By अभिनय आकाश | Sep 21, 2026
एक तरफ मॉस्को, दूसरी तरफ वाशिंगटन और बीच में भारत। रूस पर अमेरिकी दबाव बढ़ रहा है। अमेरिका ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टेरिफ लगाने का रास्ता खोल दिया है। ठीक इसी दौर में भारत के आर्मी चीफ जनरल धीरज सेठ रूस पहुंच रहे हैं। मॉस्को में रूसी सेना के बड़े अधिकारियों से उनकी मुलाकात होती है। डिफेंस कोऑपरेशन पर बात होती है। जॉइंट कैपेबिलिटी डेवलपमेंट की भी बात होती है और सैन्य सहयोग को और मजबूत करने की भी बात होती है। भारत के आर्मी चीफ जनरल धीरज सेठ 16 से 18 सितंबर तक रूस के आधिकारिक दौरे पर रहे। यह सिर्फ औपचारिक दौरा नहीं था। इस दौरान रूस के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ बातचीत होती है। रूसी लैंड फोर्सेस के कमांडर इन चीफ कर्नल जनरल आंद्रेई मोर्द विचेव के साथ सैन्य सहयोग और ट्रेनिंग जैसे मुद्दों पर बातचीत होती है। इसके अलावा रूसी रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ रक्षा उद्योग और प्रोक्योरमेंट से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत होती है। यानी कि बातचीत सिर्फ सैनिकों के आदानप्रदान तक सीमित नहीं थी। इसमें रक्षा टेक्निक, प्रशिक्षण, क्षमता का विकास और रक्षा खरीद जैसे बड़े मुद्दे शामिल थे।
अब यहां पर असली सवाल पैदा हो रहा है कि अगर अमेरिका रूस पर दबाव बढ़ा रहा है तो भारत रूस के साथ सैन्य रिश्ते क्यों बनाए रख रहा है? इसका जवाब भारत रूस रिश्ते के इतिहास में छुपा है। भारत और रूस या कहें भारत और सोवियत संघ के बीच रक्षा सहयोग कई दशकों पुराना है। भारतीय सेना के बड़े हिस्से के हथियार और सैन्य प्लेटफार्म लंबे समय तक सोवियत और रूसी टेक्निक पर आधारित रहे। फाइटर जेट हो, टैंक हो, मिसाइल हो, मिसाइल का सिस्टम हो, हेलीकॉप्टर हो, तोपे हो और कई तरह के सैन्य उपकरण हैं। रूस भारत के रक्षा ढांचों में लंबे समय से एक अहम भागीदार रहा है और इसीलिए किसी एक फैसले से यह रिश्ता अचानक से खत्म हो ही नहीं सकता। बल्कि भारत बीते कुछ सालों में एक साथ कई देशों के साथ रक्षा संबंध बढ़ा रहा है। अमेरिका के साथ भी बढ़ा रहा है। फ्रांस के साथ भी बढ़ा रहा है। इजराइल के साथ भी बढ़ा रहा है और रूस के साथ भी बढ़ा ही रहा है। यानी भारत की रणनीति को सिर्फ किसी एक खेमे में जाने के तौर पर देखना तस्वीर नहीं है। भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अलग-अलग साझेदारों के साथ काम करता रहा है। वापस आते हैं रूस के दौरे पर।
दोनों देशों की सेनाएं ऐसी क्षमताओं पर सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं जिसमें प्रशिक्षण तकनीकी समझ, सैन्य अनुभव साझा करना शामिल हो। इसके अलावा प्रोफेशनल मिलिट्री एक्सचेंज भी बातचीत का हिस्सा रहा है। यानी दो दोनों ही सेनाओं के अधिकारी और सैन्य संस्थान एक दूसरे के अनुभव और प्रशिक्षण साझा करते हैं। सवाल यह है कि क्या इसका मतलब है कि भारत अमेरिका से दूर जा रहा है? सिर्फ इस दौरे के आधार पर ऐसा कोई कंक्लूजन ठीक नहीं है क्योंकि भारत अमेरिका रक्षा संबंध भी बीते सालों में काफी बड़े हैं। भारत अमेरिका से कई रक्षा प्लेटफार्म और टेक्निक्स लेता है। दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यास होते रहते हैं। अभी भी हुआ और रणनीतिक सहयोग भी बढ़ा है और इसलिए तस्वीर कुछ ऐसी है कि भारत रूस के साथ पुराने रिश्ते को बरकरार रखना चाहता है और अमेरिका और दूसरे देशों के साथ भी अपने रक्षा संबंध आगे बढ़ा रहा है। यानी भारत के लिए मुद्दा किसी एक देश को चुनने वाला नहीं है। बल्कि अपनी सुरक्षा, जरूरतों और रणनीतिक हितों के हिसाब से साझेदारी को मैनेज करना है। लेकिन अमेरिका का नया टेरिफ कानून इस बैलेंस को चुनौती दे सकता है। क्योंकि अगर रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टेरिफ लगा तो भारत के सामने आर्थिक और रणनीतिक दोनों तरह के सवाल खड़े हो जाएंगे।