लू से 700 मौतें हो गई, राजनीतिक दलों ने उफ तक नहीं की

By योगेंद्र योगी | Jun 05, 2025

देश में आम लोगों की जिन्दगी कोई मोल नहीं है। कम से कम सरकारों और राजनीतिक दलों की नजर में तो बिल्कुल नजर नहीं आता। मुद्दा यदि वोट बैंक से जुड़ा हुआ हो, तभी राजनीतिक दल कुछ गंभीरता बेशक दिखा लें किन्तु लोगों के जीवन-मरण जैसे मुद्दों से लगता यही है कि उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है। यदि ऐसा नहीं होता तो अदालतों को मौसम की मार से होने वाली मौतें रोकने के लिए सरकारों को दिशा-निर्देश नहीं देने पड़ते। आश्चर्य की बात यह है कि प्रतिकूल मौसम से आम लोगों को बचाने की जिम्मेदारी केंद्र और राज्यों की सरकारों की है, किन्तु यह काम भी अब अदालतों को करना पड़ रहा है। इससे सवाल खड़ा होता है कि आखिर सरकारों की जरूरत कितनी सीमित रह गई है।   

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याचिका में यह भी बताया गया है कि 2019 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हीटवेव से निपटने के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी किए थे, लेकिन कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अब तक उस पर काम ही नहीं किया। याचिका में यह भी जिक्र है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 35 के अनुसार केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस तरह की आपदा से निपटने के लिए पुख्ता इंतजाम करे। इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट ने अधिकारियों के रवैये पर गहरी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि पिछले साल दिए गए अदालत के निर्देशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। कोर्ट ने कहा कि यह कानून के शासन पर सवाल उठाता है। अधिकारी स्वयं को कानून से ऊपर मान रहे हैँ, लेकिन कोर्ट आंख बंद करके नहीं बैठ सकता। इंसानों से जानवरों जैसा बर्ताव नहीं हो सकता और न जान बचाने के लिए धन की कमी का बहाना चल सकता। कोर्ट ने मुख्य सचिव से अदालती आदेशों की पालना के लिए समन्वय समिति बनाने और लू से बचाव के लिए कार्ययोजना बनाने का निर्देश दिया, वहीं केन्द्रीय गृह मंत्रालय, मुख्य सचिव व राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तथा केन्द्र व राज्य सरकार के 10 अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।   

मई के पहले सप्ताह में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने देश के उत्तरी, मध्य और पश्चिमी भागों में गर्मियों के दौरान पडऩे वाली लू के मद्देनजर 11 राज्यों से कहा है कि वे कमजोर लोगों, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, बाहरी कामगारों, वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों और बेघर लोगों की सुरक्षा के लिए तत्काल एहतियाती कदम उठाएं, जो पर्याप्त आश्रय और संसाधनों की कमी के कारण जोखिम में हैं। वर्ष 2018 से 2022 के बीच गर्मी और लू के कारण 3,798 लोगों की मौत के बारे में एनसीआरबी के आंकड़ों पर प्रकाश डालते हुए आयोग ने एकीकृत और समावेशी उपायों की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया है। आयोग ने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और राजस्थान के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में आश्रयों की व्यवस्था, राहत सामग्री की आपूर्ति, कार्य घंटों में संशोधन और गर्मी से संबंधित बीमारियों के इलाज के लिए मानक प्रक्रियाओं की उपलब्धता की मांग की है।   

भारत में वर्ष 2001 से 2019 के बीच हीटवेव यानी लू से करीब 20,000 लोगों की मौत हुई है। एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ कि पुरुषों में लू से होने वाली मौतों की आशंका ज्यादा पाई गई। एक और हालिया अध्ययन में यह बताया गया है कि हीटवेव से होने वाली मौतें जातीय आधार पर भी बंटी हुई हैं। भारत में हाशिए पर मौजूद समुदायों से ताल्लुक रखने वाले लोगों की मौतें, अन्य समुदायों की तुलना में, लू से कहीं ज्यादा हुईं। अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि यह एक तरह की 'थर्मल इनजस्टिस' (गर्मी से जुड़ा अन्याय) की स्थिति है। संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की 2021 की एक रिपोर्ट जैसी कई रिपोर्टों ने चेतावनी दी है कि भारत समेत एशिया के कई हिस्सों में आने वाले वर्षों में और भी एक्स्ट्रीम वेदर इवेंट्स, जैसे कि हीटवेव, देखने को मिलेंगी। हर साल गर्मी के रिकॉर्ड टूटते जा रहे हैं।   

भारत के मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, फरवरी 2025 भारत में बीते 125 वर्षों में सबसे गर्म फरवरी का महीना रहा है। टीम ने पाया कि 2001 से 2019 के बीच भारत में हीटस्ट्रोक से 19,693 मौतें और अत्यधिक ठंड से 15,197 मौतें दर्ज की गईं। हालांकि, यह संख्या असल आंकड़ों से कम हो सकती है क्योंकि अत्यधिक तापमान के संपर्क में आने से होने वाली मौतों की रिपोर्टिंग पर्याप्त रूप से नहीं होती। यह बात 29 अप्रैल को प्रकाशित एक अध्ययन में कही गई है, जो वैज्ञानिक पत्रिका 'टेम्परेचर' में प्रकाशित हुआ। अध्ययन में यह भी पाया गया कि हीटस्ट्रोक से मरने वालों में पुरुषों की संख्या अधिक थी; इस अवधि में महिलाओं की तुलना में पुरुषों की मौतें तीन से पांच गुना ज़्यादा थीं। इतना ही नहीं लू जैसी आपदा के अलावा बाढ़, अतिवृष्टि और बिजली गिरने जैसी आपदाओं में हर साल हजारों लोग काल कलवित हो जाते हैं। ऐसे मुद्दे राजनीतिक दलों के एजेंडे में शामिल नहीं हैं। कोई भी राजनीतिक दल घोषणा करना तो दूर बल्कि यह दावा तक नहीं करता कि किसी भी व्यक्ति की मौत ऐसे प्राकृतिक कारणों से नहीं होगी। इससे साफ जाहिर है कि राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में ऐसी मौतों की रोकथाम के गंभीर प्रयास करना या इसे चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करना नहीं है। कारण स्पष्ट है इससे दलों के वोट बैंक में इजाफा नहीं होता। ऐसे मुद्दों के लिए सत्तारुढ़ दलों के नेताओं से अधिक नौकरशाहों को जिम्मेदार बनाने की जरूरत है। इनकी जवाबदेयी के लिए जब तक कानून के तहत दंड का प्रावधान नहीं होगा, तब हर साल प्राकृतिक आपदाओं लोगों की मौत होती रहेंगी।

- योगेन्द्र योगी

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