विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार कर कांग्रेस ने पाकिस्तान जैसा राक्षस पैदा करने की ऐतिहासिक गलती की

By नीरज कुमार दुबे | Aug 13, 2025

1947 का भारत-विभाजन इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है। लाखों लोग अपने घर-परिवार, ज़मीन-जायदाद छोड़ने पर मजबूर हुए, लाखों लोगों की हत्या हुई और करोड़ों लोग विस्थापन की त्रासदी से जूझे। यह केवल एक भू-राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि एक स्थायी घाव था, जो आज भी भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है। कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने अंग्रेजों द्वारा पेश किए गए विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर ऐतिहासिक भूल की थी जिसकी भरपाई आज भी समस्त भारतीय कर रहे हैं। हालांकि कई इतिहासकार तत्कालीन परिस्थितियों में विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार करने को "व्यावहारिक समाधान" बताते हैं, लेकिन इसके आलोचक मानते हैं कि यह एक ऐसी रणनीतिक गलती थी, जिसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है।

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देखा जाये तो विभाजन स्वीकार करना, जिन्ना के इस तर्क को अप्रत्यक्ष रूप से वैध ठहराना था कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते। इससे न केवल भारत की धर्मनिरपेक्षता को झटका लगा, बल्कि यह तर्क बाद के दशकों में पाकिस्तान के भारत-विरोधी नैरेटिव की जड़ बन गया। साथ ही पाकिस्तान बनने से भारत का भू-राजनीतिक नक्शा बदल गया। पश्चिम में पाकिस्तान और पूर्व में (1971 तक) पूर्वी पाकिस्तान की मौजूदगी ने भारत को दो मोर्चों पर रक्षा की चुनौती में झोंक दिया। इसके साथ ही विभाजन के साथ ही कश्मीर का मुद्दा सामने आया। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान के कबायली हमले ने इस विवाद को जन्म दिया, जो आज तक भारत की सबसे बड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती है। इसके अलावा, पाकिस्तान की स्थापना ने भारत की पश्चिमी सीमा पर एक स्थायी शत्रु पैदा कर दिया। चार बड़े युद्ध (1947, 1965, 1971, 1999) और लगातार सीमा पार आतंकवाद इस गलती की प्रत्यक्ष कीमत हैं।

इसके अलावा, विभाजन से उपजी समस्याएं जो आज भी भारत को परेशान कर रही हैं उनमें सीमा पार आतंकवाद सबसे बड़ी चुनौती है। दरअसल पाकिस्तान की सुरक्षा नीति का केंद्र भारत को अस्थिर करना है। इसके साथ ही भारत का रक्षा बजट हर साल बढ़ता जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान से खतरा हमेशा बना हुआ है। यह खर्च शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में निवेश को सीमित करता है। अगर पाकिस्तान नहीं बना होता, तो यह पैसा विकास कार्यों में लगाया जा सकता था।

इसके अलावा, विभाजन ने हिंदू-मुस्लिम अविश्वास की खाई गहरी की। आज भी चुनावी राजनीति में पाकिस्तान का हवाला देकर वोट बैंक प्रभावित करने की कोशिश होती है। यह सामाजिक एकता के लिए एक बड़ी चुनौती है। साथ ही, अगर विभाजन न हुआ होता, तो भारत के पास अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी ज़मीनी पहुंच होती। आज पाकिस्तान के कारण यह संपर्क टूट चुका है और भारत क्षेत्रीय व्यापारिक ब्लॉकों से भी वंचित है। इसके अलावा, 1947 में करोड़ों लोगों का पलायन हुआ, जिसमें हिंसा, बलात्कार, लूटपाट और सामूहिक हत्याएं हुईं। इन घावों की स्मृति पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, जिसने साम्प्रदायिक संबंधों में तनाव बनाए रखा है। 

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि अगर कांग्रेस नेतृत्व विशेषकर नेहरू ब्रिटिश हड़बड़ी और मुस्लिम लीग की ज़िद के सामने कुछ और समय तक टिका रहते तो पाकिस्तान का गठन रोका जा सकता था। वहीं कुछ अन्य कहते हैं कि तत्कालीन हिंसक माहौल, ब्रिटिश समय-सीमा और विभाजन-रोधी ताकतों की कमज़ोर स्थिति को देखते हुए यह बात पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती कि विभाजन को रोका जा सकता था। देखा जाये तो कांग्रेस द्वारा विभाजन स्वीकारना तत्कालीन हालात में ‘समाधान’ की तरह दिख रहा था, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम भारत के लिए बेहद महंगे साबित हुए। यह निर्णय केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि भरोसे, विकास और सामाजिक सौहार्द का भी बंटवारा था।

आज 78 साल बाद भी, भारत पाकिस्तान-जनित चुनौतियों— कश्मीर विवाद, सीमा पार आतंकवाद, रक्षा बोझ और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से जूझ रहा है। विभाजन हमें यह सिखाता है कि अल्पकालिक राजनीतिक समाधान, अगर दूरगामी दृष्टि के बिना लिए जाएं, तो वह पीढ़ियों तक देश को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकते हैं।

देखा जाये तो भारत-पाकिस्तान संबंधों की मौजूदा कीमत केवल युद्ध, गोलीबारी या आतंकी हमलों के आंकड़ों में नहीं मापी जा सकती। असली बोझ इससे कहीं गहरा है— सामाजिक अविश्वास, आर्थिक नुकसान, स्थायी सुरक्षा खतरे और विकास पर लगा अदृश्य ताला। और इस ऐतिहासिक बोझ की जड़ में कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व की अदूरदर्शिता है, जिसने अंग्रेजों की विभाजनकारी नीति को समय रहते चुनौती नहीं दी।

महात्मा गांधी धर्म के आधार पर देश के बंटवारे के खिलाफ थे। उनके लिए आज़ादी का मतलब केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि शांति, सद्भाव और समानता वाला भारत था। इसी वजह से वह 15 अगस्त 1947 के जश्न में शामिल नहीं हुए क्योंकि यह वह ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ नहीं थी जिसके लिए उन्होंने सत्याग्रह और असहयोग आंदोलनों की अगुवाई की थी। कांग्रेस नेतृत्व की सहमति ने उनके सपनों को आधा-अधूरा कर दिया था।

साथ ही, इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने जिन देशों में विभाजन कराया— आयरलैंड, फिलिस्तीन, साइप्रस और भारत, उनमें भारत का विभाजन ही सबसे रक्तरंजित रहा। लाखों जानें गईं, करोड़ों लोग बेघर हुए और पीढ़ियों तक घाव ताजा रहे। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कांग्रेस का तत्कालीन नेतृत्व अंग्रेजों की चाल और उनकी ‘फूट डालो, राज करो’ नीति को भली-भांति समझता था, तब भी उन्होंने विभाजन का खुलकर विरोध क्यों नहीं किया था? क्या यह राजनीतिक थकान थी, साम्प्रदायिक हिंसा के दबाव में लिया गया समझौता था? या फिर सत्ता तक शीघ्र पहुंचने की अधीरता थी? जो भी कारण रहे हों, उनका परिणाम आज भी भारत भुगत रहा है। देखा जाये तो इतिहास के उस मोड़ पर लिया गया निर्णय न केवल तत्कालीन पीढ़ी के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्थायी संकट का कारण बन गया।

बहरहाल, देश के विभाजन के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। अपनी आजादी का जश्न मनाते हुए एक कृतज्ञ राष्ट्र के रूप में हमें अपनी मातृभूमि के उन बेटे-बेटियों को 14 अगस्त के दिन विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर अवश्य नमन करना चाहिए, जिन्हें हिंसा के उन्माद में अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी थी। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस हमें भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना के जहर को खत्म करने के लिए न केवल प्रेरित करता है बल्कि इससे देश की एकता, सामाजिक सद्भाव और मानवीय संवेदनाएं भी मजबूत होंगी।

-नीरज कुमार दुबे

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