Greenland के बाद Indian Ocean में स्थित Diego Garcia Island पर नजरें गड़ा कर Trump ने सबको चौंकाया

By नीरज कुमार दुबे | Jan 21, 2026

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों की आग अब यूरोप से निकलकर हिंद महासागर तक पहुंच गई है। ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क और यूरोप को घेरने के बाद ट्रंप ने अब ब्रिटेन और मॉरिशस के बीच हुए डिएगो गार्सिया समझौते पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने इस सौदे को नाटो सहयोगी ब्रिटेन की कमजोरी और भारी मूर्खता करार देते हुए कहा कि इससे चीन और रूस जैसे देश उत्साहित होंगे।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर लिखा कि डिएगो गार्सिया एक अत्यंत महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य अड्डा है और इसे सौंपना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक संदेश है। उन्होंने इसे ग्रीनलैंड को हासिल करने की अपनी दलील से भी जोड़ा और कहा कि अंतरराष्ट्रीय ताकतें केवल ताकत की भाषा समझती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में भारत का नाम ट्रंप ने नहीं लिया, जबकि भारत इस सौदे का खुला समर्थक है। नई दिल्ली लंबे समय से मॉरिशस के संप्रभु अधिकारों के पक्ष में रही है और उसने ब्रिटेन को उपनिवेशवाद के इस अध्याय को समाप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया है। भारत ने मॉरिशस को आर्थिक और सुरक्षा सहयोग के तहत भारी पैकेज देने का भी फैसला किया है। इसमें समुद्री संरक्षित क्षेत्र का विकास, उपग्रह स्टेशन की स्थापना और हाइड्रोग्राफिक सर्वे जैसे कदम शामिल हैं। यह सब उस समय हो रहा है जब चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है और मॉरिशस के साथ उसके व्यापारिक रिश्ते भी गहरे हैं।

देखा जाये तो डोनाल्ड ट्रंप का डिएगो गार्सिया पर दिया गया ताजा बयान उनकी विस्तारवादी और शक्ति प्रदर्शन की सोच का स्पष्ट संकेत है। ग्रीनलैंड हो या डिएगो गार्सिया, ट्रंप का तर्क यही है कि अमेरिका को रणनीतिक भूभागों पर सीधा नियंत्रण चाहिए, चाहे इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहमति और इतिहास की अनदेखी ही क्यों न करनी पड़े।

हम आपको बता दें कि डिएगो गार्सिया का सामरिक महत्व असाधारण है। हिंद महासागर के मध्य में स्थित यह द्वीप अफ्रीका, पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच एक प्राकृतिक सैन्य चौकी की तरह है। यमन, अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया में अमेरिका की कई सैन्य कार्रवाइयों में इस अड्डे की भूमिका निर्णायक रही है। शीत युद्ध के दौर में इसी अड्डे के निर्माण का फैसला भारत के लिए कड़वे अनुभव से जुड़ा है, जब 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान अमेरिकी नौसैनिक टास्क फोर्स को बंगाल की खाड़ी में भेजा गया था। उसी घटना ने अमेरिका को यह अहसास कराया कि हिंद महासागर में स्थायी ठिकाना कितना जरूरी है।

भारत के लिए डिएगो गार्सिया और चागोस द्वीपसमूह का महत्व केवल इतिहास तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र भारत के समुद्री प्रभाव क्षेत्र के केंद्र में आता है। आज जबकि चीन अपने सैन्य और आर्थिक कदमों से हिंद महासागर में दखल बढ़ा रहा है, भारत के लिए यह आवश्यक है कि यहां शक्ति संतुलन बना रहे। मॉरिशस की संप्रभुता को समर्थन देकर भारत एक ओर उपनिवेशवाद विरोधी सिद्धांत पर खड़ा है, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय स्थिरता में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है।

ट्रंप का बयान इस पूरी प्रक्रिया पर अनिश्चितता का साया डालता है। यदि अमेरिका लीज से संतुष्ट न होकर सीधे स्वामित्व की मांग करने लगे, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता की अवधारणा के लिए खतरनाक मिसाल बनेगी। यह वही सोच है जो ग्रीनलैंड के मामले में भी दिखती है, जहां एक संप्रभु देश के भूभाग को केवल सामरिक जरूरत बताकर हासिल करने की बात कही जा रही है।

दुनिया के लिए खतरा केवल इतना नहीं है कि एक महाशक्ति आक्रामक बयान दे रही है, बल्कि खतरा यह है कि ताकत के आधार पर सीमाएं और संप्रभुता तय करने की प्रवृत्ति फिर से सिर उठा रही है। यदि यह चलन मजबूत हुआ, तो छोटे और मध्यम देशों की सुरक्षा और स्वतंत्र निर्णय क्षमता पर सीधा खतरा होगा। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, जो नियमों और समझौतों पर टिकी है, धीरे-धीरे जंगल के कानून की ओर बढ़ सकती है।

भारत के नजरिये से देखें तो ट्रंप का यह रुख सावधानी की घंटी है। अमेरिका के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग के बावजूद भारत को अपने समुद्री हितों और क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर सतर्क रहना होगा। डिएगो गार्सिया पर संतुलित व्यवस्था, जिसमें मॉरिशस की संप्रभुता, भारत की क्षेत्रीय भूमिका और अमेरिका की सुरक्षा जरूरतें साथ चलें, वही हिंद महासागर में स्थिरता की कुंजी है।

बहरहाल, ट्रंप का बयान केवल एक द्वीप या एक अड्डे तक सीमित नहीं है। यह उस सोच का प्रतीक है जो दुनिया को सहयोग नहीं, बल्कि अधिग्रहण की नजर से देखती है। ऐसी सोच यदि हावी हुई, तो वैश्विक शांति और संतुलन दोनों के लिए इसके नतीजे गंभीर और दूरगामी होंगे।

-नीरज कुमार दुबे

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