By नीरज कुमार दुबे | Apr 08, 2026
मध्य पूर्व आज बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का ज्वलंत उदाहरण बन चुका है। जिस अमेरिका ने दशकों तक इस क्षेत्र को अपनी रणनीतिक मुट्ठी में रखा, वही आज यहां अपनी पकड़ खोता नजर आ रहा है। पहले गाजा में तबाही और अब ईरान युद्ध से उपजे हालात अरब देशों को गहरी चिंता में डाल गये हैं। गाजा में हमले और ईरान युद्ध से लाखों लोग बेघर हुए, हजारों जिंदगियां खत्म हुईं और पूरे क्षेत्र में तबाही का मंजर फैल गया। इस सबसे अरब दुनिया के लोगों के दिल और दिमाग में बड़ा बदलाव आया है। हम आपको बता दें कि अरब दुनिया में अब अमेरिका के लिए भरोसा लगभग खत्म हो चुका है। जनता उसे एक पक्षीय, अवसरवादी और नैतिक रूप से कमजोर शक्ति के रूप में देख रही है। इसके उलट चीन और रूस को अधिक संतुलित और भरोसेमंद विकल्प माना जाने लगा है। लोग अब यह मानने लगे हैं कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून की बात केवल तब करता है जब उसे फायदा हो। अरब देश यह भी देख रहे हैं कि गाजा अब भी मलबे में दबा है और वहां पुनर्निर्माण की कोई ठोस पहल नजर नहीं आती।
इसके अलावा, खाड़ी देशों ने दशकों तक अमेरिका को अपने यहां सैन्य अड्डे बनाने की अनुमति देकर यह भरोसा किया था कि इससे उनकी सुरक्षा मजबूत होगी और वह किसी भी बाहरी खतरे से सुरक्षित रहेंगे। लेकिन ईरान के साथ हालिया युद्ध ने इस धारणा को गहरे स्तर पर झकझोर दिया है। हकीकत यह सामने आई कि यही अमेरिकी अड्डे खाड़ी देशों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन गए। ईरान ने सीधे तौर पर उन ठिकानों और संपत्तियों को निशाना बनाया जहां अमेरिकी मौजूदगी थी और इसके चलते हमले खाड़ी देशों की जमीन पर हुए। नतीजा यह हुआ कि नुकसान केवल अमेरिका का नहीं, बल्कि खाड़ी देशों का भी हुआ और उनकी सुरक्षित निवेश गंतव्य तथा स्थिर क्षेत्र की छवि को गहरा आघात पहुंचा। इसलिए सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि जब संकट की घड़ी आई तो अमेरिका अपने ही सैन्य अड्डों के आसपास स्थित देशों को पूर्ण सुरक्षा नहीं दे सका। ऐसे में अब यह बहस तेज हो रही है कि क्या खाड़ी देश भविष्य में अमेरिका को अपने यहां सैन्य मौजूदगी जारी रखने देंगे या वह इस मॉडल पर पुनर्विचार करेंगे। यह घटनाक्रम पूरी दुनिया को यह संदेश भी देता है कि किसी बाहरी शक्ति को अपने भूभाग पर सैन्य अड्डे देने की कीमत कितनी भारी पड़ सकती है।
इसलिए मध्य पूर्व में आने वाले समय में रणनीतिक स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अरब देश समझ रहे हैं कि अमेरिका की अगुवाई वाली व्यवस्था अब दरक रही है। अरब देश अब खुलकर या चुपचाप अपने विकल्प तलाश रहे हैं। चीन और रूस के साथ रिश्ते मजबूत हो रहे हैं। रक्षा सहयोग बढ़ रहा है, व्यापारिक साझेदारियां गहरी हो रही हैं और नए बहुपक्षीय मंचों की ओर झुकाव साफ दिख रहा है। साथ ही खाड़ी देशों ने युद्ध से पहले अमेरिका को चेताया था, लेकिन उनकी अनदेखी की गई। अब जब वह खुद नुकसान झेल रहे हैं, तो वह अपने निवेश और गठबंधनों पर दोबारा सोचने को मजबूर हैं।
देखा जाये तो अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी इजराइल के प्रति अंध समर्थन बन चुकी है। अरब जनता इसे अन्याय और दोहरे मापदंड के रूप में देखती है। लोगों का मानना है कि अमेरिका ने न तो मानवाधिकारों की रक्षा की और न ही अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन किया। यही कारण है कि अब चीन को ज्यादा जिम्मेदार और संतुलित शक्ति माना जा रहा है। यह अमेरिका के प्रभाव के खत्म होने का संकेत है।
साथ ही इस पूरे संकट ने वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को भी पक्षपाती माना जा रहा है। लोगों का भरोसा नियम आधारित व्यवस्था से उठ रहा है। यह संकेत है कि दुनिया अब एक नई, बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है जहां पश्चिम का प्रभुत्व कमजोर होगा।
वैसे, अमेरिका के पास अभी भी मौका है, लेकिन समय तेजी से निकल रहा है। अगर वह ईरान युद्ध को जल्द खत्म करता है और फिलिस्तीन मुद्दे पर न्यायपूर्ण रुख अपनाता है, तो कुछ हद तक अपनी साख बचा सकता है। लेकिन अगर वही नीतियां जारी रहीं, तो मध्य पूर्व में उसका प्रभाव इतिहास बन सकता है।
बहरहाल, अमेरिका की गिरती साख, खाड़ी देशों का आर्थिक संकट और बदलता जनमत यह साफ संकेत दे रहे हैं कि शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। अगर अब भी अमेरिका ने दिशा नहीं बदली, तो मध्य पूर्व में उसकी जगह कोई और लेने के लिए पूरी तरह तैयार है।
-नीरज कुमार दुबे