कभी कुछ न करके भी देखो...अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच 5 Star स्ट्रैटर्जी से अब चीन दुनिया पर राज करेगा?

जब मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जंग तेज हुई, तो सबको लगा था कि दुनिया की बड़ी ताकतें भी इसमें कूदेंगी। लेकिन चीन ने खुद को इससे बिल्कुल दूर रखा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो डेडलाइन दी थी वो तो गुजर चुकी है। जिस हमले को लेकर उन्होंने दावा किया था वो हमला भी नहीं हुआ। बैकफुट पर वो आ गए हैं और सब की नजरें इस वक्त उन देशों पर टिकी हुई हैं जो देश युद्ध में इनवॉल्व हैं। अमेरिका का क्या रुख होगा? डॉनल्ड ट्रंप अब कौन सा फैसला लेंगे। हर कोई इसी पर नजर गड़ाए हुए हैं। बहरहाल जब डेडलाइन क्रॉस होनी थी आज सुबह 5:30 बजे तक उससे पहले एक बड़ी खबर आई और वो ये कि ईरान के ऑयल अब खारक आइलैंड पर हमला किया गया है। गल्फ कंट्रीज में इस वक्त बवाल मचा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को धमकी दी थी कि अगर उसने डील नहीं की और होर्मुज समुद्री मार्ग नहीं खोला तो ईरान पर इतने हमले करेंगे कि वह पाषाण युग में चला जाएगा। लेकिन कुछ ही घंटे बाद अचानक से सीजफायर का ऐलान हो जाता है।
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कभी कुछ न करके भी देखो
आज आपको 2019 में चर्चित हुए एक ऐड की याद दिलाते हैं। इस विज्ञापन में दिखाया गया है कि युवक कैडबरी 5स्टार चॉकलेट बार का आनंद ले रहा है, तभी महिला उससे अपनी छड़ी उठाने के लिए कहती है जो उससे गलती से गिर गई थी, जिस पर वह हां कह देता है लेकिन कुछ नहीं करता। फिर बुजुर्ग महिला छड़ी उठाने के लिए उठती है। ठीक उसी क्षण, एक विशाल पियानो उस बेंच पर गिरता है जहाँ वह कुछ देर पहले बैठी थी। इसके बाद वह युवक को धन्यवाद देती है कि उसने कुछ नहीं किया, क्योंकि इसी वजह से उसकी जान बच गई। विज्ञापन चॉकलेट उत्पाद की नई टैगलाइन के साथ समाप्त होता है- कभी कुछ न करके भी देखो और 5 स्टार खाओ। कुछ मत करो। ऐसा ही कुछ नजारा इन दिनों एक देश और उसके राष्ट्रपति के साथ मैच कर रहा है। न उस देश ने अपनी फौज उतारी, न कोई बमबारी की और न ही कोई बड़ा बयान देकर फालतू का हो हल्ला मचाया। दुनिया ईरान के मामले में उलझी रही, लेकिन चीन ने चालाकी से किनारे होकर ईरान से सस्ते दाम पर तेल खरीदना जारी रखा। सच तो यह है कि अगर कोई एक देश है जिसने खुद को इस लड़ाई-झगड़े से पूरी तरह दूर रखा है, तो वो चीन ही है। चीन की इसी चुपचाप बैठकर तमाशा देखो वाली नीति की आजकल पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। मशहूर मैगजीन द इकोनॉमिस्ट ने तो इसे अपने कवर पेज पर छापा है। उन्होंने चीन की इस चाल को एक पुरानी कहावत के जरिए समझाया है: जब आपका दुश्मन खुद अपनी बर्बादी का रास्ता चुन रहा हो या गलती कर रहा हो, तो उसे टोककर उसकी गलती सुधारने की कोशिश कभी मत करो। चीन बस वही कर रहा है। दूसरों को उलझते देख रहा है और खुद चुपचाप अपना फायदा निकाल रहा है।
जिनपिंग ने खुलकर कुछ नहीं बोला
जब मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जंग तेज हुई, तो सबको लगा था कि दुनिया की बड़ी ताकतें भी इसमें कूदेंगी। लेकिन चीन ने खुद को इससे बिल्कुल दूर रखा। उसकी प्रतिक्रिया बहुत ठंडी रही; यहाँ तक कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस लड़ाई पर सार्वजनिक रूप से एक शब्द भी नहीं कहा। वह बस चुपचाप बैठकर तमाशा देखते रहे। अमेरिका को लगा था कि वह ईरान की सरकार बदल देगा और उसके परमाणु प्रोग्राम को रोक देगा, लेकिन उल्टा वह खुद एक कभी न खत्म होने वाली जंग में फंस गया। नतीजा क्या निकला? अमेरिका पर युद्ध का भारी कर्ज चढ़ गया, खाड़ी देशों के साथ उसके रिश्तों में खटास आ गई और अपने ही साथी (नाटो) देशों के साथ अनबन शुरू हो गई। चीन के लिए इससे बेहतर स्थिति और क्या हो सकती थी!
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चीन पर 'द इकोनॉमिस्ट' का कवर
इस बात को 'द इकोनॉमिस्ट' के कवर पर बहुत ही शानदार ढंग से दिखाया गया है। इसकी हेडलाइन असल में एक ऐसा कथन है, जिसका श्रेय आमतौर पर फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट को दिया जाता है। सैन्य संदर्भ में, इसका मूल अर्थ यह है कि जब आपका विरोधी कोई गलती कर रहा हो या कोई भारी पड़ने वाला कदम उठा रहा हो, तो ऐसे में बीच में दखल देने के बजाय, चुपचाप उसे देखते रहना ही ज़्यादा समझदारी होती है। कवर इमेज भी प्रतीकात्मक है। इसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एकदम साफ़ दिखाई दे रहे हैं, जबकि डोनाल्ड ट्रंप की इमेज धुंधली है। यह इस बढ़ती हुई वैश्विक सोच को दिखाता है कि एक अस्थिर दुनिया में बीजिंग को फ़ायदा हो सकता है, जबकि वॉशिंगटन मध्य-पूर्व की उथल-पुथल में उलझा हुआ है। जब ट्रंप ने यह टकराव शुरू किया था, तब उनके मन में यह बात नहीं थी। अमेरिका के राष्ट्रपति का मानना है कि तेल के बहाव को कंट्रोल करने से दुनिया के मंच पर ताक़त मिलती है। वेनेज़ुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने और देश के विशाल कच्चे तेल के भंडार पर कब्ज़ा करने के लिए उनका साहसी ऑपरेशन इस बात के काफ़ी संकेत देता है। ईरान के ऊर्जा बहाव को अमेरिका के कंट्रोल में लाना उनकी लिस्ट में अगला काम था। ट्रंप इसका इस्तेमाल चीन के साथ सौदेबाज़ी के लिए एक हथियार के तौर पर कर सकते थे, जो ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। दोनों नेताओं के बीच अगले महीने बीजिंग में एक मुलाक़ात तय है। लेकिन ईरान ज़्यादा मज़बूत साबित हुआ। उसने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करके अपना सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता खेल दिया है; यह एक ऐसा अहम जलमार्ग है जिससे दुनिया का पाँचवाँ हिस्सा तेल और गैस गुज़रता है। इस तरह, ईरान ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बना लिया है।
ऑयल क्राइसिस से बीजिंग ने खुद को कैसे बचाया
अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद भी हो जाए, तो चीन को उससे खास फर्क नहीं पड़ेगा। ईरान का खास दोस्त होने के नाते चीन को पिछले कुछ हफ्तों में 'शैडो फ्लीट्स' (पुरानी और बिना बीमा वाली जहाजों की फौज) के जरिए लाखों बैरल ईरानी तेल मिला है। यही नहीं, चीन ने समझदारी दिखाते हुए आठ अलग-अलग देशों से तेल खरीदना शुरू कर दिया है, जिसका उसे अब बड़ा फायदा मिल रहा है। असल में, बीजिंग सालों से ऐसे ही बुरे वक्त की तैयारी कर रहा था। उसने तेल का बड़ा भंडार जमा कर लिया है, अपने देश में उत्पादन बढ़ा दिया है और साथ ही रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) में भी भारी निवेश किया है। चीन के इस बढ़ते तेल भंडार के पीछे 'टीपॉट' रिफाइनरियों का बड़ा हाथ है। ये छोटी और निजी रिफाइनरियां हैं, जिनका इस्तेमाल चीन अमेरिकी पाबंदियों से बचने के लिए ईरान और रूस से सस्ता कच्चा तेल मंगाने के लिए करता है। ये रिफाइनरियां सरकारी कंपनियों से अलग, स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच, इन्हीं छोटी रिफाइनरियों ने चीन की अर्थव्यवस्था को डगमगाने नहीं दिया। इसके अलावा, चीन की अर्थव्यवस्था दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वहाँ बिकने वाली नई कारों में से आधी इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ (EVs) हैं। इस वजह से चीन को पेट्रोल-डीजल की उतनी किल्लत महसूस नहीं हो रही है और उसके फ्यूल पंपों पर कोई दबाव नहीं पड़ा है।
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चीन का मौन रिएक्शन
इस तरह, इस उथल-पुथल से खुद को अलग रखकर, चीन ने खुद को एक स्थिर विकल्प के तौर पर पेश किया है। वह एक लंबी चाल चल रहा है। उसने इस संघर्ष में अमेरिका या इज़रायल को सीधे तौर पर हमलावर भी नहीं बताया है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने पिछले महीने कहा था, ताकत से ही सही साबित नहीं होता। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे की सोच यह है कि भू-राजनीतिक तनावों से ऐसे अवसर पैदा होने दिए जाएं, जिनका इस्तेमाल चीन बाद में अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए कर सके। शायद इसी स्थिर छवि की वजह से पाकिस्तान जो अमेरिका और ईरान के बीच एक अप्रत्याशित मध्यस्थ के तौर पर उभरा है—अपने 'हर मौसम के दोस्त' चीन का समर्थन पाने के लिए तुरंत उसके पास पहुँचा। इससे चीन को शांतिदूत की भूमिका निभाने का एक मौका मिल गया। हालाँकि, शेखी बघारने वाले बयानों के बजाय, चीन ने युद्धविराम और 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' को फिर से खोलने के लिए पाँच-सूत्रीय योजना जारी की। बीजिंग ने न तो वॉशिंगटन का सामना किया और न ही उसकी आलोचना की। उसने एक व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बने रहना चुना। तब से, चीन ने अपनी कूटनीति को और तेज़ कर दिया है, जिससे अमेरिका को काफ़ी नागवारी गुज़री है। एक लंबा युद्ध चीन के लिए भी फ़ायदेमंद नहीं है। तेल संकट के कारण अस्थिर हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था, दुनिया भर में चीन की सामान बेचने की क्षमता पर गंभीर चोट पहुँचाएगी।
चीन अब दुनिया पर राज करेगा?
सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस लड़ाई ने अमेरिका का ध्यान ईस्ट एशिया (चीन के पड़ोस) से भटका दिया है। अगर ईरान का संकट इसी तरह चलता रहा, तो अमेरिका को अगले कई सालों तक खाड़ी देशों की 'आग बुझाने' में ही अपनी ताकत लगानी पड़ेगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका 'इंडो-पैसिफिक' इलाके (जहाँ चीन अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है) पर उतना ध्यान नहीं दे पाएगा। साथ ही, हॉर्मुज जलडमरूमध्य का भविष्य क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। ऐसे में जो देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर डरे हुए हैं, वे मजबूरी में चीन की 'ग्रीन टेक्नोलॉजी' (सोलर और इलेक्ट्रिक तकनीक) की ओर खिंचे चले आएंगे। चीन के लिए ईरान के झगड़े में पड़ने से कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि भविष्य की दुनिया पर उसका कब्जा हो। बीजिंग, अमेरिका के इस अंधाधुंध सैन्य हमले का इस्तेमाल भारत और ब्राजील जैसे 'ग्लोबल साउथ' के देशों को एक कड़ा संदेश देने के लिए भी कर सकता है। वह दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि वाशिंगटन (अमेरिका) सिर्फ अपनी दादागिरी चलाना जानता है और दूसरों के मामलों में दखल देकर तबाही मचाता है।
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