By नीरज कुमार दुबे | Jan 08, 2026
असम में चुनावी साल से पहले हिमंत बिस्व सरमा की सरकार ने दो मोर्चों पर सख्त और स्पष्ट संदेश दे दिया है। एक ओर महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने की मुहिम को अभूतपूर्व रफ्तार दी गई है, तो दूसरी ओर जंगल और सरकारी जमीन पर अवैध कब्जों के खिलाफ बुलडोजर और प्रशासनिक सख्ती पूरी ताकत से सामने आई है। हम आपको बता दें कि राज्य सरकार ने महिला आत्मनिर्भरता कार्यक्रम के तहत अब तक करीब 15 लाख महिलाओं को स्वरोजगार के लिए सीड कैपिटल प्रदान किया है। लक्ष्य है कि आने वाले महीनों में यह संख्या 40 लाख तक पहुंचाई जाए। योजना के तहत प्रत्येक महिला को शुरुआती तौर पर दस हजार रुपये दिए जा रहे हैं ताकि वह छोटे व्यापार, कृषि आधारित काम, पशुपालन, दुकान, सिलाई या अन्य स्वरोजगार गतिविधियां शुरू कर सकें। राज्य सरकार का दावा है कि यह केवल सहायता नहीं बल्कि महिलाओं को स्थायी आय के रास्ते पर खड़ा करने का प्रयास है। आगे चलकर सफल महिलाओं को कम ब्याज पर बड़े ऋण देने की भी व्यवस्था की गई है।
इसी के साथ राज्य सरकार ने अवैध अतिक्रमण के खिलाफ भी निर्णायक कार्रवाई तेज कर दी है। हम आपको बता दें कि हाल ही में होजाई जिले में पांच हजार से अधिक बिगहा रिजर्व फॉरेस्ट भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया। प्रशासन का कहना है कि यह जमीन वर्षों से अवैध कब्जे में थी और वन क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंच रहा था। मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में कहा है कि जंगल और सरकारी भूमि पर किसी भी तरह का अवैध कब्जा स्वीकार नहीं किया जाएगा।
राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में एक लाख से अधिक बिगहा सरकारी और वन भूमि खाली कराई जा चुकी है। सोनीटपुर सहित कई जिलों में बड़े पैमाने पर अभियान चलाकर अवैध बस्तियां हटाई गई हैं। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर तीखे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि अवैध कब्जाधारकों के लिए अब असम में कोई जगह नहीं है।
देखा जाये तो असम की राजनीति इस समय दो बेहद साफ और टकरावपूर्ण ध्रुवों पर खड़ी दिखाई दे रही है। एक तरफ कल्याण और सशक्तिकरण की राजनीति, दूसरी तरफ कठोर शासन और पहचान की राजनीति। और इन दोनों के केंद्र में एक ही लक्ष्य है आगामी विधानसभा चुनाव। महिला स्वरोजगार योजना असम की राजनीति में सबसे सटीक वोट बैंक रणनीति है। असम में महिला मतदाता न केवल संख्या में निर्णायक हैं, बल्कि वे घर और समाज के फैसलों को भी दिशा देती हैं। जब सरकार सीधे उनके हाथ में पूंजी देती है, तो वह केवल पैसा नहीं देती, बल्कि सम्मान, भरोसा और भविष्य की उम्मीद देती है। 40 लाख महिलाओं तक पहुंचने का लक्ष्य अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि भागीदार बनाना चाहती है। हम आपको यह भी बता दें कि चुनावी माहौल में यह योजना विपक्ष की जमीन को खिसकाने का भी काम कर रही है, खासकर उन इलाकों में जहां परंपरागत रूप से सरकार विरोधी भावनाएं मजबूत रही हैं।
वैसे असम की राजनीति केवल कल्याण योजनाओं से नहीं चलती। यहां पहचान, जमीन और संसाधन सबसे संवेदनशील मुद्दे रहे हैं। यही वह जगह है जहां अतिक्रमण विरोधी अभियान अपनी पूरी राजनीतिक ताकत दिखाता है। जब सरकार हजारों बिगहा जमीन खाली कराती है और खुलेआम कहती है कि अवैध कब्जाधारक भाग जाएं, तो वह सिर्फ कानून का पालन नहीं करवा रही होती। वह मतदाता के मन में बैठी उस भावना को छू रही होती है जो वर्षों से असुरक्षा, जनसांख्यिकीय बदलाव और जमीन छिनने के डर से बनी है।
यह सख्ती खास तौर पर उन मतदाताओं को संदेश देती है जो मानते हैं कि पहले की सरकारें इस मुद्दे पर कमजोर और समझौतावादी रहीं। वर्तमान नेतृत्व खुद को निर्णायक, निडर और बिना दबाव के फैसले लेने वाला साबित करना चाहता है। चुनावी राजनीति में यह छवि बेहद कीमती होती है। यह कोई संयोग नहीं है कि चुनाव नजदीक आते ही ये दोनों अभियान और तेज हो गए हैं। एक तरफ महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देकर भरोसा जीता जा रहा है, दूसरी तरफ सख्त कार्रवाई से यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि सरकार स्थानीय हितों की रक्षा करने में कोई समझौता नहीं करेगी।
बहरहाल, आगामी विधानसभा चुनाव तय करेंगे कि क्या असम की जनता इस आक्रामक, निर्णायक और स्पष्ट शासन शैली को आगे भी समर्थन देती है या नहीं। फिलहाल संकेत साफ हैं कि सरकार ने चुनावी मैदान में उतरने से पहले अपने हथियार धारदार कर लिए हैं।