से उखाड़ फेंकने का काम किया है।अमित शाह ने गृह मंत्रालय की कमान संभालते ही नक्सलवाद को केवल एक स्थानीय कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय इसे एक राष्ट्रव्यापी सुरक्षा चुनौती के रूप में चिन्हित किया और इसे समाप्त करने के लिए 'समाधान' और 'लौह प्रहार' जैसी रणनीतियों का सूत्रपात किया।&nbsp;</div><div><br></div><div>अमित शाह की कार्यशैली का सबसे प्रमुख पहलू उनका 'परिणाम-आधारित' दृष्टिकोण है। उन्होंने अपने विभिन्न भाषणों में बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि नक्सलवाद का अस्तित्व केवल बंदूकों के दम पर नहीं, बल्कि विकास की कमी और वैचारिक भ्रम के कारण टिका हुआ था। शाह ने उन 'अर्बन नक्सल' समूहों को भी बेनकाब किया जो शहरों में बैठकर जंगलों में हिंसा फैलाने वालों के लिए वैचारिक कवच तैयार करते थे। गृह मंत्री का मानना है कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है, और यदि कोई समूह हथियार उठाकर संविधान को चुनौती देता है, तो उसे उसी की भाषा में जवाब देना राज्य का उत्तरदायित्व है। इसी सोच के तहत उन्होंने सुरक्षा बलों को वह 'फ्री हैंड' दिया, जिसकी मांग वे दशकों से कर रहे थे। आज सुरक्षा बल न केवल नक्सलियों के गढ़ों में घुसकर प्रहार कर रहे हैं, बल्कि उन दुर्गम इलाकों में भी तिरंगा फहरा रहे हैं जहाँ पहले जाना असंभव माना जाता था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/maoists-will-no-longer-thrive-do-spare-a-thought-for-them-too" target="_blank">अब नहीं पनपेंगे माओवादी: जरा याद इन्हें भी कर लो</a></h3><div>पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड के सीमावर्ती इलाकों में सैकड़ों नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं। इन कैंपों ने नक्सलियों की रसद, सूचना तंत्र और छिपने के ठिकानों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। अमित शाह ने व्यक्तिगत रूप से इन क्षेत्रों का दौरा कर जवानों का मनोबल बढ़ाया और उन्हें आधुनिक तकनीक, ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और संचार के बेहतर साधनों से लैस किया। गृह मंत्री ने संसद में स्पष्ट किया था कि जब तक अंतिम नक्सली हथियार नहीं डाल देता या उसका सफाया नहीं हो जाता, तब तक सरकार चैन से नहीं बैठेगी। अमित शाह की रणनीति केवल सैन्य कार्यवाही तक सीमित नहीं रही है। उनके भाषणों का एक बड़ा हिस्सा 'विकास' को समर्पित रहा है। उनका तर्क है कि जहाँ सड़क पहुँचती है, वहाँ नक्सलवाद पीछे हट जाता है। इसी सोच के साथ उन्होंने सड़क संपर्क परियोजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। हजारों किलोमीटर लंबी सड़कों का जाल उन इलाकों में बिछाया गया जहाँ कभी नक्सलियों का खौफ हुआ करता था। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। एकलव्य मॉडल स्कूलों के माध्यम से जनजातीय बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ना और मोबाइल टावरों के जरिए डिजिटल इंडिया को घने जंगलों तक पहुँचाना शाह के 'सर्वांगीण विकास' मॉडल का हिस्सा है। जब एक आदिवासी युवक के हाथ में बंदूक के बजाय स्मार्टफोन और रोजगार के अवसर आए, तो नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया स्वतः ही ध्वस्त हो गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>अमित शाह ने बार-बार एक और महत्वपूर्ण बात कही है—'संवाद और पुनर्वास'। उन्होंने उन युवाओं के लिए हमेशा 'लाल कालीन' बिछाई है जो गुमराह होकर हिंसा की राह पर चले गए थे। सरकार की आत्मसमर्पण नीति को इतना आकर्षक और सुलभ बनाया गया कि हजारों नक्सलियों ने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। शाह ने अपने भाषणों में स्पष्ट संदेश दिया कि सरकार उन लोगों के प्रति सहानुभूति रखती है जो भटक गए हैं, लेकिन जो निर्दोषों की हत्या और विकास कार्यों में बाधा डालेंगे, उन्हें सुरक्षा बलों के लौह प्रहार का सामना करना पड़ेगा। यह 'कैरेट एंड स्टिक' (पुरस्कार और दंड) की नीति ही थी जिसने नक्सली संगठनों के भीतर दरार पैदा कर दी और उनके नेतृत्व को कमजोर कर दिया।</div><div><br></div><div>आज झारखंड का 'बूढ़ा पहाड़' हो या छत्तीसगढ़ का 'अबूझमाड़', इन क्षेत्रों की पहचान अब आतंक के बजाय प्रगति से होने लगी है। अमित शाह ने सुरक्षा बलों, राज्य सरकारों और खुफिया एजेंसियों के बीच जिस तरह का समन्वय स्थापित किया, वह प्रशासनिक कौशल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने 'यूनिफाइड कमांड' के माध्यम से सूचनाओं के आदान-प्रदान को तेज किया, जिससे ऑपरेशन की सटीकता बढ़ी और सुरक्षा बलों के हताहत होने की दर में भारी कमी आई।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div>अमित शाह का योगदान आधुनिक भारत के निर्माण में एक ऐसे सेनापति के रूप में देखा जाएगा जिसने देश की आंतरिक एकता को खंडित करने वाली सबसे बड़ी शक्ति को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। उनके नेतृत्व में भारत ने न केवल नक्सलियों को हराया है, बल्कि उन लाखों लोगों के मन में विश्वास जगाया है जो दशकों तक डर और अभाव के साये में जीने को मजबूर थे। आज का भारत अब 'लाल गलियारे' के अंत का जश्न मना रहा है और विकास के नए क्षितिज की ओर अग्रसर है, जहाँ गोलियों की जगह कलम होगी और भय की जगह स्वाभिमान होगा।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत भूषण अरजरिया,</div><div>प्रभारी मीडिया काउंसिल ऑफ इंडिया</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:41:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-end-of-the-red-corridor-shah-zero-tolerance-policy-scripts-a-new-chapter-in-security</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[लीजिये अब Corporate Jihad आ गया! Nashik TCS Case और Amravati कांड ने मचाया देशभर में हड़कंप]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-nashik-tcs-case-and-the-amravati-scandal-have-created-a-stir-across-the-country]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महाराष्ट्र के नासिक और अमरावती में सामने आए हिंदू महिलाओं के धर्मांतरण और यौन शोषण से जुड़े मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इन घटनाओं ने न केवल कार्यस्थलों की सुरक्षा और महिलाओं की गरिमा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह बहस भी तेज कर दी है कि क्या संगठित तरीके से हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है? अमरावती में सैंकड़ों लड़कियों के यौन शोषण को लव जिहाद का मामला बताया जा रहा है तो वहीं नासिक में टीसीएस के ऑफिस में हुए धर्मांतरण और यौन शोषण मामले को कॉर्पोरेट जिहाद की संज्ञा दी जा रही है। पिछले साल पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने पर्यटकों को उनका धर्म पूछ कर मारा था और अब देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आ रही घटनाएं दर्शा रही हैं कि धर्म के आधार पर निशाना बनाने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं और इसका सबसे आसान शिकार महिलाएं और लड़कियां बन रही हैं।</div><div><br></div><div>सबसे पहले नासिक से सामने आये घटनाक्रम की बात करें तो आपको बता दें कि एक प्रमुख आईटी कंपनी टीसीएस में काम करने वाली महिला कर्मचारियों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों ने पूरे कॉर्पोरेट जगत में हलचल मचा दी है। कई महिला कर्मचारियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और धार्मिक दबाव बनाने जैसे आरोप लगाए हैं। इन शिकायतों के आधार पर पुलिस ने कई प्राथमिकी दर्ज की हैं और अब तक कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/fadnavis-major-action-in-nashik-tcs-casesays-it-a-serious-matter-the-culprits-will-not-be-spared" target="_blank">Nashik TCS केस में फडणवीस का बड़ा एक्शन, बोले- गंभीर मामला, दोषी बख्शे नहीं जाएंगे</a></h3><div>शिकायतों के अनुसार, यह घटनाएं पिछले दो से तीन वर्षों के दौरान हुईं। पीड़िताओं की उम्र लगभग अठारह से पच्चीस वर्ष के बीच बताई गई है। आरोप है कि कुछ टीम लीडर और कर्मचारी महिलाओं को नौकरी, वेतन वृद्धि या अन्य लाभ का लालच देकर उनका शोषण करते थे। पुलिस के अनुसार, इस मामले में दुष्कर्म, छेड़छाड़ और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से जुड़े मामले दर्ज किए गए हैं। एक विशेष जांच दल का गठन किया गया है, जो तकनीकी और भौतिक साक्ष्यों के आधार पर जांच कर रहा है। इस बीच, कंपनी ने बयान जारी कर कहा है कि वह किसी भी प्रकार के उत्पीड़न के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति अपनाती है और जांच पूरी होने तक आरोपित कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है। हालांकि, यह सवाल भी उठ रहे हैं कि यदि पहले शिकायतें की गई थीं तो उन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?</div><div><br></div><div>देखा जाये तो इस मामले ने बीपीओ और केपीओ क्षेत्र के कार्य वातावरण पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। कुछ कर्मचारियों ने दावा किया कि रात की शिफ्ट, कमजोर निगरानी और पद पर बैठे लोगों की शक्ति का दुरुपयोग ऐसे मामलों को बढ़ावा देता है। कुछ पीड़ितों का कहना है कि उन्हें बार बार व्यक्तिगत टिप्पणियों, अनुचित प्रस्तावों और दबाव का सामना करना पड़ा। कुछ मामलों में कथित तौर पर निजी तस्वीरों या वीडियो के माध्यम से ब्लैकमेल करने की भी बात सामने आई है। एक पुरुष कर्मचारी ने भी मानसिक दबाव और जबरदस्ती धार्मिक आचरण अपनाने के लिए मजबूर किए जाने का आरोप लगाया है। हालांकि इन दावों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन यह स्पष्ट है कि कार्यस्थल की सुरक्षा, शिकायत निवारण प्रणाली और निगरानी तंत्र को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं।</div><div><br></div><div>इसी बीच महाराष्ट्र के अमरावती जिले में एक और सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें एक 19 वर्षीय युवक पर कई युवतियों को बहला फुसलाकर उनके आपत्तिजनक वीडियो बनाने और उन्हें फैलाने का आरोप है। पुलिस के अनुसार, आरोपी युवतियों से दोस्ती करता था, उनका विश्वास जीतता था और फिर उन्हें निजी संबंधों में फंसाकर वीडियो रिकॉर्ड करता था। बाद में इन वीडियो का इस्तेमाल कथित तौर पर दबाव और ब्लैकमेल के लिए किया गया। आरोपी के पास से मोबाइल, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरण बरामद किए गए हैं, जिन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है।</div><div><br></div><div>उधर, पुलिस सूत्रों के अनुसार, मुख्य आरोपी ने पूछताछ में स्वीकार किया कि वह सोशल मीडिया के माध्यम से युवतियों से संपर्क करता था और धीरे-धीरे उन्हें अपने प्रभाव में लेता था। उसका सोशल मीडिया पर सक्रिय होना और दिखावटी जीवनशैली भी इस प्रक्रिया में सहायक रही। जांच एजेंसियां अब यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या इस मामले में कोई संगठित नेटवर्क शामिल है या यह व्यक्तिगत स्तर का अपराध है।</div><div><br></div><div>इस बीच, दोनों मामलों ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। कुछ नेताओं ने इन घटनाओं को कार्यस्थल सुरक्षा और कानून व्यवस्था की विफलता बताया है, जबकि अन्य ने इसे व्यापक सामाजिक समस्या के रूप में उठाया है। कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए और आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई। वहीं इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर धर्मांतरण कराने वालों पर NSA-UAPA लगाने की मांग की है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, नासिक और अमरावती के ये दोनों मामले इस बात की ओर संकेत करते हैं कि कार्यस्थलों और समाज में महिलाओं की सुरक्षा, डिजिटल अपराधों की रोकथाम और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई बेहद जरूरी है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 17:46:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-nashik-tcs-case-and-the-amravati-scandal-have-created-a-stir-across-the-country</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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