प्रशासक ऐसे होने चाहिएं (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jun 28, 2021

बहुत साल पहले एक राजनीतिक सीरियल आया था जिसमें फारुख शेख और जयंत कृपलानी ने जीवंत अभिनय किया था। फारुख शेख मंत्री व जयंत कृपलानी सरकारी अफसर बने थे। सरल स्वभाव मंत्री को बुद्धिमान ब्यूरोक्रेट कैसे हैंडल करते हैं इसका बहुत दिलचस्प चित्रण उस सीरियल में था। आजकल मामला वैसा नहीं है, प्रशासक अपने शासक को नचाना तो चाहते हैं लेकिन शासक उन्हें अपने इशारों पर चलाना चाहते हैं  इस बीच बेचारा देश वक़्त के नज़ारे देखता रहता है। राजनीति में आना अलग बात है लेकिन उचित तरीके से शासन कर पाना अलग बात है तभी तो यह कहा जाता रहा है कि शासक तो आते जाते रहते हैं, पार्टियां बदलते रहते हैं, असली शासक तो अफसरशाही ही होती है। राजनेता अस्थायी होते हैं और अफसर स्थायी होते हैं, जैसे प्रकाशक स्थायी होते हैं और लेखक आते जाते रहते हैं। मैदान वही रहता है, खिलाड़ी आते हैं, कोई जीतकर जाता है और कोई हार कर जाता है।

इसे भी पढ़ें: बरसात से न निपटने के लिए बैठक (व्यंग्य)

बताते हैं एक प्रशासक और ठेकेदार के बीच, एक महंगी निर्माण योजना को लेकर जो संजीदा वायदा हुआ था वह पूरा नहीं हुआ। साहिब ने खफा होकर फाइल अपने पास मंगा ली और जब ठेकेदारजी, जो छोटे मोटे नेता भी थे, मिलने आए तो पीए ने ठेकेदारजी को साहिब के हाथ से लिखा हुआ दिखा दिया। प्रशासक ने अपनी ज़बरदस्त, खतरनाक कलम से जहां EPRIOVED अंग्रेज़ी में ‘एप्रूव्ड’ लिखा था उसके सामने ‘नॉट’ लिख दिया जिससे वह ‘नॉट एप्रूव्ड’ हो गया। अब पुरानी ऑफर धराशायी हो चुकी थी, ठेकेदार ने नया वायदा पूरा करना था। वह खुद फ़ाइल लेकर साहिब के पास गए, पीए ने पुष्टि कर दी कि काम हो गया है। साहिब ने अपनी सुन्दर कलम से ‘नॉट’ के आगे अंग्रेज़ी की ‘ई’ लगाकर उसे ‘नोट एप्रूव्ड’ कर दिया था। संतुष्ट ठेकेदारजी ने राजनीतिजी से कहा हमें ऐसे ही प्रशासक चाहिए।

- संतोष उत्सुक

प्रमुख खबरें

Sugar और Onion Prices ने त्योहारी मौसम में बिगाड़ा रसोई का बजट, महंगाई को काबू करना PM Modi के सामने सबसे बड़ी चुनौती

Festival Fashion Trend: रक्षाबंधन पर Anarkali Suit में दिखना है गॉर्जियस? फॉलो करें ये Expert Style Guide

बिहार में CM Samrat Choudhary ने शुरू किए स्टूडेंट सपोर्ट कैंप, शिकायतों का होगा तुरंत समाधान

Jan Gan Man: Nashik Kumbh पर Justice Prasanna Varale के बयान पर मचा बवाल, आखिर सिर्फ Hindu आयोजनों पर ही क्यों उठाये जाते हैं प्रश्न?