आम आदमी पार्टी की हार, भाजपा की सरकार

By सुरेश हिंदुस्तानी | Feb 08, 2025

कहा जाता है कि जिसको जल्दी सफलता मिलती है, वह उस सफलता को यथावत नहीं रख सकता। जिसको संघर्ष के बाद सफलता मिलती है, वह स्थायित्व को प्राप्त कर सकती है, क्योंकि संघर्ष करने से अनुभव आता है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को ऐसी ही सफलता मिली, जिसे संभालने का राजनीतिक अनुभव उनके पास नहीं था। लोक लुभावन वादे एक निश्चित अवधि तक ही सुख का अनुभव करा सकते हैं, वह लम्बे समय तक सफलता का आधार नहीं बन सकता। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में लगभग यही दिखाई दिया। केजरीवाल को बिना लम्बे परिश्रम के सत्ता मिल गई, जिसे वे स्थायित्व नहीं दे सके। वे खुद भी चुनाव हार गए और उनके बाद आम आदमी पार्टी में दूसरे नंबर पर आने वाले नेता मनीष सिसोदिया को भी पराजय का सामना करना पड़ा।

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दिल्ली के विधानसभा चुनाव परिणाम का अध्ययन किया जाए तो यही परिलक्षित होता है कि इस बार अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस को आईना दिखाने के प्रयास में अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का ही काम किया है। अगर अरविन्द केजरीवाल कांग्रेस की बात मानकर गठबंधन कर लेते तो चुनाव परिणाम की तस्वीर कुछ और ही होती, लेकिन अरविन्द केजरीवाल का अहंकार ही उनको ले डूबा। हम जानते हैं कि एक बार आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि “मोदी जी दिल्ली में आम आदमी पार्टी को इस जन्म में तो आप हरा नहीं सकते”। ऐसी भाषा को सुनकर यही लगता है कि केजरीवाल को अहंकार हो गया था। दूसरी बड़ी बात यह है कि उन पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे थे, इन सब आरोपों पर उन्होंने हमेशा भाजपा पर निशाना साधने का काम किया। जबकि यह सारा काम जांच एजेंसियों और सर्वोच्च न्यायालय ने किया। अरविन्द केजरीवाल को जेल भेजने का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय का था, लेकिन उनका आरोप भाजपा पर था। दिल्ली की जनता ने केजरीवाल की इस बात को झूंठ ही माना। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल इस तथ्य को भूल गए कि भारतीय जनता पार्टी का भी दिल्ली में व्यापक राजनीतिक प्रभाव है। लोकसभा के चुनाव में भाजपा को दिल्ली की सभी सीट प्राप्त होना, इसको प्रमाणित भी करता है। विधानसभा में भाजपा को भले ही कम सफलता मिली हो, लेकिन इससे भाजपा के राजनीतिक प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। बड़ी बात यह भी है कि भाजपा ने भी इस चुनाव को आम आदमी पार्टी की तर्ज पर ही लड़ा। भाजपा ने लोहे को लोहे से काटने की रणनीति पर काम किया, जिसमें भाजपा ने बाजी मार ली।

दिल्ली के चुनाव में इस बार जिस प्रकार से आधुनिक संचार तकनीक का प्रयोग किया गया, उसने भी केजरीवाल की कथनी और करनी की भिन्नता को ही उजागर किया। केजरीवाल एक बात पर टिके दिखाई नहीं दिए। वे कभी कुछ तो कभी उसके विपरीत दिखाई दिए। यमुना साफ करने के नाम पर बार बार वादे करना आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के लिए भारी पड़ गया। यह बात सही है कि वादे करना सरल है, उनको पूरा करना उतना ही कठिन है। केजरीवाल जो वादे कर रहे थे, वे वही वादे थे, जो उन्होंने दस वर्ष पूर्व किए थे। उनमें से कई बड़े वादे अब तक पूरे नहीं किए जा सके। सबसे बड़ा वादा यमुना साफ करने का ही था। इसके अलावा भ्रष्टाचार समाप्त करने के नाम पर गठित आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल खुद ही भ्रष्टाचार के आरोप में जेल की हवा खा चुके थे। हद तो तब हो गई, ज़ब वे अपनी सरकार को जेल से ही चलाने लगे। उधर उनको ज़मानत मिलने पर सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट निर्देश दिया कि केजरीवाल न तो मुख्यमंत्री कार्यालय में जा सकते हैं और न ही किसी फ़ाइल पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। केजरीवाल अभी भी आरोपी हैं, इसलिए उनका मुख्यमंत्री बनना असंभव ही था, क्योंकि अगर वे चुनाव जीतते तो बिना काम के मुख्यमंत्री ही रहते। ये सब भ्रष्टाचार के आरोप के कारण ही हुआ। वहीं दूसरी तरफ केजरीवाल के राजनीतिक गुरु के रूप प्रचारित समाजसेवी अण्णा हजारे इस चुनाव में केजरीवाल से रूठे से दिखाई दिए। इसको केजरीवाल के विरोधियों ने एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, जो सही निशाने पर जाकर लगा है।

दिल्ली चुनाव के बारे में मतदान के बाद किए गए सर्वेक्षण परिणाम को पुष्ट करते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि सर्वेक्षण कई बार गलत भी साबित हुए हैं, लेकिन इस बार का सर्वेक्षण सटीक होकर वही तस्वीर दिखा रहे हैं, जो उन्होंने देखा। इससे ऐसा लगता है कि अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी अपना स्वयं का परीक्षण करने में चूक गए। उनको लगता ही नहीं था कि उनकी पार्टी सत्ता से बाहर भी हो सकती है।

आम आदमी पार्टी के सत्ता से बाहर होने के बारे में यह भी कहा जा रहा आम आदमी पार्टी को दूसरों ने कम उनके अपनों ने ही पराजित किया है। आम आदमी पार्टी के कई बड़े नेता इस बात से नाराज थे कि आतिशी मार्लेना को मुख्यमंत्री क्यों बनाया। जबकि आम आदमी पार्टी में इस पद के लिए कई दावेदार थे। अतः यह स्वाभाविक थी जो नेता राजनीतिक आकांक्षा को लेकर कार्य कर रहे थे, उनके सपनों पर पानी फिर गया। कहा यह भी जा रहा है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद आतिशी खुद नहीं चाहती थी कि अरविन्द केजरीवाल जीत कर आएं, क्योंकि वे जीतते तो आतिशी को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ता। इसलिए यह कहना उचित होगा कि आम आदमी पार्टी की पराजय में उनके अपनों का ही योगदान है। रही सही कसर कांग्रेस ने पूरी करदी। कहा यह भी जा रहा है कि इंडी गठबंधन का बिखराव भी आम आदमी पार्टी की पराजय का कारण बना। अभी तक राजनीतिक शून्यता का टैग लगा चुकी कांग्रेस पार्टी ने इस चुनाव को बहुत गंभीरता से लिया। कांग्रेस ने हालांकि उन्हीं क्षेत्रों में बहुत परिश्रम किया, जहां उनका व्यापक प्रभाव था। लगभग बीस सीटों पर किए गए इस प्रयास के कारण भले ही कांग्रेस अपेक्षित सफलता के द्वार तक नहीं पहुंची, लेकिन कांग्रेस के इसी प्रयास ने आम आदमी पार्टी के लिए सत्ता के मार्ग का दरवाजा बंद करने में प्रमुख भूमिका निभाई। पिछले लोकसभा चुनाव में साथ जीने मरने की कसम खाने वाले भाजपा विरोधी राजनीतिक दल एक मंच पर आकर मिलकर चुनाव लड़ने की बात कर रहे थे, लोकसभा चुनाव में कहीं कहीं ऐसा दिखा भी, लेकिन दिल्ली के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल खुद ही अकेले मैदान में कूद गए। कांग्रेस भी मैदान में आ गई और विपक्ष का वोट, जो अब तक केजरीवाल को ही मिलता था, वह नहीं मिल सका। इसलिए कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने भी आम आदमी पार्टी को हराने का काम किया।

- सुरेश हिंदुस्तानी

वरिष्ठ पत्रकार

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