By भारत भूषण अड़जरिया | Apr 22, 2026
भारत की अधिकांश जनसंख्या गाँवों में बसती है, जहाँ की मिट्टी ने मिल्खा सिंह, पी.टी. उषा और नीरज चोपड़ा जैसे महान खिलाड़ी दिए हैं। इसके बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में खेलों की स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। विभिन्न शिक्षा रिपोर्टों और सरकारी आंकड़ों (जैसे UDISE+) के अनुसार, आज भी लगभग 30 प्रतिशत से अधिक सरकारी स्कूलों के पास अपना स्वयं का खेल का मैदान नहीं है। जहाँ मैदान उपलब्ध भी हैं, वहाँ उनका रखरखाव इतना खराब है कि वे खेल गतिविधियों के लिए सुरक्षित नहीं माने जा सकते। बाउंड्री वॉल का न होना, मैदान में झाड़ियाँ उगना या स्थानीय लोगों द्वारा अतिक्रमण करना एक आम समस्या बन गई है, जिसके कारण बच्चों को सड़कों या संकरी गलियों में खेलने को मजबूर होना पड़ता है।
सामाजिक और नीतिगत स्तर पर भी ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को वह सहयोग नहीं मिल पाता जिसकी वे हकदार हैं। ग्रामीण परिवेश में आज भी 'पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब' वाली कहावत हावी है, जहाँ खेलों को पढ़ाई में बाधा माना जाता है। केंद्र सरकार की 'खेलो इंडिया' जैसी योजनाएं निस्संदेह सराहनीय हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ अभी भी शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक ही सिमटा हुआ है। ग्रामीण ब्लॉकों में इन योजनाओं का क्रियान्वयन बेहद सुस्त है। संसाधनों के इस अभाव का सीधा परिणाम ग्रामीण युवाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। खेलों की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण बच्चे शारीरिक गतिविधियों से दूर होकर मोबाइल गेमिंग और डिजिटल व्यसनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यदि भारत को वास्तव में एक वैश्विक खेल महाशक्ति बनना है, तो हमें अपनी नीतियों के केंद्र में ग्रामीण विद्यालयों को रखना होगा। जब तक गाँव के हर स्कूल में एक समतल मैदान, आवश्यक खेल उपकरण और एक समर्पित कोच की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक 'फिट इंडिया' और ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना अधूरा ही रहेगा। इसके लिए पंचायत स्तर पर बजटीय आवंटन बढ़ाना और निजी क्षेत्रों को खेल बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना अनिवार्य है।
- भारत भूषण अड़जरिया
(मीडिया प्रभारी, दिल्ली विश्वविद्यालय)